9) „= >» 4 ॥ . । ऋ क "^ 4 ति कः ति १.५१ | +न । # 6 च 1 ^ १ क. "१ न छ { * छ । ध <> ; १, भ
| ` ~ | ` छदय८55 0 प +
५/॥॥ ऽ /^ 7 ^ ५.1 ॑ (~) 1
| 1 नी व १ क क # 1 + के ~
ॐ = "नै ५१७२ ॥ ३ [1
1; कै
1 का ति ~
मे
। + हे ् ~ ~ ~~ ~
६3
क कक 0 र ५
हट {<>
` > ~* ३ + ध 1 | ॥ (द्वन श त © 4 ^. * ४ । स्म र ^ > ( ५ ॥।॥। , (५ श 4. >
1 + {® ष ।
छ (ल 1
ऋ
# ५ ) 3 ५.६ छ १० | # 1 # ९ ॥ "ऋ चै च ` {53 र ट
च दू ॥ कै ¢ + च । 4
भ [
ड
+
#
1
। 4, न्न
५ "~ - `
` (गपर+
~
^ १06 89१2 धह
क भ 1 य ड ४१
+
॥ (4 1 4 7
न= ८ = न # 1) ^ तो तः उडी ==
#
[1 =
। क~) 7
॥ 0४८९, 2९ 14५, (म 88168901 81 #811 1 {€ रूभे?+5त 066" 4 ।
„ न; 11. ^ चा १9८ (4...) 1:01. + 0 4
38 0 "+ ^ 124 द 9९/5८ एप ^ ४॥५१॥ 17775 ॥
४0.
( २८५7२] 1] )
|
त
७
द
21/89210.58.:21
(021 ^ 174 ^ 9५ व+
व
] +)
शैः वपष कि गाए । - %*-
। एप्प) एप
ध °^ 1 प्र ^ 1.6.889 (ना < 2६५ ॥16 ४18 ए 1128 11688,
ध ०] पतात 14116, लाभ ©, (11४. ५५
छ 1924 थ
-&8168.916 ३६ 81१ = {€ ए16ब् 166.
चक क ~ क ऋका -- `
(= एः चक य # ॐ # ~= = ४ 2 *4 8 स रै प = $ = 8 ६ कच (भ ~ ध „न ०५ -* +. = कक क = ९ #
: ^ 4. १.३11.101
* ह.
#) । # 18१
॥ ॥ $ ज्म १ # १ # ङ + न | १. १4 11 [ #, ` ६4१ ^? ५1१ ¢ § ¢
नक १ च, ७४7
(षा ^ (^ पर - #~ क~
जा
=
जे
कः
॥ >) = अनव ॐ | -@ इ (
क ' । । ।
+ ॥. ३ | ;
= ह ॐ मि, > च्छ
¢
कः+ ^ ~ र एन @ छ [त १ छ # जद | ॥ # ह 9 । ४ $ । । न च † 1 # बै ' “1 # ५ 4 ।
> न हि कक °
॥ ॥
अम्रतानन्दनाथविराचेता योगिनीद्दयर्दीपिका
धः ( सन द.। )
> ^
«10. 00, 81 ५
ह गताः १06 प्रि/१॥ 71 ( एप्त एषण) +^ 14 ^ कत 6.
27000) 1 प [त1107ण्ला0न्ि 76.
स्का नि 11, ८1 00 9 40 29 01 9 ८८४ गगन. नै (3 + 1 1 1* | ॥
12 4 0] प ^ वात 4 एत, 1.6, 1.1२ 11 प अ) १12 8. <£ प्ण 1.1511.4 दप
8५१२48९ 47 एप ^ ए.९..॥, ए एप 1२४४.
(गा गना ग गाग गगण १ ^ च ^. # * ४ = < ॥॥; ^ ५, "च ॥)
. - -~----- 0 ~= ~~ ~~
$ ररि 40 00
19९4
{=
<कक्कक्क्न्कनकुन्क्कद्नकुनक्क्कुकुन्कन्क्ककृ्५&
॥# 11111.
.. सणाहएऽा
«11 ^ तकाव ^ {44411 (41६01
(7/1 111}
च {)
| १ „+ 4
र 71८4. । {1 (1 ¢ १०2११ ५ 0१ ५१ * न् १1 ११६१ ४8 4. ष च ११7 (कक
4 ।
ॐ, १1 कि १ ४
9.7 9: #
[ 1 ॥ ष च ^ न कै र ऋषिः दीः = = केक + ज नकः (ल वेः कनिति । केः र जननः = > कक । ४ । ४ ४ $ ि ४ ~ ह $ > # ‰ १
12411013 (1. {0८ 1 01;
1118 {0110 10@ [8@©8 €प0०त् 2 व्छण 68.15, ४००९. ६61 एध) 16 ०्ाट्ापरय् ६6९६, ग ४ 00171111, ८६11लव् 172, ङ 91011818 ६68. 06 ६९६४, सला पाऽ ४ [षका 106 प्राप १]र६९8.19 व 1678 ( 06102 ४8 183४ {11166 नर्क डाइ ) ५88 [प्राणा ञल्त् 70 116 ५ प९त्६- ॐव, ध 9668 ४0९९ धा€ाा पणा) 1४8 (01111611 966०२611 [0 दशा दिति8, एप ५06 कपाल्छ्त्मा म ५116 [रा ए 110) एलुगलडलाा४ड कय व1ला€4 11०८ ग घाठपरा) ४ ४11] ३तत् ९0081व्ला वक ४० ०णाः ]त्ो0क]€व्2० ग = #16 8661-6 0611768 2 {६116 &€<]100]
111८ .1८1/104
€ [7 18 ध€ एज], 28 1185 21168त्ङ 6७ 868 ल्त् ५ ¢ 7 }॥8.187त8, रि ६6118, फ }10 ९8118 11170861 16 018©1}9९€र्ण प 8187142 १५० ज {९8811111 1९पष्छणछा. जप 06 [7"९त्दुप्णः शत् चठ ताडने 9८ इध्त् ४0 187९ [ल्ल 168. ॥ 0९18 8110 \€16 ]एा011238 1014१14 11091258, [> प70 $~ प08"8 ९ वा181र६14.ए 11888, ६0 णठ] +© 50110 0 {6 118, क्लि कर्लि8 88 {16 णत ग 5 (01) # 128 2]. 7९684. 1661 [प1151 €.
3681058 16 ए ०छाफा])] 2 त्त, 4 ए] 880 108 35] 7158 0188 327100112+ अप0122०48९६.६९ 11) {116 (^ {8100 प्र 1. 29) ^ पल्ला { 80९] ~ ४५0
६1181 21) त 8 प} ]1 फ
8.१8 |00 07 चत) (९0)
1016 प तार ४8 (णाप
+ (५. 7, 77, | न ` "क † [7 "6 -\श्ञाा17 &2115र{# 61163, पाते 71 6 वगमात् पल. { प्फाञाह्वे 11 6 [र पडो" 39718 ( 3961165.
६ 96160 10 7 ५6 [काह 17. 38, 79, 98 भते 135. व
6ख्०प ५५ 11 {16 {0 0 1९ च्व.
( 2 )
{2 8 ©, साट. दद्र 8कताफो ति धात (रर ता] ( 71 प्रव ). 13६ 1६ 18 र ००६] 1 ५16 01111101. > {11688 (३६६९ ४ 6वक्1 ६2, एए 0118 एए 88 10611162] एप 16 @7९8.६ 1९ ९ञ] 171 ६6६८1161 ° {116 89716 1811068. ४ 16138 03861107 ( 7. 861 ), 1€6116त् ६0 ़ 4 प1<ल[1{, {118६ 41701 पत्18.1 08 20176660 15 17<1151181102.73 = 8.11{1082.1-8 18 €व प९।। 1181) [21168016 ६0 0पाः कप्तान {क ५06 81110 [218 18.301) {118८ {९ 18117.112008. {४10 \१६8३ ६ 01 {ला [दा ० 1९211०8६} ©/110108101, =^ = (आ शाप्ाा$ [26कप 74 1९0०९०९० ग = > 2619 ( 1460-1560 6. 13. ), ५798 8 18.{6ा- एधा ध1211 ५06 कप न्ाजाः ता 6 [रा2.
7/7 1:८1 11८ ,9९ ९८0411८;
^ 160 त<ा ० {16 इल्पदणत् 2 व्वा 10 एप 106 81110] (1011 {16 [01168 > 4102161106 106 661 -3115.51 4.1.818 11161 ५1.11 211त् 118६ 9 ^\ 71164218. 13114.5]२0.1-8 12161 {0 {16 %16 8 ५ 116 [070 5071611168 1४ वुगाठरश् 0४ ग्ल 70 2 शूप ज वाशक्कपद्टपो6ा) ६, 00110708 11 6
81 9 ५16 ४फ० 01110 61181168, ©8111त् - जा पशात 8 018[008810786 71117, 18 इप्रा6 ६0 16१९ "6 € ६ 1).
5 [01४6 01 13117श]र१8 21117020167181018 = 4 7) ] {1181148 98 16]168611118 {16 ६1441018 1116 ग © ])181121107, 18 26061811 ६ 50161" 8.7त्] 1101€ 1611४116 &प1५€ ० {176 1 {1086168 ग 79 8८ ०६५1६०४. ++ 311४ 0{ 8]0466 ८गणकलश8 1716 10 <वा {01 तफए€[110दु 0 113 [नज 9.४ &168.61 1९2४1) 11616 ¢ 1686156 8 88161181 {प्रतर 0 16 व्ल्(्नी एह 2 86026 [षृ ,
(01111४3 0/ £^८ 1 0 107 1(१८(4/८4; {18 70६ [0085916 ॥0 इप्ता पु) फव्राा 6 [18 ग 18 [7 ्०व्पन0ा ध6 कठव पव 7 6 कण] एप
= ~ - क == = ०
, "नक"
४ ‰
001151061111 {1५ 1 ठाप्व्ाद् म न6 इप्र्रोन्टाः 8 सिज
४ 0705 पदर 11616 16 80161.
(1116 [00]. 13 प1४1९€व् 17४0 ४1166 8९८४००08, 0०8}1९6व् ०४128, पल्माणठ 14804८६ एलु एध 616 घ्रोकलछणित् = इद्ा]र6६ 07 {16 उप [0167016 (०तत€88--( ४ } (11918, ( ४ ) 2116718, ध्वात् ( ४४४ ) [प्] £.
(४) 1116 (वु) पपोष पपठ) 88 "7 (11108 ज (11 पाह (पा, 16]016860४8 16 पला18 121४116 0शला 88 1708111168{6व् 1४ 16 ना ग ६16 पा ४९136, @1089, 8016 &३ ९]] &8 ८९३2]. (116 (111९8 ८०181808 र 11116 (27168, 1७ 111 ९९111668 (०८11 ४१६1-3 2.10 {0 पाः एटा ६) ९611068 पाणछाःव३, = 116 तलाः 16[01686768 116 लाः९दप्एठ 2806८ ० [0 61" & 18 ९०11€त् <^, 1161645 {126 14.61", ८8116 (716, 8081148 {0 1४8 त6इघ पठन रल []188. 16 जलद ग ५116 (1111-४, 18 €>] ९€त् 8 तपण€ ५० ६116 +#1]] {ठ € 6116१18. {100 07 {16 [ध 3 16 §ष76116 [20ढा, €^ 811त् अधध] 8 [101 8 116 कात् {0012704 {11611 €वृ पा] परा, +116916 116 01{{९61617068 06 €€ा1 {116 {0 18 01011161..16त्, 28 ०९।९५ पा, एतहाः पा व्रात्य 88 ९ द्राः, ठाः इपाणला१€ एउाप्तप. 1४ 18 शात् णीध ६8 10 (०ाादछा फा) 076 7८८ फलु 1 008 0प्डा1] काद 16 ९००४९९१ ° 1116 जः 91६ (प्रकाश) 0९.368 #116 000 01 &/ध्प्ं ( िमशं ) ४0 716]४ & 0 त. [113 छपप्रीठछ, [णा 0लककष्छाो ध€ ४० [उप्रतपञ, 18 ०९९116५ तिक्ष्ण. ¶106 क्र 88 6880८116 +] 18 -पतिद्र्वाश्पदव्मह @(ए७8 1186 0 (116 18 (1211-४, 08116 1381045६, ]11९]1 18 {176 इ०पा'८८ न वा] [ततव न 8010890 रला = एद९8 01 10181018, 1, 6.2 81] +© 96 8, 111 80 ० ४116 नाप्न76 रला 86, 16 13917878 (1141६, ॥14.11616 7 िता0,८०फ]ग868 {116 11:66 12. 188 12, {द श्प््, रत्) एत ८ एतमान, 1४ 15 ९४116
( 4 )
3111858. 110. 88 0 पठ 28 1४ 018. 68 {नि उ7वप--ध116 ण छ@7702] नः पप एाषवप-क्नमलाः 18 7 12811 717 एप ५116 82 ^९& ९५९ 0? {13€ ५१८९ च "९९१९८् 0 _ ००९8 8.० 1 0) 00116160186 = 48.512, 01" {> 1-41110.709६. | 116 23211089 0 {11701081 (1६11६ [010 प्८ल्ह +€ 80- ८६]]€व रैर धरधर 001 (1 1द]त४-८०ाा8णदह 9 9 (न शाहटालः 16- {3110 {0 ५०९९, € नल १९०५७ 0{ 118 (11811 जा [€ 11118 प 00078 816--(1-11) 1202708 & + तरवा, (11) 6 घा, 671, {4141115 (718 ध7त वाोद्वा्रघ्रफष्, ( शाण) ) 7५० 8.1त (116८४ ( श्राद्य ), ® (>) {४ 1९11016९ ( प्रमा ) "115 71116010 (1811६ 18) 10111 वात् ाद्ोरपम, पाल् (101४ (1.6. चैतन्यकल्ा) ६14 ^ 11110 (1.९. 101188४९ {011 तान छलः 0904196प्ता ५ चूर्णाहन्ता), 1 111711{210718 ° {1716 3]>406 876 01111. 16 एश[तदरॐ (1811-8 18 1101161", 170 1-ल]््छा 0 +श1116]1 घ16€ वपिध्र एताः (1189119, 18 0पप्ा. [६ शाप्ठपात् € एलणला0९ाःघ्त्ं ध ध्रा वि करवभणा 18 ८०ा9]०8९त् ज 116 ज वोदाग्थ्णन द्ध का]. 116 केर शकथ्षजमं (18118 18 16.118{01196त् 11,{0 € 11016 19899 12.(1) ग पाणदक ०१४०८) ववार, (111) 319 2,६.11150 0114. ्ि (४) 1 क ) 41516118. 27.111; 8, (४1) पव 00 ६1188, ( भा) 341५0 11/11 (ष) जथर मतता ६700 (7) दिता ० 18६, ‡111द2 ९0116820 कौ | ० "€ ( 1) 1 {०} त्प, ( 71 ) घाल 16-6५५।1९त 10फ्ड, (111) 16
8-]6\५11९५ 10३, ( ए) ४१ 14-डाहटान्व् दुपाल, (भभ)
{17 ४५0 {©ा1-9114160 टु ण6 ( ०पााः कष 1ालाः), ( भ ॥ {18 0077, ( 111 ) {76 {1181116 कात ( [इ श्र\8 4 प्])176116 {26178 मः 13170 प.
76 13817वधए४/ 07 110४0 ((0ध्ा8 5{ध्ात्ड {0 11€ {8115117 तप् पा) 16]716861118 {6 लवृपााप्रो)) 0? &/159
( 5 )
<¢ 8/4 ४1. 11183 11071916 18 [1071 88 4 1110118, & 18 ए7{1117 1116 (५६९०. 1४8 {11:66 €1प्€8 6008181 ॐ 15 ९० ९]8, ए12. {णा अ ५० अं ,& 1४8 ९6716 18 116 16४७1 अः । [४18 [1681464 ०७ 0 [165६४ 80 द का6ईरकान (1.0. बरद 8.7त् ४1108158, 01: 89/1४, & 3/च्), एए 101©]0 816 8686 88 18 ए 616 ०१ घ्© ह82718, ग 8 वता र2, गः क गुदमातप,
(11 ) {16 860०ात् इ6्छ्ना तशला8 प]? ॥06 (धापन 3911618. 1116 पर०९ (शतः ५३ 8]00७ ग 770 ६16 18१ [81813 86 वला & लडका [लष्, कणत ० 47४ 8 एल्गाङ & “शद्ध ण (10०४ (चिन्मरीचि).1४ 18 80 ८116त् 05 एप 01103 [0 तलारलाःणड (राम) ० वार छा) 06772 0161 ४४४९त् प्र000. {16 0176 1538 816 78706 070 [9] 68-71,87)व {1118 18 {0110०प फ़ क ९००४ ० छलः 715 388 771 {116 [प्रा 00पृङ्. ग कध 31618 28 शरपणत्, 1. ९. भावार्थं, समस्ब्दायार्थं, निगभाथं,कोकिकाथेःसर्व॑रदस्याथं 1 महातच्वाथं, 79९11 0 {11988 18 १68९110९व् ९४ 1671.
। ( 71 ) 7116 पणत् इल्ला ४6४8 ज {116 + प]२ 811]; 618, 23 21160 11610760. ¶]6 ग 01" ४ गाश11]) ` ज {16 (०५५१६३३ 18 06५]&16व 0 106 ° {11166 11108, १12, (87200, (0) 770 त का" कात् (८) 4040. 116 {78४ 16]16861108 ऽप ए्ला6 [५१०९1९व्ह्ठ (गाइ 170 16 76्न7ऽ8 जा ज {16 11. 2168४ पा 1.6 तलानि 1४ ॥16 1291712 84४2. 11116 86९- ० [0271268 त 8 पपात् ङ्प, एनप्द वाङ् 8117718 ६८ ४.41 वध. 8त् (०8४8 70 {16 ४01४8] 0 1168118 0 ]दरक्णा9 0 (16 6्{टा०य् नृाशुता88 7710 {176 प्ल. प्रा. 017€€1664.1121४. 1113 18 1681] & 14078] €]770109 तजा 0 प्रणा 1 16 पणा ० 0०१1९1९8. 16 प्प् 0४ 10९80 णया ग प्रणा) 18 त {16 सहल 72] कातप्ा9७, ४४19९, &९. [५ 89768 {छा {16 प्रलया) ०७। 11816 07 (19 पप्रा (६९९) णत् ]70९९6्द्ऽ ४४ 01९1668 0 {16 (दध्र ध]
$. +
© 3217958 एा2&6; 7 प्रान ०8 1४ 18 6 फणाडा) ग 116 11016 3 (012, 1४1 21] 116 ३0 ब८१८३, 4 ८८००७,९९०८८७
& 00618. [६ 18 पा6€ श्ल & 18 0701106 ४० ५6 शगवत 2{ 016ा€ा)९68
4111 11411022
116 2/88 07 11९] 6 [लला €तवाप्णा ग शण्छाण- 11089 2716 168 0070706 18 02860 19९९ 66 2]769त्ङ् १९३०10९0 171 {116 “160 कवि ०४6 70 12216 1. ` (01५८5६०)
{६ 00 एला18108 {07 726 ८0 8९001646 7) ध णारपपिा- 0688 10 1706064 ०688 60 [2०01६ कष धा 2118. 280 [र 1156 उताना, 881. [णावा & ववद९.0०2.६108 8/8 प्ज्ञण्ड उनपक्णष्वाणव 0 ्लृणदु ०९ 7 1680799 ४16 108 त् स) ४२1१९०1९ इप्रटष्ुल्ड्०8
38118111 (01166, )
0609768. > धि (121 ^ 17^ क शला 30, 1924. । |
सृचीपन्नम्
पटखाः | प्रथमः; पटकः ( चक्रसङ्केतः )
| क | हितीयः पटलः ( मन्तरसङ्कतः )
छर॑तीयः पटरः ( पूजासङ्कतः )
पृष्ठाङ्काः (ऋ
६.७- १५७
९ 4 ५4-३०८
` मल
# | के
र जं = हौ
1 १ तर , ^ १ क् "व क)
कष ~ 1. 1 += ६
०१-९/,. 4
अ + नि व ~
# कणः मे ( फाम्तन ). ऊ 5६८
> ० $~“ 3 ( 4917६ )
# १ क स ह न कनके "भ १1 =
= न + । >= ककि :‡ =<
सवेरहस्याथनिरूपणस् + १६९१
इन्द्रियप्रीणनद्रग्येविंहितस्ात्मपजनः ॥ ७.॥ `
भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या) । (१)जपतो ऽन्तः स्वयं नादा मन्त्रास्पा जप इदश्चः(२)॥(३)३ति। तादरमेव ध्यानमप(४) ुयादेयाह-अन्तसुखः इति । तन्न प्रययकतानता ध्यानापाते (@)यागपतज्ञखाक्तरत्या विजातीयव्रत्ययानन्तरितसजातीयपरत्ययपरवाहलक्षणध्यानन स- दान्त; शब्द् स्राचतनान्तमुखः परमाशवद्वतमभावनापर भूयाद् त्यथेः। तदुक्तं विज्ञानभरव(&)मटरकः-- ध्यानं या निष्कखा चिन्ता निराकारा७) नराश्रया। न तु ध्यानं शरीरस्य मुखहस्तादिकरपना ॥ इति | चित्कखोरट्लछास(८)द लितसङ्गाचस्त तिसुन्द रः ॥ (९) इति । चिदम्बुाधेमहाभङ्गमिन्नसङ च(१०)घुन्दरः । इत्यस्म(११)दगुरक्तरीया परिकरिपितपरिपूणांहभावः । अत
( १) 'जयत्यन्तस्वय' क9 (२) शदरितः' ख9 [३ 1 “इति' नासति कण ( ७ ) ताद्श्मपि ध्यानः ख० ( ५ ) 'योगश्ासनोक्त' ख9 (& ) मेरवः इति नास्ति ख७ ( ७ ) निविकाराः इत्ययमपि पाठ; ख० ` (८ ) ¶चत्कल्छाटाभिद्ङित' क० [९] (इति' न।स्ति क० [ १७ ] 'संडुःदः१ 7 [ १९१९] 'स्मदुक्त'ख9 २१
९६२ खटीके योाभेनीहदये--
ॐ 1" न्थासनिवतंयदेहे, षोढान्यातपुरःसरम् ॥ गणेशैः प्रथमो न्यासो दितीयस्तु अ्रहेमंतः ॥ < ॥
घूवातिुन्दरः मदात्रिपुरपुन्दरीनामधयपरचित्कर।रक।सास्पद- परमयुन्दरपरप्रप्रमास्पदपरमाशताभिन्न इत्यथः पूजापप्येताद्शीपेव ङयादित्याह-इन्द्रियेति । इद्दरियाणि श्रोत्रादीनि तेषां प्रीणनानि द्रव्याणि विर्िष्टश- व्दस्पशेखूपरस(१)गन्धास्तै विदिते स्वात्पदेवतायाः पूजनं यन तथाविधः । तदुक्तं सुख्याम्नायरहस्यविधो-- इन्द्रियद्ारसग्राह्चगेन्धा(र.्ररात्पदवताप् । स्वभावेन समाराध्य ज्ञातुः सोऽयं महामखः॥ (३१३ते। . ~. जग्धिपानन्तोट्छाखरसा(४) स्वाद् विजुम्मणात् । भावयेद्धरितावस्थां परहानन्दस्ततो भवेद ॥ इति च(५) विज्ञानैरवभट्ारकोक्तरीत्या श्रोत्रादीन्दियवि- षयज्ञब्दाययतु भव(द)जनितेन पहानन्दन सपरसाकरण परापूजा
इयथः ॥७॥। अथ अपरापृजां वक्र तदङ्भूत बाह्यन्यासमह-न्यासानात।
षाटा(ऊ)न्यासो गणेशषत्यादयसूतरे सचितः। देहे स्वस्येति शेषः
[ १1] गन्धवन्ति तेर्चि'ख9
[२] श्यः स्वारः ख
[ ३ ] (इतिः नास्ति ख०
( ४ ) रसानन्द' ख
(५ ) च इत्यधिकम् ख०
[ ६ ] (जनितनन्द्नां महा" क
[ ७ | “न्यास वुरः सरमित्यज् चूचितो न्याल्ो निगद्यते हति श- वः ख ॐ
पुजा खङ्तानेख्पणम् । ` १६३
[क
नक्षत्रैश्च ततीयः स्याद्योगिनीमिश्वतुधकः ॥ ` ` ` राशेभिः पञ्चमो न्यासः षष्ठः पीठैर्निगयते ॥ ९ ॥ षट स्यासस्त्वयं भोः सवत्रेव्रापराजतः ॥
एव्र यो न्यस्तगात्रस्तु स पृञ्यः सवेयागेभिः ॥ १० नास्यस्य पूञ्यो रोकेषु पिदरमात्मुखा जनः ॥
स एव्र पृञ्यः सवेषां स स्वय परमेश्वरः ॥ ११ ॥ . षोटान्यासविहीनं य॑ भ्रणमेदेष पतेति ॥ `
-
षदा षटूपरकारका न्याघः। 441 (१,तत्काराणां गणनामाह-गणेशोरिलति। इति सुगमम् ।न्यासं न्यासजातं जातावेकवचनम् । निवतेये-- दिति क्षः ॥८-९॥ ष।दा षट्प्रकारन्वाषः एक एव, ततकार बादान्यास्पाहाद्म्यं फर चाह-बादात । | प्र क्त।ऽय बाहा न्याः खवेच्र खवराकष्वापि अपराजितः अप्रातहतसाप(२) (ध्यः । एव वह्यपाणक्रमेण था न्यस्तगात्र षोढान्याससाप)ध्योच्छिनपाश्चसवारस्वयमेव परमेऽवरः । अत
एव रोकेषु जनेषु स एव योगिभिः पूज्यः, किं बहुना स्वेषापपि
पुञ्यः, नास्त्ययस्य पृञ्यः कोऽपि रोके । अस्ति यदि चे(३)देष बङादन्यस्मे प्रणमति स मृतो भवेत नरकं च भयातीययेः । [ १ 1 'तत्व्रकारमाह' ख9
[ २] कखान्तगेतवो ग्रन्थो नास्तं खर [ ३ ] चदेव वादयाचस्मै प्रण! क
१६४ सटीक योगिनीाष्टदये-~ सोऽचिरान्मत्युमप्रेति नरकं च प्रप्ते ॥ १२.॥ ` घोटन्यासप्रकार च कथयामि तवानघ ॥ ;
[
विघ्नेशो विराजश्च विनायकशिवोत्तमो ॥ १३ ॥ विघ्र्ृदि्चहतो च (१)गणराट् गणनायकः(२)॥ | एकदन्तो दविदन्तश. गजवक्रो निरज्ञनः.॥ १४ ॥ ` ` कपद्वान् दीषमुखः शङ्कुकर्णो वृषध्वजः ॥ `
गणनाथो गजेन्द्रश्च शूपकणल्िोचनः ॥ .१५ ॥
॥ १०-११-~१३२॥ षादान्यासपरकारं वक्तुं पतिजानीत--षोदेति । इति स्पषटम्। . ततपरकारमाह-विध्क् इति । (३)ग्रन्थान्तरे- एते गगेज्ञवणानापेक पञ्चाशतः कमात् । श्रीश्च हीशेव तुष्टिः क्नान्तिः चुषटेः सरस्वती ॥ रमा पेधा तथा कान्तिः कामिनी मोहिनी बा। तीवा च ज्वाङ्िनी नन्दा सुरसा कापरूपिणी ॥` उग्रा च जयिनी सत्या विध्रज्ञानी सुरूपिणी कामदा पदजिहा च विकटा घूणितानना ॥ भूतिभूमिः सती रम्था मानुषी पकरध्वजा । ( १) "विघ्रहद्धिघ्नकतो' ख (०२ ) गणनायक एव च' ख० ` ( ३ ) कंसान्तगतं नास्ति खश
चुजासङ्तानेरूवणम् । ` २६९९
रुम्ब।दरो महानादअतुमूतिः सदाशिवः ॥ 7 आमोदो दुमृखश्चैव सुमुखश्च प्रमोदकः ॥ १६ ॥ ¦
न
एकपादो दिजहश्चं (१)शरो वरश्च षण्मुखः ॥
न
---<~ वरद् वामद्वश्चर वक्रतुण्ड 1दरण्डकः ॥ १९७ ॥
सेनानीग्रामणीमेत्तो विमत्तो मत्तवाहनः 1 `
जटी मुण्डी तथा खड्गी वरेण्यो वृषकेतनः ॥ १८ ॥ भक्ष्यप्रियो गणेशश्च मेघनाद गणेश्वरः ॥ इति(३) । ` तरुणारुणतङ्काशान् गजवक्त्रान् विलोचनान् ॥ १ ९॥
विकणां श्रकुटी छल्ना दाधघोणा धलुधरा । तथेव यापिनी रातिशन्द्रकान्ता शरिषभा ॥ खोलाक्ती चपला ऋद्धिदुभेगा सुभगा शिवा । दुगा गुहभरिया कालौ ठलल्निहा च शक्तयः ॥ (३)नामान्येतानिं नात्र व्याह्येयानीति(५) । तेषां ध्यानपाह-तरूणारुणेति । ` तरूणारणसङ्काशान् तरुणारुणसवणान् । गजवक्तरमिवं व- कत्रं येषां ते गजवक््ास्तान्। उध्वकरयोः पाज्ञाङ्कशो । अधःकर- योवेराभये दधानान् । पुष्व्यादिभिः समन्वितान् । अत्र सु चिता-
नां नाम्नामागमान्तरषद्धतिषु चोक्तत्वान्न बदामः । न्यासस्था-
(१) 'ह्विजिकश्च' ख०
(२) शति! नाद्ति ख 9 | (३) (तान्येतानि तावद् वयास्येयानीतिः ख (४) “इयाख्येयमिति' क । |
१६६ खटीके योगिनीहद्ये--
पाशाङ्कुश्चवराभीतिहस्तान् शक्तिसमन्ितान्॥ इति (१)
एतांस्तु षेन्यसदे हे(२)मातकान्थास(३ )वस्पिये॥ २ ०।इति। स्वरस्तु साहतः सूय हरयाघः प्रावन्यसंत् ॥
बिन्दुस्थाने सुधास॒तिं यादिवणचतुष्टयेः | २१ ॥
मुपुतरं रोचनहन्हे कवग।धिपतिं प्रिये ॥ हदये विन्यतेच्छुकं चव्रगाधिपतिं पनः(४) ॥ २२ ॥ - हदयोपरि विन्थस्येहवगंधिपतिं बुधम् ॥
€ ^+ ल (५
बृह॒स्पतिं कण्ठदशे तवगाधिपति भ्रिये ॥ २३ ॥
नान्थाह--एतान् गगेशशान्(५) । पातरकावेकर (8) स्थानेषु न्यसेदित्यथंः ॥१३--२०॥ हन्यासमाद-स्वरैरेति । स्वरेरकारादिविषगान्तेः षोडश्चाभः सहितपरादौ (नान्न ) घय हदयाधा विन्यसेत्(७) बिन्दुस्थानं छट । अत्रवाक्तमू ।
दा पाकाराद्धपात्रश्च छट उत्तापष्य(८वे | इयादिना |
( १) शति" नास्ति क । (२) धेवि'ख। (३ ) कास्थान' ज । ( ४ ) बुधः ख । ( ५ ) (मातृक्तान्यासवत्ः इत्यधिकः पाडः ख । ( ६ ) ^न्याखस्थानेचु ख । ( ॐ ) िन्यस्य ख। (८ ) ब्त इष्यते क।
पुजासङ्कतनिरूपणम् । १६७
नानो शनेश्वरं देवि [श ]पवरीशं सुरेश्वरि ॥ वकत्रशादिचतुवर्भैः सहितं राहुमेव च ॥ २४ ॥ क्षकारसहितं केतुं पायो देवेशि विन्यसेत् ॥ (२)इति । ललाटे दक्षनेते च वामे कणटये पुनः ॥ २५ ॥ पुटयोनांसिकायाश्च कण्ठे स्कम्धद्यये पनः ॥ पर्चात्कूषर(३)युगम च मणिबन्धदये पुनः(८४।२६॥ स्तनयानाभदेशे च काटिबन्धे ततः परम्(प) | उरुयुम्मे तथ।जान्वो जङ्घयोश्च पदडये ॥ २७ ॥ [जचयुग्मन्तथा चेकं ततखीणि चतुश्यम् ॥
सुधाष्ति चन्द्रमसं यादिवगचतुष्टयेः । यरख्वेश्चतुभि(दर्विन्यसेदित्यन्वयः । (७)भूपुत्र प्रक्ष छाचनदन्दरे कवगेस्योपरिस्थितमधिपतिं विन्यसेत् । हृदये वक्ष-
व
त । स्पष्टमन्यत् । पाया दवेश्च विन्यस्दत्यन्तम्(८) ।
(९) ध्वेष' खे । (२) इत्यनन्तरं “रक्त श्वतं तथा रक्तं नीलं श्वेतं च पाण्डुरम् ।
ङष्णधूख्र तथा धून्र भ।वयेद् रविपूवेकम् ॥ कामरूप धराः सर्व विचि-
त्राञ्चरभ्ूषताः ।'' इत्यधिकः पाठः ख। (२) कूपरयोसखुग्मेः क ।
, . _ ५) तथाः-ल्।
(५) (पुनः' क । (६) 'चतुभः' भास्ति ख। (७) इत्यर्थः, ख ।
ह क [2
(<) कवग धेपाति क ।
९३८ सरीके योभनहद्ये-~
एकमेकं दयच्चेति खराः भोक्ताशथतुदश्च ॥ २८. ॥ , उ्यज्ञनेष्वेकमुभयं दयं. न्यस्येदतः परम् ॥
एकं युग्मे दथन्दन्दमेकं युग्मं हयन्ततः ॥ २२ ॥ एकं अध तथा चकं एकमेकं दयन्तथा ॥
एकं दयं तय पश्चाछक्षं अं मश्चतुष्टयम्॥ ३० ॥ सश्चेन्थादेः प्रो मागे दसा चक्रमतो न्यसेत् ]॥ (१) उरत्कालानलप्रख्या वरदामयपाणयः॥ ३१ ॥ नतिपाण्योऽश्िन)पूवाः सवराभरणसूषरिताः ॥
एतास्तु विन्यसेदेवि स्थानेष्वेषु सुरार्चिते ॥ ३२॥ विधो हदये नाभो स्वाधिष्ठाने च मूरके ॥ नक्षजाणां स्थानानि न्यासं चाद-काटिवन्ध (२) इति।
क क २
-कटिवन्धयोरिति द्रन्द्रपरम् । अन्यथा सपर्विज्ञतिसख्या न घरते। कणदय इति दक्षिणादिवः । (३)दक्षनेते वामे चेति (४)कपश्योपक्रान्तत्वात् । वरदाभयपाणयः । नतिषाण्य इत्युक्तया बाहु चतुष्टयं गम्यते । शेषं सुगमम् ॥२१-३२॥ योगिनीन्यासमाह- विद्ुडाविति । -
विशुद्धो ताुमूके षोडशदरकपले हृ8येऽनाहते द्वादशदल- कपे नाभं मणिपूरके दशदलखकमले स्वाधिष्ठने षडूदरकपले .
(९) [ 1 एतत्कंसान्तगेतो ब्रन्थः ० पुस्तके नास्ति । ` (२) शति" नास्ति क ।
(३) य इत्यादि" क ।
(४७) 'वात्रनेन्रति' क ।
== "वा । +
0.4 (3,
नि
स्ैरहस्थाथानिरूपणम्। १६६
आज्ञायां घातुनाथाच न्यस्तव्या उादिदताः ॥ ३३ ॥
मूलके चतुदररुकमङरे आज्ञायां द्विदरुकमले धातवस्त्वग- खङ्पांसपदास्थिमजाश्चुक्राणि । तेषां नाथाः स्वापिन्णा डा द(१)द् वताः-डाकिनीराकनीलाक्रिनीकाकिनीसाङिनीदाक- यः । अम्रतादेयुताः स्व्च्छन्दसङ्कह।क्ताः । (र२यथा- असता परथमा द्त्री दितीया काषेणी मता | इन्द्राणी त॒ तृतीया स्यादीशानी तु चताथेका ॥ पञ्चमीं स्यादुमा देवी षष्ठी चेतरोध्वकेद्ठिनी । सपमी ऋद्धिदा (र)पाक्ता टषा चाष्टपिका मता ॥ लका ` नवपमिका भोक्ता ट्टषा स्यादशमी मता| एकादशो यथा (४)चकपादा दादाशेका श्वे ॥ एेश्वयांपिरता पथादाङ्ारी तु त्रयाद्श | चतुदंशी (५)चोषधात्मा पञ्चाधेकदक्ाम्विक्रा ॥ षोडशी तवक्षरा देवी प्रोक्ताः षोडश (६) लशक्तयः। कालरात्रिश्च खातीता गायत्री च ततः परम्॥ घण्टाधारा च डउणोःत्पा चण्डा छाया जयापि च। शङ्ारौ ज्ञानरूपा च टङ्हस्ता ततः प्रम् ॥
(९) 'डाकिन्यादि' क । | | 1.1१. # (२) यथाः नास्ति क। | ॑ | (३) "ऋकिमिका' ख। {४) तुसा ख। (५) देश्योषधात्मा चः ख । (६) कण्ठडगाः*-ख ।
4:
धि छ छ + क्ये
९.७० खटीके यांगिनीहदषे-
अगरतादियुताः सम्यङ् न्यस्तव्या (१)सुरेश्वरि! ॥ पादे रिद्धि च कुक्षौ च हदये वाहुमूख्योः(२) ॥२४॥
टङ्कारी द्वादश्च हता द्वादश्चारे समचेयेत्। ई डाकिनीं (३)चेव दड्कारी गामिनीं (४)तामसीं तथा ॥ 1 | स्थाण्वीं दाक्षायणीं चेव धारनी नन्दाञ् पावेति ! (५)। | | फट्कारी (2)दकश्पत्रेषु पूवादीशान्तिकं यजेत्(७) ॥ बन्धिनां भद्रकारा च महामायां यशस्विनाम् । रक्तां छम्बोष्टिकां चेव पृजयेक्रमशः परिये(८) ॥ चतुष्पत्रे च(९) देवेति {वरदां च श्रियं तथा । पण्डां सरस्वतीं चेव पूजयेम; हिवे ! ॥ क्षमां हासवतीं चैव पृजयच द्विपत्रयोः(१०) ।
€ _ (~ 0
॥ एताभिः शक्तिभियुक्ता(*१) ध्यातव्याश्च सुरेश्वरि {॥
(१) 'लम्पग् ध्यातव्याश्चः ख । | | (२) 'मस्तक' ख । ¦ ॥ (३) (ङामच' ख |
(७) "णामर्नाः ख ।
(५) 'थान्ता दाक्षायणी धती ज्ञेया नादा च पावती! ख। (द) "कङ्कर" ख ।
(७) “इतिः इत्याधिकः पाठः ख |
(८) 'शिवे' इति ख ।
(९) (चतुष्परज्नषु' ख ।
(१०) द्विपन्नके' ख ।
(१९) श्वाक्तियुक्ताभिः' ख।
१ ` ऋका 9७
वूजासङ्तचिख्वणम् । १७१ दक्षिण पाद्(१)मारम्य वामपादा(र)वसानकम् ॥ `
नया सनिवेतयेदिस्ययपान्तरो न्यासः(३) । ध्यान(४)पा- गमान्तराद्वगन्तन्यसर् ॥३३-३२४। राेन्याखमाह-दश्िणमिति। पादादिस्थानषु दक्षिणादितो बापान्तम् | मेषादिराशयो पे. वादिमानान्ताः मेषटष(५) मिथुनकक(६)कन्यातुखारधिकध- लुमकरङ्म्भपीनाः । वर्गैः मावुंकाक्षरैः सह न्यस्तव्याः । राश्षी- नावणा आगपान्तरसवाद्ात्(७,) मयाच्यन्ते । अब्यंश्चतुाभः सहितो मेषां दक्षपदे स्वरैः (८) ॥ उकारा्यस्िमिवरणे्ंषभा खिङ्गदक्षिणि ।
चकर ये खिभिवगे मिथुनं इक्षिदक्षिणे ॥ एपेभ्यां ककंटो रारियुक्तो(९) वक्षसि दक्षिणे |
¢ =
आओंभ्यां सहितः सिंहा दक्षिणे बाहुमूखकं ॥ अंअः(१०)शवगकः कन्या शिरो(११)दक्षिणभागतः ।
््
(१) "पाद्व क ।
(२) 'पाद्वा' क ।
(३) “न्याखं निवेच्ये। एवं मातरे ध्यातव्याः । अपीत्यर्थः । ध्या- नं निवस्यायमान्तरो न्थाख इत्यथेः' ख।
(४) “ध्यान त्वागमान्तरा' ख ।
(५) षमः ख । ॑
(६) ककं" इति नास्ति क।
(७) (आगमान्तरोक्तत्वात" क ।
(<) 'अक्चरे. ख ।
(९) युतो' ख ।
(१०) च" इति नास्ति क ।
(१९) शश्िखा'ख ।
| | | | |
१७२. स्टाकं यागे नीष्टदये --
मेषादिर।शयों वर्भन्य॑स्तव्याः सह् पाव्रैतिः॥ ३१५ ॥ ` पठानि (शमतिन्यसेदेवि ! माठ कास्थानके पुनः (२) ॥ तेषां नामानि वह्यन्ते(३) श्रुणुष्वारहिता प्रिये ! ॥३६॥ कामरूपं वाराणसी नेपालं पोण्डूवधनम् ॥
चर(४)स्थिरं कान्यकुन्जं पृ्ण्चेरं तथार्बदम् ॥३७॥ आञ्रातकेरवरेकाम्रं विस्रो: कामकोटकम् ॥
कैलासं गनगरं केदारपणचन्द्रके (५) ॥२८॥ श्रीषीठमोङ्कारषीटं जारन्धं (£ )माडव।त्कङे (७) ॥
कवगण तुला मूध्नि वामे तद्वाहूमूखके ॥
ृश्चिकथ चवण उवर्गेण धनुहदि ।
वामे तवगेसंयुक्तो मकरः कक्षिवामतः ॥
पवर्गण पुनः कुम्भो किङ्गवापप्रदेशतः।
यवगेैः क्षगेसंयुक्तो पीनाखूयो(८)बापपादके ॥३५॥ `
प।ठन्यासमाह-पीठानीति।
(१) "पीठटांस्तु ख।
(२२) दातः इतव्यधेकः पाटः ख । ( ३ ) "कथ्यन्ते ख ।
( ४ ) शपुर ख ।
( ५ ) 'चन्द्रवुष्करम्' ख।
( & ) 'जाखाख्यः ख |
(७ ) ध्राखवं वथाः ख।
(८ ) मीनः स्यात्" ख।
वुजासङ्कतानिशरूपणम् । ९७३
कुखान्त(9) देविकोटं (२)चं गोकणे मारुतेश्वरम् ॥३०२॥ अटृहासं च विरजं राजगेह८३) महापथम् ॥ के।लपुगर(४)मेखापुरं ओङ्कारन्तु) जघान्तिका ॥४०॥ उजयेन्यपि चित्ता(६) च क्षीरकं हस्तिनाप॒रम् ॥ अइरो(७) च प्रयागाख्यं षष्ठं मायाप्रं तथा।।४१॥ जलेशं मर्यं शलं मेरं गिरिवरं तथा ॥
महेन्द्रं वामनं चैव हिरण्यपुरमेव च ॥ २॥
मातृकास्थानमिति जातावेकव चनम्(८)। वेखरीव णस्थान ॐ (९ )भ्वि- त्यथः । नलु कानने तानि पीठानीव्यत आ्ह- बहुत्वात्पीठानां नाश्नां(*०) वक्त परक्यस्वादसन्त(२ १)घावधाना भवेखथंः। तन्ना- मान्याह-एते पीठाः समदिष्टा गृहीतनामानः ¶ीडा(१२)। मातृक्राङ- (१९) कखन क । (२) काल्यं" ख! (३ ) .राजगरहः ख । (७ ) कोटलगिरि' ख ! (५ ) "कालेश चः ख । ( द ) 'उञ्ञयनी विचित्रं चः ख । ( ७ ) 'उङाश्' ख। ( < ) एकत्वम्' ख । ` (९ ) स्थानेषु" ख । ( १० ) ष्पीठनाघ्नां' ख । ( ९१ ) “अस्यन्तः इति नास्ति ख । ८ १२ ) “दते ००० पाटः इत्यश्च नास्ति ख।
१७ खटीके योगिनीहदये--
महाल्षमौपरोड्याणं(१) छयाछतेमतः परम ॥ एते पाट।; समुद्दिष्टा मातकारूपकाः स्थिताः ॥ ४२३ ॥ एव षोढा पुरः(२) कूत्वा श्रीचक्रन्यासमाचरेत् ॥
क~ 4 < 4 9 ^ =. श्रीमान्चपुरसुन्दय।चचक्न्यास शृणु त्रयं ! ॥४४॥
त व ॥ म म
श ॥ कि" न =
पकाः स्थिता(३) मातृका रूपं येषां ते मातृकरारूपकाः। ॥ ्रमेणादिष्षान्तनामेकेक वणपेकोकस्यादावुक्ता तत्स्थानं त(९)- । दणंस्थानेषु पीठन्यास कुयादिसर्थः। [ पी(दे)उानां मातर । कापयताकथने गणेशादीनापप्युपलक्षणम् । वगेवर्णानापादौ ˆ बेखयाक्षराण्यागमान्तरसंवादाद्िमज्य योज्यानीयथेः|॥३६-४३॥
षोटान्यासानन्तरं श्रीचक्रन्यासस्याऽरद्यम्भावित्वात्तदिदार्नी । #चक्रन्यास(७)माह-एवयि ति । | एवयुक्तप्रकारेण । षोढा षट्षकारन्यासं पु(८)रः कृता प्चा(र)च्हौचक्रन्यासतपार(१०)भेदितस्यथंः। |
( १ ) “ज्याणो' ख ।
(> ) पुरा इति ख० पुऽ्पा०।
( ३ )" पीठाः"हत्याधेकः पाठः खल०। (४) ^ क्वा" ख० । । ( ५ ) (तत्तत्स्थानेषु इति ख० । | | ( ६ ) []इतिचिन्हान्तगंतो भ्रन्थो नास्ति ख०। ( ७ ) 'अवश्यम्मावित्वात् श्रीचक्रन्यासस्य'दति ख० पु० पच।०।
(< ) वुः ख०।
(९, ) "पश्चात्" इति ख० पु० नास्ति ।
( १० ) चेरत" इति ख पु० पा०।
वूजासङ्तनिरूपणम् । १७९
| ९ ०
यन्न कस्यचिदाख्यातं तनुशुदकरं परम् ॥
2 श ९
चतुरसर'यरेखाये नम इयादितो न्यसेत् ॥ ४५ ॥
श्रीचक्रन्यासस्य महाप्रयोजनसत्वादनन्यकथितपपि अद्य प्रियाय कथयापीत्याह-शआ्रीण्दिति। आनन्दक(१)णाभेक्षाथं शब्दस्पर्शं दिप(२)कण । अ(३)रत्यविरतं येन तदारिन्ये विद्धाः ॥ इत्थभियुक्तवचनोक्तरीत्या सङ्च लक्षणद्रिवि(रे)घातिनीौ परिषूणंपरानन्दरूपा सम्पत् श्रीरिच्युच्यते । तद्रती त्रिपुर सुन्दरी । त्रिपुर («)तुरीयरूपत्वाव छुन्दरी। भद लक्षणप्रपञ्चापरष- ययपर (६) दौ ्भाग्यपरिपन्थिपरभाद्रैतसौ भाग्यपदाधिरूढा सवे- भराणिष्वा(७)त्मतया परम(८)प्रमास्प्दीभूता परचित्कखा । तस्याः चक्रं शिवादिक्षितिपर्यन्तं(९) तच्वमयं तदाविभोंवभुमिः। न्यासं शुणु परिये मम मियाये पद्करसस्य कारुसाये कथयापि । तस्य यन्न॒ कस्यचिदाख्य।तमि(१०)ति रदस्पत्वात् । रच कऋ(११) ( १) ^ऊन्द' इति ख० पुऽ पा०। | | (२) (कारणे' इति ख० वु° पा०। ( ३ ) 'उपेत्य' इति ख० चु० पा०। ( ४७ ) ननिवत्तिनीः इति ख० पुर पा०। ( ९ ) ^चिरूपभेद' इति क ० पु० पा० | ( £ ) परम” इति खऽ पु पा०। ( ७ ) स्वाः इति क० पु० पा०। ( < ) 'म' ख० पुऽ नारसिति। (९ ) ^तत्वचक्रपयं तदविनामा०' इति ख० पुऽ। (१० ) भमः इति ख० चु* पा०। ( १९१ ) []एतदन्तगंतो न्रन्थः ख पुऽ नास्ति ।
-१.७द खटा याशेर्नीदह्रये-~
दक्षांसप्रछठपाण्यग्ररिफक(१)पादाङ्गुङीष्वथ ॥ वामाङ्घ्रय(२)ङ्गुिषु.स्फक्ते पाण्यग्रे चांसप्रके॥४६॥ सचू(र)रीमूघूषेषु व्यापकत्वेन सुन्दरि ! ॥ अतेतर स्थानद्शके अणि(४)मायास्तु विन्यसेत् ॥४७॥
न्यासस्य पहाप्रयोजनत्वात्। अनन्यकथितमपि प्रियायै ते कथ- यामीयथंः । ] तनुश॒द्धिकरं परम् । तनोः षटूरतिशत्तत्रात्मनः शुद्ध पराचत्पयेवप्तानटक्षणां कराति, अत एव परघुत्टरषएटपितः-
रन्यासभ्यः।
भ्राचक्रन्यासप्रकारमाह-चतुराते । | चतुरक्ला्रलाये नषः इति(५) पन्त्रेणं आदिता दक्षां सपृष्राादचू(2)टिगपृष्ठान्तस्थानेषु दशघ्ु व्यापक्रल्रेन न्यसत् । दुक्षासस्य पृष्ठ पञ्द्धागः । स्रू(७)लति । सूरं -श्िरसः पुरस्वाद्धागः । | पष्(८) रिरसः पश्चद्धागः।| स्फि(९)गेव पिफकप्र । स्पष्टमन्यत् ।
( १) 'रिफक्पादान्नाङ्कुलि०' क०॥
(२) षवाम्राद्यङ्कुः° क०।
( ३ ) च्यूखि' ख० ।
(४ ) ‹ज्दकेऽणिमादया ददा वि खर! (५) त्यादि" इति ख० पु°।
( & ) " चूखेपृष्ठुान्तः इति क० वु० नास्ति
( ७ ) सन्मति हाते ख पुर पा०
( € ) []फतदन्तगताश्रन्था नास्त ख०।
( ९ ) 'र्फिकपरूरूसान्धः इति खण पुर पार
स्थरहस्याथनिरूपणस् । १७७
सिदधीस्तदन्तशथच तनुन्यापकस्वेन सुन्दरे ! ॥
तस्थाः स्थानेषु विन्यस्य बह्याण्याचास्तदा(१फ्सुव ॥४८॥ पादाङ्गष्ठदये पाश्वे दक्ष मूधैन्य(२)पश्वंके ॥ वामदक्षिणजान्वीख बहिरंसहये तथा ॥ ४९ ॥
ए(३)षु स्थानेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह-अशैवेति।
अणिमारीषपापहिमेक्िताधाकाम्यञुक्ताच्छप्राप्भिसवेकामा-
याः सद्धयाऽण(४)पद्या दश्च ।
चतुरस्चपध्यरखायां उ्यापकमाह-तद्न्तरिति । ` ‹'चतुरखमध्यरेखाये नमः""इत्यादि बल्छभे विन्य से(९&)व् । तदन्तः सिद्धिस्थानानापषन्तर्देे ““चतुरक्चपध्यरखायं नपः इति(द) पन्त्रेण तनुज्यापकत्वेन विन्यसेदित्यथेः(७) । चतुरस्रमध्यरेखायां न्यस्तव्याः क्तीराह- तस्या इति । तस्याः चतुरक्चपध्यरेखायाः । अष्टस्थानेषु । ब्रह्याण्याधाः
ब्रह्माणीमाहिष्वरीकोमारीविष्णवीवारारीन्द्राणीचापुण्डापहार-
ह्मी; । तथा विन्यषेदिस्यन्वयः ॥४८॥
तासा स्यन्टकमाह--पादाङ्क छत | ` स्पष्टम् ॥४९॥ | (१, (तथाः खन । ` (२) “ूश्रौऽन्यः ख०। ` (३) येषु" दहाति क० पु०।
(४) ऽणिमाद्या' इत्यधिकं क०। (५) “विन्यस्येति' ख । ९7 # . (६) “इत्यादि ' ख ० । । (७) "चिन्यसेदित्यन्वयः' ख०।
२३
। न + ~~ क +
१७८ सटीके याोगिनीहद्ये-
न्यस्तन्याश्चतुरंखान्व्य(१)रेखायै नम इलयपि ॥ विन्यसेब्यापकत्वेन पूर्वोक्तान्तशथ् विग्रहे ॥ ५० ॥ तस्याः स्थानेषु दशस मुद्राणां दश्चकं न्यत् ॥ ब्रह्माण्याद््टस्थानान्तस्तासामष्टौ न्यन्ेत्त(२)तः ॥५१॥
चतुरखान्तर(इ)रेखायां व्यापकमाह-न्यस्लन्या इति । ‹“चतुरखान्तपध्यरेखाये नमः” इति मन्त्रेण, विग्रहे देहे । प्वाक्तान्तश्(४) पूर्वोक्तानां ब्राह्मयादिस्थानानामन्तर्देशेषु व्याप- कत्वेन न्यस्तव्याः । न्यासयोगेन (५) न्यसेत् ॥५०॥
तस्यां) चतुरस्रान्तरेखायां (७) न्यस्तव्याः शक्तीराह-
तस्या इति ।
तस्याश्चतुरसान्तप(८)ध्यरेख।याः । दक्षप्ु स्थानेषु तरः खण्डयरुद्रासाहेतानां(९) सष्घाभिण्यादिपुद्राणां दश्चकं न्यसेत् । ताप्तां स्थानान्याह-ब्रह्माण्यादीति |
तासां मुद्राणां मध्य अए(*१गोघुद्राः ब्रह्माण्याचषस्या-
(१) (चतुर सखान्त' ल ० । (२) न्यसदथ'सख०। (३) “चतु रसखरान्त्यरख।व्या० ख० । (७) “पुवाक्तान्तश्च' शति नास्ति क | (५) न्यासयोग्ये विन्यसेत्" ख०। ` (६) (तस्यां नारित ख०। (७) रेख।स्थाने' ख०। (८) 'मच्य नास्तिसखर०। (९) “त्रलण्डमुद्रालदहेतखड्ुभेण्यादेसमुद्ाद् 9 ख०। (१०) “अष्ीः ख० ।
चजासखङ्तानेरूषणम् । १७९
रिष्टे दे दादश्ञान्ते च पादाङ्गुष्ठ च विन्यसेत् ॥ . “ ` तदन्तः षोडशदलपद्याय नम इव्य(श>पि ॥ ५२ ॥
(र
नानामन्तरदशेष्वष्टसु विन्यसेत्(२) । षष्टे है यद्र(३) द्वादशन्ते (४)पादाङ्खषटे च विन्यचत् । दादश्चान्तं बोड- शान्तन्दुपण्डलाद्षः स्ुयमण्डटस्थानम्र् । तदुक्त जसखच्छन्द्- सङयरहे-- ष डशान्तमिति ख्यात व्योपस्थानेन्दुमण्डकलम् । तद(५)घःस्थानगं सूयविम्बं द्रादशशक्तिकम् ॥ ` द्वादशान्त(रे)मिति ख्यातं स्थितं व्योपप्रदेश्षकम्। इति(9) तेन॒ बिन्दुतचंचतुष्पत्राम्बुजश्च तत्(<) ॥ सूयेविम्ब(र)पधश्चोध्वं सार्धेकाङ्कलिदेशतः । . ति (१.० )रास्या रङाटस्थान विन्दुतस्वोपरिस्थितं सूयेपण्डक- स्थानं छखाटार्ध्वं द्रादश्षान्तपदेन रक्ते । घोडकदखपद्मव्यापकमाह-तदन्तरिति।
(१) “दत्यथ' ख9 (२) (विन्यस्य' ख०। (३) भ्मुद्धे" नास्ति ख०। (४) द्वाद श्ान्तपादाङ्गष्ठयोविं' ख० । ` (५) 'तथान्त;' (तदत्तः खऽ । (६) (इादश्लान्तं स्रत तेन' खर । | (७) शति" नासति क०। 0 1 (८) "चतुष्पत्रास्वुज्ञमेतादे -यादे' क । (९) श्यं बिन्दुमधश्चोध्वै' ख० ।
(१०) `स्वच्छन्द् स ङ्टोक्त°' दत्य धिक क० षुस्तक्षे।
१८० खंटीके वोभिनीहटदये--
विन्यस्य, तदङे कामाकरषिण्याचाश्चःब्रिन्यसेत् ॥ ` दानि दक्षिणश्रोत्रप्ष्ठमंसं च कूपरम् ॥ ५३ ॥ करणठं चारूजानुगरट्फपादतलं तथा ॥ वामपादतलायेवमेतदे(श)बा्टकं मतम् ॥ ५४ ॥ तदस्तरे चाष्टदरपस्नाय नम इलयपि ॥ `
विन्यस्य, तदरुष्वषु दक्षशङ्कं च जन्रुके ॥ "५ ॥
तषां चव॒रख्णां अन्तर्दुशे “बवोडशदलपद्माय नमः” दाते म्रन््रेण दक्षिणश्रात्रण्ष्ठादिस्थानानि सस्पृर्य व्यापक वृन्यक्षदव्ययः ` तदर्षु न्यस्तव्याः शक्त राइ- तदल इत । ` ` तद्रे जाताबकवचनम् । तदटषु, कापाकषण्याद्याः कामनुद्धयहङः(रदान्दस्पशेरूपरसगन्धचित्तधयस्प्रतिनामर्बजातमा- यृतश्चराराकीषण्यस्ता । विन्यसेत् । तद्खस्थानान्याह~-दलानीति । ` द् खानि" इत्यादि (तथा! इत्यन्त(२) श्यषटम् । एवधुक्त- प्रकारेण । वापपादतङादिवामश्नात्रपृष्टान्तमेतदेवा्टक पतम् । स्थानाषकद्रय षाडश्दलानात्यथः ॥५१-५६॥ | अष्दरव्यापकमाह- तदन्तरं इति । द्न्तरे षाडशद छपश्ना(रे)न्तरे । “अषद् कपञ्चाय नमः” (१) "पतदव्य्ठक' ख० । (२) ^हति' क० । (३) ेडशादलछान्तरे' क०।
वुजासङ्कतनिरूवणस्र् } ` ९१८ १
उवेन्तशर्फगुल्फौर जनरुशङ्क च वामतः ॥ `
अनङ्गकसमाच्या(१)अ शक्तीरष्टो च विन्यसेत् ॥५६॥ दन्तश्चतुदद्यारचकराय नम इलयपि ॥
वरि्यस्य, तस्य कोणेषु न्यसेच्छक्तीश्तुदंश ॥ ५७ ॥
५
दति मन्त्रेण दक्षश्चह्कादिस्थानानि सस्प्रर्य व्यापकलवे(२) न न्ये सादत्यथः | ध तदखान्याह-तद्रेष्वित्ति । `
शद्धनञ(३)त्वा दिशब्दानां शरीराषच्छिन्ना(५्रयवावच्छि- क्नानामङ्गषु निषण्डु(<रवु सुप्रसिद्धलादवगतिः । तत्तदरेषु न्यस्तव्याः राक्तीराह-अनङ्खकुखभाया इति । अनङ्गकुषुमा्याः अनङ्धङघुमाऽनङ्गपख लाऽनङ्गपदन[ऽनङ्ग मदनातुराऽनज्गरेखा ऽनङ्गवेगिन्यनङ्गङ्कशाऽनङ्गमालिन्यः । चेष सुगपम् ॥ ५५-५६ ॥ चतुदेशारचक्रन्यापकमाह-तदत्तारेति ।
तदन्तरष्टदलपद्यस्यान्तः . ““चतुदशारचक्राय नमः” इति पन्त्रण चतुद शक णस्थानान छरूरदद्न सस्वरस्य च्य पच्छ विन्यस्य ॥ ५७ ॥ |
(१) 'स्तुः ल० पु० पाठः।
(२) “उयापकं' ख० ।
(३) (शङ्खजञ्वादिशब्डा्नां' ० ।
(9) शशरीरावयवस्थितानामङ्ेषु' ख । (५) निघण्डुषु" नास्ति ख्र० |
१८२ सखरदीके योगिनी हदये--
सवसङ्कोभिण्या(१ >चास्तु तस्य कोणानि वच्म्यहम् ॥ कलाटे दक्षभागं च दक्षगण्डासमध्यतः ॥ ५८ ॥ पारर्वान्त(२)रूरुजङ्घान्तवोमजङ्घादि पव॑त! ॥ वामोर्बन्तं वामपादं बामांस्रं वामगण्डकम् ॥ ५९ ॥
चतुदेशकाणे न्यस्तव्याः शक्तीराह-- सवखद्ो सिण्याद्या इति ।
सवसद्लाभिण्याच्याः सवशङ्खोभिणीसवेविद्रातिणीसताक
पिंणी पवोरहा(३)दिनीसषपम्पोहिनीसर्वस्ताभ्मिनी सवे(४)ज॒म्मि
~
णी सवेवशडरा सवरज्ञन।सवान्पादिनासवाथसाधिनासवरसम्पात्त (९ )पूरणी सवेषन्त्रम्थीसवद्रनद्रक्षयङ्यंः । [शेष स्प(६/४म् ।
तत्कोणानि भतिज्ञापूवेकमाह-- तस्य कोणानीत्यादि । ` दक्षभागं रुखारटस्यैव छलाट इति भकृतत्वादक्षगण्डद्षा- समध्यत इत्यथः । पार्वान्त(७)ररजङ्कान्तरिति त्रिभिरपि दक्षशब्दो युञ्यते । 'वामजङ्गादीः त्यादिशब्दः चिष्टाथारम्भवो- तकः । वामांस इत्यत्राऽपि मध्ये इति योज्यम् । प्ृष्ुमिति शिरसः पष्ठुमि(<ति ज्ञेयम् । दक्षवापयोः प्रथपे रलाटोपादानाव् ।
(१) 'सवेसङ्घोभिकाच।स्तु' ख० 1
(२) 'दश्चपाश्वांख्ज ° ख० ।
(३) “स वाहादकारिणी' खर |"
(8) “सवैजम्मभिनी' ख०।
(५) (सवेसखम्पत्तिरूपिणी' ख० ।
(६) “शिं स्पष्टम्! नास्ति ख० ।
(७) "पारव रुज०' ख० ।
(<) ध्पष्ठमेवः ख०।
हि न,
पुजासङ्कतनिरूपणम् । १८३
रलाटवाममध्ये च तथा वे पृष्ठमपि ॥
ततो द८१)श।रचक्राय नम इत्यपि पवेति! ॥ ६० ॥ तस्य कोणानि दृक्षाक्षि ना र् पर्ामुलाऽऽस्यनेत्रके ॥ कुक्षीरावायुकोणेषु जानुद्धयगुरेषु च ॥ ६१ ॥ कुक्षिनेतिषन्द्यास्यकोणेष्वरेषु न्यसेत्पुनः ॥
छकारं शिरसः पुरस्ताद्धागः । बहिर्दशारचक्रव्यापकमपाह- तत इति । ततश्वतुदं शारको गन्या(२) सानन्तरम् । “दक्षारचक्राय नपः?? इति मन्त्रेण दक्षक््यादिदशकणानि सस्प्ररय व्यापकमपि शब्दान्न्य(४े)प्तदिति योज्यम् ॥५८-द०॥ द्शारचक्रस्य कोणान्याह-तस्थत्ति । तस्य दृशारचक्रकोणानि दशा(५)पि दशसु दक्षा््या- दिस्थनेषु भावनीयानीति (शेषः । इक्षीश्वायुकोणषु छान्दसत्वात् द्विसे वहुवचनम् । बाहु(७)दयपारभ्यारुद्यप- यन्तं क्क्षिशब्देन रक्ष्यते, तेन ङुक्षरूपरिभागः पाची, अधो- भागः प्रतीची, दक्षिणवामपात्वं दक्षिणोदीच्यो । कोणशब्देन (१) "बहि दैश्ा०' इति ख० पुस्तके पाठान्तरम् । (२) "नासिकामुखने्नके' ख० । | (३) 'कोणान्तरेः ख ० । (७) ^शाब्द्। दविन्यसेदिति ` ख । (५) (दश्ापि' नास्ति खम । (६) (भाषनीयानीलय्थः' ख । (७) जबुदनरुद्धयमारमभ्योरुमुरपर्यन्तंः क० ॥
ण (र कि
श ष्य खङीक्त यागनइ इ य~~
सवस्तिडिप्रदादीनां खक्तनां दशक(१)तथा ॥ £ २ ॥ तदन्तश्च ददारादिचक्ाय नम इदयपि ॥
।
वाहू(२)उरू च(३)खक्ष्येते । तेन वामवाहूमूमीशक्रोणो, वामोर- मूकं वायुकाणो(४) दक्िणोरुमुरं नेकेतिकोणो, दक्षिणवबाहुमू- कप(५)प्रिक।णः, (&)घुगममन्यत् । दशकोगषु न्यस्तव्याः शक्तीराह- सवंसिडिपरदादी- नामरत्ि। सवसिद्धिपरदाच्याः स्वेसिद्धिभदास्षवे सम्पलदासवपरियङ्री- सवंमङ्कककारि णी सवेकामपरदासवदुःखविमोचनी सवमृल्युभरशमनी- सवविघ्रनिषारेणीसव। द्सुन्दरी सवसा भाग्यदायिन्यः । शष स्पष्टय् ॥ ६ १-६२ ॥ न्तदे शारचक्र(ऽ)व्यापकमाह-तदन्तरिति । ` तदन्त्ब्यद्शारान्तः । दशारादचक्राय बाह्मदश्चारादच ऋ1(८)य । ““अन्तदज्ञारचक्राय नपः”' इति मन्त्रेण द प्षिणनाप्ता- दे(९)दक्षस्थानाने सस्प्रह्य व्यापक विन्यस्य ।
(१) ग्रिये' ख०। (२) 'कोणशब्देन' नास्ति ख । (३) “ऊरू च' नास्ति ख०। (४) "वामोख्मुरु वायुकोणो' नास्ति कऽ । (५) "मूर वन्हि°' ख०। (६) अच्र सवज काणश्ाब्वस्य नघुलकत्वं क० वुस्तके । ` (७) (चक्र नास्त ख०। (<) (दृश्ासयादेचक्राय बद्यदश्चसादेचक्रायः हाते नास्त खल (९) द्दुक्षनासाद्काणाने ख०।
` ग्नन्धकन्ज्केन) "
^ नतक" तितः ऋचरतककः :
म # की
पूजाखङ्तनिरूपणम् । १८५
वरिन्पस्य, तस्य कोणेषु सवरेज्ञा्ाः प्रविन्यस्ेत ॥६२॥ दक्षनासा सृकिणी च स्तनं वरृषणमेवच॥ सावेनी बाममुष्कं च स्तनं खक्किणि नासिके ॥ ६४ ॥ नापताग्रं चैव विज्ञेयं कोणानां दशकं तथा ॥ तदन्त(१)रटकोणारिचक्राय नम इयि ॥ ६५ ॥ व्रिन्यस्य तस्य कोणेषु वश्िन्याय्टकं न्यसेत् ॥
चिवुकं कण्ठहदयनाभीनां चेव दक्षिणम् ॥ ६६ ॥
¦ दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह-तस्य कोणेषु इति। स्वज्ञायाः सर्वज्ञासवेशक्ति(र) स्वैडयपदा(३)सवेज्ञान- पयीसर्वन्याधिविनाशनी रवा धारस्वरूपा(४)सवेपापहरासवोन- न्दपयीसवेरक्नास्वरूपिणीस्॑प्सितफरप्रदाः। स्पष्टमन्यत् ॥६३॥ .; तस्य कोणान्याह-दक्षदयादि । ¦ , इति स्पष्टम् । तदन्तदशारान्तः। ““अषएटकोणादिचक्राय नप! इति(५) चिबुकाद्यष्टकाणानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य । अष्टकोगचक्र- स्यादित्वम् । तरिकाणादीतरचक्रेभ्यः भरथमगयुतपननत्वात् । अष्टकोगपु न्यस्तव्याः शक्ती एह- तस्येति । (१) (तद्न्तश्चा्ट०' ख 9 । (२) 'सवेश्क्तिश्चः ख० । (३) (लर्वेदवयै प्रदायिनी ख०। (४) 'सवाध्ारस्व रूपिणीः ख० । (५) "चुवुका०› शते क० । (41 ¢
१८६ खदीके योगिनी दहदय-
ज्ञेयं पार्थचतुष्कं च मणिपूरादि वामकम् ॥
चतुष्टयं च पाश्चनिमेत(१)त्काणा्टकं(२फमतम्॥ ६७) हदयस्थत्रिकोणस्य चतुिक्षु बहिन्येसेत् ॥
शरचापौ पारासणी त्रिक्रोणाय नमस्तथा ॥ ६८ ॥
| | 1
^ चीन
॑ तस्याष्ठारचक्रस्थ। कोणेषु वक्षिन्याचयषटकं वरिनीकापेहवरी- मोदिनीविमलाऽरूणाजयिनीसर्वेदव सी काडन्यः । तस्य कोणाषए्टकमाह -चिवुकभित्यादि । चिबुकादानां पारेचतुष्कं दक्षिणं माणिपृरादि । पणिपूरकं (३)नाभस्थानम् । नामिहृहयकण्ठवि(ट)बुकानां (वाम- पाडेचतुष्कं चेतत्कोणाषएटकप ॥ ६४-६७ ॥ अनन्तरमायुधावरणन्यासमादह-हद्चस्थेति । | [(ड)षृदये वक्षसि तिष्टतीति हृदयस्थं स्तनद्रयमध्यनिन्न- त्रिकाणाकारहृद यस्थत्रिकाणमिस्युच्यते तस्य । बदिधतुदेश्षु प्रा- गादिषु।] कामेदवरीकामेवरयोः शरचापां पाशखगी (®)चत्या- युधचतुष्टयं (८)न्यसेत् । अत्रैव वक्यति-
नि । 1 ॥ । 4
^ + + +, (3.
(९) भेतदेषा्टक' इति क० ।
(र) (वुनः' ख०।
(३) 'नाभिस्थानम्' नास्ति क०्।.
(४) “चुवुकार्ना' क ।
(५) "वामकं पाश्व' इति क० पु०।
(६) [ ।] पतदन्तगेत) च्रन्थः लर पुर नास्ति। (७) “चव्यायुध!क क° ।
(<) (मलत न्यसत् खल०।
५८, ~ ~ ~ ॐ ॥ चकक्न्णापिननक कनवाः
तजा खङ्तानिरूपणम् । १८७
विन्य(१)स्य तस्य काणषु अग्रदक्षात्तरंषु च ॥
कामेदवयो दिदतवरीनां(र)मध्ये दवीं च विन्यसेत् ॥& ९॥
बाणन्नत्रे धबोश्चापो कर्णे पाश्द्रयं स्यसेत्(३) । |खणिद्रयं(४)च नासाग्रं दक्षिणाग्रं तु विन्यसेत् ॥ (या० ह° सं० ३-७३) तताल्काण(५)चक्रन्यापकमाह-जचका णाय ति । जकोणाय नपःइति मन्त्रेण रेखात्रयं सस्प्श्य व्यापकं विन्यस्य | त्रिकोणे (द)न्यस्तव्या देवीराह-तस्याति । तस्य चिकोणस्य । अग्रदक्षोत्तरेषु कामेरवरीवजश्वरी भग-
मान्यः । (तासां कमेरवयाददेवानाप् । मध्य देवरा च विन्यसत् इत । मध्यं बेन्दव् (८.श्रवचक्र। दवा परकाशावेमन्ञष्षा-
परस्यरूपां त्रिपुरघुन्दरीं (९)च विन्यसेदित्यथेः ॥६८-६९॥
(१) "विन्यसेत्" इति क ०।
(२) ददेषश्च' इति ख० पुऽ ।
(३)/ह द यस्थश्निकेाणस्येति । हदयमव्यर्थानं निस्नत्रिकोणकारं हृद यस्थात्रेकोणप्रुच्यते । तस्य चतुर्दिश्चु श्रादिन्यसेत्ः इति ख पुऽ अधिकम् । वस्तुतस्तु कपुस्तकस्थः{ ] एताह्वान्तगंतश्रन्थ- स्थानस्थोऽय प्रबन्धो ठेखकथ्रमादादज पतितः स्यादिति मन्ये ।
(8) { 1 एतदन्तगेतो प्रन्थः ख ° वुऽ नारित ।
(५) चक्र" ति नासत ख ०।
(६) 'त्रिकाणन्यस्तव्या'खलऽ ।
(७) भगमाखना एतासां इतिं खऽ पुऽ ।
(<) वेन्दवश्ची चक्रे" शति ख० पुऽ।
(९) च नास्ति ख०।
# + >~ ~
१८८ सटीक योगेनी ह दये--
@, (व ©>
एवं मयोदितो देवि ! न्यासो (9 )गद्यतमक्रमः ॥ एतद् गुद्यतमं(२)कायं त्वया वे वीरवन्दिते ! ॥\७०॥ समयस्थाय. दातव्य नाऽदिष्याय कदाचन ॥
न > च्छः
श्राचक्रन्यासभ्रुपस्हरति-एवामात । इति स्पष्टम् ॥ अतस्त्वयाऽप्यतन्न्यासजातं (रे.गाप्यामेत्याह-एतदि ति) हाते स्पष्टम् ॥ ७० ॥ नयु 1केपतन्न कस्माचदपि कथनी ष्रमित्यत आह-समय- स्थायाति । समयस्थाय (छ.काठिकाय समयाचारनिषठाय देयम् । पश्च- समया(५)चारनिष्ठाय न देयमिययथंः |
(वनु कालिकसमयस्थायाऽपि (७)सवेस्मे देयं नेत्याह- नाराव्यायाते ।
समयस्वायात जिष्याय [(८)अन्यरिष्याय] न देवम् ॥ मयाप्यतत्व(९,)दन्यस्य कस्यापि न (१ ०,्रकटीङतपित्या-
(र) यद्यतमः सखव कज्वा गुद्यतमः स्श्तः क० पु०।
(२) “गद्य तर' शक्ति ख० ।
(३) “गोप्य कायेमिऽ'कण० पु०।
(७) कोिकसलतमयाचार०ः इति ख० |
(५) "पश्युसम्याचारपरायः इति ख० ।
(६) "नलु" नास्ति क०।
(७) 'सलमयस्थाय सस्य हाते ख|
(<) [|दतदृन्तगेतं नास्ति ख० । |
(९) “स्वदन्यताऽपि न कस्यापि इति ख० ।
(१०) ्वुरा प्रकटी" इति ख० |
भाक क व य
9 7 क र) म च ष ॥
वूजासङ्कतानिशूपणनर् । १८९
गपताद् गुप्ततरच्चेतत्तवाऽच प्रकटीचतम् ॥ ७१ ॥ मूखदेव्यादिकं न्यासमणिमान्तं वृनन्यसेत् ॥
इ-गप्ाएदेति |
गुष्ठाद्पि (१.गुप्रतरम् । रहस्याद(र)प्यत्यन्तरहस्यसरात् । एतत्तव पर्दशमूतात्रमशोल्पिकायाः (इप्रेयतमायाः प्रियतमेन पयाऽद्य भ्रकटोकृतप् । पुराऽन्यस्थ न प्रकटीकरतामेतिः तात्प येम ॥ ७१॥
अस्यव न्यासस्य पुनः; प्रकारान्तरमाद-स्बलदव्याष्द् कामिति ।
पूवेमाणमादिमूखदव्य(उ)न्तश्री चक्रवरणद्वतान्या(५.ससु कत्वा इदान। मूलदव्याद्याणिमान्तं पुनः भ्रीचक्रावरणदेवता- न्यास कुयादिस्यथेः
मूल(द१द्व्यादिन्यासप्रक)।रमव्राह-दिरख्िकागति ।
यूरदग्वाद्दकानत्यननव श्िराल्काणमध्यं मूर्देन्याः परथमन्यास्ता ज्ञेयः । पञ्चाच्छिरस्िकाण(ऽ)पध्ये निञ्नं तिक ण(८.पास्त) त(९ द्रा मृदुतरं हश्यते । ततर पुवा(१०)दिशब्द्दक्षि-
(१) 'गुप्ताद् गुप्ततर' इति ख० । |
(२) रदस्यादप्यतिरह० ख० ।
(२) प्रियतमाया अपि यता मया ख०।
(४) “मूलदेवष्यन्तंः ख० ।
(५) न्यासमुक्तम्' क०।
(६) 'मुलदेवतादि' ख० ।
(७) शशिारचल्िकोणे शिरकपालमध्यै' चऽ ।
(<) (जकाणाकारम स्तिः लऽ ।
(९) (तद्वास्ये' खऽ ।
(१०) "पूवादि आदिशब्दा ०' इति ख० ।
।
अनि त (क
१९० खदीक योगिनीहद्ये-
>
शिरख्िकोण(१ )पृवौदि कामेदवयादिकं न्यसेत् ॥७२॥
=>
बाणान्नेत्रे श्रुवोश्चपो कर्णे पादय (२)न्यसेत् ॥ सृणिह.य॑(३) च नासाग्रे दक्षिणाग्रं तु विन्यसेत् ॥७३॥
गोत्तरकोणयो(भगरेहः । का(ध)पेह्वयांदिशब्देन (६) वजेशव- रीमगपाछिन्यौ गते । शिर ्चिकोणाग्रदक्षवामकोणेषु कामेऽव- रीवज्रस्वरीभगमालिनीर्विन्यसेत् इत्यथः ॥ ७२ ॥ आयुधावरणन्यासमाद-बाणानित्यादि। बाणान् का(ऊ)वेन्वरकापेन्वर्योः। ने(८तरे नेत्रयोः । चापौ श्चवोः । पाशद्रय कर्ण(९) कणयाः। इ(१०)णगिद्रयन्तु नासाग्रोभ- यपाखयोः। नेत्र(१ १)कर्णे नासाग्रे इति चैकवचनप्रयोगो द्विवचनो-
पलक्षगम्। दक्षि(१ र)णाग्रमिति च कथनात्। एषु स्थानेषु दक्षिणे
= त = ^ (= न ९ कामेइवरस्य वामे कामेहवयोश्चायुधानि विन्यसेदित्यथः ॥७३॥
(१) (जिकोणेः ख० ।
(२) प्वुनः' ख०।
(३) तख ० । |
(४) को णयोग्रहणम्' ख० ।
(५) 'कामेदवयां दिका आदिः ख० । (६) “शब्दादज्रदवरी' ख० । (७) कामेदव सीकामेहवरयोः' ल ० । (८) नेत्र इति ख ० नास्ति।
(९) कर्णे" नारित ख० । | (१०) 'सखणिद्धय नासाभयपादवयोः (१९) "नज कणं" इति ख७ ।
(१२) भभ्टबोदेक्षिणाश्र ० क० ।
सत 6। `
पूजासङ्कतनिशूपणम् । १९९१
मुण्ड(१)पूलकरमेणेव न्यसेदःग्देवता्टकम् ॥
बेन्दवादीनि चक्राणि न्यस्तव्यानि घराने} ॥ ७४ ॥ ` `
॥ ९ ५.१ ~ ॥ # निहि क ५ नेतमूङे त्वपाङ्ग च कणपूत्रात्तरे पुनः ॥
वरिन्याच्ावरणन्यास्तपाह-सुण्डनिति ।
मुण्ड शिरः । त(र)प्य मूलक्रमेणाष्टदिष्ु परितो बा(३)ग्द वतानां वंखयेषटवगा धिष्ठाजाणां वक्चिन्याद्।नां द(४)वतानामषटक न्यसेत् ।
ननु वैन्दवचक्रादुपयधचन्द्राचयुन्मन्यन्तानां सुक्ष्मावयवानां न्यासः किमिति नोक्त ३८९९ )त्यत आह-बन्द्व।दी नाते ।
वेन्द वादीनि (६)चतुरखान्तानि नव चक्राणि न्यस्तव्या- नि स्थुरत्वात् । अभ्चन्द्राह्यन्मन्यन्तानि (७)भावनीयानी स्यः । स्थुखन्यासम्रसङ्ग स्थुरानामेव न्यासा (८निगघते . इति भावः॥ ७२ ॥
सवेज्ञाचावरणन्यापप्राह~-नच्नमूले इत्यादि |
क्णोत्तरं कणस्य पश्चाद्धागः । चृडादिके चूडायाः आदि-
(९) मुण्डमाखा' ख०।
(२) (तस्य माङाक्रमेणः ख ० । | (३) ष्वाग्देवताषकं वागधिष्ठाज्णां वरिन्यादीनां' ख०। (७) षदेव तानां" नास्ति ख०। |
(५) शत्याहः खं० |
(द) ध्चक्राणि' नास्ति ख ।
(७) "विभावनीयानीति । अतः स्थुरु०' ख ० ।
(८) (वदयत ख 9 ।
१९२ स गक याोगेनीद्टदये--
चू(१)उ'दिकण्ठनिम्रऽ्र शे(रेषाथै कणृष्ठके॥७५॥ कृ(३)9 पत त्वरपाङ्कं च तस्य मृरे च (४ )विन्धत्ेत्॥ हदये मनुकाणस्थ(५)शक्तय)।ऽपि च पूत्ैवत् ॥ ७६ ॥ सवैसिच्यादिकं कण्ठे भ्रादाक्षेण्येन विन्यसेत् ॥
~. द्ध
क
| खलारम् । अ(द.धेनिन्ञे कणात्तरानन्तरं न्यसेदिति सम्थदायः। | निन्नं रिरःपश्चान्निम्नस्थरम(७)वटम् । कोऽथः ? चूडादेनेवमृखा- पाङ्गकणपूत्रषृष्टबु (८,पत्रज्ञाद्।नां दश्ानामष विन्यसेत् । (९)अ- यवाऽऽस(मवात्तरधेपवनूवन्तरकणेपृष्ठपूवान्यनेतापाङ्गमूषेषु विन्य- सदत्यथः। नयु सत्रे्ञद्नां नापन कथित(१०), कथमत्र ता एव न्यस्तच्याः कथ्यन्ते ( उच्यते पूर्चक्रं वर्चिन्या्याः न्यस्तव्याः कथिताः। अनन्तरोपरिचक्रे सवेषिद्धाचाः न्यस्तव्याः कथ्यन्ते । अतस्तयोरपि (*१)पध्यदन्ञस्थानेषु पारिकेष्यात्सर्बज्न।चाः न्य. स्तव्या इति गृह्यन्ते ॥ ७९५-७६ ॥
(१) श्चूडादिके च निख्ात्र' ल०। (२) श्षाधं कणेप्रघ्रयोःः ख०। ` (३) (क णपूव त्वपाङ्खे च' ख० । (2) वेतः ख ० ।
(५) (कोणस्थाः' ख |
(६) (तदपि कणोंतरानन्तर' ख७ | (७) (मवदुरेवः ख०।
(८) सवलिद्धधादौीनां' खल ०।
(९) भथ तास्रामेवाद्धं अवदट्ुकणपृष्ठ 9 ख । (१०) "की्ितं! ख० ।
(११) 'मध्यद्ुक्ा ख०।
०९ [ क
वूजासङ््तानेरूपणम् । ९९३
नामावष्टदरं (१)तत्तु वंशे वामे च पाश्वके॥७७॥ उद्रे सव्यपा्वे च न्यसेदादिचतुष्टयम् ॥
[ > (< ~ { ~~~
सवापच्याधावरणन्यासपाह(२)-खबासिद्यादेकानात। एम् | सवेसङ्क्षोभिण्याद्यावरणन्यासमाह-ह्ृदये इति । हृदये वक्षसि। पूववत्पादक्षिण्यन मनुकोण(३ )स्थशक्तयश्चतु- देशारकोणनिवासिन्यः सवेसङक्षोभिण्याद्याः । न्यस्तव्या इति शषः । अनङ्कुसुपादययाबरणन्याखपाह-नाभाविलति । नाभो नाभिपदेश्चे। अष्टदरं पद्मम् | [ तल्तवि(४)ति। तत्पुवो- क्तानङ्गकुषुमाचष्टकं परामृश्यते । तदादि चतुष्टयमनङ्ङ्कसुमाऽन- कृपेखराऽनङ्गमद नाऽनङ्गमदनातुराणां चतुष्टयम् | । (५)वश्चः प्- छास्थि । सव्यपाश्चम् (दैरदाक्षणपाश्वेम् । वंशचवामान्तरारा- दि वक्नवापपाश्वयारन्तरालम् । आ(<)दिक्ञब्दाद्रापपारनेषुरो- भागयारन्त(८)राङपुराभागदक्षिण(९)पाहवयारन्तरार दक्षषा-
(१) (नामो त्वच्रदरू'ख० । (२) 'स्वखिद्धथ।दिकभिति' इत्यारभ्य हृदये इतिः इत्यन्तो - म्रन्थः क० पुऽ नाह्िति ।
(३) 'कोणस्थाः शक्तय ०' ख०।
(४) [ । पतख्चह्नन्तगेतो प्रन्थः ख ० वु° नास्त ।
(५) 'ताद्ध वश्च वश्पृष्ठाास्थनि' ख ।
(६) 'दश्चिण वामऽ ख9। # (७) 'अादिषाब्दात' नास्ति खऽ ।
(८) °रन्तर।ङ' ख ० ।
(९) 'द्चिणपा्षे' ख०।
२०५
९.९ सके योगनीहदये--
वेशवामंन्तिराखादि ञयसेदन्य८ १)चतुश्यम् ॥ ७८ ॥ < "41 १. |
स्वाधिष्ठाने न्यतेत्छस्य पू्रादक्षाव्रसानकम् ॥
चतखस्तु चतस्रस्तु चतुरिक्षु क्रमान्न्यसेत् ॥ ७९॥
मृखाधारे न्थसन्मद्राद्शकं साधकोत्तमः ॥
उरपृष्ठवंशयो(र२)रन्तराछं श्यते ॥ अन्य(३)चतुष्टयमनङ्गरेलानङ्ग- वेगिन्यनङ्घाङ्ककश्षन ङ्गपालिनीनां चतुष्टयम् । नाभ(४)देश्ञस्य | पश्चिमादिदिष्षु अनङ्गङ्कषुमादीनां (>न्यसेदित्यथः॥७०-७८॥ कामाकर्षिण्या्यावरणन्याप्तमाह-स्वाधे्ठाने इति । ५4 4 कु प € © (^~ [>
स्वाधिष्ठानकेपख्वदेशे स्वस्य पदात् पूवेदिगादिभागमारभ्य दक्षावसानकें दक्षिणदि गवस्रानपयन्तमर् । चतुर्दि्च भतिदिशं च- तसश्वतस्लः शक्तयः कापाकार्षण्यादाः करपरेण न्यस्तव्याः । नतु कामाकर्विण्याचा इति कथमतुपी(द)यन्ते, इति चेदुच्यते । पुप्रव- देव पूरवो(७) त्तरचक्रयाः शक्तानां नामग्रहणात् मध्यचक्रश्चक्तानां पारििष्यान्ना प्रान्यद्चक्तान्यपि अवसायन्त इति ॥ ७९ ॥
वेसङ्कोभिण्यादिसुद्राचक्यावरणन्यास्तमाह- श्रलाधा
(१) “अन्यश्चतु ° ख० ।
(२) धवक्ायोश्चान्तराङखं' ख ।
(३) “अन्यश्चतुष्टयः सरउ ।
(४) (नाभिदेश्स्थपञ्िमादिद्क्षिणपाषहवान्तमनह्०' स ० ।
(५) "वाप्वादिनैकच्छतान्तं' इत्यधिकः ख० ।
(द) "कथ पवसीयन्त' क ० ।
(७) “पूबात्तर०' इत्यारभ्य °(अवसीयन्त दतिः इत्यन्तस्य प्रन्थस्य थाने "पुवाक्तचक्रराक्तीनां नामन्रहणात् पारिशेष्यात् नामान्युक्ता ष्यवसीयन्ते इतिः इति ल० पु० पाठः|
[या क „न ~ य अध ~ म १ कग ण्वि
वूजासङ्कत निरूपणम् । ९९९
पुनव्रैरो च (१)सन्ये च वामे चेान्तराख्के ॥ € ° ॥: ऊष्याधो द्रमुद्रा ऊष्वीधोवर्जितं पनः ॥
रे इते । मूलाधारे मुकाधारपदेशे । शेषं स्पष्टम् ।
नु क मूखाधारे युद्रादश्षकं कन(२) पिधानंन न्यस्तन्य- शङ्ायामाह-पुनवेरे इलि ।
पुनः शब्दान्नामां तष्टदक (₹)तवत्यान्यष्टद टस्थानाक्त- स्थानान्युच्यन्ते । वश पृषवशे । समे चपा । चकारादुत्तर(४,)द- स्िणयाः पाङवयाग्रहणमप्र् । वामे चवान्तराछकं पृष्ठवरवापपाः हवान्तराके । चकाराद्रापपाश्वां यन्तरा नि गृह्यन्ते । काथः ‹ पृष्ठ वेश्रादि दिक्षु (“बायन्याद्यन्तराङेषु (इचोध्व(धश्च(७) दश्च घ॒द्राः न्यसत् ॥ ८० ॥ नतु ऊभ्वाध इति केपान्तर् स्थानद्रय, (८) अन्यन्नव्याह- ऊध्वाध इतं | आन्त(९)रोष्वाधःस्थानटदयप्। (१) प्वुनः ष्ये च वंचे च'ख० । (र) "केन विधानेन' इत्यत्र भध्यानेन'इति ख० पु० पाठः। (३) "तद्धत्यज्नाऽछद खन्यासोक्तस्थानान्युच्यन्तेःख०। (७) 'चकारादुत्तरयोग्रहणम् सऽ । (५) देने ख (६) (वायव्याद्यन्तरारेख९ । (७) 'चोध्वोधस्तास्च' ख०। (<) "अन्यत् इति नास्ति ख० । न (९) 'जन्तसदुष्वोधः स्थानद्वधम्! क९ | `, : ` (4)
१९६ सदीके योगनीहदये--
© ५ © बरह्माण्याद्य्टकं दक्षजङ्घायां तास्तु पूतरवत् ॥ < १ ॥ वामजङ्घां समारभ्य वामारक्रमतोऽपि च ॥
०
इन्द्रशानदिशेमध्ये स्थानम(२)न्यसकीर्तितम् | नेकऋताम्बुदिशो(र)मध्ये स्थानमन्य(३)त्की ततम् ॥ ।
9
तन्वविमररिन्यामस्मदगु)रूक्तरीव्या दकखोकपालार्चनसी- त्येव स्थानद्रयं शिष्टसुद्रा(५)दथस्य कल्पनीयम् । | बह्याण्याद्यावरणन्यासमाह-ब्रह्याण्यादीति । । | विन्यसेव [ इ्यनुषङ्ः । रिष्ट ] (इ) स्पष्टम् -। ` नतु दक्ष(७.जह्मयां विन्यसदित्युक्त, तत्र तासां कानि स्थानानात्यत(८)आह-ता स्त्विति । ताः बरह्माण्या्या; पुववत् "पुनः स्ये च वंशे चः इ्युक्त- स्थनयु । अचर ध्ृष्टवशचन्दन पश्चान्दागा छक््यते । दक्ष(९) जद्धायाः पचिमादिचतुर्दिश्च बायव्यादिविदिश्चु च । ताः बह्मा ण्या(! °या न्यस्तव्या इत्यथः ॥ ८१ ॥ आणमाधयावरणन्यासमाह -वामजङ्काभेति । | |
[व्व अभ 31.
(९) (स्थानमस्य प्र° ख । | | (२) नेक्रत्यभ्बीश्ायोमे ० क०। | | (३) (स्थानमस्य' ख० | | | (8) (मस्मद्कत ° ख० । (५) 'हाष्ठसुद्रास्थानद्धयभित्यथैः' ख०। (६) कलखान्तगेत नास्ति क ० पुस्तके । (७) 'दृाक्षण' क । (८) (अतः' इति नास्ति ख० । (९) दश्च" नास्ति क०। (१०) "वायब्याधस्तरारेषु' ख०।
==
पृजाखङ्तनिरूषणन् । १९७
` सिख्यष्टकं स्यत्तेचेषु हयं पादतरे न्यसेत् ॥ ८२ ॥ कारणालरखतं न्यासं दीपादीपमिवोदितम् ॥ `
एवं विस्थस्य देवेशीं (१) स्वाभदन व्ेाचन्तयेत् ॥८३॥ ततथ करदाद्यादिन्यासं कयाव्समा!हतः ॥
वापनद्ां समारभ्य वापजङ्घायाः पिमभागमारभ्य । बा- मादिक्रमतोऽपि वामान्तरालक्रमेण । तेषु पवोक्तेषु स्थानेषु अ- (२)्टसु, सिच्छष्टकं न्यसेत् (३)इति शिष्यं पादतङे पाद्- - (४)तरयान्येसे(५)दिव्यथः ॥ ८२ ॥
उक्तन्यासस्यात्कषं दशे यन्नु(द्)पसहत्य फटभतां वासः नां विधत्त-कारणा दिति ।
कारणातमकाशविमश्चसामरस्यरूपाननेखकजगद्रपात् । दी- पारपामेव भरत, पहाभासं कारणातुरूपम् , एवसुक्तपरकारंण, उदितं कथिते, न्यासं विन्यस्य, स्वासनोऽमेदेन विचिन्तयत् । श्रीचक्रावयवान् सश्षक्तिकान् । स्वदेहावयवेर पृथक्त्वेन विभाव्य तद्धिष्रज्या परया च स्वात्मना(७)ऽभेदं भावयोरित्यथेः ॥८३॥ उक्तंसिमिः षोढादिभिन्यसैः परविदानन्दरक्षणं ` भाव- ` यन् परिपकहदयां बाह्यपूजाक्रियायाग्यतायं करण्द्धचादिन्यासं (१) (देवोक्षे !' क०। (२) “अष्टसु नास्ति ल ०। (३) दति" नास्ति क०। (9) "पादतलयोः' नास्ति ख ° । (५) त्यथः ' नास्ति ० । (६) 'दशेयितुस्तुप० ख० । (७) “हवारमनोऽप्यभेद्' ख० ।
दीष ९
` ९४ सटीक थो गनी हदये-
अहं ते कथयाम्यय विदयान्यासं शण श्रियै ! ॥ ८४ ॥ ध मूध्नि गुह्ये च दये नेत्रेषु()त्नितथषु च ॥ श्रोच्नयोधुगटे चेव (र)सुखे च भुजयोस्तथा(३) ॥ <५ ॥
कयोदित्याह-तत इति । ` ततल्िविषन्यासानन्तर करश्चद्धयादिन्यासम् । कमणा(ड.त्पपराप्रु्टकायं(९) भूताङ्कलिस्थतम् । करम चरमया शद्ध करया; स्पश्चवाष(द.नाम् ॥ इत्याभयुक्तव चनाक्तरत्यां करश्युद्धिन्यास् आदियस्य न्यासस्य, जातवेक(७)वचनमप्र । समाहितः सावहितः । करणु- इ्यादिन्यासश्चतु;(<८)शतिशाल्लक्तः । अतो नात्रो(र)च्यते, केवरु नास्लव गृह्यते ॥८४॥ | तत्रालुक्तं विद्यान्यासमाद-सूरध्वीति। ` (१०.बेदाया बाजच्रयेण न्यासो विच्ान्यासः। मूध्नि वारभववाज, हृदय शाक्तवाज, गद्यं कामराजबाजम् । एवं सर्वत्र
` (१) (नत्रात्रतय एत्र चः ख । (२) "देवि! ख०। (2-97-५ । (४) कारणा० ख । (५) (हूपा०ः ख० | (६) “शधिनीम्' ख9 । (७) (जातावेकत्वम्' ख ० । (८) "चतुःशती ख० । (९) "नोच्यते ख० । (१०) जान जान्वाः त्यक् ख० वुश्तके।
चूजासङतनिरूपणन् । १९९
पष्ठ जान्वोश्च नाभो च विद्यान्था्तं विधाय (१ च |` करदाद्धिः पुनश्चिव्र आसनादिष(र)उङ्गकम् ॥ <£ ॥ `
स्थानत्रये बीजत्रयदधु्रन्न्यसेदिययेः । [ रिष्टे (३) स्पष्टम् | । करशुद्धयादीनां नामान्या(४)इह-करद्युद्धिभिति । वग्दिच्यो व्तिन्याच्ाः । श्रीकण्ठादिन्यासः स्वच्छन्दसङ्क हो क्तेः, तन्त्रान्तरे प्र्षिद्धस्वादिह नोक्छः । शिष्टे स्पष्टम् । ` कामेन्वया।ददेकीनां न्यासमाह-आधारे इाते।
४
वेन्द वस्थाने शिखायापिति व्ययेन क्रमो ज्ञेयः । बेन्दव-
स्थानम् । | दीपाकारोष्वषाचश्च कका५)टे हत्त मिष्यते । एति पूवाक्तं ठकाटभू् । ज्िखा नाम ङण्डारुन्या अग्रं शिवस्य
विश्रान्तिस्थानम् । अनर श्रुतिः नतस्याः (क्रिखाया
पध्ये परमामा व्यवस्थितः इति । तेन शि(ऽ)खाङब्देन तव्य
परिस्थानं बह्यरन्धे छषष्यते । अधिचक्रादिकाः 'अभ्िचक्रे काम गियीखये (८)पित्रेशनाथात्पके श्री (र)कापिश्वरदेवीरुद्रालपक्शक्ति-
(१) “खमाचरंत्' ख० । (२) (आसनानि ष ख०। (३) कसान्तगंतं नास्ति ख०। (४) न्याखमारह्ः क ० । (५) ललाट चत्तदष्थते' कऽ । (६) श्िवः' इत्यधिकम् ख० । (७) 'श्िखाशब्देन' नारित ख७। (८) "मिजीक्नाथा० ख० ।
(९) श्री' नास्ति स०।
(~ ~ ~
०० खटाके योगनीषह्टदये--
श्रीकण्ठादीनि (१)वाग्देवीराधारे हदये पनः ॥ शिखायां वैन्दवस्थाने स्चिचक्रदिका न्यसेत् ॥८७॥ तत्त्रथ समस्तं च विद्यावीजच्रयान्वितम् ॥
1
श्रीपादुकां पूजयापि । रुयंचक्रे जाल(र)न्धरपीठे बष्ठीक्षनाथा- त्मके वज्रऽवरीदेवा विष्ण्वात्पशक्तिश्रापादुकां पूजयामि । साम- चक्रे परणेगिरिपीठे आङ्खीश्नाथात्पके भगमालिनीदेवीबद्यास्प- श्ाक्तश्रा पादुकां पूजयापि । बद्यचक्रं ओ(३.डयाण्षाठ चया नाथाटके श्रामदात्रिपुरख॒न्दरादेवीपरब्रह्मासशक्तभापाद्का पृ जयापः। इति मन्न्येस्तव्याः शक्त याऽग्रेघ्यसापब्रह्यचक्राद्- काः (४)। कथः, आधारहदयश्चपध्यब्रह्यरन्धषु बहेसुयसामन्रह्- ` चक्रेषु कामगिरिजारुन्पर(“~पूणेगियाडथाणग(६)पार्वु श्र विष्णुबरद्यपरब्रह्यारमकशक्तीः (७)कापेरवरीवजेर्वरो भगमा ङ- नीमहातरिपुरसुन्दरीः न्यसेदियथेः । अयमेवाथेः सम्परदायवि- दधिदशिकेन्द्रेः (८)पद्धतिषु भरपञ्चितः ॥८९-<८७॥ तत्वन्यास्माह-तस्वच्यनिति ।
त्वरय आत्मविद्यािवाख्यतच्वानां त्रयम् । समस्तं च
(१) भ्रीकण्डादींश्च ` ख ०।
(२) 'जाखन्' क ।
(३) 'उडियान' श्र ।
(७) 'धम्निचक्रादिकाः' अधिक ख० । (५) जानः कऽ ।
(६) 'उड्याणः' ख० ।
(७) (शाक्तीः' नादिति स०।
(८) “दे दिके क 9 ।
व च, कमी ठ 4 १ यरि 9 १
+ व क.
चूजा सङ्ननिरूपणम् । २०१
पादाद्नामिपपन्तमागङ शिरसस्तथा ॥ ८< ॥
त्वत्र यपपष्टिखूपं तुरीयं तच्वम् । तदुक्तं स्वच्छन्द खङ्कदे-
धरादिमायान्तमारमत म(१)न्तगेतं स्प्रतम्
शुद्धविचेश्वरसदा रिष व्रि्या(२)ख्यतक्छगाः ॥
शिवशक्तिद्रयं चेव शिवत्वं भक तितम् ।
प्रमातपेयप्रमितिरूपमेतच्र यात्मकम् ॥
एतत्तत्त्वं शिवत्वं सवेतवमयं श्युभम् ।
इति (उ)विद्याबीजजयान्वितप् । ` विद्यायाः बीजानि घाग्भवकामराजशक्तिवीजानि । शएतद्धीनसपुदायरूपै तुये बीजम् । तश्चताभवाजरान्वतं पादादेनाभिषयन्त स्पष्टम् | आ(४)गखपित्यादेसामथ्योनामभ्याद्यागक छ(५)््यते ! ज्ञि. रस इति प्श्चमासपभ्यद्खादेति (ल्व ठभ्यते । कोथः {१ अआत्मरवरिद्रशिवतुरायतचानि मृलत्रिच्यावाग्भव- कृ[(मराजश्ाक्ततुर यबाजादकानि चतुध्यन्तनपान्तकानि उचाये पाद्ादेनामे(जोषयन्त नाभ्यादेगखान्त गखादि्िरोन्तं सथ पस्पु(८)र्य व्यापक न्यसेदित्ययेः \
(१) (तच्वस्यान्त० ख9। (२) “डशिवविद्याख्यतच्वगईम्' ख । (३) (इतिः नास्ति कऽ । (७) 'स्पषम्, आगरमत्याद् इत्यन्न पयन्तपद्'इातेख9 पुरऽ पाटः (५) "स्यतः ख | (६) 'च' नास्ति खऽ। (७) नाभ्यन्तः ख०। (<) 'सस्परद्य' ख० । २६
२०९ सटीक धागिनीहदये-
व्यापकं चेव (१ >विन्यस्य स्वात्मीङ्कखय परं पुनः ॥
५
भूयोऽपि पराहन्ताभावनामाह-स्वात्मीकरल्याति । परं व्रिश्मोत्तीर्णं तेजः पुनः स्वात्मीकृत्य पूवं श्रीचक्र न्यासानन्तरं स्त्रामेदेन वि्चेन्तयेदिति । [ परेणे(र)क्ययुक्तभू । इदानीं करथद्धचादिन्यासानन्तरमपि पुनः परञ्योतिमांयावशा- त्स्व भिन्नमिव प्रतीयमानं स्वाभेदन विचिन्तयेदिति ]। स्वास्मी- कृत्य पुनः करश्चुद्धयादिन्याससामथ्योन्पाया(३)पगमे भरी- महात्रिपुरसुन्दरी स्वात्मतया त्रिभाव्येत्यथः। अगृतप्ठावनपाह-सन्तपषयेदिति । सोम्यं बह्मरन्ध्राधो्ख(*)सहखद लकमलकर्णिकामध्यग - तपूणसोपमण्डलपध्यस्थितत्रे( ९ )करोणान्वरस्थमनच्कानुत्तरात्प- , [ हाषे(ह)कलास्पकं सोम्यं मूलाधारचवुर्दखकमलक्णिकामध्य- गतपूणेवहिपण्डरृपध्यगतत्रिको णान्तरस्थितमनच्करात्पक | सपरा. धकरारूपपाभ्रयं द्रयोर पतानल(अ)कण्डङिनीरूपयोरय ऊर्ध्वे भ- स(८)रतोर्यानिलिङ्धाकारयोः सापरस्पास(९)तरदमतद्रवासा-
ह (प 9
` (१) "चातः ख०। (२) कसान्तमेतं नास्ति ख०। (३) (मायापारगं स्वात्म ख०। (७) 'सहसर1रकमख' ख० । (५) “ज्िकाणान्तरस्थिनमनक्ातपकः' कऽ] (६) कंसान्तगेतो च्रन्थो नास्ति ख० । (७, चकुः ण्डलीरूपयोः'ख ० । (<, श्रसरयाः कण । (९) श्षरद्श्ुतः' लर° ¦
पूजासखङ्तानेचू्पणम् । २०२
सन्तषयत्पनदईैवीं सीम्याच्चेयास्रतद्रतरेः ॥ <९ ॥ एउ चतवधा न्यासः कतेव्या व।रवान्दत। ॥ षाटा न्यास्ाजणसमादयश्च मर्द्व्यादिकः [पय्] ॥ २०॥ करदुख्यादिकश्चैत्र सधरिकन सुसदये ॥
५ © छ, € (~. परातः(१)कार तथा पूजास्तमयं ह्मकमण ॥ ९१ ॥
रेः सन्तपयेत् आष्ठावयेत्। अयमेव सम्परदायेद्धिदोशिकेः पद्धतिषु परान्यास (र२.इव्युच्यते ॥८८-<८९॥ उक्तचतुरविंधन्या(३)पमनुवादपुरःसरज्चपसंहरति-एवमभिति। एवमुक्तप्रकारेण । षाढान्यासोदिषुसिद्धये खखेन न्पाकस्षस्ा- मथ्यान्निरादरतप्रस्युहतया परमानिःश्रयसप्राप्ये स।धकेन सुथु- पुणा कतेव्यः, न तु द्धन तस्य मुक्तत्वात् । (४) [न ध्या नं तपःक्रिया ।] तदुक्तं वविकज्ञानभेरवमट्ारकैः (५) तरव पूज्यते द्रव्येस्तपेयद्रा परापरः । | यश्चव पूजकः (६)सवः स एवैकः फ़ पूजनम् ॥ इति । ` न्यासचतुष्टपस्य कारुमेदेन विनियोगपाह-प्रातरिति । भ्रातःकरे षोढन्यासं, पूजासमये अणिषादिन्यास, हो(ऽ)प्रमये मूलदेव्यादिकन्यासं, जपक!ठे करशुद्यादिन्यां (१) कालेऽथ वा पूजाकाटेवादहो०ः १) कालेऽथ वा पूजाकाठे वा हो०ः ख । (२) न्यास उच्यते ख०। (३) 'न्यासाचुवाद ° कञ। (४) कसान्तगेतो ग्रन्थो नास्ति ल ०। (५) येरवः ख७ । (६) 'सव' ख० । (७) "हामकारे मुलविद्यादिन्यासं' ख० । ¦
२०४ संटीके यागिनीहदये--
जपकारे (१)तथा तेषां विनियोगः पृथक् प्रथक् ॥ पजाकाटे लमस्तं वा कूला (२) साधकपद्धवः ॥९२॥ षट््रिशत्तच्रपयैन्तमासनं परिकर्प्य च॥
^ (> ~ 4 7. = ङु षाद ति । अय प्रथक् पृथक् विनेयाग्ः । अथवा पूजका
समस्त चतुर्विधं न्यासं करा साधकपुङ्गवः साधकश्रेष्ठश्चतुरविःः धन्यासकरणसामथ्यादिशीयंषाणपाश्चएटकत्ालसत्यासन्न(दोो- |
्षत्वात्करृतकय एव ॥९०-९२॥ घट्चिंरादिति । पटतरिशत्त्परयन्तं सित्यादििषान्तं तरवक्युदायरूपमा- सनं परिकटप्य चिन्मरी चीनापाधारत्वादासनं श्रीचक्रं परिक- रप्य । तदुक्तं श्रीषराक्रभ-- हत्षरोजान्तरे (ध्यायन् पृथिव्यादि शिवान्ति(५,)कम् । गुपादितप्त(द)क्सुपक्षपणाऽऽसनतां न(७)येव् ॥ गुप्नादि । योगिनीनामि(८)त्यस्यादो समस्तपरकरपदमध्याहा- यम् | आदिपदेन गुप्तरसम्भदायङ्कलकलनिगर्भरहस्याति-
रहस्यपरापररहस्ययागिन्यां श्यन्ते । वदि; पूजा । तत्र निघ-
(१) किऽ्थ वा तेषां" ख० ।
(२) साधक वित्तमः ख०
(३) “वत्थाखन्न मोक्चत्वात् ! अत एवः ख० । (४) “उ्याघ्र पऽ ख०।
(५) शश्िवान्तिमम्' ख० ।
(६) 'सै।वणतक्त' ख० ।
(७) तिः इत्याधिकप् ख० ।
(८) “मित्यत्नर' ख ०।
तूजासङ्कतानिख्यणन् । २०५
गप्तादियामनोनां च मन्त्रेणाऽथ बार ददत् ॥९३॥ पेण्डरूपपदमान्थमेदनाद्घभ(१)दकम् ॥
चटुः -(र२)"वाछिः पुजोपहारः' इति । नदाक वि भिरप्युक्तम्- ८अवचितवलिपुष्पा") ( कुपारसं° स ० १ उटा० ६० ) ३।१।
५
कोऽथः १ मावितालसा(३.बाह्य पूजा करणात पूतम् | यद्यद्भःद्यं वक्ष्यमाणं तत्तदान्तरमाचरत् ।- इस्यस्प्रदगुर्क्त(४ रीत्या अन्तयागाय स््रशर्।र् त८५)चषचु- दायरूपं (६) श्रीचक्रं विभाव्य ('क्षमस्तपरकटगुक्तगुप्ततरसम्प्रदाय- कुखकोालनिगभरहस्यातिर हस्यपरापररहस्ययायन (9श्राषा- दुकाभ्या नमः” इति यागिनीमूरुपन्त्रेण स्वाथेरासं पूना इयाः दित्यर्थः । (<)एतन बह्मपूनां सवापपि (<जञआदावन्ते च ` कुयाद्ति दुच्यत ९ ३॥ आ(९०)न्तरविध्नि(११)रासपाह-पिण्डरूपोति ।
(1 क अ ५
(१) *भदनम्' ख० ।
(२)"बालिः पूजोपहारेऽपि दण्डभेदे कौ रिषे-इति' ख०।
(३) “भावितात्मपूजाकरणात् ` ख० । ¦
(४) शइत्यस्मदुक्तरीत्या' ख० ।
(५) "तच्च ख० ।
(६) श्री नास्ति ख०।
(७) श्रः नास्तं ख ।
(८) भत एव ख०।
(९) 'आदावन्तः कुया ° क० |
(१०) अन्तविध्न' क० ।
(११) "निवारणमाह' ख ।
२०६ सटीक योगिनीहदये- ग्यह- © [ »> क ~< गुष्यहन्मुखमुधसु विन्यासेन सुन्दर !॥ ९४ ॥
[ ®
यागमन्द्रिगांश्ैव विघ्नानुत्सायं मन्त्रत्रित् ॥
गुद्यहुन्पुखमूषषु । गह्यसब्देन गुदमे(१ )द्ान्तरारं खक्ष ते । (२) [ गु३)दं गुद्यपञ्स्थ मेदं लक्ष्य? || पुख शब्दन (४) मुख।वयवं रराटं क्ष्यते । गुद्यहुन्म(५)खमूष चतुषु (दकस्था- नषु विधयान्यासेन (७अरविद्रायाः सभागयवरिद्यायाः बीजचतुष्- यन्याषन । पिण्डं कुण्डलनी । पिण्डशब्दन कुण्डटिनस्थयान गु (८)दमेदरान्तरकन्दो लक्ष्यते । [ रूपपदेऽपि व्यत्ययो ज्ञेयः । पदं हसः । पदशब्देन हंसस्थानं हृदयं रक्ष्यते । रूपं बिन्दुः । रूपशब्देन बिन्दुस्थानं कलां छक्ष्यते(९) । | अ्रन्थिशन्देन यत्र विदं सत्रे मणिरिव प्रथ्यते तद्विर्वभूल ब्ह्यरन्ध वचन्मय ठष््यते । (१ ०)एतच्चतुष्टयभदाद्रेघ्रभदनम् । काथः , गुह्या स्थानचतुषटयेषु (९१) विद्याबीजचतुष्टयन्याप्तेन । पाताङादिषु खाकेषु ये विष्ना भेदलक्षणाः ।
[१] भद्र्।न्तर' ख ।
[२] शति पदान्तरम् ' इत्याधेक क०।
३] कसान्तशतो ग्रन्थो नास्ति ख०।
[७] मू मावयवोः ख० ।
[५] (मध्यः क०।
[६] 'स्थानेषु' नास्ति ख ।
[| 'सामाग्यवद्याबीजचतुष्टयन्यासेन' ख० ।
[८] गुद मदान्तर कन्द् छ्ष्यतेः क ० ।
[९] कसान्तगत नास्ति क०।
[१०] “ए! नास्ति ख° ।
[१९] श्ु' नास्ति स्र°।
+
वुजासङ्कतनिहूपणम् । ०७
पार्णिघातेन भौमांश्च ताठन च नभोगतान् ॥. ९५ ॥ असमन्त्रेण (१>विद्याश्च ष्ट्या विघ्नानपोहयेत् ॥
इत्यभियुक्त वचनाक्तरीत्या पाताखादि(रुररूपाणे पिण्ड- पदरूप(र)ग्रन्थिस्थाने गु(४)दहदयललाटब्रह्यरन्धाणि भे- द् क्षणात मचा त(५)द्ध्वे रन्ता तताश्चन्पयाद्रयपदाव- श्रान्तिरान्तरो विष्ननिरास इव्यथः । एतन स्वमपि बाह्यपू(६) जान्तं अन्तः कूयादिति उपलक्ष्यते । अन्तयागे(७) देहस्येव यागगरहत्वात्तदन्तािघ्रान्नरस्य वहियांगप्रन्दिरगतानां(८)विघ्धानासुत्सारणे ङयादित्याह-याग-
मान्द्रात। अपसपन्तुये भूनाय मुता सुवि सास्थताः। ये मुता विघ्रकतारस्ते (९.नशयन्तु शिवाज्ञया ॥ ““ह(१०) अन्ञाय फट्?” इति मन्त्रेण मन्त्रवित् साधको
- निगेच्छतां वि(रशघ्नानां निजवामाङ्गपङ(१२)चतो मागें
(१) 'खष्ट्या च दिव्यान्विना० ख० । (२) “रूपेण' ख० । ।
(३) 'रूपरूपातीतस्थाना९ऽ' ख०।
(७8) (कन्द हदय० ख०।
(५) (तदुध्वे तदतीताचन्मयाद्वयाविश्नान्तिार्नेवास हव्यथेः' ख 9 (६) “पूजनानन्तरमपि कुयादित्युपर्ष्यते' ख० ।
(७) “अन्तयागगरहस्येव यागगदान्तरत्वात् तद्न्तरविश्न २ ख०। (८) मन्दिर नास्ति ख०।
(९) "गच्छन्तु" ख० |
(१०) ° हः' ख० ।
(११) “विष्नसङ्कानां खऽ ।
(१२) 'लङ्गोचात्'ल° ।
२०८ ससीके योगिनी हदये--
[३ ह्व ०१.११.५१. ( ^ ५4 ^ क दिष्छघोध्वं (१)महाकह्विपराकार पारभाव्रयत् ॥ ९६ ॥ सामान्यार््येण देवेशि ! मातण्डं पारेपृजयत् ॥
दां उतायं । | भूपरिगतान्नमोगतान् विद्यां विघ्ानुत्सारयव् हइत्याह-पा- ष्णिघातेनेति ।
[पा(र)ष्णघातेन पात्णघातत्रयेण । मोपान् भुभिष्ठन् विघ्नान् । अघ्नषन्त्रेणेति सर्वजातुवतते । तालेन करताङजयेण । नभोगत्तान् अन्तरिक्षगतान् विघ्ान् दृष्ट्या वीक्षणेन वि्ांश्च व्रन्नान् । । अपाहयत् नेःसारयत् ।
नग(देतानां शिन्ननांः पुनरभवेज्ञाय वन्हिपाकारभाव नापाह--दिष््वधोध्वं मिति ।
संविद महासारे विमर्ञेकरारीरिणि । ` भदाभासमिदं हव्यं जुहोभ्यपुनरूद्धवम् ॥ इत्यजियुक्तव चनोक्तरीया स(ढ)ववस्तुतत्परसतरिदेव मह - बन्हिः प एव प्राकारः दुखह््यलात्सवेतो दिक्षु परिस्फुरददर- यपरसविदात्पकपहावन्दिधाकारपरिकलपना भावनया मेदभती- विलक्षणानां चिष्रानामपवेश इयथः ॥९४-९६॥ घुथपूजामाह-सामान्यार्व्येणति
सामान्यार्घ्यं वि्ञेषाघ्यं च (५)वक््यते। [पर(2)काशक्च-
(१) (ततो बह्कि°` ख । ¦
(२) कसास्तगेतो श्रन्थो नास्ति ० । (३) (निगच्छतां' खऽ।
(५) 'खर्वस्फुरितपरसंविदेष' क (५) क्षयतः क ।
(६) कंसान्तगतमधिकःं कऽ ।
^
वूजाखङ्तनिरूपणम् । २०६९
प्रकाशशक्तेसहितमरुणाकत्पमुञ्ञ रम् ॥ ९७ ॥ ग्रहादिपरेवारच्च विश्चतेजोऽबभा( १) सनम् ॥
(९ [ (र
क्ति सहितथ]। भरकाक्शक्तिसहितः पराज्ञः परमाक्ञेवः, शक्तेवि मश्ोख्या तया सहितो नित्यसपवेतः । स्वप्रकारशिव एव भस्कर- स्तद्विमदोविभवो मरीचयः! येः सख भासयति वेद्यमण्डलं = तस्थ पूजनपहन्तया मतिः ॥ ९(२)त्याभियु्तवचनोक्तरीया सवे प्ामान्याश्पेण स्वासाहः स्भावभावनालक्षणया पूजनया मावयेोदित्यथेः । बाह्याथेस्तु(३) स्पष्ट एव । । अस्व गुणापिक्यमाह-अरूणेति। स्वसंवित्रिपुरा देवी छोदित्यं तद्विपशंनम् । इति प्रामाणिकवचनेोक्तरीस्या (४)विपरेिभवविविधारुण- भूषणम् । उज्ज्वलं उद्यास्तमयरहितत्वात् ॥ ९५-९७ ॥ यरहाटीति। ग्रहदिपरिवारं च (विषयान् । (र)गरह्णन्तीति (९) 'तेजोऽवभासकम्' ख०। | (र) इत्यस्मदुक्तरीत्या'ख० वस्तुतस्तु त्यस्मद् गुरूक्त रीत्या ६. त्यप्ष्यत । (३) तु' नास्ति ख०। (8) (वि मशेवि धार्णम्' । ख०। (५) भ्व नास्त क०। (६) गुणातीतिः ख० । २.७५
| | | | |
२९१० सटीके योगिनीहदये--
सौम्या्चेधयुतैदेत्रि ! रोचनागरुकुङ्कुमेः ॥ ९८ ॥
मृरमुच्ारयन् सम्यग्भावयेचक्रराजकम् ॥
ग्रहाः इद्दरियाणे । तेषापादि मनः, तत्परिवारं. च
विविधविषयग्रहलक्षणसङ्रपपरत्ययभवादहपव्तकमित्यथः । अः च्रोपनेषत्-“धियो यो नः प्रचोदयात् इत्ति । विरवतेजोऽवभ।सकं, “तदेव (१)ज्योतिषां ज्योतिः?” (२)इत्यु- पानिषदुक्तरात्या (३)बाह्यतजोगणप्रतीतिकारणनिजस्फुरणम् । बाद्याथस्तु धीमादयोऽ्र(४) ग्रहाः । सूर्यस्य भरधानलादादिश- ब्दात् षडङ्गानि गृह्यन्त । स्पष्टमन्यत् । बाह्यचक्रोद्धारमाह-सौम्पेति ।
सोम्यं कपूरं, सोमनामवाच्यत्वात् । अश्रेय कारमीरेः | (५) अभ्रिशिखासंज्ञकल्वात्। | “कादपरजन्पाभशिखम'' इत्य- मरः । रोचना (दगोरोचना, अगर; कालागरूः, ङुङ्कपं घु- खण, (७)एतेः सुधया पड्कीकृस्य तेन स््र्णादिमये पटे (८) देमच्ूच्या विरिख्य । भृङ सोभाग्व्रि्यां । उच्यारयने. परेण
चच्चक्रं ेखयति, स्वयं चेरिख्खति तदोच्चश्न् । चक्ररा-
(१) 'तदेवान्तरं ज्योतिःख०।
(२) इति श्चुव्युक्तरीत्याः ख० ।
(३) ^तेजोगुण' ख० ।
(४) “अन्न' नास्त ख०।
(५) कखान्त गतं नास्ति ख०।
(६) 'गोरोचनम्' क०।
(७) "एतेतेपङ्करव्याव्ययाकींरुनस्वणौ ०? ख० । - (<) 'पट' नारित क ० ।
तूज।सङ्तनिदूपणम् । २११
योगिनीमूरमन्त्रेण क्षिपेत् पुष्पाञ्जलि ततः ॥ २ ॥ ` ९ +
~. व भ ( ~ मणसुच्छश्रवाडव। त्रखम मूलखत्रियवा || .
जं चतुराम्ना(१)पमपल्वात् (२)सवेपूनायक्रेभ्योऽप्युत्तपे सम्यक् । समत्रेकाणशक्यग्र समरखं मनोहरम् ।
इत्या भयु्तवचने।क्त रीत्या भावयेरिलखत् (३)टेखयः- द्रा । तदुक्तमभियुक्तैः--"कस्तूरीघुखगेन्दु चन्दनघ्ुषाभिश्चक्र- राज टेखतर्' इति (४) । |
योगिनीति।
योगिनीनां पमरकटाद्ीनां मूलमन्त्रेण (समस्तपकटः--इत्या दिपृवोक्तिन पष्पराज्जछिष्। ततः श्रीचक्र नैक्षिपेत्॥९८-९९॥
(९ )पुष्पादीनाममभवि(३)ऽपि कायेतापाह--सणि- श्क्तेति।
वोप प्रतिलोमम् । (ॐ)उच्वारितमूरबिच्यया सौ-
| अ
भाग्यविद्यया वा । (८)वाङ्घन्दः काका(र)क्षिबदुमयत्रापि `
(१) धचतुराम्नायत्वात्' क ।
(२) (तत्सवे' ख० ।
(३) “खछेखयेख्चः ख० ।
(9) (तचः इत्यधिकं क०।
(५) 'वुष्पाणामभा० ख० ।
(द) “ऽपि कायतामाह' इति नारित क०। (७) 'उच्चरितया साभा० खऽ।
(<) वा! नासत क० |
(९.) "काकाक्िवदुभयत्र सयुञ्यते' ख० ।
¢. अ ने
२१२ सदीके योगिनीहदये-
अशून्यं स(१)बदा कुयाच्छन्ये विधनास्त्वनेकशः।| १० ०॥ श्रीचक्रस्यात्मनश्वेतर मध्ये त्वर्थं प्र(२)तिक्षिपेत् ॥
सम्बध्यते । अशुन्यं आविराहैतम् । (२)सवेदा येन केन पर कारेण इयात् । पुष्पाणाममावे मण्यादेभिर्बा योगिनी मुलमन्ते- ॥ ण सोभाग्यविदच्यया वा (ड)सतर॑दा अशुन्यं चक्रं ईयात् पूज- | येदिखथंः। - [ (<)तथाऽकरणे निष्फकतामाह ]--द्युन्ये इति । पण्यादिभिः शुन्ये सति श्रीचक्र ऽने(दै)कशः बहुशः विघ्नाः । सपयान्तरायाः सम्भवेयुः ॥१००॥ सामान्याघ्येव्रैवानमाह-श्रीचक्रस्येति। श्री चक्रस्य पूर्वोक्तरीत्या उद्धतस्य, साधकस्य च मध्ये अष्यं वक्ष्यमाणरीत्या (७)प्रतिक्षिपत् [ (८प्रतिष्ठापयत् ) | । अप्यपरतिष्ठा(र)भकारमाद-चतुरख्रान्तरास्थाति । चतुरसरान्तराखस्थकोणपटके आदो चतुरस्रं छित्वा तदन्तरेत्तं तदन्तः षटुक्ोणं तन्पध्ये त्रिकोणमिति मण्डलं गोम
(१)“सर्वथा ख० ।
(२) श्रतिष्टयेत्' ख० ।
(३) (सवथा एकेनापि प्रकरिण' ख० ।
(७) सवथा अश्चून्यं चक्र पूजयेदि ०" ख० ।
(५) कखान्तभतं नास्ति क०। (६)“ऽनेकशो विश्चा बहवो विघ्नाः" ख०।
(७) ्रतिष्ठयेते' ख ०।
(€) (क सान्तर्भत' नास्ति खऽ ।
(९) ध्रकार' नास्ति ख०।
पूजा सङ्तनिरूपणच् २१३
चतुरखान्तरास्थकौणषट्कं सुरेश्वरि ! ॥ १०१ ॥ षडालनानि सस्पूञप त्रिकोणस्यान्तरे पुनः ॥
योपरिप्तमुतछे मर्प्यमुद्रया त्रिलिखिदिति सापथ्या(१)छभ्यम् । तदुक्तं श्रीप्राक्रम--
तता गोपयसद्धिप्र चतुरस्मुबस्थले ।
प्रवह(रद्ासहस्तन कृतया मत्स्यञ्चुद्रया ॥
दिव्यगन्ध तुर्ययुक्तं विलिखेदश्येमण्डलम् । वेदास्रहत्तपङ्कोणं त्रिकोणान्यन्तरेऽन्तरे ॥ (३)एवर चतुरस्रत्तान्तराटको णषर्के ॥१०१॥ घडासनानीति ।
पडासनानि८) सम्पूज्य । अमृताणवपोताम्बुन आस- चक्रमन्त्रसाध्यािद्धासनानि सम्पूज्य । षट्कांणान्तरस्थ्िको- णपध्ये का(प) कामगिरिषीठं, षू (दे) पूणगिरिपीठ, ना(७) जाङन्ध्रपीठं, ओ(८) ओञ्याणपीठं (रक्र- मात् । विचतुरद्ी(१०)न्वा चतुरो वा । तिकोणकोणेषु
(९) (सामथ्यंलभ्यम्' ख० । (2) दाम इति क० षु° पाठःन्तरमपि।
(३) इति" ख० ।
(७) 'बडासनानि सम्पूञ्य' क ०
(५) का" नास्ति ख० ।
(६) “पू' नास्ति ख०।
(७) “जा नास्ति खऽ ।
(<) “ओ! नास्ति खऽ।
(९) 'इतिः क० ।
(१०) भिचतुरल्ीन्वा चतुरो षा' नारित ख० |
२१४ सटीक योगिनी हदये- पीटा(१)नि चतुरो देत्रि ! क।पूजाओ इति क्रमात् १०२॥
९
अ्चैथित्वाऽध्वदे तु वहूदैशकला यजेत् ॥
चतुरस्रे (र)तन्पध्ये चाचोपिा तत्राधार् प्रतिष्ठाप्य अष्थपाद(शेमाधारं तस्मिन्मध्ये (छतरह्विदिम्बं अभ्य- च्य तत्परितः कलाश्चाभ्यचयेत् । तदुक्तं स्वच्छन्द सङ्गह - षट्काणान्ततरिकोणे तु वहिविम्बं कलायुतम् । आवाह्याधारता देवि ! पूजयेन्मन्त्र वित्तमः ॥ इति (५) । मात् यादिक्षान्तदशवणेपूवास्तस्य (६)वहेरेश कठा धू- म्राचिराद्या यजेव् । तदुक्तं स्वच्छन्दसङ्घदै -- ` यादिक्षान्ता()त्पवणानि कला वहेमेहेरवरि ! । एताः कटाः सपभ्यच्ये स्वस्ववर्गयथाविधि ॥ सववीजायाश्चतुथ्यन्तनापमध्या नपोन्तिकाः (८) । परोक्ता वहविकला मन््रनामानि श्रृणु साम्प्रतम् ॥ धृम्रार्चिनीख्लक्ता च कपिला विस्फुरिङ्किन।(९) ।
(१) 'पीडंखिचतुरो' क9
(२) "चतुरे तन्मध्ये चाचैयित्वाः इत्यज्र रयं मध्ये कम्च- यित्वा ख०।
(३) (अघ्यैपादे आधारे" ख० ।
(४) (तन्मध्ये ख० ।
(५) इति नास्ति क०।
(६) 'तस्थैव' ख०।
(७) ध्यादिश्चान्तानिः ख० ।
(८) (नमो.ऽन्तिमाः' ल० ।
~ “^~ @.
(९) विस्फुटिल्गिणो' क० ।
पूजासङ्कतनिषरूषणम् । २१५
अष्पेपान्रं प्रतिष्ठाप्य तत्र सुथेक्रला यजेत् ॥१०३॥ पात्रे सूयैकल श्चैव कभादिदहादशाचैयेत् ॥
ञ्व[कापाङिन्यविष्पती तदृर्ध्वं हव्यवाहिनी | अष्टमी कव्यवाहा च रोरी सवाहिनीौ (१)तथा ॥ [ घू(२)भ्राचरूष्या ज्लिनी ज्ाछिनी विस्फुखङ्गिनी ।
(9 १ 2 4
सश्र; सुरूपा कपिला हव्यकञ्यव श्त तन्त्रान्तरे | ॥१०२-१०३॥ पाच इति। = ^~ | © 9 पा(र)तरे अध्यंपात्रमध्ये। सुैविम्वमभ्यस्य । तदुक्तं खच्छ- न्द् सद्भदे -- अ()घ्लप्रक्षाकितं शाहः स्थापयित्वा तथापरं । हदयात्घुयविम्बं च समावाह्य स्व(५)पन्त्रतः ॥ कादिठान्तं भादिडान्तं वणेजातं क्रमोऽक्रमात्। दयं द्यं प्र२)योक्तव्यं कलाश्च तदनन्तरम् ॥ ह्व्यस्मद्गुरूक्तरीस्या कभादि ककारमकारादि ब(७)णे- युगङ द्रदगशादयक्छाः । क्रपात्तापन्याद्या ६[द् शाचयत् । त्- दुक्तं खच्छन्दसङ्द- कादिठनन्ताक्षरा देवि { सूतिनाश्ना समीरिताः| ` (१) "संहारणी ततः ख० । (२) कसान्तगेतो अन्थः ख० पु० नास्ति । (३) पाजमभ्यच्यं पान्नमध्य' ख०। (४) (अथ प्र९' खऽ | (५) "च मन्बतः' ख० । (६) "च वक्तव्यम् ख० । (७) वणेयुग्मयुक्तद्वादऽ' ख० ।
१8६ सटाके योगिनीह्दये--
६१
©
विधृते तु पुनद्रेव्ये षोडशेन्दुकला यजत् ॥ १०४ ॥ तपिनी तापिनी चेव शोधनी शचोषणी तथा ॥ श्रा(श)मणी दिनी चव वरेण्या क्षणी तथा| सुपुन्रा (२)ृष्टिवाहा च येष्ठा चेव दिरण्यदा ॥ एताः सोरकलाधरैव व्यु(३)च्करमाद्धादिडान्तिपाः । कभादिकथनाद्यकारादयो दश्च (छ)बहिकलखाः | अकारा- दयः षोडश स्व(^)राः सोपकखा इति गस्यते। तत्र पा- त्र ख्वङ्भाद भिः सुगान्धङकु(द्)सुमश्च बासत सछिलमापूयं तस्मान्ेन्दुमण्डलपमभ्यच्ये | तदुक्तं स्वच्छन्द स(७)द्दे- एलारवङ्गकङङ(८)जाताफलसुसयुतान् । सुगन्धिङ्क(९)घुपेद्रभ्येः सह् तस्मन् जख क्षिपेत् || इति नव्रयोनें समाटेिख्य पूर्ैवजजखपध्यतः । निश्यद्धितः समावाह्य चन्द्रमण्डकपच(१०)यत् ॥ अिधरते इति । तस्पिन्विध्रते द्रव्ये द्रवे । द्रवास्पकं द्रव्यं विकशेदाध्यं पद्य द्रचेमयपेव हि | तदुक्त स्वच्छन्द्सङ्कदहे -- (१) भ्रमणी' ख० ।
(२) 'तुशवाहा खऽ। (३) “व्युत्करमात् डादेभान्तमाः इत खऽ।
(2) 'वान्हकखा दशः ख०।
(५) °खरा' नाड्िति ख० |
(६) कुखुमेवा वासि तमश्नतसालिख०' ख० ।
(७) “स्वच्छन्दे' नास्ति ख० |
(८) ककारा" ख° ।
(९) खगन्धिकुखमदिव्यमह त्तस्मिन् जख किरेत् › ख०। (१०) "चतुरस समचयत ख० ।
पूजाखङ्तनिखूपणम् । २१७
अतो हि पिशेषाण्येस्य साधनं भरोच्यतेऽधुना ।
आधारपात्रयोश्चैव तयोवेन्ह्यकंपूजनभ् ॥
सापान्याष्योंक्तमार्भण कल्रा(१)पृनत येके ।
पाज त्वासवमापूये शिरोपन्त्रेण पूवेवव् ।
पोडरोन्दुकछा यज(२)दिति । क्रपादकारादिषाडश सररा- दिका अमृतादि(३)काः षोडश्च कडा यजेत् । तदुक्तं स्वच्छ- सह ~
आदिकाचन्तिकाः सौम्याः कठाः षोडश कीर्तिताः ।
तातां नामानि ब्ष्यामि श्रणु सबोङ्गसुन्दरि ! ॥
अमृता मानदा पू(शोषा पुष्टिः भरतिमहेर्वरि! ।
रेवती द्यपती चे(५)व श्रीः कान्तिश्च सुधा ततः ॥
उयोरस्ना हैमवती चेव छाया षम्पूरि(द्)ता तथा ।
रापा(७) इयामा कलानां च नामान्येतानि व(<)द्छमं ! ॥
अमृतेशं च तन्मध्ये भावयेच्च नवात्मना । इति ।
खकु(९)केशं सयुदधत्य भृ(१०)ग संवतेकं तथा ॥
पिनाकिनं च खडगीशं सुज(१२१)ङ यावनं तथा ।
(१) कृत पूजित पूञ्यके' ख ० । (२) 'यज्ञेदेतिः नास्ति ख०। (३) "श्रताया; खम,
(४) 'पु्ेस्तुतिः' ख ० । (५) देवि ख०।
(६) 'सम्पूरिणीः ख० ।
(७) "वामा रामाः ख०।
(<) "वस्तुतः ख० ।
(९) 'अश्चतेश्ची' ख०।
(१०) श्गुः सवतेकश्च यः' ख०। (१९) “भुजगं बालिनं ० ।
२८
११६ सदीके योगिनीहदये--
अम्रतेशीं च तन्मध्ये भावयेच्च नत्रात्मना ॥
नव्राठ्मना ततो देवि | तपेयेद्ातुदेवताः ॥ १०५ ॥ 1 % (१ = ०. = © छ
आनन्द भरव(9,) बवेषडन्तेनव च तपययत् ॥
योजयित्वा क्रमेणेवर कायेकारणमस्तकम् ॥ अधींडं योजयेदन्ते नवात्मायं सथुदुधृतः । इति(२) । स्वच्छन्द्सङ्गदादुधृतं नवात्मानम्र् । तन्मध्ये ते(३न मन्त्रेण अमृते्षीम् । भरसतागृतर(श)रम्योघसन्तरपिंतचराचराम् । भवानीं मवशषान्त्यं त्वां भावयास्यपृतेदवरीम् ॥ इत्याभियुक्त(५)व चनाक्तरीत्यामृतस्लाविणीं भावयेत् नवार्मना ततो द चे(६)-इति । धातुदेवताः उाकिन्या्याः । अन्नेवोक्तम्-- विशुद्धौ हृदये नाभो स्वाधिष्ठाने तु सृरतः। आज्ञायां घातुनाथा्च न्यस्तव्या घातुदषताः।।(याह.स.३-३३) इति नवात्मना पूर्क्तेन तपेयेत् ॥ १०४-१०५ ॥ आनन्द भेरवभिति। आनन्दभेरवं चेवका(र)रेण नवात्मनेव आनन्दभेरवं त- (१) चेष वोषडन्तन' ख०। (२) “दति' नास्ति ख० | (३) “अनेन' ख० । (७) ^रदमे घ' क०। (५) शइत्यभियुक्ताकत्या' ख० । (६) शौरि ! ` ख०। (७) ध्चेव ¶त्येवकारात् ` ख ० ।
। । ।
पूजा सङ्तनिद्पणम् । २१९
तदाज्ञाप्रेरितं तच्च गुरुपङ्क्त) निवेदयेत् ॥ १०६ ॥
तयेवार्घ्यं विङेषेण साधयेत साधकात्तमः ॥
येदिति । नवात्मानघ्रुच्चायं ““आनन्दभेराय बौषट्” इति पयदिस्यथेः । तद्ाज्ञति तस्य गुरुरूषिणो भेरवस्याज्ञा(शपरेरितमनुज्ञातम् । त(२)च द्रव्यं पुनश्च गरूपद्धौ निवेदयेत् ॥ १०६ ॥ ` ध सापान्पाघ्यपरकारं() विशेषा्ध्येऽप्यतिदिशति-तथेवेति । इति स्पष्टम् । एवमण्य॑श्चुद्धं कृत्वा तदनन्तरं शरन पूजये दित्याह-गुङ्- वाद्।छिमिति | गुरूणां परमाशिवादिस्वगुरुपयन्तानां पादाव पा- 1 (५५)द्कापरम्परां देव्यातद्धाद्य (दपानवाद्यत्रयवतीमापुः इय स्वारैरस्यच्यादकाक्षतङ्कसुपरभ्यच्ये । क्षाोषेतपच्यपार्खार तरेरु(७) दधत्य पहापद्वनान्तस्थश्रङ्टादरबासने गरषछपण
पव् क्तानेषचनाय भेरवाय ददेत् नवेदयत् । तत्(८,)पुनः॥१०७॥
21 21
¢
(९) 'भरवाज्ञाप्रे°' ख०।
(२) (तश्च दरव्यं षुनश्च' नास्ति ख०।
(३) 'सामान्याद्ंप्रकारपेव विक्ञवाच्येस्यासाद्नमिि, क०. । (४) पाद्ावर्टाः ख०।
(५) "पादुका नास्ति ख०।
(६) “स्िद्धम।० ख०।
(७) 'खमुद्धुन्य' ख०।
(<) (तत् ' नारित क०।
2२० सररीके यागिनीाहदये-
गुरुपादालिम।(१)पूञ्य भैरवाय ददेत् पुनः | १०७॥ तदीयं शेषमादाय कामाग्नो विशधतस्थु(२)षि ॥
भरसादग्रहणमाह-तदीयमिति।
| तदीयं शेषं गुरुदे (३)वतयोरनिवेदितं शेषे द्रव्यमादाय
॥ तत्व चतुष्टयशाधनमन्तेः । (कमा देवः स काम्यात्" इत्य-
स्मद्गुरू(४.,क्तरौत्या विश्वघमभ्मरकी(५)छरे कामेदवरराख उ चता गघ्वात्मन्य्रा | विशर्वत(दे)स्थुपि त्िचवग्रसनशीलं तदुप ते-
| नमियम्र्। तत इत्याज्ञावताराक्तरीत्या विहवघस्पर की रा(७)क- नार । पादुकां स्वगुरश्री(<)पाहुकां मूकविचां (२)सोमाग्य-
व्या च जपन् हाप भदेन्धनप्रक्षेपरक्षणं समाचरे । तदुक्तं आषराकमे-
वद्य (१०.मस्तकस्थाय गुरवेऽरध्यं तदाज्ञया । कस्पान्तहुतसुकटपवचिदभो विहवघस्परे ॥
(१) गुरुपादावरि पृञ्य' क०।
(२) 'विश्वतस्त्विषि' ख०।
(३) 'गुरुदेवतायाः पीतश्ेष द्र ० ख० 1
(8) शइत्यस्मदुक्त ° ख०। # (५) कलछापतो' ख०।
(६) "विद्व तसित्विषिः ख० ।
(७) कृ खाज्ञ।ले' ख० ।
(८) श्री नास्ति ख०।
(९) 'सोभाग्यमूरुविद्यां' ख० ।
(१०) निवेचयामस्तकं स्वीयशगुरोरघ्ै' ख० |
पुजासङ्तनिरूपणम् । २२१
पादुकां मृलत्रियां च जगन् होमं समाचरेत ॥ १०८॥ महा प्रकाशे विदवस्य संह्।रवमनोयते ॥
मेय(१)राशिमयं हन्यं बास्षनात्पोपदंश्कम् । ज्यति()षङ्कण स जुहन् जपेदालमानमामृक्ञन् ॥ इति॥१०८॥ ननु कः कापाप्रिः, स (३) ङु (४) वा निवसति, क हवि रित्यत आह-मदहापरकारो इति । ङण्डछी(५)ष्खे व्यवास्थते इति क्ेषः। अत्र श्चु्तिः- “तस्याः शेखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः” इति । महा प्रकारे निरिन्धनदीप्ने निर्बाणरदहिते भमातरि वहो [विश्व सहारवमनो्यते(8)] विश्वस्य रिवादि(७)भूम्यन्तस्य सहारे निजकारणतावन्पाजाऽव (८) स्थितौ वमने सजने चोधते रिव- स्याचै(र परेच्छा शक्तिः । [तदुक्त(१०)माज्ञावतारे]-- स्वेच्छयेव जगत्सर्वे निगिरव्युद्धिरत्यपि । मनसा सार्धं मरीचिरृत्तीजहुयात् । आन्तरस्य चित्करस्य
(९) श्ञेयरा०' ख० |
(२) "एतेषां गणश्नो ज्ञुऽदन्' ख । (३) "सः नास्ति ख०।
(४) “वा नास्ति ख०।
(५) क ण्डलीश्चुखे' नास्ति ख० । (६) कसान्तगेतं नास्ति क०। (७) 'क्ञिवादेभू०' ख०।
(८) "मा्नस्थितो' क०।
(९) 'विद्वायेव शक्तिः" ख०। (१०) कसान्तगेतं नास्ति ल० |
२२२ खर्दाके योगशिनीहदये-
^~ [9 ~ मरीचिदृत्तीजुहुणान्भनतसा कुण्डलीमुखे ॥ १०९॥
परीचयो(१)ऽक्षागि(र)वहिरर्थषु तेषां सश्चाराः(३) उत्तयः ।
तदुक्तं विज्ञान भेरवमदहारकः- तत्र तव्राऽक्षमार्गेण चैतन्य व्यज्यते प्रभोः । इति । कोऽथः ! कुण्टङिन्याः शिखायां पदहाज्ञन्ये व्यवस्थिते सर्व- पराणिष्वात्मानि प्रकाश्चलक्षणे कामाग्रो “आत्मा मनसा संयुञयते मन इन्द्रियेण इद्धियपर्थन!ईइति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या वदहिरथेषु परखतचिन्मरीचिरूपाक्षटत्तिरक्षणं हविस्तेनेव मर्गणान्तश्चंखतया मनसा सह ॒जुदहृयात् शतत्यथः । तदृक्त (भोश्रीविज्ञानमंरव- अटरकः- महाश्यन्याकये वहो भूताक्ष्िषयादिकम् । हय(५)ते पनसा सायं स हो(दै)पश्चेतनास्युचा ॥ इति । अयमवान्तरो दोपः । तदुक्तं वद्ध तिषु-- धर्मीधमहविदप्रे आत्पाश्रौ मनसा खुचा । सुषुल्नावसना नित्यमक्षटतीज्ञहोम्यहम् ॥ आन्तरामव पृणाहूतिमाह-अहन्तदन्तयो रिति ।
(९) “अक्षीनवदः' ख ० ।
(२) "वहिः" नास्ति ख०।
(३) 'खवादि काः' ख०।
(४) “भी' नास्ति खऽ।.
(५) श्वातेन' ख०।
(६) भमहामष्िमश्लालिनि' ख० ।
| ॥ | हि
पूजा सङ्कतनिशूपणभ्। २२३
अहन्तदन्तयोरेक्यसु>मन्यां (१)क्षचि कल्पितम् ॥
= __ जद ९ =< यदै = [8 नेदानेस्तप्पेणेः सम्यम्वि(२)णुद्धेरप्रतात्मभिः। मद (३)हन्तां करोमीदं विरवं हव्यपुरःसरम् ॥ १०९ ॥ इत्यभियु क्तव चनोक्तरीत्या अहन्तेदन्तयारवैयम् । अहन्ता प्रमाता, इदन्ता प्रमेय, तयोरेक्य प्रमाणं तज्जितयसापरस्यात्मकम् । विशाक्षप्षद(४)प्रमेयघुभगां बाह्या महात्रा(५) भवं विग्वोत्ताणमहाप्रकाश्ष(द)वपुषं शक्तिं (७) च नेसागेकोम् ॥ प्रापाण्य(<) पचणात्रेश्ाक्तख(९चतां पध्यं तु चातुदशा सखिन्त्याम्ब! सपिन्ध(१०)यन्तुभवतो पथ्नापि तन्ताराणम्।। इत्यभियुकतवचनोक्तरीत्या तन्त्रारणिपथना( १९१ श्रकेण सम्भूते तज्जितयसमाष्टेरूपं (१२)वस्तुषूप वस्तुद्रव्यं तद्रू(१२,१ब्। तदुक्तं सुख्याश्नायक्रमे - (९) “सुन्मनीसु० ख० । (२) (शनेः शनेस्तपणेः सं ० क०। (३) (समाहन्तां' ख ० । (४) ्टसवत्' ख० | (५) 'महावैभवेः' ख०। ~| (६) 'महाभरमातृववुषः ख० । (७) 'तु' ख० । । (८) प््रामाण्यभ्रणयेन श्०' क०। (र९)-"०तामध्युचथा०' ख० । (१०) (सवित्यकखमिखवस्तुभरितोः ख ० । (११) (दकसम्भुतं' खण (१२) “रूप, नाङ्ति ख ऽ | (१३) "तद्रूपम् नास्ति ख ।
(> क क,
२९ खरी क्रे योगिनीह दय-
मथनोद्धेकसम्मूतं वस्तुरूपं महाहविः ॥ ११० ॥
स्वकु योत्सतते वस्तु यदानन्द्सुखं भवेत् । इति । प्रहा(१)हविः । यस्मिन् हूते स्वम्रमेयलक्षणे हवि(२)१ | प्रपात्रलक्षण व्यातिर(३)नवरत प्रञवखति तन्पहाहविः पणां हु ति(४)होमः। उन्मन्यां श्चि करित । उन्मना नाम(५) |. समनोध्वं निरस्तकाछ्कलाक्रियादिका पूर्वोक्तलक्षणा सा| खचि तन्परय(दनाऽगप्रतनापूयं पूगाहूात जुयात् । एवष द वहुत्वा । आनन्द ब्रह्मणा रूपं तच्च (७) देहे प्रतिष्ठितम् । तस्याभिव्यस्रकं द्रव्यं योगिभिस्तन पीयते ॥ 9 क~ | ३ ९ ~ © =, इति व्रा्ाणकवचनाक्तरात्या याव(८)दानन्द्ाविभोवो मव्- ति। तदुक्तं विज्ञानमैरवमटारकेः- जग्धिपानकृतारलासरसानन्द वरिजुभ्भणात् । भावयद्धरितावस्थां महानन्दस्ततां भवेत् ॥ कोऽथः ! मन्त्रारणिमथनसम्भूतं इदन्ताहन्ताप्तामरस्य८९)रूपं (१) “इतिः नारित क ० । (२) (द् बाकि" क° (३) “ज्यातिनिंरन्तरः ख० । (७) 'होमे' ख० । (५) (समनो ध्वैः-द्व्यारभ्य 'छक्चणा-व्यन्तस्य प्रन्थस्य स्थाने “पूर्वो क्तकृक्षणा खा खगित्युच्यते तस्यां ' इत्ति ० पुर पाठः । (६) 'तन्मयन घुतेन' ख9 (७) "मोक्षः ल (८) "याव देत्यादे "भवतीत्यत्र यो भावः तमन्ुभवेनः इति शखऽ पु० पाट | (९) 'सामरस्ववस्तुङपध्रतङ्पपूणाष् तीव °' ख०।
५ `" भन 0 न्को केदो व...
चूजा सङ्कतनिरूपणब् । दद५
हुत्वा हुत्वा खयं वेत्रं सहजानन्द्विग्रहुः ॥ स्वरपरधा(१)प्रसराकारं श्रीचक्रं पृजयेत् सुधीः ॥१११॥
पचदपं घरतपृगाहंतिं बहुशो हृस्वा परिस्फुरत्परपानन्दो मवेदि त्यान्तरपुणाहृतिः । अत एव ।
- भवि(र)्ऽन्तः सिन्धुरसे भेद निदैरणास्पके । स्थैय॑मे(३)ति चमत्कारं विना विषयसङ्ग(४) तिम् ॥ इति ।
(न 0५
कऋभाद्थाक्तरात्या मनामि (“.स्थरोभूते बाह्यचक्राचन इया- दित्याह-स्वप्रधति । सुधीः सौीधुरसपानेन अनन्यविषयासक्तः स्वसवि(दै.न्पा- त्रस्थिरमनाः। मनसि स्थिरे ठति धारणा स्थिरा, तस्यां स्थिरा- यां तत्र परत्ययकतानता ष्यानम्-इति थोगपातञ्जलशाच्नो- ्तरी(ॐःत्या ्रत्ययकतानतालक्षणे ध्यानं भवति । विना ध्यान पूजा निष्फछा भवति । अथादावमृतीकरतमासवं शिवादि भ्या गुरुभ्यः सिवाभ्याञ्च नवद स्वासाश्ना हुत्वा अउवङन्(८) परमानन्दास्यरधीभूयात् इयथः । स्वप्रधाप्रसराकारः स्वप्रधां
(१) (स्वप्रथ।' ख । (२) "प्रविष्ट उद्यत् श्रीद्यभ्नि भेदनिहेरणात्मक' ख । (२) स्थेयं मतेश्च०' स्र ०। (७) "खद्भमात् ` खे ° । ` (५) (मनःश्थेयं जायते चश्च ०, ख ऽ। (६) “स्वयं चेन्मा०' ख० । (७) “दैत्या नास्ति ख० | (८) भ्रज्वलत्पर ख । २९.
क
२२६ सटाके योगिनीहदये-
गणेशे दृतरीं चेव क्षत्रेश दूतिकां तथा ॥ बाद्यदरे यजेदेतरि| देब्री्च स्वस्तिकादेकाः ॥११२॥
स्वस वित्तस्याः बहिर्थेषु इ्द्रियदरारा प्रसरो व्यापारः । तदा(१). त्मना स्फुरणं । ततस्तदाकारं श्रीचक्रं पूनपेत् । श्रीचक्रं ना(२) म नान्यत्किञ्चित् । अपितु स्वसविदेवतायाः परसररूपान्तः- करणचतुष्टषाव्यक्त पददहङ्ुःतितन्पात्रदगन्धियतदुत्ति()तद्िषय- तत्पूयेष्टकषोडशविकारधातुप्रपञ्च एव(४) श्रीचक्रासमना स्फुर- ति, एता(५)वत् ॥ ११०-१५१ ॥ श्रीचक्रपूजापाह-'गणेश्ाम्'इत्यादिना (चके चूजां वि- धायः हत्यन्तेनेति । | । . श्रीचक्रहवारश्षाखयोगगेशं तच्छक्तिं दृतरी कषतरशं बटुकाख्यं तच्छक्तिं दृतिकां च यजत् । तदुक्तं सङ्कतपडत्याम्- ेतादरेतमहामेहशवेरीक्षपणक्षमः । भस््ानिव जयत्येको गणेशो दृतररीघुतः ॥ भरतिषायाः परोरलासो निशाकर इवाऽपरः । दूतीयुक्तः स जयति बटुकस्ताण्डवान्ितः ॥ वाद्यद्वारे इति।
(१) (तत आत्मनाः ख०।
(२) रधचिक्र नाम' नास्ति ख०। (३) "तद्वुन्ति' नास्ति ख०।
(छ) "एव' नास्ति ख० ।
(५) एनत्. ख०।
पूजा सङ्कत निरूपणम् । २२७
~
ततश्चान्तखिकोणऽपि गुरुपङ्क्ति निधा स्थिताम् ॥ तदन्तश्च महाद्वी तामावाद्य यजेत् पुनः ॥ ११३ ॥
बाहयदरारे श्रीचक्रद्रारबाह्यपरदेशे । स्व स्तिकादिकाः (९)देवीः सरस्वतीश्रीदुगांभद्रकास्यश्चतस्चः। स्वस्तिका (२)अदियो तामिति सचमासः । साहाशुमङ्रीगौरीलोकधाजीवागीश्वये्च पञ्च । (३)एतास्ताश्च देवीः । (छ)गायका यनत् । तसाश्द्धं पद्ध तिषु ॥ ११२ ॥ तत इति । | ततः तस्य श्रीचक्रस्य (५) त्रिकोणे निधा स्थितां दिञ्य- सिद्धपानमोघत्रयवतीं गुरूपङ्ाक्तं रिवादिस्व(६)गुरूपयन्तानां गुरूणां पङक्तेः परम्परा तां । अपिक्षब्दा्जोदित्यनुषङ्गः । गुहप- रम्परा गुरुणुखादेव ज्ञातव्या । न रोक्ता न च पुस्तके लि- खि(अेता अत्यन्तरदस्यस्वात् । तदन्तरोति। | तदन्तः श्रीचक्रस्य८ ८ ) मध्ये बेन्दवाख्ये चक्रे तां। पहापञ्चवनान्तस्थां । ` (१) 'स्वर्तिकायाः देव्यः सर ७ । (२) “स्वस्तिकास्ता आऽ ख9। (३) "मञगतास्ताश्च' ख० । (४) "गायिका ख० । (५) श्राचकरस्थ अन्तः' इति नारित क०। (६) (स्व, नास्ति कऽ | '. (७) (लेखनीय! क 9 । (८) श्रीचक्रमध्यबेन्द वाख्ये' खं० ।
छ | (ति - ९ नि
२२८ खर्टाके योगिनी दहदये--
मह्।पद्यवनान्तस्थां कारणानन्द् विग्रहम् ॥
महापञ्चवनान्तस्थे वाग्भतरे गुरुपादुकाम् । इत्यत्रो पपादितरूपां (१)अङलधोष्लसदस्लद छं कमं प- हापञ्चवनम् । पदङ्कापाश्रयां अनाभ्रितस्य(२) स्वपकान्ञाहपनो मपाऽङ्कस्थां । कारणानन्द विग्रहां कारण (३)नाम हेतुद्रञ्यम् । अत्रेव वक्ष्पति- त्र णां पतये महं वचि कुर्वीत हेतुना । इति । द्रष्यपानेन तेन य आनन्दः स एव विग्रहः आकारे यस्यास्ताम् । कोऽथः १ सोधितामृतीमूतद्रव्यपानपरिस्फुरस्परमा- नेन्दपत्रशरीरामित्यथेः । भवतीं अनाध्ितां ()षम देवीं विमश्ासििकां । इच्छाकामफलमदां इच्छया यस्काम्यते त्फङं तस्य सवस्य दाजी । पहापश्चवनान्तस्ये ! कारणानन्द विग्रहे ! | सवेभूतहिते ! मातरि परमेश्वरि! ॥ इति पन्त्रेणावाद्च यजेत् । नतु पदापद्यवनान्तस्थािस्यने- नव अनाश्रिता देवः; अनाभचिता देवी चाऽत्र चक्रे समावाष्ठ कामेश्वरीकामेरवररूपेण पृञ्याविति कथमवसीयत इति चेदुच्य- (१)"इव्यत्रोपपादेतरूपक्खाधायुखसदसखद रकम रखुमहा पद्वनम- यस्था" ख०। (२) द्रदवरस्य' शत्याधेकं ख०। (३) (नामः नास्ति ख । (४) (मम देवीम्! इव्यारभ्य (सवांवयवभूषणः' इत्यन्तो श्रन्थः श्ञ० वु० नात ।
क क क्कः ~ ककन
पि पगम #
8 ए पीर प क पकप त 4 व
पूजासं ङ्त निरूपणम् । २२९
र (कि
मदङ्गोप।श्रतां देवीमिच्छाकामफर्प्रदाम् ॥ ११४॥
ते-महापदमवनान्तस्थः सकरागमश्रा्लाणां वक्ता देवोऽप्यनाश्रे- त एव ,तच्छाक्तेरनाश्रिता अत एव । अन्यथा पहपञ्चवनान्तस्थां मदङ्कोपाश्रयाम्' इति वचनं कथं घटते ! सदारिवादीनां तु यद्यप्यागमक्नास्चवकंतृत्वपास्ति तथाऽपि महापद्यवनान्तस्थतं ना- स्ति । तदुक्तं स्वच्छन्द सङ्कदे- अनाश्चितस्य मध्यस्थं व्योमपद्ं सुविस्तरम् । अक्षङ्ख्ययोजनायामं तत्र सिदहासनाधितः ॥ सुकोव्यवबुदभख्यः शशाङ्कृतशेखरः । पथ्चवक्नो दत्रमुजल्िपञ्चनयनः प्रञुः ॥ सवाबयवस्भ्पूणव्रह्यभ्रूतिः सनातनः । सवेज्ञः सवेकतां च सवातुग्रहणे रतः ॥
सवेरतनसमाकीणः सवोवयवभूषणः अनाभितकरा देवी तस्यो(१)त्सङ सदा स्थिता ॥ पञ्चववता त्रिनेत्रा च दक्षबाहीन्दुशेखरा ।
^+ (+ (~£
च्यापिन्यादिचतुष्कं च तादशं परिकी्तितम्॥ पूव दुत्तरपयन्तं (२)दिग्गतेः सेवकः रिषः । रद्र(३)कोव्युदानीकेः सवसारूप्ये; (४)सशक्तिभिः ॥
(१) (त थार्सङ्गे कथं' ख० |
(२) "नियाता सेविका श्िवा' ख०। (३) 'सविकाऽ' सञ०।
(४) च ' ख 9 |
~. चन कनि ।
२३० खदीकेः थोगिनीहदये-
9 ड, छ भ, छ @ + ©=, भवत्! तन्मयेरव नवेयादाभरचयत् ॥
४२
सेवितो (१)लोकनायेस्तेः खषटयादीने करोति (२)सः। अनाश्रितोऽय भगवान् पञ्चवक्त्रख्िरक्तथा ॥ दशबाहुथतवाहु्रिव दैक वा(३)हकः । छाका(४)गमादिवक्ताऽसो देवदेवः सदाशिवः ॥ परापरविभागेन भाव।चाऽपङ्क्यमागमम् । इति । उत्तर पद् ऽप्युक्तम् । व्योमाम्बुजे सदस्रारे सितकसरसङ्कके । तत्राप्तीनं पहादेवमप्रच्छत कुरनायिका ॥ इति । भवतीमि(५)त्यत्र सन्मधेरेवेति । भवतीं स्वसंविलक्षणां । स्वन्पयेरेव । पञश्चभूतमयं विश्वं तन्पयी (६)घा सदाऽनपे! । (ॐ)तन्मयी मूलत्रि्या च तत्तथा (<)कथयापि ते ॥
[ क [ (भ
इति पुवाक्तरात्या [पञ्चभूतानि मवदिच्छाविक्ञाम्भतान (९)तदरूपाणि] । , (१) 'ससेविखाकपाखांश्चसख'० खल ० । (२) साः ख०। (३) (वक्त्र कः' क ० । (४) "कोखागमाद्केवक्रांरादेवमेवः ख०। (९) भव तीनित्यत्राप्यन्वेति' ख० । ६) धऽ ख । (७) (त्वन्मया ख० ॥ (८) (तथा च ख०। (९ )कसान्तगतग्रन्थस्थान पञ्चरूपाणि पञचोपचरैर्चयेत्' १ ति ० पाठः|
ए
^ "णगि
घुजासङ््तनिशूपणम् । २३१
तिकोणे तत्स्फुरत्तायाः प्रतिबिस्बाछरतीः पुनः ॥१११५॥
पञ्चरूपिणमात्मानं दिव्यैः पञ्चोपचारकैः । अपेयेत्तह गन्धन पृथिवीं कुषुमेन खम् ॥
धूपेन वायुं दीपेन तेजोऽन्नेन रसं पुनः (
इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या[ (र)तैरेव नेवे्यादिभिरचंये-
त् । नवद्यादाभेरित्यादपदेन गन्यपुष्पधूपद्ापनवेचा ग्रह्यन्ते ।|
सुगन्धबत्पद्थोऽचुभवेन प्रत्ङ्कुखतया प्रमातरि विश्रान्तिगं-
न्धसपपणम् । (२,घुशब्दवत्पदाथाऽतुमेव्रन प्रत्यङ्घुखतया प्रमा- ` तरि विश्रान्तिः पुष्पस्रमपेणम् । (३)खुस्पशेवत्पद।था नुभवेन प्रत्यङ्गुखतया प्रमातारं विश्रान्तिधूपसमपणम् । सुरूपवतपदाथां ऽनुभवन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्नान्तदापस्तपपेणम् । स्वा- दु(४)रसव्रत्पदाथानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातीर विश्रानितिर्नवे- दय स्रमपणामत्यथः । तदुक्त सुख्धास्नायरहस्ये-
इद्दरियग्रापसङ्धहषिगेन्धायेरत्पदेवताम् । स्वाभेदन(५) समाराध्य ज्ञातुः साऽय पहापखः ॥ हिर पि गन्धपुष्पधूपदौपनेवे्यानि (द)एथिव्याकाशवायुतेनः-
(१) कंलान्तग॑तश्रन्थस्थके निवे्ययागम् । कोथः? इति ख० पुट ` पाटः। | (२)^तत आत्म राब्द्ाऽनुभवेन' ख० । (३) सु' नास्ति ख०। (४) 'स्वादुपद् शावत्पदाथोऽनुभवेन' ख० । (५) स्वभविन' ख ० । (द) पृथिवी वाग्याकाशतेजः' ख० ।
~ -- ॥ >
| |
२३६ सदीके याोशिनीहदये--
~ क ~ [अ 9 तत्तात्तिथिमयीनिंयाः काम्यकमानुक्तारेणीः ॥
[क
सङिरभावनया दैव्ये सपरपयेत्' ३(१)प्युपचारोपनिषत् ।
(च १५ ४ ९, कि -, दे .
नरिकोणे श्रीचक्रस्य त्रिकोणे रेखात्रये तस्स्फुरत्तायाः
गुणाः पञ्चदश प्राक्ता भूतानां तन्मयी शिवा । इ्स्यतेव पूर्वाक्तरोत्या भृगुणात्पिकायाः पञ्चद्ाक्षरश्-
(र)रीरिण्याः श्रौत्रि्यायाः । ` (रे)तव स्फुरणात् पश्चदक्ञपरति-
विम्बरूपाः तत्तत्तिथिपरयीः तत्संख्याकभरातिपदा दि ति(*)थ्या- सिक्ताः । काम्यक्रमानुसखारिणीः । नवचक्रक्रपो (५)योऽसो मदहावरयादिसिद्धिदः । [ब = ज ©\ ॥ ६५ इति खड्धत पडव्युक्त रीत्या बाह्यचक्राचंने (६)करास्यकषें तदनुरूपकरचरणादिमदूपधा(७)रिणीः । उसपत्तिविनाशरूप- (८)रदितत्वानि(९)व्यत्वाश्च नित्याः । ततः कापेरवरी नित्या नित्या च भगपाछिनी। (१) (उपचासेपनिषत्? नास्ति ख° । (२) "पञ्चश्श्ञाक्चरश्ालिन्याः श्री° खऽ। (३) (तच्र' नास्ति ख०्। (2) ्रतिपदादि तत्तत्तिथ्याल्मिकाः' ख ० । (५) व्चक्रमयो योऽसौ ख०। (६) काम्यं कमेः खऽ । (७) “घारेण्व;' ख०। (८) *ङूप' नास्ति ख । (९) ^रहितत्वान्निव्याः' ख ।
"न त
> णण ~ - - रि
वूजासङ्कतनिशरूपणम् । २३३
9५ ^~ क" 3 = ७ 94 = => तत्र प्रकट यागेन्यश्चक्र नलाक्यमाहूने ॥ ११६ ॥ माठ्कास्थूररूपत्वाच्वगारिव्यापक्रत्वत : ॥
नित्या (र)्िन्नाऽपि च तथा मेरुण्डा वहविवािनी ॥ पहाविचेहवरी दूती सारता इरसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सवंमङ्गला ॥ ज्वाला पालिनी चित्रा चस्येवं नित्यास्तु षाड | इति चतुःशती कास्नोक्ताः । पुनःशब्दादचेयेदित्यनुषङ्गः । तच्नति । ॥ | तत्र श्रीचक्रे । चैलोक्यमोहने चक्रे पृबाक्तनिवेचने चतुर- सघत्रयलक्षणे प्रकटयोगिन्यो यष्टव्याः इव्युत्तर(२)रत्र॒स्थिते- नान्वयः ॥ १९२-११६ ॥ प्रकटकन्द निवेचनपाह -सातका इति। पातकाः (र३)परापश्यन्तीम्यमावेख(४)वस्तासु स्थुलप- कार दिक्षकारन्तपश्चाशद्रणेषयतैखरीरूपम् । तदुक्तं स्वच्छन्द - सङ्कहे-स्थुट पश्चाशदक्षरम्" इति । तदूप्रतराव् पातुक(५)
स्थूटरूपवेखशवणेवगौषएटकमयत्वात् सिद्धीनां ब,द्म्याद्ौनां च । तदुक्तं चतुःकत्याम्- ।
(१) (नित्यक्किल्ला' खऽ | (२) शव्युत्तरस्थितेन' खऽ । (३) भातृकायाः' ख०। {ड खय ० 9 (४) 'वेखय्यांयाः स्थु्°' ख० | (५) ^थूखरूप' नास्ति ख । ३७
२३५ ` खर्दाके थागिनीहदये-
योगिन्यः प्रकटा ज्ञेयाः स्थूल वेशवप्रधा(१)तमनि॥ १ १७७]
¢ = ज [९ ० ^> वगा वुक्रमयागन (रपहासद्धयष्टक स्थितम् ।
` , बन्दे तामष्ठवगोस्थां प्रहासिद्धयष्टकेडरीम् ॥ इति ।
स्वगादिव्यापकत्वतः त्रगख्ञ्ंसपदोऽस्थिमज्ाज्चुक्रोजसः आदि( ३ )रब्देन गर्न्ते । तन्यापकस्वाच्वगावार( ४ )भर्- मध्यरक्तनितम्ब(द)प्तनमांचनाभिष१(५)दोहद् यास्थिकण्ठषज्ना- स्यशक्रनासापुटक्राधललाटचक्रषु स्थिततवाद्राहम्यादीनाम् । स्थ विह्यपभरधात्मनि स्थूखत्रकथनाव् । अत एव विभ कर्वेण (धत्ते इति व्िद्यप्रधा जिड्वस्भरा तदास्पनि भूग्रह- त्रयात्मके जेट क्यभाहने चक्र स्थितत्वाच्च (८)मावृकस्थूल- रप [साच (९प्रेखधवयवत्व(च त्वगादीनां धातूनां |शरी- रावयवतया व्यापकत्वात् चैखेक्यपरोहनचक्रस्य स्थुखविशवम्भ-
" ¢ ^~ र
रात्मक्रत्राच (१०) तदन्तगेनाः [सष्द्या ब्रादस्याद्याश्च भरकर ज्ञेया इत्यथः ॥ ११७ ॥
(९) श्रथा्मनिः ख०।
(२) ध्यस्यां माच्रष्टक' ख ० ।
(३) शदाब्दन' नास्ति ख०।
(८) “श्र १४य' नास्ति ख०।
(५) “स्तन, नास्ति ख०।
(द) स्नायु" ख9।
(७) दधतः क०।
(८) (त्वात् मातृऽ' ख ० |
(९) कंसान्तगेतश्रन्थस्थले त्वासखगादिधातूर्ना' खे० ।
(१०) शवात्तदृन्त° ख०।
तुजा सङ्तनिरूपणमर् । २३९६
छ क
अणिमाद्या महादेव्रि! सिद्धयोऽशे व्यवस्थिताः ॥
तासु रक्ततरा वर्णेवरामयकरास्तथा ॥ ११८ ॥ धृन(१)चिन्तामहारत्ना मनीषेतफलभ्रदाः ॥ ब्राह्यय।या अपि तत्रेव यष्टव्याः क्रमतः प्रिये! ॥११९॥
अन्त्यभूगहनिवापिनीनां नापग्रहणपूवेकं ध्यानमाह-अ- णिमाया इति । |
(कप
अणिमाद्या; (२).आणेषा विपद्ररे" इत्यादि चतुः-
चातीश्षाखाक्ताः टधिपावहिपेशिताव्िता(३)षाकाम्यभु- | त्तीच्छापाप्निसवैका()पाख्याः सिद्धयस्तत्रादिश्ब्दन श॒ ह(षरन्ते। अष्टे व्यवस्थिताः अष्ट(दे)सिद्धयो निचण्टुष- सिद्धाः । अत्र तु देति तात्पयेम्। ` |
पापरनङ्कां समारभ्य वामादिक्रमतोऽपि च।
पिद्धवष्टकं न्यसेततेषु द्रयं पादतल न्यसेत्। (यो. ह, स..)
अ, ०, 9 @ [@र > 9 इत्यत्रषा (७) क्तत्वात् । महा(८,)रत वचिन्तापाणः। शष स्पष्टम् ।
कक ~
६
(९) “धुनाचिन्ता' ख०। (२) 'आणिमाद्याः' नास्ति ख० । (३, “व ्नात्व' ख०। (७) 'कामास्यलिद्धयो द शादि० ल०1 (५) गृह्यन्त नास्ति खर । (६) 'अघ्रौ सिद्धयो! ख०। (७) "त्यज्नैवो्तम्' ख० । (८) भधतचिन्तामहारत्ना चिन्तामणिः" क०।
<,
छ, किर, कनि |च
२३६ सदीके योगिनीहदये-
बह्याणीं पातव्रणां च चतुर्भिः शोभिता सुखैः |}
वरदाऽभवहुस्ता च कुण्डिकाक्ष( १)ङप्तत्करा। १२०) मादेश्वरी श्तवण। त्रिनेता शूख्धारिणी ॥
` कृपाङमेण पर दधानां पाणिभिः प्रिय! ॥ १२१॥ [एेन्द्री(र)तु इयामव्रणां च वञ्रोतरुलसत्करा] ॥ कौमारी पीतव्रणो च राक्तितोमरधारिणी ॥ १२२॥ वरदाभयहस्ता च ध्यातव्या (३ )परमेश्वरी ॥
ब्रा हुम्याव्या इति । ब्र म्पा्याः ब्रह्माणी पथिमद्वारे" इति चतुःकतीशाच्ा-
क्तास्तत्रेव पध्यचतुरसे यष्टव्याः । क्रमतः क्रमेण ॥११८-११९॥
तासां प्र(ढ)त्येकं ध्यानपाह-ब्रदह्याणीति । करेरिति शेषः । [शिष्ट (५) स्पष्टम् ] ॥१२०॥
माहडब्ररीति |
| एकेन (६)पाभिना श्रुलधारिणी त्रिभिः कृपालषेण परथ दधाना] ॥१२१-९२२॥ वरदामयेति।
~~ ---
(१) श्वख्रगुउज्वख क० । (२) कसान्तगेतं नास्ति क०। (२) "च सुरे दवरी' ख०।
(8) ्रत्येक' नास्ति ० । (५) क सान्तगतं नस्ति ख०। (६) कखान्तगेतं नास्ति ल०।
~ -- ---~ न~~ ~~ ~~ ~ क हती 2 त 1 वा व का कि
पूजासङ्तनिरूपणम् । - २३७
वैष्णवी इयामवण। च शङ्कूचक्र( )वरामयान् ॥१२३॥ हस्ते(२)स्तु बिभ्राणा भूषिता दिव्यमूषणेः ॥ वाराही इयामरच्छया पौत्रि )क्रसमुञ्ञ्वला॥ १२४॥ हं च मुसलं खद्ं खेटकं दधती भुजैः ॥
[न्द्र (४)इधामल्वण। च वज्द.रलसत्करा | ॥ १२१५॥ चामृण्ड। कृष्णव्रणां च शं डमरुकं तथा ॥
खद्धं वेताखुक चेतर दधाना दाक्षणे;(५करः ॥१२६॥ नागखेटकषण्टा( ६ )ख्यान् दधानान्यः कषाटकमु |
स्पष्टम । वैच्णचीति ।
स्पष्टम् । देन्द्री(७ति |
स्पष्टम ॥१२३-१.५॥ चासुण्डाते
वेताः पिशाचव्िश्षषः । शुलडपरखड्गवेतालान् दक्षिणैः
(२) हस्तपश्चेश्च स ०।
(३) "प।त्र कण । (४) कखानतगत नास्त खश {कन्तु कपारख्मण वृरशु ` इत्यस्या
ऽनन्तर कमार) पतवणाच द८्यस्याद्ा रत्र © पु वतते । (५५) दक्षणसथुज ख ।
(६) सुण्डाख्य ल । (७) णन्द्रा ईत त्यस्य वूच करस्त्यथः इत्याघेकु खऽ |
[ छ
२३८ सटीके योगिनीहदये-
महारक्ष्मस्तु पीतामा पद्य()दपणमेव च ॥ १२७ मातु(र)टुङ्गफङ चेव दधाना परमेश्वरी ॥
एवं ध्याला यजदेताश्चकेयीं त्रिपुरां ततः ॥ १२८ ॥ कृ्मेन्द्रिपाणां वेमस्यात् करद्चदिकर। स्मरता॥
करैः नागखेटकघण्डा(३)पाङानि वामकरे घानेत्यर्थः । महाल्टमीरिति ।
स्पष्टम् । ननु युद्र।दक्षक किमित्यन्तश्वतुरस्े पूञ्यत्रन ना- क्तम् ? सत्यम्, चतुःराताश्चास्च (५)अनुक्तत्वादत्रापि भरा धान्येन नाख्या(५)ताः । किन्तु श्र (ह)श्रीचक्रन्यास-
मूकाधारे न्यसेन्युद्रादश्चक साधकोत्तमः ।
इति घ्ूचताः। अताऽन्तश्चतुरस यद्रादशकमपि पूजयत् । एव {सितति ।
एवुक्तप्रकारेण । एताः प्रकटयोगिनीः ध्यात्वा, चक्रेशी चिपुशं यजत् ॥१२६-१.२८॥
विद्यदिबतयोरमेदविवक्षया(७) बेलोक्यपोहनचक्रे (<)श्री- विद्यानिवेचनमाह-कर्मन्द्रिय।णानिति ।
(१) प्पञ्चौ' ख०।
(२) 'मातुलङ्ग' क० ।
(३) शलटकमुण्डकपाखानि' ख० ।
(४) “शाखे ऽप्यनु क्तत्वादजेव' ख० ।
(५) "प्राघान्येनाख्यातभ्याः' ख ।
(६) श्रा नास्त ख० ।
(७) "च शत्याधक्र छ ० ।
(८) 'मोहनचक्रेशीविधया०' ल ० ।
पूजास्चङ्लनिरूपणम् | २२३९
क( {> शादधिमतवरा सिद्धिरणिमा (२)चात्र संस्थिता।१२९॥
9,
आर्पतक्वे1तयोरशथदयो-
रत्र करपकरणात्मनाटयोः । शुद्धतस्वख(३)यभावनापरयी
शुद्धि रात्मकरयोः परा पता ॥
इत्यस्म(2)दगुरूक्तर'त्या आत्मतच्वम्याऽद्ुद्धत्वात् कमान्द्र याणामारमतन्छान्तःपातितात् करय कमन्द्रियलत्राद(५.शद्धयाः कायेकरणात्मनोः करयोः सकारणशुद्धतच्वाशेवाद्रेतमावनाकर- शुद्धिः तत्करीयं । स्मता निरुक्ता । क्ायङ्ुङमव।ते। कारणात्पपरापृष्टका(दै)यरूपेण सस्थताम् । करोमि चिन्मथा शुद्धि करयाः स्परे(७शाधेनींम् ॥ ऽयभियुक्तव चनोक्तरीत्या कायस्य शुद्धिनोम कारणता वन्पात्रतया पयैवस्ता(८)नम् । अणोरणीयान्! इति श्वुत्युक्ताणी- यासे कारणे विद्यमानस्यात्मनाऽणिमा सिध्य(९)तीत्यणिपा (९) करश्युद्धि' खऽ । (२) 'तज्रः खऽ। (३) “गतः ख । (७) इत्यस्मदुक्तरीत्याः ख० । (५) दद्युद्धयाः करयाः काययाः स्वकारणश्ुऽ' खऽ। (६) काथरूपाङ्कुःलिस्थिताम्' ख०। (७) 'स्पराश्ाधनम्' ख० । (८) (पये वसाना क ० ।
[ ( (>
(९) ¶ स्यतीति सिद्धिः ख° ।
२० खटाके थोगिनीहदये-
).4 षोडदास्पन्द सन्दाह् चमत्कृतिमयीः क |
म्रणादिषोडशानां तु बा(१)युनां प्राणनास्मिकाः॥ १३ ०॥ बीज(२) भूताः स्वर।त्मत्वात् कलनाह।जरूपकाः(३) ॥
(+
` सिद्धिः।सा चात्र त्रोकयपो(४)हनचक्े स्थितेति तात्पयप्॥१२९॥ =
द्वितीयचक्रे पूजां (५)सत्राप्तनामाह-षोडशस्पन्द्ति। स्पन्दो नाप परायास्तचखषूपेण प्रसा(६)रः । तदु(७)क्त
वरापश्चाप्दाकायाम्-
सिठक्षोः प्रथमस्पन्दः शितं भभोः स्मृतम् ।
तेन षोडश स्पन्दाः! षाड विकाराः भूतेन्द्रियमनांसे
तेषां सन्दो(८)हः। चमत्कारो नाम (९ )तस्मिन् चिद ति्चयांदयः। तदुक्तं कमोदये- | स्थेयेमे(०)ति चमत्कारो विना वरिषय(११)सङ्गतिप।
(१) (भाणानांः ख०। ^
(२) "वाजभूनस्व०' ख०। ।
(३) 'रूपगाः' ख० ।
(४) 'माहने चक्र' ख०। 5 (५) "चक्रे सवासनां पूजामाह' ख० । (दे) प्रसरः ख०।
(७) कखान्तगेतो त्रन्थो नास्ति खऽ | (८) समूहः इत्यधिकं खऽ ।
(९) (नाम काश्चिदतिऽः क०।
(१०) भेष' ख०।
(११) (विषयसङ्गतिम्-इति' क० ।
® वजासङ्कतनिरूपणम् । २४१
अन्तरङ्तया गु(१)प्ता योमिन्यः संव्य८र२)बस्थिताः १३१ क।(माकरषेणरूपाद्याः सृष्टेः (ई) प्राधान्यतः श्रिये! ॥
तन्पस्यः भुतेन्द्रियपनः(४,घु चदनुप्रवष्टाः क्खाः षा ड(५.श स्फुरन्ति तदास्पिका इत्यथः । कराः षोडज्ञसङ्ख्या- काः (६)कखामिधानाशच प्राण आदिर्यषां (७) ते अपानोदान-
¢ = ^~ समाननागकूप(८)क्रकरदद् तधनञय। दश प्रसिद्धाः(९बायः- व;(१ ०)अन्येष्वागमान्तरेषु मरग्यास्तेषां भाणनास्मिकाः| सर्वे(११) षां प्राणनास्पिकाः] पराणादयो ह्येते(१२)त् तेषां प्राणादीनापपि प्राणनास्मिका इत्यथः । बाजमूता बिन्दुयुक्तत्वा् स्वराः षाडश् अकारादिविसगान्ताः। तदात्मकत्वात् करना(१३)क्रपाव्। स बिन्दुकस्वरपराप्तस्वात् (१४)ककनाडजरूपकाः [स्वस्व (१५.बीज-
(१) शुक्षयागि०" ख० । (२) ध्यागिन्यः सस्थिता मताः' ख०। (३) 'खषटिमाधा० ख०। (४) भभूतेन्द्रियमनांसि' क° | (५) षोडशधा" ख०। (६) सख्याकखाभिर' ख० | (७) ध्यंषां प्राणापानन्यानोद्ा० ख० । (<) कख क०। (र) श्रसिद्धाः' नास्ति खऽ। (१०) वायवः तेषु षडागमा० ख० ! (१९) कसान्तगतं नास्ति ख०। (१२) शयोतन्त॒ एतेषां" क ० । (१३) कलनात् प्रक्रमात्" ख० । (१४) “धा्षत्वात् चाजरूपगः' ख०। (१५) कसान्तभेतं नारित ख० | |
३१
२४२ सदीके यगिनीदहदय-
सत्राशापृरणास्ये तु चक्रे वमेन पूजयेत ॥ १३२॥
स्वरूपाः अन्तरङ्गतया षोडशविकाराणाँं स्वगादिषातुवत्तत्राप- कटतवा्तन्पय्यः । ] तन्मया योगिन्यो गुनाः (१)सग्यवास्थि- ताः । अन्तरङ्गतया अन्तरङ्क अन्तरिन्टरियं बदिस्तचमत्कारम- त्वादेता अन्तरङ्काः । अत पव गुप्ताः सर्व्ापूरणाख्ये 4 (र)चक्रं । योगिन्य इत्यत्र छनन्दसत्वाहिती यार्थे भथमा । का- माक्षेणरूपाचाः(३) “कामाकषेणसरूपा चः इयादिचतुःक- ती(रोलाल्लाक्ताः । खष्टेः (५)पाधान्यतः खौ वापचक्रस्येव भरधा(द)नत्वादस्येव चक्रस्य रष्टिरूपत्वा(ऽ)दतस्ता; योगिनीः वामेन पूजयेत् वापावतेक्रमेण (८) पूजयेत् । विकाराः षोडश विखासभृताः। प्राणादिषोडश्वायूनां जगसा(९)णनादि शक्त्या- त्मिकाः सबिन्दु(१०)पोडशस्वरेः आकलिताः। भव्येकं तन्मयीर- न्तरङ्गविद तुभविष्टषाडगविकारतया गुप्ठाः कामाकर्षिण्या्याः कलाः सवो शापरिपूरके चक्रे वाममगेण पूजयेदित्यर्थः॥ १३०-१३२॥
(९) गछाः सस्थिताः खऽ।
(२) तु" नास्ति ख०।
(३) कामाकषणरूपादयाः नाड्ति क० } (७) 'चतुःशतिश्चा० क० |
(५) 'खष्िप्रा० ख०।
(६) प्राधान्यात् अस्य चक्रस्य" ख० } (७) "त्वात्ततस्ताः' खर ऽ ।
(<) (कमेणाचेयेत्' ख०।
(९) 'जगत्प्राणादि' ख०।
(१५) 'सविन्दुस्वरेः कलिता" र !
तो र.
पूजा खङ्कतानि रूपणम् । २४३ `
पाशाङ्कु( १)शधरा ह्येता रक्ता रक्ताम्बरा (२)इताः ॥ प्राणङ्द्दिमथी स्तिद्धिरयिमा भौक्तुरात्मनः ॥१३३॥
एतासां ध्यानपाह-पाशाङ्कशेति । स्प१(३,् । तच्चक्रद्वताचने (४) सरद्धपाह-प्राणद्खुद्धमसाात। आनन्द्(^फेवात सुधया सुतादकम् इत श्चुव्युक्त- रीत्या विशव पा(दै)गनरूपरया स्व(७)धया सह [ यदे(८)कमपा- रुणः भाणिति तस्मिन् ] स्वकारणे ख्यः । भरणादीनां वायुनां छ्यादधिनीमाऽत्र प्राणशब्दो वायुमात्नोपलक्षणपरः, तेन वायुख्य- लक्षणायां (९)थद्धौ मनाङ्यलक्षणः(१०) समाधिभेवति । अ- त(१ १)स्तदेकरस्मूतस्य भाक्तुरात्मना जीवस्य य(१२)स्तद्युणां खाधमास्ाद्धमवात ॥१३२३॥
|
(१) 'पाशाङ्कःलकरा पताः खश9।
(२) इति" क०।
(३) स्पष्टम नास्ति ख०।
(४) '्द्वताच॑न लिाद्ध० ख० ।
(५) आनितवातं स्वधया तदेकम्" क० ।
(६) “विदवप्रीणनः ख०।
(७) “सखुधया' ख ।
(<) कसान्तगेतच्रन्थस्थले 'यदेकरसमयमतः प्राणा एतस्मिन इति ख० पु० पाठः
(९) "तुः इत्यधिकं खऽ।
(१०) लक्षणा समा' कऽ ।
(१९) (ततस्तदे० ख०।
(१२) यद्गुणोः ख०।
२४४१ सर्दीके योगिनी हदये--
त्रिपुरेशी च चक्रेशी पृञ्या सवोपचारकेः ॥ [कोलिका(१)नुमर्वावि्टमोगपुर्य्टकाश्रेताः (१ ३४॥ वाग्मवाष्टकसस्बन्धसूक्ष्मा वगस्त्रूपतः ॥ तास्तु गुप्ततराः सवाः सवेसंक्षामणात्मके ॥ १३५ ॥
चिपुरेरीति। 3 याद्रेरुपचारेः सवै(र)गेन्धादिभिमूलदेवी पूनिता, ताद्य. रवोपचरेः सर्वाश्ापरि(३)पूरणचक्रे चक्रेशी त्रिपुरेशी षू- ज(४)नीयेत्यथेः । ॥ तृतीयचकरे पूजां सवासनामाह-कोलिकेति। कृ (५)पटूर्विदात्तखातमकशरीरम् , तद्विषयानुभवः कृशो- ऽह ॒स्थुखोऽहमित्यादि। तेनाविष्टो जीवः । तदाश्िततया तस्य भोगपुयेष्टकम् । चिन्तिश्चित्तं च चेतन्यं चेतनाद्रयकर्मं च । जीवः कठा च देवेशि! सु्ष्मपुयष्टकं मतमू्॥ इति स्वच्छन्द सङ्कहोक्तरीत्या सु्मपुयष्टक तदाध्रिताः
(१)कसान्तगेतग्रन्थस्थे “्रङूत्यटकरूपस्थाः कवगायषटवर्गमगाः।
अनङ्गकुःखुमाद्यास्तु सवसक्चोभकारके ॥ चक्रे चात्यन्तरङ्गत्वादेता गुत्त- रा मताः । पाशाङ्कशघनुबाणकरा रक्ताः समर्चयत् ॥' हति ख० पुर पाटः । (२) (क्लवेगन्धा० ख०। (३) “पारि” नास्ति ख०। (४) पूज्येति स्पष्टम्'खऽ । (५) करम्" श्यारभ्य 'र्तकञ्चुकेति'हत्यन्तं नास्ति ख०।
पूजासङ्कतनिरूपणम् । २१
अनङ्ककृ सुमायास्तु रक्तकञ्चुकशोभिताः]॥ [वरणक्छित(१ )कसत्केशाश्वापब।णधराः इभाः ]|॥१३६॥ तत्तदाकार वुच्यात्मभाग्यमाक्तुम(र२)हरेतः॥
तन्मयतया वाग्भवानामिकाराणापषटकन सम्बद्धाः । सृष्ष्मवर्ग- वखर्[वणएकवगम् । तदुक्त स्वच्छन्द सङ्गहं- स्थूरं पञ्चाशदाकार सूक्ष्पमपष्टाष्टकं स्मृतम् । तर स्वरूपत्वात्तदात्मकत्वाह्प्तरा सुक्पवखरावणेवगोषएटक-
पयत्वादता अपि बृष्ष्माः। अताऽखन्तरङ्गतया गुप्न॒नर। इत्यथैः ताः सवा अनङ्गङकमुमाय्ययाः `अनङ्गङुसमा पूवे" इत्यादे चतु शतारल्ञाक्ताः सवेसुद्खाभणाहये तृतीय चक्रे अषटदलकमछे ^ पूज्या इति योज्यम् |
तासां ध्यानमाह-रक्तकञ्चुकेति | स्पष्टम् ॥२१३४- १३६॥
तत्तदाकारेति ।
इन्द्रयद्रारा वहिनिगैः्प तत्तदाकारा तत्तदिन्द्ियाथा- कराकारता (बुद्धिरन्तःकरणपरिणतिस्तदात्मनो भोग्याः न्दस्पशरूपर सगन्धास्तेषां भोक्ता भरमाता स एव मही उता भूपतेः क्षत्रज्ञ इति यावव् । तस्य पिण्डादीनां पिण्ड. १द रूपरूपातातानां स्थानानां विश्रान्त(छ)रूपातीते तुरीयपद् (१) कसान्तगंतं नास्ति ख । (२) महीशितुः' ख9 (३) "कारिता! नास्ति ख०।
४) विशन्ती रूपातीतं तुरीयपद मुक्तिः" ख० |
२४६ ~ खरीक योगिनीदहदये-
~~ _ ~ [० ^~ ५९ ° पिण्डादिपद् विश्रान्तिसौन्दयगुणसंयुता ॥ १३७ ॥ ` चक्रेरवरे बुद्धिःडुद्धिरूपा च परमेदवरी (9) ॥
च
युक्तिः । अत्र (र)प्रालाणेकवचनम्- पिण्ड युक्ताः पदे युक्ताः रूपे युक्ताः षडानन ! | रूपातीते तु ये भक्तास्ते यक्ता नाऽत्र संशयः ॥
सैव सो(३ मन्दर्य (४ )इत्यनित्याशविसंसारकक्षणप- रपदोभोगयवि( ९ )दारणानिर्यज्चुदधपरममेमास्पद सर्वस्प्रहणी यप - रमराशिवरूपपकाशनमेव सौन्दर्य तदेव गुणस्तन संयुता तदेकरसतया चक्रे्री सवैसङ्कोभणाख्यत्तीयचक्रेदवरी । कोऽथेः { चिन्पयश्रब्दादिविषयपरमातुः क्षिजज्ञस्य पिण्डपद्- रूपरूपार्ताताविश्रान्तिरूपरलक्षणा तज्ितयचुरातनी तदेकरस्य- सोन्दयंश्ाछिनी त्रिपुरसुन्दरी तरितयचक्रेडवरीत्यथेः । बुद्धिश्चदधिरूपा उुद्धिशुद्धिनांप विषयस्तसर्गं विहाय निर्वि करपवचिदत्मिकयस्तदूपा । अत एव महिमािद्धिरूपा बुदध- रविषयोपरागाच्धिदात्मनो पदहिमामाहिपत्वं (2) पिवति । तस्ि- द्विरूपा चक्रेइवरी सर्वोप( ७ चरेः पूर्वाक्तेभेन्धादिभिः(८) ^ (९) ¶सेद्वरिख०॥ | `: ` 1 (२) भ्रमाणच०' ख० । (३) 'सरवायस्ौ० क० |
(9) "खुन्वरत्वं अभि०' खऽ ।
(५) “विदहदाय तस्य निऽ' ख०। ` (६) (मह त्वः ख० । (७) (सर्वोपचारकैः ख० । | (<) गन्धा दिभिरभ्वच्याः ख०। ्
वूजासङ्कतनिरूपणम् । २४७
माहिमासेदिरूपा (१)त पञ्या सवापचारकंः॥ १ ३८॥ हादराग्रन्थिभेदेन ससुह्छसितसविद्ः |
पूज्या ॥१२७-९३८॥ ~ चतुथंचक्र (२)घवाप्नां प्ूजापाह- दादशयान्थयं- द्नेति। ग्रन्थिः षट्चक्राणां भस्यकं उष्वोधोग्राश्यद्रय पिति द्रादशग्र- न्थयः । अत्रेव वक्ष्यति -- ` । दादश्ग्रन्थिमेदेन वणानां न्तरे भिये! य८३)दाोदसति श्ङारपीटाद्छृटिखरूपिणी ॥ इति चतुःराती(2)चाच्वाक्तरीत्या ससुर्छसितायाः उद्व च्छन्त्याः । संविदः इण्डाछेन्याः। दर दशग्रन्थि भेदेन विखगान्तद- शावेशादिसगेः षोडशस्वरः। तेन विसगेशब्देन षोडशचसख्या श- हते । अतो त्रिसगान्तं षोडक्लान्तम् । | यच्छादक्ञकलाकार भूतान्तं व्योमगश्च (५)तत् । पाडशान्तमिति ख्यातं व्योपर्थानेन्दुमण्डलप् ॥ इति स्वच्छन्द सङ्कहो क्तरीत्या तदेव । [दक्ता(द्पवेशधिदी- पाकारत्वात्तदावशस्तत्रासक्तिः । | (१) शचः ख०। (२२) "पूजां सवासना० ख ! (३) 'यदुह्छखति' खछ० । (४) “चतुः रतिः क०। (५) '्यत्' ख० । (द, 1 दशा चिद्ाघारत्वात् तद्ावेशास्तक्टापः ्तिः' ख०
२४८ सटाके याभेनीद्टदये--~
व्रिसग॑।म्तदशावेशाच्छक्तानुभवपूवकम ॥ १३९ ॥ उन्मेषशाक्तेप्रसरेरिच्छाशक्तिभिधानकेः ॥
तदुक्तमच्रव-- १ उयोपेन्दुषण्डलासक्ता सुधा(१)स्रोतस्वरूपिणी । शाक्तानुमवपूरवंकं मूटे (२)स्थितायाः कुण्ड छिन्याः षट्च- क्रग्रन्थिसश्चयमेदक्रभण उषोपन्दुमण्डलासक्ति(३)परिकस्पनमेव श्ञाक्तातुभवः। तत्पूत्रैकं भाविव्णीत्पात्तरिति क्रियाविशेषणम् ॥ १२३९ ॥
तेरोक्षयमोहनारिचक्रवये वेखशीमयतावास्नाुक्त्वा स- वंसाभाग्यदायकादिचक्रचये भूतङ्पिमध्यमामय(र>वासना- माह-उन्भषरा क्तेति । |
अङुरसदद्टरूपेरङ्खं (५)ब्रह्यरन्धाधामसुखसितसदस्र कक - मङ् । तच्रस्थाऽकारः-
अकारः सवेवणोगन्यः प्रकाशः परमः शिवः ॥ इति खङ्कतपडत्युक्तरी (६) त्या अकारः परमरिवात्मको- ऽकुलशब्देन रक्ष्यते । तेन सङः सम्बन्धः । [तद्रू(७)पैरिच्छा-
(९) “श्रोतः ख०।
(२) “मुखात्थितायाः' ख० ।
(३) 'सक्त' स्र 9 ।
(४) मध्यमामयतां व° क० |
(५) अङ्कु नास्ति ख० ।
(६) 'पद्धल्युक्ता $कारः' ख० ।
(७) कस।न्तगेतो ग्रन्थः ख० चु° नास्ति ।
वजा सङ्कतनिदपणम् ।- २४९
तदेवाऽकुलसङ्षटृरूपेवणचतुष्टयेः ॥ १४० ॥
शाक्तभधानकैः । इच्छाशक्तिरिकारः। उन्पेषरक्तिभ्रसरेः। उन्पे- षरक्तिरुकारः । | तदुक्तं परापञ्चाशिकावाम्-- अनुत्तरेच्छा उन्पे(९)१ आनन्दे(२)षणभूरता । क्रियेच्छाज्ञानशक्तीनां सन्ता चोच्छ(३)नता च षट् ॥ कोऽथः ? मूटोत्यिताया इच्छाशक्तेः कुलङ्कण्डलिन्याः अङ स्थेन अकारेण सङ्कटे सति एकारो जायते । त(*) स्ये बोन्पेष- शक्तिसद््रे सति अकारो जायते । तथारेवाऽकुटसद्वटे स- ति एेकारौकारौ जाये(५तेते इत्यथः । तदुक्तं परापश्चाशि- कायाम्- ६५ अनुत्तरानन्त(६)शक्तिरिच्छाशक्तो नियोजिता । त्रिकोण(७)प्रथ षट्कोणपिच्छायां रूढिमागता ॥ इति । ते एवोन्भेषयोगेन क्रियााक्ते(८) स्फुटे दपुः । उक्तत्रिशक्तेसद्कहनिशुं दवैतघस्मरम् ॥ इति च । पिभ्रेच्छाभाकरितैरपि।
~~
(९) 'उन्मेषा' कण| (२) (आनन्द श्न नताः क० । (३) “सत्ताचेच्छरृखता ववद् । इतिः ख० । (४) 'उन््रषशक्तिरूपायास्तस्या पएवाङ्कुलसङ्कद्क' ख० । (५) 'जायेतः कण, (जायते ख ० । (६) (अनुत्तरानन्द्' क०। | (७) ^्िकाणमध्यषरूकोणमिच्छायां खूढमागतम्' ख० । (८) (शाक्तो ख ® । ३२
२५.० सदीके थोगिनीहदये--
न
वेयोष्मरूपलाव(टरनरनिन्रच्छाभावितेरपि ।॥
` हच्छेषणान्तरारूढाः स्फुटास्फुटजगन्पयाः ॥ चत्वारः पर (रतो वर्णा; षडात्पा(र)ोनः प्रचोदिताः ॥ इाते परा()पश्चारिकोक्तरीव्या अङुखेषणाभ्यां मिन्रेण भाविताः षंटाः स्थुक(५ वणाः, तेरपि। तन्न दस्वद्रयमेव श्रायम् । अत एवाऽकुकः। एको वर्णः इच्छात्मके । दितीयः उन्मेषोऽपरः । पर(६)षद्दस्वद्रयं च एकारेकारोक।रोकाराश्चेति नव स्वश भवन्ति । वेद्योष्मरूपसावर्णः । सत्तावाचिनि बीने तु प्रादिपायान्तिमं जगत् । विटु्रपरस्ययाकारमेतत् सपरिरिष्यते ॥ इति परापश्चाशकोक्तरीत्या वेचस्य षटर्वंशत्तचवात्मनः। सङ्ल्परूपा उर्पाणः श्वषसहा ङष्पाणःः इति तन्ऋान्तर- वचनात् । एवम्भूतः स॒ आदियस्य हकारस्य स एव वेद्योष्म- रूपरादिहंकारस्तदाचवर्णैः । अत्रैक आदिषाञ्दः अध्याहायं;ः । कुकशक्तिसमवेशरूपव मैदरया नवतेः | ` कुछगक्तिः इण्डलिनी तस्याः सपवेज्लः उदयविश्रान्ति- स्थानद्रयं आधारं ब्रह्मरन्धरमयं तदप वणेद्रयं ठकारवका- रातपकं । (१) शचाद्यर्णौ ° क9। (२) श्पुरतो' ख०। (३) टात्मानः' ख०। (७) 'परा' नास्ति ख०। (५) "वड कल्टृर््वणांः क०। (६) "वर" न।स्ति क०।
घूजा सङ्तनिरूप णम् । २९५१
कुरशक्तिसमावेशरूपवणेद.यान्वितेः ॥ १४१ ॥ क्तेः सारमयत्वेन प्रसरततव्वान्महश्चरि| ॥
आधारपड्जं पीतं चतुष्पत्रं सुके(१)शरम् 1 इत्यादि (पाथव पङ्जं हेतवः इयन्तन स्वच्छन्द्सङ्ध- हाक्तरीत्या आधारपडनस्य पा्थिदा(र)त्पकतया छकारः । बह्मरन्ध्र धुवादरष्व ऊुरुपञ्चं महेश्वर! श्वतं सुकेशरोपेतं सदहसारमधोयुखम् ॥ व्यापिनी के(२)वखा शाक्तरसताघपरवर्षिंणी । इत्यन्तेन स्वच्छन्द सङ्कहोक्त शत्या अमृतमय वकारः) एतदरणेद्रयान्वतः | काऽथेः { इखशक्तारच्छात्पक्रायाः ङ्ण्ड- छिन्याः उन्मेषात् षट् चक्रपश्चगगनद्रादजग्रन्थिभेदक्रमेण अख समावेशात् , अईउकऋृएएेओओहयवरक'-इति वणेचतुदे शक- सुत्प्यते । तदुक्तमागमान्तरे भूत रिप्युडार(*)सङ्ग्रदे- पञ हस्वाः सन्धिवणाः दौर्बाख(५)भिजरं धरा । इति । तन्मयं चतुदेशारचक्रमित्यथेः ॥१४०-९४१॥ सम्प्रदायक्रमायातपो भाग्यदायकशन्दयोवासनापाह-श्च- क्तरिति । शक्ते रेच्छाशक्तेः इण्डङिन्याः सारः प्रसारः पूर्बोक्तरीस्या
(१) 'सकेसरम' ख० ।
(२) 'पाथवतया' ख०।
(३) “उयापिनी केवल शदवदस्रतोघप्रनषिणम्' क ० । (४) “्रसखङ्ध' ख० ।
(५) “व्योमेराभ्निज ल धरा ख ० ।
र.
२५९२ सटीके योगिनीाहदये-
सम्प्रदायक्रमायाताश्चक्रे सोभाग्यदायके ॥१४२॥ निरन्तरध्रधारूपसो भाग्यं बरूयोगतः ॥
अङ्लम्थानप्याऽवुक्तरशिवरसंघगेस्तन्पयत्मेन तदु्पन्नत्वात् । ए-
= (०५. ५४ © = (=, ^ ^ ते(१ षां वणानां तेवर्णैः प्रखृतताव सवसङ्क्षोभिण्यादिशक्ती-
नां सम्धदायक्रपायातत्वम् । सम्प्रदायो पमहावोधदूपां गुरुखे स्थितः । इति(२) । पूर्वोक्तरीत्या गुशुमुखादधिगतत्वादे त(३)देव वर्णा- त्पत्तेः । आसां च तन्पयत्वम् । ()अत एव्र ताः सम्प्रदायः | 0 १ १.९ क्रमायाता इत्यथः । 'अणिमासद्शा(<)स्तास्तु रक्त(ध्फवणः'
इत्यादिपूर्क्ता अगि(७)मासिद्धिसदवारूपाः । सवेसङ्क्नो- |
भि(<)णीपूवाः 'सवे(९)सडक्षोभिणी शक्ते'रित्यादिचतुः-
` चती धाख्क्ताः । निरन्तरमधा शिवाद्वैतमावना सेव सोमाग्यं
परमसुभगदरमप्रेपास्पदपर शिवा मेद गाचरत्वात्तदष बं शाक्तिः
(१) "पतेन ख० । (२) ति” नास्ति क०। (२) 'त्वाद्ण।०' ख० । (४) (च ` अधिकं कऽ । (५) 'सरदरीः खऽ | (६) !रक्ततरावर्णैः' ख०।
८ दे | ~ [ज (७) "परबाक्ता।णमास्रद्धिसरद्ीः ख०। (<) 'सवसष्खोभिणीषूवीःः' नास्ति ख०।
५ भ &कि. ॥ [क
(९) -सवसङ्क्षाभणा राक्तिः' इत्यत्र 'सवेज्ञा सर्वशक्तिश्च इति
० पु° पाटः।
पूजासङ्धतनिरूपणम् । २५३ `
अन्वर्थतं(१)ज्ञिके! देवर! अणिमापद(२)ाः शुभाः ॥१४६३॥ सर्वसङ्कभिणीपूा देह क्षादिवरिश्ुदधिदाः ॥
तथ्ोगतः अनित्याश्चचिरूपपरमदुभेगसतवै(३)जुगुप्सिततट्लक्ष- णसंसारपरिपन्थिपरम(४)रेमास्पद् सवेस्पृहणीयपरमसुभगपरम - विवाहन्ताटक्षणसौभाग्यपरतिपादनशक्तक्षयोगात् । अन्वयं ज्ञकं - (५)असुद्काथाक्षरशालन (दकसज्ञावति साभाग्यद्ा यके चक्रे सम्पूजमेदित्यचुषङ्गः ।
ॐ =
देदेति। देहः षटू्रिशत्तचवसथुदायलक्षणः । तच्छब्देन तद हन्ताभि- मानिनीभमाता छक्ष्यते। अक्षाणीद्धियाणि प्रमाणानि । आदिश्- बदाद्धिषयाः भरमेयद्पाः श्रयन्ते । तेषां विशद्धि(०)धिदैकविश्रा-
। तस्यां (८)विशुद्धा यष्टुरोऽव्र(९)रत्वं स्वातन्त्यं (९०)ति- द्यति सा चाऽत्र प्राक्तरूपे परपातृमानमेयलक्षणे पुरत्रये (११)चि- __------------------ ~~~
(९) स्ञके' ख०। + |
(२) 'सदरीः' ख ।
(३) ज्ुगुप्सामेद खक्षण०' ख०। (8) “पर ख० ।
(५) “स ज्ञिक' क० ।
(६) शछालिसज्ञा°' ख०।
(७) शुद्धः वेवेकावेश्रान्तः ख०।
(८) शुद्धौ ख ।
(९) श्ाशेत्व' ख०।
(१०) (स्वातन्त्रय' नास्ति क० |
(११) “त्रयेऽपि निा० ख० ।
२५४ सर्टीके योगिनीोहदये- ५
© ^~ (^~ + (~ ४ ~ = । ` इंशित्वसिद्धिरपि च प्रोक्तरूपे पुरत्रये ॥ १४४ ॥ योगादिङ्केशभेदेन सिद्धा तरिपुरवासिनी ॥
िवासस्थानत्वात् । अत्रैव वक्ष्यति- ` मातृपानपरपयाणां पुराणां परिपाषणीं । इति ॥१४२-२४४); योगादीति। योगादिङ्कशमेदेन(१) । आत्मा मनसा संयुज्यते मन इन्द्ियेगेद्धियमर्थन, इन्द्रियाणां (र)प्राप्यकारित्वनियमात् । ततोऽष्यथंसन्निकृषटन्धियेणः इति तन्ब्ान्तरोक्तरीया मामान- मे(रयेषु तद्रूपेण चिन्मरीचीनां परसा(४)रः तत्समवाय (५)योगः प एवा(६)दिङ्कशः। असङ्काद्रयापरिच्छि(च्न- संविदात्मने मानसेद्धियाेषयात्मना बहिरूपराग एव हि शः छिष्त्वम् । तद (८)भदेन भत्यङ्पुखतया तदेकरस्येन परपरमा- तृविध्ान्तिसमेदः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्-- सवे८९)संविन्नदी मेदमिन्नविश्रान्तिभूषये । नमः प्रमातरव(१ ०)पुपे रिवचेतन्यसिन्ध(१९बे ॥ (१) शाब्देन क० । (२) कंलान्तगंतं नास्ति क० । (३) श्रमेये' ख०। (४) “रसरः ख० । (५) (तत्लमयो योगः क० । (६) स चादि ख9। (७) "विच्छिन्नः ख० । (८) तद्भेदेन ख०। (९) 'सवेचित्तादिकाद्धेदाद्धिश्न० ख० । (१०) “विधये ख०। (१९) "क्िद्धये' ख०।
पूजा सङ्कुतनिरूपणस् । ` २५५
एताः सम्पूजगेदेवि! सवौः सर्वोपचारकैः ॥ १४५ ॥ सदातनानां नादानां नवरन्धस्थितात्मनांम ॥
स्तोच्रावल्यासपि- यत्र यत्र मिलिता मरीचयः तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते । इति । ८4 सिद्धा त्रिपुरवासिनी पूर्वोक्तपुरच्यविश्रान्तिरूपिणी चतु. थचक्रेऽवरी । एताः पूज्याः आवरणदेवताः सि द्धिचकरेवरीयुताः सवां; सर्वोपचारैगेन्धादिभिः सम्पूनयेत् ॥१४९॥ पञचचमचक्र [त सवासनामाह-सद्ातनानामिति । ` सदातनानां यावच्छरीरभावितानां नादानां अविक्रतज्ु- म्यस्परेनादध्वनिबिन्दुशाक्तवीजाक्षराख्यानां । नवरन्धरस्थिता- त्मना नवरन्धराणि नवाधाराणि सुषुम्नान्तगतगगनभा(१)ग- रूपणे । [आधार(र)स्वाधिषटठनपृणिपूरानाहततदृध्यैवजपश्च कण्डरम्बिकाविशुद्ाज्ञाख्यानि] । तदुक्तं (२)खच्छन्द- सङ्खदे- आधारं स्वाधिष्ठानं च पणिपूरमनाहतपर । मध्यमं बज्रकण्ठं च रुभ्विकां च विश्द्धिकाम् ॥ आज्ञां च (४)नवकं विद्धि षद्धक्राणि (५) िहीनकम् । इति।
~ --------- ---
(१) (मासरूपत्वात्' ख० । (२) कंसान्तगेतं नास्ति ख०। (३) 'स्वच्छन्दे' ख ।
(७) (नवकः ख० ।
(५) !स्विहीऽ' क०।
२९५६ सर्टीके योगिनीहदये-
महासामान्यरूपेण व्याव्रृत्तध्वनिरूप्रिणी ॥ १४६ ॥ अ! स्थरास्थरवयना सखयाषशू्वदसाणकः ॥
तेषु स्थित्तात्पनां तेषां पहासापान्यरूपण पहत् आद्यन्तर- हितं निविक्षध्येनिखक्षणे सापिान्य सपाषिस्तद्रपण | व्यारत्तध्व- निरूपिणी एवं व्याहत्तो विभक्तो दश्धा ध्वनिः तद्रपिणी अ-
अ
विङृतादिनादमयसुक्ष्ममध्यमारूपिणीत्यथेः । अस्थिर स्थिरवे्या- नां अस्थिरवेद्यानि कर्मेन्द्रिषमोचरतया क्रियारूपाणि वचना- दानगमनविसगोनन्दाख्यानि स्थिरे्यानि ज्ञानेन्द्रियगेाचराः शब्दस्परैरूपरस(श)गन्धाः तेषापस्थिरस्थिस्वे्यानां । छायास्पैः (२)विम्बप्रतिविम्बल्यैः | दशाणेकैः (३)टतवगेदयदशार्णेराविः- छता इति शेषः । छुङ(*)कोखयोगिन्यः। अत एव कुलस्य द्- दस्य अवरयवभूतानि दशेन्द्रिषागे कुलशब्द नोच्यन्ते, तत्सवन्धा- (५)त्द्राह्चदशविषयाः कोशिका इत्युच्यन्ते, तेर्योगः सम्बन्धः कायकारणमा(द)बलक्षणो- यासां ताः कुलको()कया गिन्यः । ननु (८)भरूनाटिप्युद्धारक्रमे क्रमप्राप्तौ कवगेच-
(९) “रसः नास्ति कऽ।
(२) “रूपेः प्रतिविम्बभ्ूते; दश्ा० ख०।
(३) (द शाणकंसावेभूता०' क०।
(४) करूकोलिकये गिस्यः' ख० । ।
(५) ("तत्लम्बन्धात्तत्सङ्काद्या दश ० ख०। (६) भावः नास्ति ख० ।
(७) कुरुकौिकयोगिन्यः' ख० ।
(<) 'भूत्कछिपक्रमेणः ख० ।
पूजा सङडत निरूपणम् । २५७
कुरुकंलिकयोगिन्यः सवैसिदिप्रदायिकाः ॥१४९७॥ दवेता( १म्बरधराः उेताः उवेताभरणभूषिताः ॥
वर्गो [कथं (२)टतवर्गोः तस्मिन् दशर व्युक्रमेण कथ्येते ?उ- च्यते चतुदशारदशारद्यचक्राणां स्थितिरूपत्वाद् भूतलपिमध्यमा- वयवत्वान्पध्यमायाश्च स्थातेरूपत्वात्स्थितिक्रमाऽयं वगेज्य(३) त्ययः । अत एव तत्कारणमभूतद्रुक्ष्ममध्यमात्मना (नादम् यत्व(८)संकज्ञाकथनमस्य चक्रस्य । सवेसिद्धिपद्!यिकाः(६) सवस्य पूत्राक्तस्य ्ञानकपन्द्ियविषयजातस्य सिद्धिः पतीतिः भमा- तेविश्रान्िः,त्टक्षणायाः (७) सिदेः प्रदायिकाः॥ १४६-१४अ७॥ तासां(८) प्यानमाद-द्वतास्बरधरा इते ।
स्पष्टम् । सर्वाथसाधकचक्र(९)ब्युत्पात्तिमाह-मन््राणामिति ।
[सवे(१०)सिद्धमदाधाः 'सर्वसिद्धिमदा देवी च' इयादि-
(९) श्ेवत्तावराभयकराः' ख० : ध , अ भै भ (~~ च = = 1 5 (२) कसान्तगणेतम्रन्थस्थने 'आस्मन् दक्र व्युत्करमेणाच्यते दाति क० । (३) 'वगेन्यास्तः' ख०। (४) (्मना' नस्ति ख०। (५) स्व ' नास्ति खऽ। (६) 'भ्रदायकाः' कर । (७) *ज्िद्धः' नास्ति क०। (८) 'आसां' ख ० । (९) “चक्रोत्पत्तिमा०ः ख ० । (१०) क सान्तगेतं नास्ति खश । ३३
२९८ खटीके चनिनी हदये-
मन्ताणां (१)स्वप्रधारूपयोगादन्वर्थसन्ञके ॥ १४८ ॥ सर्वसिद्धिरदायास्तु चक्रे सवथेसाधके ॥ रोकत्रथसष्डद्धीनां हेतुत्राचक्रनाधिका ॥ १४९२ ॥
चतुःचातीत्राह्लोक्ताः । मन्त्राणां पूर्वोक्तनिवेचनानां मननत्रा- णतां स्वप्रधारूपयागात् स्वस्य चिवात्पनः साधकस्य ]। ,. प्रथा(२) किवाहम्भावमावना (ईतदेव पननत्राणनं तयो- गादन्वथेसज्नक सवाथेसाधकपद्ा(४.)बुकूखाथवत्सक्नाश्चाङने । शिवाहम्भवभावनालक्षणमननात् सर्वेषां (५)स्वस्वप्ताधकानामर अथं परमरमयोजनं पाक्षं प्रापयतीति विशेषात् (६)सवाथस्ाघक चक्रे संस्थिता इतिकेषः। स्वनामपदाये(ऽ)ग्यु्पात्तिपुरःसरपेतवक्र (<) बरी माह-खौ- कल्रयसम्धखीनानिति । [ (९)कोकयतीति कोकः, छोकनं रोकः, छोक्यत $ति छाकः| इति व्युत्पत्या कोकत्रयस्य परातूपानमेयलक्षणस्य समू-
^+ = ^ ण
(१) “श्वप्रथामनन्राणयोगा० ख ० । (२) श्वप्रथाः ख०। | (३) 'तदेवामननघ्राणे त° चख० | (४) “पदाथोजुङ्खा०' ख ० । | ~ १ (५) (घस्वसाध०' ख ० । (द) "विशेषात् नास्ति क०। (७) 'थेवत् उत्पात 9' खं ० । + (८) चक्र्ीमा०' ख० । | (९) के सान्तगतस्थले 'लोकयतीति छेोकते ऽनेनेति लोकयतः'स०।
पूजा खङ्तानेशूपणच् । २५९
त्रिपुरा श्रीर्महेशानि ! मन्त्रददधिमवा पुनः ॥ व॒रिलवसिदधिराश्याता एताः सवाः समचयत ॥११५.०॥ ऊध्वौधोभुखया देवि ! कुण्डलिन्या प्रकाशिताः ॥
द्धीनां परिपृणे(ट)प्रपातविभ्रान्तिलक्षणानां दहैतुखन्चिपुरा(र)
श्री पञ्चपचक्रेश्वरी पूञ्येत्यथः। लन्च्ह्ुद्धीति। मन्त्राणां शद्धिनांम “ अङ्के विषुपन्ने च ` हत्यादिपूर्बाक्त- रीत्या उन्मन्य(३)न्तकारुरुयलक्षणोचारणेन । चिन्मयता(४). भावना तादशमन््रह्युद्या स्वसाघकस्य वशित्वं । [सक(५.)क्ज- गर्सजने रक्षणे सहारे च] स्वायत्तत्व (६) सिद्धयति ताश्शपर- शिवपराप्िः । सा चाऽस्मिन् चक्रे वर्षित्वसिद्धरस्ति । एताः सर्वां आवरणदेवताशके(ॐ)ष्वरीसिद्धिसंयुताः सपचेयेत् ॥ १४८-१५५०॥ षृ्चक्रं (८)पृजां सवास्नापाह-उध्वाधोञुलयेतिं । उध्वाधो्ुखया यदेष्टुसतिः शव्यादेचतुःचता्ना-
(९) प्पूणपरप्रमा०' ख° ।
(र) जिषुरा भीः पञ्चम" ख ।
(३) “उन्मना पय्येन्त कल।वीजखुक्षणो ° ख ० ।
(8) कंसान्तगतस्थाने "चन्मय्यन्तभांवनं मातमन्षद्युखाहो, इति ख० पु०।
(५) कलान्तगंतस्थरे 'लजगत्प्रलवे ल्रजगत्संहारे च' ख०।
(६) (स्वातन्ध्यं लिखतीति तादृश्ची परदिव त।प्रास्तिः' ख०।
(७) “चक्रे भीकषेिसलयुताः' खऽ।
(८) 'चक्रपूजांः ख०।
| | ।
छ, क क ४५९
२६० खटीके यागेनीदह्द्ये--
कुरुच्छया वहिभोवात् कादिवणेप्रथामयी( १३१५ १॥ निगर्भयोगनी वाच्या (२)स्वरूपा वेरारूपकं ॥
सक्तरीस्या अङक (३)स्थपरपुरुषप्राप्रये ऊष्वैयुखया पुनर. धोमुखया (४)विखखष्टये मुखाधारं भरविश्न्या. कुण्डलिन्या प्रकाशिताः अभिग्य्निताः कारणे स्वात् कुलेच्छया कुलसुक्त- क्षणं पातरपानमेयदूपे तत्रेच्छथा तन्निर्मागच्छया बहि. भवात् (५)कादिवणेप्रधामयी षटूनिंशत्तस्सडकनरूपतन्व- च्रयमयमातमानभयलक्षणकुङनिमणेच्छया (६) अङ्करस्थपरत्रि- वाद्वहिः प्रख्तया समस्तवणेगार्भेण्या ङुण्डाछिन्या ककारादिदः- दावणपरधारूपा निर्िता हयथः। निगमयोगिनावाच्याः निगभ- योगिन्य इति (अवचना! | निगमो (८)हि महादेवि ! विवश॒वांत्मगो चरः । इति पूर्वोक्तरीया[(९)ऽदरेतपधालक्षणदेतपमधालक्षणपरममातरयोगो
यासां ताः]योगिन्यो विषयेन्द्रियससगेलक्षण८१ ०)दशेन्दियदत्तयः
(९) श्रथामयाः' ख०। (२) "वाच्याः स्व°' ख । (३) (स्य'नारित ख०। (४) 'स्वसृष्टये' ख ० । (५) कचादि' ख०। ` (६) “अ नस्ति ख०। (७) इति वचनात् ख ० । (८) निगर्भोऽपि' च०। क (६) ४५ (ऽदेतलक्षणपरग्रमातुः योगो आसामि (१०) रक्षणा दुक्ञा°' ख ।
तूजासङ्कतनिशूपणम् । २६१
© =>
सवौवेशकरे (१)चकरे सवैरक्ताकरे पराः ॥ १५२ ॥ सवैज्ञायाः स्थिता (२)एताः; सह पस्ताक्षमालिकाः ॥
चिन्परीचयो निगभयोगिन्यः। स्वरूपावेश्षरूपके स्वरूपस्य साधक- स्या(३)त्मनः प्रपातुर वरेशः परश्िषोऽहमिति पतिः । आवेश हि रोके ब्रह्मराक्षसोऽहमितिवत् पराहन्तापरथा तद्रूपके तननिरू- पके । अत एव सवावेशकरे ।
यत्र यन्न मनो याति-इत्यादि ॥
तत्रतजाक्षमार्गेण चेतन्यं उ्यञ्यते प्रभोः ।
इति विज्ञान रव भष्टारकोक्तरीत्या सव्र (*)तद वेश्- तद भेदेन (५)स्फुरणं करोतीति प्तवावेशकरे । चक्रे ष़ चक्रे स- वैरक्षाकरे काकेभ्यो रक्षतामन्नभू्' (द६)इतिषत् (अ) परतिकू- कपदार्थादुपहतिषरिहारः । रक्षा नाप सवस्माद्भदभपश्चलक्षणा- त् परिपन्थिनो रक्षा पररिवाभेद्भतीतिरूपा तरकर । पराः परकि- वाद्रतभतिपादनपरस्वाद(८)ष्टाः। सवज्ञाधाः (स्वहा सर्वश क्तः" शत्यादिचवुःहातीषास्रोक्ताः स्थिताः । तासां ध्यानपा्ट-एता इति ।
(९) .सवेर्ष्षाकरे चके सवावश्करे पराः ख | (२) “स्थिताश्चताः' ख०।
(३) 'लाधकात्मनः' ख०।
(४) 'सघन्न तत्पङावेशस्तश०' ख० ।
(५) दन स्वस्येव स्फुः० ख ७ ।
(६) "रक्षतामयमिति' ख०।
(७) (तत्प्रति क ० ।
(८) "परत्वात् सवे°' ख०।
>, कि = (कि कि
२६२ खटीक्ते योगिनीहदये-~ |
॥ [ [#)
मातरमानप्रमेयानां पुराणां परिपोषिणी ॥ १५३ ॥
भ
विप्रामालिनी ख्याता चक्रेशी तिपुरमोहिनी ॥
~>
1
॥
पुस्त पुस्तकं । रिषं स्पष्टम् । | नामव्युत्पत्तिपुरःसरं चक्रे(१)इवरीपाद-घातमानप्रमे- ~ | यानाभिति । | | [पर(र)संवित्सन्दरूपत्वान्पातृपानपेयान्येव पुराणितेषां पुराणां परिपेषिणी प्रधानन उपन्ुहिगी|। अत एव तिपुरामाछ- नी ख्याता निरुक्ता । चक्रे (ड)षष्ठचकरे। सषेमोहिनी (५)एत- त्छृतमेादवक्षादेव हि मादृमानरमेयरूपा भथा । तङ्क्तं परापश्चा- शिकायामस- स्वां शूपेषु (५)भानेषु मायाप्षत्वविभेद्धीः । इति । विधा्ञक्तिविश्चुद्धि च सिद्ध प्राकास्यप्त(ह)ज्िताम् ॥ . एताः स्वाोपचारण पूजयेदेवताः क्रमात । इति । पन्त्राः पुरूपवास्याधिद्धिताः विधाः द्षीदपवाच्याधिष्ठिताः । अत एव विच्याशक्तेः सौ माभ्यवि्ावणेवाच्यायाः षटू््रिशत्तरव- पथ्या विश्युद्धिस्त(७)दतीतपरवचिष्टक्षणा तद्रपाम् ।
दन न्क कै ~ = 6 ~ ~ = 1 # 6
न ~न
(१) 'चक्रशीमाह' खल०। (२) कंखान्तगेतस्थले (ल्वा सलवप्रथा प्रव्ननापचुंहि णी?हति ल ० घुऽ पारः। । । (३)4्चक्रेशी षष्ठ चक्रेरी' चऽ 1. (8) "अत एव कतमोदिनी'खर। ` `. | | | (५) 'भगिषु' ख०। | (६) संशि" क० । (७) 'विश्चुद्धिस्त्वतीतः क ऽ ।
परूजासङ्तनिरूपणन्् । ` २६३
निश्ढवायुसङ्घटुस्फुटितग्रन्थिमूरतः ॥ ११५४ ॥ हदयान्तरसंवित्तिशून्यपुयं्टकारमना ॥
भाकास्यसक्गिकां(१)सिद्धि कापना(र)रूपछक्षणाम् । तदुक्तं महाकविभिः- द्रवः सङ्खातकठिनः स्थुः घष्पौ कघुयुरः । व्यक्तो व्यक्तेतरश्चापि प्राकास्यन्ते विभूतिषु ॥ इति। पता देवताः) क्रमासथमावरणदेवताः पथाचक्रं बीं ततः
सिद्धि पिति क्रपात्स(४)र्बापचारेण । जातबवेक(५)वचनं सर्वो(क)पचरः पूजयेदित्यथंः |: : : |
सप्रपचक्रे पूजां सवासनापा- निरुद्धेति । ` निरुद्धयोः (७)परिहतस्वैराचारयोः वाय्वोः प्राणापानयोः सद्द्टात् । ॥ गुदमाङ्गञ्च्य बहुशः भागापानौ निरुध्य च| पयोऽयते- इत्य भियुक्तवचनाक्तराया स्योगात् फुटितो ग्रन्थिः षष पनान्तगतमुकाधारकपलपयन्तं बसन् ताह सूरं मूलाधारं । ततो
(९) “सश्ञितां' ख०
(२) "कामनाऽचुरूप खऽ।
(३) द वताः सवेक्ञायाश्चक्रश्ाोासद्िसुद्रायुताः क्रमा० ख०। (४) क्रम्रात् पूचापचार० ख ।
(५) "जातावकत्व ख०।
(६) -सघरूपचा० सर ०।
(७9) 'नैखखयोः परिहत इत्यारभ्य 'दुल्यत्वाच्छरन्यमिति च'
द खदीक्रे योगेनीह्दये--
बीजरूपस्वरक ख स्पृष्टवगोनुसारतः ॥ १५१ ॥ रहश्ययोगिनीदेवीः (१)तत्तारदखनेउञ्रे ॥
हृद यान्तरसंवित्तिश्चन्य पुथषटकार्मना ध्ध्यायवू् भुजगाक्र
तिं हुङारविहलञ्यातिः पवनक्षेपमनाीभेगेपयेदृध्वेम् हत्य-
भियुक्तवचनाक्तरीया मूकादुस्थितायाः कुण्डछिनीरूपायाः । ततो हृदयपनब्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं कराम ।
इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या हृद यान्तरे स्ष्टुरन्त्याः पवि विदासिनः
कि
चितिथित्तं च चततन्य॑ चतनाद्रयकपे च | जीवः का च देवेशि ! घकष्पयुयेष्टकं पतम् ॥
इति स्वच्छन्द सङ्कदाक्तरात्या पह्पपुयष्टकानां ब्रह्ष्पतया ,
दु कष््यलाच्छून्यमिति च।
हृत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्" इति (२)श्रुत्युक्तरीत्या पुर शरीरं चिदष्टकरूपं घुष्ष्मश्रीरं शुर्यपुय्॑टकं तद्ारमना त- दर¶ेण सस्थि(३)ता इत्यवुषङ्ग; ।
विधेय मातृका देवी(४) ीजयोन्यास्मना स्थिता ।
इति परापश्चाक्िकोक्तरीत्या [बीजद्पाः (५) स्वराः अ-
(१) दवि! ख०।
(२) श््रुव्युक्त्याः ख० ।
(३) 'तद्पेण पता इ ० ख० ।
(४) 'देवि' क० ।
(५) कंसान्तगेतस्थकले "्वीजरूपाः आदिस्वरा अकाराद्ेषिसखणा न्तपाडशस्वरकखाः इति खण चुर पा०।
4
प
न = म को का कज
व ये
वूजासङ्तनिरूपणम् । २६५
सवरागहर चक्रं सस्थिता वारवन्दितं 1 ॥ १५६ | वरिन्याद्या रक्तवणो वरदामयम्द्रेताः ॥
श दक दि
कारादिविप्तगोन्ताः कलाः षोडश] ताभिः स्पृष्टाः अवर्णेन सं(१). युताः वगाः कचटतपयकशाः तेषां अनुखारः । अवगेः भथमो देवि! वक्गिनी तत्र संस्थिता । श्त्यादि चतुः हाती शाच्रीक्त(र)त्वात् । “उद्धरेत् भथम रफप्' इत्यादि चतुःरातीशाल्नोद्धताः । स्वस्वर्बाजातुसारतः क्रमात् स्वस्ववगांन्ते स्वरस्ववीजसुच्ायं पूजयेदित्यथेः। नच चतु- देशक णादि (द)पूर्वचक्रेषु देवतानां मृताशपिमातूकाष(४)१- | स्वरनवकदादिपश्चकटतक चवगंमयत्वसुक्तम् , अषटकोणादि(५)- । देवतानां किमिति [शिष्टप(दै) वगंशषसमयत्वोक्तपिति चेत् सयम्, अष्टको णदेवतार्बीजमलुक्त मप्यवगन्तञ्पम् । वीजरूपस्वरक कास्पृष्टवगांनुसारतः । इति तु वज्चिन्यादिदेवतापूजामन्तरकथनम् । रदस्ययोगिन्यः (अ) पू्ष्पमन्त्ररहस्यं पुयष्टकं तेन सह योगः सम्बन्धः कायेकारणलक्षणो वासां ताः वक्षिन्यायाः योगिन्यः (१) “अवरौण युताः ख° । (२) श्ाख्ोक्ताः स्वस्ववगोन्त उद रे०क० । (३) "पूवे" नास्ति ज ०। (७) "वण" नाति ख०। (५) कोणा धिदैव' ख० । (६) कसान्तमतस्थले 'शिष्टवग॑श्बसमयत्व अष्टकोणादिदेवता- नामयुक्तमप्यवमन्तव्यम् ` क० । (७) ध्योगिनीः' ख० | 2
=
। † क णे
]
३६६ सटीक थोगिनीहदये--
पुस्तकं जपमालां(१) च दधानाः सिद्धयोगिनः ॥ १ ५७॥ शृदविदाविद्युद्धः च भुक्तेसिद्धिं महेश्वरि ! ॥
[(र)ष्क्ष्मतया दुरष्च्यपुयैष्टकपमयतवाद्रो पनीयाः । संसार दङनोज्ज्वके अनियाशविङ्धन्ञरूपमेदः ससारस्तस्य दलने हरणे उजञ्ञ्वङे परभधकाञ्चतावन्माव्रे। अत एव सवंरागहरे चक्रे सव]
` एवानित्याछचिह्केशदूपससारो रागः तस्य॒ हरणे (दै.
भावश्लाछिनि सप्रमचक्र संस्थिता(छ)वरिन्या्याः । अवगेः प्रथमो देवि ! व्चिनी तन्न संस्थिता । एति चतुःचातीश्ाच्चाक्ताः पूजयेदियतुषङ्कः । ताप्तां ध्यनपाह-श्क्वणा इाते। सिद्धः परप(द)क्लिवः तेन स(९)यागः सम्बन्धः पुयेषटका- त्म(७)कतयां तस्य जीवत्वा(८)षाद्नलक्षणास्तद्रतीः (९) । दि स्पष्टम् ॥१५१-१५५७॥ चद विद्ये ति । अहन्तेदन्तयारंक्यपिति(* °) विद्या निगद्यते । (१) 'जपमाराश्चः खऽ । (२) कंसान्तगेतस्थरे ख० पुस्तके “अत पव सवद यानेव त्रन्थः। (३) “हरणे पट प्र° ख० । (७) “संस्थितवद्वान्याद्याः' क०। (५५) "परशिवः । (६) "तेन योगः ल ०। (७) 'कात्मतयाः' ख । (८) जीव तापा० ख । (९) (तद्वतीम्! क०। (१०) "मति विध्या" क०।
बुजा सङ््तनिदषणद्च् । 2६.
€ [2
ईेररीं त्रिपशं (१)सिद्धां परजयेदहिन्दतपणेः ॥१५९८॥
इति परापश्चा(शिकोक्तरीत्या रिवाद्वेतपरथारक्षणायाः शद्धविधायाः विशुद्धिः । ज्ञानेन ज्े(र)यमाखाक्य पशारन्नानं परित्यजेत् । इति (३)प्रतिपादितरीत्या ज्ञातज्ञानज्ञे(४)यविभागश्ुल्य- निविकरपबोधलक्षणपर(९)मशिवक्षमावेच्यस्तदूपिणी, -अत एव भुक्तसिद्ध् । विन्वं रिवादिभूम्यन्तं चमत्काररसाथयम् । श्त्यभियु(द)च्छवचनोक्तरीत्या पदहाथक्तिविदवविषयिणी स्व साधकस्य सिद्धति। तां चक्रेश्वरीं सप्रमचक्रर्वरीं तरिपुरासि- (जदा पादमानपेयद्ूपाणां जिपुराणां (८)उत्तीगपरमकिव- ङ(रगक्षणां सिद्धि बिन्दूतपणरनापाङ्खषए्यागलक्षण(१ ०) लिवक्- क्तिपेरनयुद्रया द्रव्यबिन्दुतपणेः साक्षतङ्कुसुमेः पज ण दिति ॥१५८॥
(१). श्रिषुरासिङ्धि' ख०। (२) श्ञानमा० खऽ।
(३) (दति वचनप्रति°' ख०। (४) शक्ञेय' नारित ख ० ।
(५) "परद्चिव' ख ० ।
(६) इत्यभियुक्तो त्याः ख ०। (७) श्िपुरासिदधि' ख० । (<) ^जिपुराणां सिच्िमुत्ती°' ख ऽ । (९) 'परम' नादित ख०। (१०) (शिवल्यलक्षणा' ख ० । (१९) 'रुक्षणया' ख ० ।
|
| ५
२६८ सरीके योगिनीहटदये-
। @* => (~ शक्ते्रयात्मका देवरं! चिद्धामप्र्राः (१)१२ः ॥ सेवतीग्निकङारूपाः परमातिरहस्यकाः ॥१५९॥
अषटमचक्रपूजां सवासनापाह-ल् क्तिजयात्मिका श्ति। `
शाक्तेत्र यास्काः इच्छाज्ञानाक्रयास्मकाः । (२)चद्धापपर संरा; (३)चिदः सविदः अम्बिकाख्या(डोयाः धाम्नां कर णानां अंशानां वापज्यष्ठराद्यात्मिकानां (“)ओङ्कशषष्ठी- शपि(8)तेश्षाख्यानां प्रसराः स्पन्दभूताः [ (अ)सर्वावरण-
भरधानभूतत्वात् ]। संबतांग्निकङारूपाः संवर्ताग्निः विख-
घस्मरः (८)परमशिवस्तस्य कला हकारः तदरपास्तदा- सिकाः शान्ताक्षक्तयवयवमृतस्वात् । परमातिरहस्यकाः परमाः सर्वावरणदेवताभ्यो(९)ऽतिरहस्यकाः मनोबुद्यदङ्काररूपोपाधि- त्रय(१ ०)स्फुरत्पराचद्ाधाररूपत्वाद यन्तगापनांयाः । पूणापूण-
स्वरूपाया! पूणां (१९) परश्वसमावेश्चरूपत्वात, [ पृणे-
(९) श्रक्राः कशेकाः' ख०।
(२) विदामः ख०।
(३) “वेद्ः' ख9
(७) "अस्विकाख्वादि धाञ्नां' ख्ल० । (५) “उदीश' ख०।
(६) "मिन्रीक्ः खर ।
(७) कखान्तगंतं नास्ति ख०।
(८) "परदिवो ऽस्वरस्तस्य' ख०। (९) "देवताभ्यः सबोभरणथ्रधानरूपत्धात् आतिर ० ख०। (१०) (परिस्फुरत्प० ख०।
(१९) 'पूणपरद्धिव' ख ० ।
1 [वि न
पूजासङ्कतनिशूवणम्र् । २६९
पणापणसखरूपायाः सिदेर्हतः (श)सर्खरि! ॥ सव्रोसिदिमयाख्ये त॒ चकर त्वायुधभषि(२)साः॥१६०॥
स्वरूपा (३) विहव विषयलात्तादशायाः सिद्धरूभयासिकायाः। सवस्य ततत्यादेशिवान्तस्य (४,परक्गिवावेश्रान्तङक्षणायाः दधः जीवन्पुक्ते(५)हेत॒तया । सवधिद्धिमयाख्ये नङ- त सवेसिद्धिमय(द)नाम्नि । आयुषभूषिताः.(७)कामेश्वरी- कामेश्वरयो(८)रायुषैः । । दरचापपाशाङ्कवार एभिमिंधुनी रतेः ।
| म्िमोत्तरपीरस्त्यदक्षिणान्ाक्मेणत ॥
इत्यादि चतुःरतीशाल्ञोक्तरीत्याऽलङ्ः(शताश्च । आ. युधानां [(१०)कापेश्वरकापेडवयांइचरणान्तःपा तित्वं 1सेद्धम] । चक्रेऽष्टमे स्थिताः कमेर्वशपूवाः 'कामेश्वरीमग्ररोणे'ह ति(९१)
(१) हे तुमयेदवरि' ! क ० ।
(२) “भूषते' ऽ ।
(३) कखान्तगतस्थकङे' "पूणेस्वकूपायाः पृणत्वं भदविषवविष, यासिद्धस्तादद्याः सिद्ध तुस्तादात्मिकाय।ः' ख० ।
(४) "परमशिवः ख० ।
(५, सुक्तहत' ख० ।
(£) “लवेसिद्धिमयानन्दे' ख०।
(७) “भूषिने' ख७ ।
(८) (आयुधे नास्ति खऽ ।
(९) अख्ःते आ० ख०।
(१०) कसान्तंगेतस्थानेकमेदवयौषरणाम्तःपातित्वं खिद्धम्' ल ०
(११) शव्यादि चतु०ख० ।
२७० खरीके थोगिनीहदये-
स्थिवाः कमेदवरीपुवाश्चतखः षीठद्वताः ॥ आयुधास्त्(१)तिरक्ताभाः स्वायुधाञञ्व र्मस्तकाः १६१
चतुःरतीशाह्लो(र) क्तरीत्या चतसः पीठदेवताः पीढा- नि (कापूजाओ इति कपात्त ` इति पृवाक्तानि मनाबु्यदङ्ा- रचित्तरक्षणानि तेषु सङ्क्रान्ता देवताः परपकाश्चावयतव्रभूतना- माज्येष्ठासंद्यम्बिकापयमित्रे(३) श्रीश (८४)ओडदीकश्रच यानाय दिवाङ्स्थास्तद्वि(«)पशचे शक्य चभूतच्छाज्ञान क्रियाश्ान्तापयकापे- इवरीवजश्वशमगपाछिनी(६)श्रीपहातिपुरसुन्दयेश्चतस्च इति । नवपचक्रदेवत(७या सह सङ्कलनाव् । अष्टमचक्र त तिस एव कापिशयांधाः सायुधाः । आयुधदेवतानां ष्यानपाह-आयुधा इति ।
आयुधाः आयुष(८)देषताः छन्दसस्वारपुरिलिङ्ग(९)पयो - गः । स्वायुधोञ्ज्वर्पस्तकाः स्वापेष्ठिताऽऽयुधपरिक(१०.खे- तपस्तकाः(११)।
(१) "आयुधा अपिः ल०। ॥ (2) श्ासख्रक्ताश्चतखः' ख० । | | (३) "मिधीक्ञ' ख०।
(७) शोड्डीशश' ख०। | (५)"वाङ्स्थाः तद्धितयशक्त्यवयवभू०' ख ० -4 (६) श्री" नास्त ख०।
(७) देवतायाः क०।
(<) (आयथयुधाधिंदे ° ख ।
(९) पुदिङ्गाः ला०' क०। | (१०) (परिकस्पित' ख०। | (१९) मस्तकाः" दर्यस्याग "हिरः हत्यिकं क० ।
जज = ० त
पूजास्चङ्कतनिशूपणम् | २७१
वरदाभयहस्ताश्च पज्या ब(१ )तफरप्रदाः ॥ त्वदीयाश्च मदीयाश्च पुंखमीवररयविधायिनः ॥१६२॥ त्वगसुङ्मांसमेरोस्थि(२)शङ्कानां च महेदवरि ! ॥
महापञ्चवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम् । पद् ङ्ापाश्रयां देवी मिच्छाकामफलप्रदाम् ॥ भेवतीभ्- इति पुवाक्तरीत्या पहापञ्चवनान्तस्थानाभ्रतक्वरस्य व दवगुराममाङ्स्थायाः अनाभितककायाः तव॒ सम्बन्धिनां बाणधचुःपाश्नाङ्कशाः पुवस्यविधापिनः तादश(ङेफष्य मम सम्बन्धिनो बागधनुःपाज्ञाङ्कशाः ज्ञीवर्यविधायिन इत्य- थः । तदुक्तं चतुःचश(ध)तीशान्ते- मादनेमदनो भूत्वा पाशाङ्गधनुःशेरेः क्षो मयेस्स्वगेभूलोकपातालतल्योपितः तथेव शाक्तदवेशि ! त्रिपुरीकृतविग्रहः | ्षाभयदहवगन्धवेसिद्धव्याधरानापे ॥ इति । ९१८५१४१ ॥१५९-१६२॥ चतुः(६)शतीकशास्ञे अतुद्धृततवाच्छक्तेिबाणात्पवबीजान्यु- दरति-त्वगख गिते ।
(९) “्यात॒फ०' ख ० ।
(२) भेदोऽस्थिमज्ञाणान्ताः स्ुरेद्वरि' ख०।
(३) (तादशश्चः ख०।
(४) 'चतुःचति' क०। ३
(५) ‹स्पष्टमन्थत्' ख० ।
(६) "पूवं चतुःशातीशासखेऽचदाह्टतत्वाच्छाक्तेऽ सल ० । `
२७२ सटीके योगिनीहद्ये--
हितीयसररसंयुक्छा एते बाणास्त्वदायकाः ॥ १६३॥ वामादीनां पुराणां तु जननी त्रिपुराम्बिका ॥
श्रीकण्डादिन्यासपरिपाव्याः स्वगादीनां पञ्चानां धातूनां ये बणोः पश्च, पएते द्वितीयस्वरसंयुक्ताः बाणाः । आकारो द्िती- यः स्वरः सापरथ्याद्विन्हुरपि र(*)भ्यते । स्वदीयकाः [वाणाः(२) सत्सम्बन्धिबाणबीजानि | । तन्न यकारस्त्वगात्मकः, रेफो ऽखगात्मकः, ठ्कारो मपतात्मकः, षकारो मेदस्वरूपः (३) अध्थिश्ब्दोपरिस्थितेन शङ्ासिपकेन स्वकारेणान्वे- ति] । चतुः(*)शात्यापप्यनुद्धूतानां कापरेशवरबाणवीनानां । आदौ पादा((्केवरेण्षारूपां सयुजेन्नरक्रये । इति खच्छन्द सङ्कहोद्धूतत्वादागमान्तरषु परसिद्धत्वान्ात्रा- द्वारः क्रियते ॥२९६३॥ वामादानामिति। - वामादीनां वापाञ्येष्ठारौव्याख्यानां मित्रे(होशादिषूपा-
णां इच्छान्नानक्रियास(७) कविमशेशकत्यं शका पेहवयांधपिष्ठि-
(१) "लक्ष्यते" ख० ।
(२) कसान्त्भतस्थरे “तच धञुषि बाणक्ीजानिः सखर०।
(१) कसान्तगेतस्थले '(अस्थिमज्नाणान्तश्चन्कोऽस्थिमज्ञा्णा- चरिस्थितं शुक्रास्मकं रक्षयति! ख०।
(४) चतुःदातीशासखे ऽप्यनुक्तानां' ख०।
(५) 'र्कयानांरखरक्तयारत्यादैना स्वच्छ० ख०।
(६) भ्िकीश्ाऽ' क |
(७) मय ख०। `
|
+.
दूजाखसङ्कतर्जिशपणस् । २.७
(0 (५ |
परस्वातन्त्परूपतादिच्छाति दि ्महेदवरि! ॥१६४॥ एताः सर्वो पचारेण पजयत्त वरानने ! ॥
^>
जल
(त्वात् पुर (र) शब्द बाच्यत्वं, तेषां च्चिपुराणां जननी समष्टि रूपत्वाद् म्विकाशक्तेरेव (ड)त्रिपुराम्विका निरूक्ता चक्रेड(४). रौति शेषः । | स्वेच्छयैव जगत्सर्व निगिरस्युदिरत्यपि । इत्याज्ञावलारो क्तरीत्या पर (५) शिवस्य विशवसजनसं हारलक्षणस्वातन्त्यलक्षणच्छा ि(द)दधिरेतच(७)क्राचेकस्य सि- द्यति । अ(८)तः सेय मिच्छासिद्धिः(९) अश्मन् चक्रे स्थित यर्थः । एताः आयुपदेवताः कमेरवयीचाशक्रेखरीधिद्धियुताः सर्वोपचरैगन्धादिभिशूपचारेः पूजयेत् । नवपचक्रे(१०)पूजां सवातसनापाह -सचोनन्दमये इति ।
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्) इति (११)"एतस्येवानन्दस्या- `
(१) “धिघ्ानत्वात्' ख० । (२) पुत्र" कृ०।
(३) “शछक्तेरेतक्चिपु० खऽ । (छ) ्यक्रेश्मीतिः ख० ।
(५) "परस्य श्िवस्य' ख०। (&) 'दाक्ति' ख०।
(७) "रेतद् चे कस्य ख० । (८) अतः" नास्ति ख० । (९) (शक्तिः' ख० |
(१०) नवमचक्रपृर्जाः ख० । (११) इति" नास्ति क०।
३५
२७४ ख्टीाके योगिनीहद्ये--
सर्वानन्दमये देवि ! परबह्यालमके परे ॥ १६५ ॥ चक्रे संवित्तिरूपा च महात्रिपुरसुन्दरी ॥ स्वैर(चरेण सम्पूञ्या त्वहन्तेदन्तयोः समा ॥१६६॥
ऽन्यानि भूताति मात्रामुपजीवन्ति इति श्चुव्युक्त(१)रीस्या सवौनन्दसपष्टिभूतपरमानन्दमयत्वात् परत्रह्मत्मके। अत एव(२) परे विश्वोत्तीर्णे पर(३)मिवस्पन्दमयत्वाचक्रं नवमे सवि- तिषू्पा। ` स्वसीवित्रिषुरा देवी रौ दिस्यं तद्विपरोनम् ।
इत्ति अभियुक्त(धोवचनोक्तरीत्या वेदक्वेधयोरह- न्तेदन्तयोः समा पध्यस्था संवित्तिपहा्िपुरसुन्दरी पूर्वाक्त(५)- नि्रचना । महाकापकङारूपा भकाङाविमशे(द)सामरस्यपहा-
विन्दुजयहाथेकला महा()कापकला तद्रूपा । "बिन्दुं सङ्कल्प्य
वक्त्रे (८)च' इत्यादिचतुःचातीक्षास्लोक्तरीत्या निनच्छारूपरि न्दरियपीगनेद्रभ्येः परिस्फुरत्परमानुसन्धानलक्षणेन स्वैराचारेण सविदहवता भावनीयेरय्थः |
(१) शश्वुन्युक्तया' ख० ।
(२) "अत एवः नस्ति क०।
(३) '"पराश्चवानन्द्मय ० ख०।
(७) "अभियुक्तोक्त०* ख० ।
(५) पएवाक्तानिवेचना' क० ।
(६) धयाससमास्मयविऽ क०।
(७) 'सहाकामखा' नास्ति क०।
(८) ष्वक्घन्रे च' नास्ति क ०।
पूजा सङ्तनिदप गम् । २७९९
महाकामकटारूपा पीठ वे्यादिसिदिदा ॥ महामुद्रामयी देवी पूञ्या पञ्चदशात्मिका ॥ १६७ ॥ तत्तत्तिथिमयी(१)निल्या नवमी भेरव्री परा ॥
भा्धिपिद्धिमाह-पीटठविद्याति ।
कापूजाओं इति क्रमात् ` इति पृरबांक्ताः पद।श्वसारः । त्रिया ब।गभवकापराजशक्तितु(र)रीयकीजालत्मिकाः आदे द्ाञ्दादेवताः कामेरवयोच्याश्तस्तस्तेषां तरी (३)यातीतपद(*)- परकिबविश्रान्तिलक्षणां सिद्धि ददातीति प्रापयतीति पापतिः दधिः । महाश्ुदरामयी महासुरा सवेविद्ासमबष्टिभूतत्वाचोनिथद्रा तन्मयी `पृज्येत्यथः । पञ्चदक्तात्पिका पश्चदश्चाक्षयां विद्यायाः वाच्यभुता पश्चदश्नभूतगुणासिमिका ॥ १६४- १६७] तत्तत्तिथिसयीति ।
तत्ततिथिमया प्रतिपदादिपञ्चदशतिथिरूपा । नित्या निजसुखमयनिस्यनिरुपपाकारा । नवपी भेरवी परा मूरविधा तथा ख्याता । इति पूर्वोक्तरीत्या मूरविद्या(८५)रूपनवमचक्रे- इवरी विद्या षोडश्कलास्पिका मृख्देषी नवपरचक्रश्वरी पूञ्ये(द)त्यथंः ।
(१) “समस्पूञ्या परमेशानि ! तत्तत्तियिमयी पराः खं । (२) "तुये! ख०।
(३) "तुयाता०' ख० ।
(७) “पद्” नासति क०।
(५) "मूलविदयापुच्चाये नवमक्रेहवर विद्यया षोड! खऽ । (६) सम्पृल्येत्यथेः' ख० ।
२७६ सटीके थागि्नाहदये-
प्रतिचक्रं स (१)मृद्रास्तु चक्रसङ्केत(२)चोदिताः १६८॥
निलङ्किन्नादिकाश्चव काञ्यकमानुसारतः ॥
प्रतिचक्रमिति। पतिचक्र त्रेरोक्यमोदनादिषरेकस्पिन् चक्रे । चक्रसङ्केते चा(३)- दिताः योनि(*)घरुद्राः तनच्चक्रेषु प्या इति योज्यम् ॥१६८॥ नित्यच्र्ाति । कामेहवरीभगमाङिन्योरावरणान्तःपातित्वात्तयामध्ये बि- कोणाग्रवामकोाणयोः स्थितिरुक्ता । शिचः नित्यष्छिन्ना तथा नित्या भेरुण्डा वहविव्रासिनी । सहाविदयेऽवरी दूती त्वरिता इटघुन्दरी ॥ नित्या नीलपताक्ा च (बेजया सतव्रमङ्गखा । ल्वाखापाङनि चित्रा च- इति चतुःकातीश्ाल्ञोक्तास्लयादश्च निस्याञ्चिकोणे षा भ्रीचक्रपध्यत्निकोणे वा चतुरख्ान्तराछे वा षोडकश्षदखचतुरस्रा- न्तराले वा । काम्यकमानुसारतः बहयादिकाम्यकमीनुरूपवरण. ध्यानपुष्पादिभिः । सुधीस्तत्तर्काम्यकमे(५)विधानाविषयज्ञो
(१) "त॒ ख०।
(२) 'कोदिताः' क ।
(३) "सङ्केतको दि ताः क०।
(४) "यानिमुद्राः -इव्यत्र ध्यानिप्राचुर्थतः नेषा स्वरूक्कोभिका वुनारत्याद्रिना चक्रसङ्कत चक्र वाहताः सवन्नुद्धाः। सवक्छश्चोाभेण्या
इति ख० पु० पाठः ।
(५) (कमोौनुविधान०' ख० ।
॥.
~ न =
कै = ज भ 0 जक तिं
वृजासङ्कतनिशूपणम् । २७७
[®
चतरसरान्तराठे वा तिक्रोणे वा यजत सधीः ॥5६९॥ ¢ भ, €
अलिना पिशितिगन्धेधुपराराध्य देवताः ॥ चकरपूजां विधायैत्थ कुलदीपं निवेदयेत् ॥१७०॥
यजे(१)६् ॥१६९॥ चक्रपूजायुपसंहरन कदी पनिवेदनमाह-अखिनिति । अलिन हेतुना । पिरिते(र)मीतः । गन्धधूपराब्दाः स्पष्टाथाः । देवताः तै खोक्यमोहनादिवेन्दबान्तनवचक्रगताः। अङ्पिक्ञि- तगन्धधूपदापराराध्य पूबाक्तरात्या चक्रपूजां विधाय कुकदाप कुर षट्त्रिशत्तसवसधुद।यरूप शरारं तत्र भव(३.दाप । ततो हदयषपद्मान्तः स्फुरन्ती सांषि(४.द्ा,कलप् । इत्यभियुक्त (ध)वचनोक्तरीत्या हृदयान्तर्मा्मानं सं- विच्कङारूपे दी(द्)पं । इन्द्रियद्रारा बहिरथेषु तद्रवेण भा- सप्ा(०)न । अत एव स्वपकाश्नोञ्ञ्वलं तत्र प्रपाणनिरपेक्षप- तीतिकं निवांगराहितं तच्छरु(८)खदीषं॑ निवेदयेत् । पुनः परत्य- इुखतया तेनेव दारेण अन्तः स्वसंविद्वि्रान्तिः तन्निवेदनं नाप ।
(१) "यजेत् › नास्ति ख० ।
(२) "पिशितगन्ध० ख०।
(३) “भव' नास्ति ख० ।
(४) (सं विदम्' ख०।
(५) 'अभियुक्तो्त० ख० ।
(६) त-वेन्द्रियद्धारा' इति कऽपु०्पाडः | (७) भासमानः नास्ति ख० ।
(८) च' ख० ।
(नेः
२७८ खटदीक्र योगिनी हदये --
९ £, ५ र 9 (~ ० अन्तबाहं भासमान स्वरपरकाराञ्ञ्वर प्रिय !॥
3 9 £ [२ पष्पाज्ञाख ततः छरत्वा जप कयात्समाहितः ॥ १७१॥ कूटजये महादेवि ! कुण्डरछ्तितयेऽपि च ॥
सयमस्येन्द्रियसश्वारं प्रो चरेनादमान्तरम् । एष एव जपः प्रोक्तो न त॒ बाह्यजपोा जपः ॥ इति प्राख्ाणिकवचनोक्तरीत्या समाहि(*)तो नियतेन्द्रि यो नादरूपमन्बोचारणल(र्क्षण जपं कुर्याव । शिष्ट॒स्प- ~ शम् ॥१७०-२७१॥ जपप्रकारमाह- कस्ये इति । कूटत्रये कूटानां वाग्भवकामरानशक्तेवीज!ख्यार्नां त्रयं कुण्डखीतितयेऽपि च कुण्डरीनां चितये । आधार हृदयं बिन्दुस्थानं च परिकीतेतम् । इति स्वच्छन्दसङ्कदोक्तेषु(३) आधारहदयूपरध्येषु स्थितानां बीजत्यश्गिखर च(४)रवक्तिंकामक छान्तगेतप्तपराधं- करङद्पाणां बन्दिसरुयेसोपङ्कण्डारे(५ गनीनां तचरये चक्राणां पू- वेपुवार्णां(६) अकुले विषुसेज्न च इत्यात्रोक्ताऽङककादि दिन्द्रन्त- स्थानेषु नवसु भावितानां तेलोक्यमाहनादिनवचक्राणां एकै- (१) 'समाहितेन्द्रियो' ख ० । (२) 'छक्षण' नास्ति ख० । (३) "स्वच्छन्द खङ्कहोक्तशीत्या' क० । (४) 'चर' नास्ति ख० । (५) (कण्डलीना' ख० । (६) पूवेपूर्वषां' ल०।
` पूजा सङ्लनिखूपणम् । २७९
° ९ = ०५९९ ९ ०\ (~ चक्राणां पवेपवषां नादरूपण याज(१)ताम्॥ १७२
©\ ©\
कर्मिन् बीज(२)क्रुण्डङिन्यां च त्रिंरल्िंशो विभज्य योजिता- नां न।दंरूपेण यो(र)जितं त्रैकक्यमहनादि च(४)क्रज्नयस्या- धारस्थवा$ङण्ड(५)छी स्थितवाग्मविखरव तिंकामकलान्तगेत- हाधेक छारूपवाहिकुण्डङिन्युत्थानोदि तहु (६) दतकामराजबीजप- यैन्तव्यापिनादमयताभावनं वाग्मववीजजपः । सवसो माग्यदाय- कादि चक्रस्य हदयस्थसूयंपण्डलस्थितकापराजत्रिखरवत्तिका- पकलान्तगतहा्कलारूपनुङ्ण्डङिन्युरथानोदितविन्दुस्थानगत- दाक्तिवीजपर्यन्तव्यापिनादपयतामावनं कामराजजपः । सवः रोगहराद्िचक्र्नयस्य विन्दुमण्डला()न्तगेतशाक्तेवीजश्नि- खरवातिहा्षकलारूपसोपङ्कण्ड छिन्युत्थानो दितब्रह्मरन्धापरिस्थि- तद्धिवतस्वातीतसमनासीपपयेन्तव्यापिनादेन सहोन्पन्यां कयः भावनं शक्तिवीज(८ोजप इत्यथः । तदुक्तमभियुक्तैः- पिण्डो वा(९)चक विस्तरस्य महतः संस्क।रशेष(१०) स्थितिः नादोऽसो तव देवि ! पूर्धि समनासीमानयु्टह्यन् ।
(९) "योजनम् ` ख० ।
(२) "बीजे नाद्ति कऽ ।
(३) “योजनं ख० ।
(8) '(नवचक्रस्थादिज०' ख०।
(५) "मण्डर ख० ।
(६) हत्स्थ' ख०।
(७) "बिन्दुस्थानेन्दुमण्डलान्तः' ख० ।
(<) शक्तिबीजोश्चारः ख० ।
(९) वाकपद्ः ख० ।
(१०) सस्कारदोषा स्थितिः खऽ ।
२८० खदाके योगिनी दये-
तेषु प्राणाग्निमाघाणकलाबिन्टधचन्द्रिकाः८१) | राधिनीनादनादान्ताः शक्तिन्या(२)पिकलन्विताः १७३॥ समना चोन्मना चेति दाद्शान्ते स्थिता प्रिये! ॥
घण्टाक्ण इव क्रमेण विरपन्नन्त्यामणीयस्त(ड)पा- मा(डजिघ्न् परविदवामनुपमां मूरति पुराणी(५)घुपे !। इत्येवोक्तम् ॥ १७२॥ ननु- | दीपाकारोषेमालश्च लाट इ(६)त्तमिष्यते | इत्यादित्रिष्पपि बीजेषु उन्मनापयेन्तञुच्वारः किमिति नो- त्तः! प्राणादीनां उन्पन्यन्तानां द्द(भेशाश्चानां सर्वत्र सा धारण्यन ववतं शक्यत्वादिखत अ!ह-तषिकति । तेषु लिष्डपि बौजेषु प्राणो हकारः, अशः रेफः, मायार्णैः इकारः, स एव कखा। तदुक्तं कालकला विलासे बिन्दुरहङ्ारात्मा रविरेतन्पिथुनसमरस।कारः । कामः कपमीयतया कठा च दहनेन्दुविग्रह विन्द् ॥ इति । विन््रादयः उन्मन्यन्ताः पूर्बाक्तखक्षणाः । एते प्राणादयः
(१) ‹रक्तिव्यापिकयान्विताः' ख० | (२) (चन्दुकाः' ख० | (३) 'यस्तनी' खऽ । (8) राः ख०। (५) पुराणीं मम' ख०। १ (६) त्त हृष्यतः क ० । (9) द्रादश्च्व्याधेक क०.।
चूजा स्त निरूपणम् । ८१
कुण्डखिनीरूपे मध्यमे च ततः पुनः ॥१७४॥ रख युन्मुख च वश्चस्य स्थातरूप महश्चर् | ॥
1
केवरं नादरूपेण उत्तरोत्तरथाजित८१)म् ॥ १७१५॥
५८६
उन्मन्यताः द्वा(२)दशशान्ते स्थिताः । मूख्ङकण्डलिनीरूपे बा- गभववबाजे । ˆ , या मात्रा त्रपु(३)सीखता ततुखुषत्तन्तुस्थिपिस्पधिनौ वाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां पन्महे ते बयम् । शक्तिः कुण्डलिनी ति विग्वेजननव्यापारबद्धोद्यमां ज्ञास (४)त्थं न पुनः स्पृशन्ति जननीगरेऽभकत्वं नराः ॥ इति छघ्श्ता जोक्तरीया विश्वस्य रखषन्मुख पथ्यम का- मराजबीजे विहवस्य स्थितिरूपे सहारख्षएटयापध्यास्यतत्वात् के-
बरु नादरूपण चादब्युन्मन्यन्ताकव्रयव्ज्चस्विजनदमत्ररूपणा
तरोत्तरयो(५)जिते उच्वारक्रियाविशेषणं बारमवबीज(दःश्ि-
खरवात्तन नाद् हृद्तकापराजवजपयन्तञुस्चरत् । कापरान तिखरवातनं नादं बिन्दुस्थानगतशक्तिवीजपयंन्तपुचरोदेययः । शबर कारक पतद्वौजद्रयन।दद्रययोगान्मिश्ररूपे तृतीये श्-
(१) 'योजनम्' ख० । (२) (दादश क० । (३) ्रपुश्ीिता' ख । (७) एष पाद्: ख० पुस्तके नास्ति! (५) धयोजन' ख० । (६) 'बीज' नास्ति क०। ३६
२८२ सटीक योगिनीहदये-
` शावलाकारके देवि । ततीये हादश्ी कडा ॥
दान्यषद्कं तथा (१)देवरि! द्यव्रस्थापञ्चकं पुनः॥ १७६॥
विषु(२)बं सप्तरूपं च मात्रयन् मनसा जपेत् ॥
क्तिवीज द्वादशी कलो(र)न्पना स्थितेखनुषङ्ः । तेन प्राणा- द्यो द्वादश्कङा अपि तृतीयबीजशिखरे स्थिता उचचा्या(४) इति भ्यते । कोऽथः ? यथपि [ वागभ(५)वकरापमराजशक्ते- ज्रयाणां अप्यन्ते प्राणाञ्निपायाविन्दरधेचन््ररोधिनादनादा- नतशक्तेव्यापिकाः समनान्पनाख्या दरद कला वक्तु शक्यन्ते ।] वाग्भवकापराजव।जयांः (द) खषएटस्थितरूपलान्न विशवाती तान्म नापयेन्तसुच्चारः । अतो न विरोध इत्यथः
जपकाठे भाग्या(जोनाह--द्यन्यवदट्क मिति । एतानि विद्यावयवेषु भाव्यानि । दिखिषिच्छ(८)चित्रह्पेपण्डरेः शुन्यपञ्चक(९)म् । `
(१) ुरेशानि !' ख०।
(२) "विषुवत्" ख०।
(३) करोन्मनी' ख० ।
(४) 'उच्चायी' इति नास्ति ख० । (५) कं लान्त्गतं नास्ति ख०। (&) श्राणाद्य उन्मन्यन्तास्तथाऽपि तयोः" श्व्यधिकं खं०। (७) “भावनामाह ख०।. (८) "पश्च खऽ ।
(९) "वटुककम् खर ।
ता न हा 7 क । 1 रै ॥ 1 का
त्र
पूजासङ्तनिरूपणन् । २८३
अश्न्यादिदाद(श)शान्तेषु श्रीखीन् व्यक्त्वा(र)बरानने॥ १७७ ृन्यत्रयं विजानीयादेकेका(३)न्तरतः प्रिये ! ॥
ध्यायतोऽनुत्तरे शू(्ोन्ये रूपं (५) उपोमततुभवेत ॥
इति विज्ञान मैरवभष्टारकोक्तरीत्या शुन्यषटकस्य रूपं ज्ञेयम् । अवस्थापश्चकं जाग्ररस्वप्नघुषुपितुयोतीतास्पकम् । एषां ज।ग्रदादीनां स्वरूपं व्यति [विषु(द)बं सत्यल्पं च वक्ष्यति ||
शुन्यादी(अनां स्थानानि स्वरूपागे च क्रमेणाह- अग्न्यादीति। .
एके(८)कश्च द्रयोयोरन्तर इत्यर्थः । अग्न्यादि अशि रेफः तदादीन् (रर्त्रान् चीन षट् स्यक्त्वा शुन्यत्रयं षट् शून्या नि विजानीयात् । कोऽथः ? हकारमायाक्षरयोमध्ये रफः(१०) । पायार्धचन्द्रयोर्भध्ये बिन्दुः(११)। अषचन्द्रनादयोमेध्ये योधि(१२)-
(९) ्ादशांरोषु'ख०।
(२) (त्यक्ता'ख०।
(३) "एकेकान्तरतं" क ० ।
(8) शुन्यः ख० ।
(५) "पर ख० ।
(६) कसान्तगेतं नास्ति ख ॥ (७) श्ुल्यानां' ख० । | (<) "एकश्च पकश्चः ख० | (र) श्रीद्मीन् षट्' खऽ ।
(१०) "रेफ' ख० ।
(११) "बिन्दु सख्० ।
(१२) 'रोधिर्नी' ख०।
नि
@ = त ८ ण (-
२८४ खटीक्रै योानेनीद्दये--
प्रबोधकरणस्याऽथ (१जागरत्वेन भावनम् ॥१७९८॥ वन्हो देवि ! मह्ाजाग्रदवस्था तिन्द्रियदयेः |
नी । नादश्षकत्योमेध्ये नादा(रोन्तः । शक्ते्तमनयोमेध्यरे व्या- पि(३)का। समनोर्ध्वं चोन्म(४ोना इति षट् व्यक्लवा । तत्र रेफ- बिन्दुराोधिनी(५)नादान्तव्यापिकास्थानेषु पञ्चसु 'क्िखिपक्ष- चितरूपैः' शत्यादिपूर्वोक्तरीत्या वारई्बहफगतचन्द्र$(१)षट- शरूपाणि पश्चशुन्यानि भावनीया(ज)नीत्यथैः । षष्टोन्म- ना(८ोयाः स्थाने [ पश्च(९)व्पोमततुभेवेत् इति विज्ञान भरव भट्ारकोक्तरीत्यैव व्योमतनुशुन्यं जेयमिरयन्यश्च विेषः। शुन्यत्रयात्परे स्थाने ] । महाशनं निरा(९०)कारं भावये- दि(११त्यथेः |
इदानीमवस्थापञ्चकभावनां कपेण विवक्षन्नादौ (१ रोजाग- रिवावस्थाभावनामाद-प्रबोधेति ।
(१) (करणस्याथजाग० ख० । (२) नादान्तः ख०।
(३) %्यापिकां ख० \
(४) “उन्मनां' ख० ।
(५) (नाद् इत्यधिक क० ।
(द) (चन्द का' क० ।
(७) “भाव्या० ख ० ।
(८) "वष्ठोन्मनास्थाने तु' ख० । (९) कंलान्तगेतं क° पुस्तके नास्ति । (१०) "निराकारं" नास्ति ख०। (११) विभावयेदिति' ख० । (१२) "वक्ष्यति अ{° क०।
वुजासङ्कतानिशूपणम् । ` २८५ `
क ९ ४५९ आन्तरः करणरेव सप्नमा(१)धावबोधकः ॥१७९॥। गलदेशे, सुषृ(र>किस्तु रीनपूतेस्य वेदनम् ॥ अन्तःकरणन्त्तीनां खयतो. विषयस्य तु ॥ १८ °॥
इद्दियद्रयैः ज्ञानकर्पन्दिय(हेदयेः दशेन्ियेः। जाग्र व्यवहारो नागरणं प्रबोधो जागर इत्युच्यत, तत्करणस्य प्रकाशस्य जागरत्वेन भावनम् । अतः भकाश्च(य.वाचक बह तातींयबीजशिख(&)रवतिनि रफ. पदाजग्रदवस्था सवः काङिकानिद्राक्षयलक्षणा परमरवोधदक्षा भावनीयेत्यथः। स्दप्नभावनापाह-आन्तरेरिति । | वाचे न्दरिय(७)रहितैरान्तरेः करणेभनोबुद्यदहड्ारावेत्ता- ख्यैरेव व्यवहारः प्रमात्रस्वप्नः समायया तातीय(<८)वीजस्थेन चतु्स्वरेण अवगतवोधनस्तद्राच्य इत्यथः । गरूदेश्े खप्न- स्य(९)स्थानप् । सुषु्िभावनामाह-खुषुिस्त्वात । वप्ने विधानानां अन्तःकरणदत्तानां कयतः स्वेन्द्र
॥ न ४५३ „9 (१) “स्वप्नो मायाबबोधनः' ख० । (२) शषुघुपे तु' क०।
८ 4 9,
(३) ्ञानकमेन्द्रियेदेराधिः ख०। (४) श््रमातुव्येवहारो' ख० ।
(५) श्रकादाके' ख० ।
(६) 'शिखर' नास्ति खऽ ।
(७) विरते" ख ०9 ।
(८) (तातींयस्थानच ० ख०। (९) (स्वप्नस्थानम् ख०।
२८३ खरीक योगिनीहदये-
पवाणाना व्रिखामन श्चमध्य वबन्दुसास्थता ॥ त॒यरूपं तथा(१) चाऽत्र वृत्तधदेस्त॒ सङ्ग्रहः।। १८ १॥. चतन्यव्य्छहंतास्तु नादरूपस्य बेद्नस् ॥
योपरतिः सुवुर्षिः इति लक्षणम् 1 अतो हि (रोर्छनपूवेस्य देदाक्षा(र)दिषु क्रडीटरतस्य खीनस्येव(४) स्त्रात्पनो वेदनं भ काशन भवति । “घुखमहपस्वाप्घम्' इति पथात्सुखमय स्वाम- रूप पराप्यते सय (ोष्ुषुधिः । ववेषयस्य तु विषय तात।य वाज विह्वन्यापिस्थानत्वात् । तस्य पृवोणोनां विन्दुपूबेस्थ- तानां वणानां विकामेन नाशेन । मायावीजं महेशानि मादनं शक्रसंयुतम् | इन्द्रबीजं केवलं तु, इत्यादि- सहार क्रमयोगेन श्क्तिवीज सयुद्धरेत् । इत्यन्तेन चतुः(द्)हातीशास्े सहारक्रमोद्धतारनां शक्तिवी- जवणानां वलापक्रमेण परिपाय्या भूमध्ये बिन्दुसंस्थिता भ्रूमध्य. स्थानर्थितहद्धेखोष्वेबिन्दो स्थिता भावनीयेत्यथंः । तुरायभावनापाह-तुयरूपयिति । चैतन्यस्य संविदः व्यक्तेः परामकेस्य हेतोः । नाद द्यस्य पुवाक्तक्षणनाद रूपस्य । वेदनमभिच्यक्तिः तुरीयष्ूपं । तस्य तुरी-
(९) "तस्य खर० ।
(२) "दहि' इत्यधिकं ख० ।
(३) "देदादिषु' ल०।
(४) 'कीनस्थितस्यात्मनो' ख ° । (५) श्लियं सुषु्िः' नास्ति ख०।
(६) 'चतुःश्तीशास्रोकयत्या' ख ० ।
वूजाखङ्कतनिशूपणन् । २८७
तुयात।त सुखस्थानं नादान्तादिस्थितं प्रिये ! ॥१८१॥ अर््रैत्र जपकार् तु पञ्चावस्थाः स्मरेदवुधः॥
यरूपस्य। अत्र(१) तारतीय्बीजे दत्ताधोदेः उत्तारं अधेचन्द्र आदि(र)शब्देन रोधिनीनादो(३)गरह्ेते तेषां सद्ग्रहः । तातीय- वीजशिखरवयधचन्द्ररोधितनीनोदषु खात्पचैतन्पाभिन्याक्तिकारण- नाद(४)कनात्पकं तुरीयं तुर्य भावनीयमिबधः । तयोतीतभावनामाह-तुयोतीतभिति ।
तुरीयातीतं ।
यतो षाचो निवसन्ते अप्राप्य मनप्ता सहः ।
आनन्दं ब्रह्मणा विद्रान्" ।
हत्य पनिषदुक्तरी (५)त्या म(६)नावागतीतपर (७) पानन्द् स्वरूपम् । छखस्थानं नादनन्तादिस्थित विरा(८)पसुख स्थाने स्थितं नादान्तशाक्तेव्यापिकासपनोन्पनाघ्ु स्थितं तुरी- यातीतं भावनीयपिययेः। अत्रैव शक्तिषीज एव पञ्चावस्था जागरिताधाः पूर्वोक्ता जपकाके स्परेद् बुधः । पश्चा्रस्था-
(१) अश्रः नास्ति क०। (२) (चब्दात् ख०। (३) "ण्रह्यतेः ख° (७) 'कणन्नादात्मकतुरीयरूप' क०। (५) क्रमेण ख० । (६) 'मनो' नास्ति ख० । (७) (परानन्द ° ख । (<) विरोमसचुखलस्थाने स्थितं नास्ति ख । \
०८८ खदीक्ते यााशेनीद्दये--
योगः प्राण।व्ममनसां त्रिषु प्राणसौक्ञे(१)तम् ॥१८२॥ आ{धारोस्थितनादे तु दीनं वु्या(२)त्मरूपकम् ॥ संयोगेन वियोगेन भन्ताणानां महश्वरि ! ॥१८ ३॥
लुसन्धानपुरःखर वषिद्याजपकारणावस्था(३)निपुणः । इदान सप्तविषुवमावनां विवक्ष(*ोनादो प्राणविषुव्रभा- वनापाह--योग इति । पाणस्य हका(५)रारमनो बाय्वा(है)त्मनो यण्टुषनसश सं योगः भ्राणविचुवमिस्युच्यते । तदुक्तं ेव(ऊ)तन्न्रे- ज्िष्यात्मघाणषनसां संयो(<ोगे पराणकं विदुः । इति । ॥ १७५३-८ २ ॥ | मन्नविषुवभावनापाह- आधारो स्थितेति । आधारान्मुखाधाराहुत्थितेन वायुना खम्मुते[९|नदेवै धा(२०)रिखरबतिन्यासरूपकमात्मनो यद्रूपं संविदारमक्रं आ-
(९) ¶्राणसंज्ञकम् ` ख ।
(२) शुद्ध ख० ।
(३) जपकरणावधाननि०' ख ० ।
(४) 'वक्ष्यन्नादौ क०
(५) ककारात्मनो' ख० ॥-
(६) "वायोः आत्मनो ख० ।
(७) ‹स्वैरतन्न्नेः ख० ।
(<) 'संयोगः' क० ।
(९) "सम्भूते" नाति क ।
(१०) "विद्ाज्चेखर'-इत्यारभ्य "विद्यामन्जाणनां' इत्यन्तस्य व्रन्थस्य स्थाने "विन्दादिषु वर्तिन्यात्मनो यष्टुं रूप खंविदार्धक्ं डीन नदेनैकरखीभूचं बुद्धा मन्बार्णानां' इति ख० पुस्तके पाठः ।
पजासङ्कतनिरूपणम् । २८९
अनाहताचयाधारान्तं नादात्मत्वविचिन्तनम् ॥ नादसस्पश्चनात्तस्य नाडावंषवमुच्यतं ॥१८४ ॥
नन्दैकरसीभूतं विचामन्त्राणोनां बाऽ्मवकामराजशक्तिबीजानां
वियोगेन ध्या()नदूपेण संयोगेन सप(र)षटिरूपण तरा
य(२.बाजेन अनाहताधाधारान्त अनाहत हृदयस्थान अधा राणां सप्रषां अन्तस्थानं ब्रह्मरन्धं८४)अन्तशब्देनोचरितं अनाहताद्याधारान्तान्तमिति यावत् । नादात्पखावेाचन्तन ना- दस्य यष्टुरूपत्वविभावन विषुव मन्त्रसक्ति(५.)तामति शषः । कोऽथः ! मूङाधारस्थितवारग्भवङ्खरवातन नाद् हृद्यपय- न्तद्ठचायं तत्न स्वयं रीना भूल स्वातमनस्तन१(द)यतानुसन्धान
मन्त्राविषुत्रपित्यथेः । तदुक्तं रावतन्ते--
आस्मना नादमध्ये तु खयं सच्चायं(७) त्वतः
अकारो(८)कारवबणादसयागन विसागतः ॥
हृद यादि (९)बिखान्तं च विषुवं मन्बसंज्ञकम् । $ति । नादीविषुवभावनापाह- नादसस्पशे ति ।
(१) "उ्यासरूपेण'ख० ।
(२) 'समष्िरूपेण'नास्ति ख० ।
(३) (तुयेबीजेन च' ख० ।
(४) (तत्पयैन्तं । अचान्तश्चन्द्ः तन्नेणोच्चारेतः'ख०ऽ ।
(५) 'सज्ञामिति' खऽ |
(६) 'स्वात्ममयस्त°' क० ।
(७) सञ्चित्य पञ्चमः" ख० ।
(<) 'अकाराकार्वणोदि०' ख० ।
(९) हृदयादि दिनान्तान्त' "हह यादी रिनिान्तान्त' इति ख पुस्तके पठ ।
३७
[क १
2९८ सर्दीके योगिनीहदये-
दादशग्रस्थिमेदेन वणानामन्तरे भिये! ॥ नादयोगः भ्ररान्त(१) तु प्रशान्तेन्द्रयगोचरम्॥। १८५॥ वह्विं माया (र)कलां चेव चेतनामर्धचन्द्रकम् ॥ `
वणोद् वीजत्रयश्ञिखरवतिंनो() नादस्य कामक्रलाक्षरात् दादशषग्रन्थिभेदेन मूखादिषट् चक्रद्रादक्ग्रन्थीन् भिस्वा तेन ना- ङ्यन्तरे पघुषुभ्नापध्यपार्गे(४) नादसंस्पश्लांवं बिवीजक्तिखरव- - ्तिनो नादस्य पूकादि(५) ब्रह्मरन्धान्तमुचारतः संस्पश्नानाडी विषुवभरुच्यते । तदुक्तं तो वतन्चे - मूक (६)पन्त्रतरिशुकेन भिचा ग्रन्थीननुक्रभात् । नादनाडीप्तपायोगान्नाडीविषुव भावनम् ॥ इति । परन्लान्तविषुवभावनामाह-नादयोग इति । वहि रेफं मायामीकारं (७)कलां तन्पध्यवर्तिसपराधेक- खां(८) रेखारूपां चतनां(९) बिन्दुचैतन्यस्य संस्कारः वेद- नरूपत्वात् । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम- बिन्दुवेधस्य संस्कारो विमरशेः(१०) सगं इत्यहम् । इति । (१) '्रह्ान्तस्तत्प्र०' ख० । (२) "मायां च कारु च' ख०। (३) !श्िखरव तिंकामकल्ा०' ख० । (ॐ) भमार्भेण' ख ० । (५) “मुखात्. त्र° ख० । (६) स्थुः ख ० । (७) 'काल' ख० । (<) कलासम्बन्धिरेखारूप' ख । (९) भचेतनाबिन्दुः बेद्यस्य' ख० । (१०) "विस्र्भश्च (स्य) महत्यसौ' ख०।
वूजासङ्कत निरूपणम् । ^ २९
रोधिनीन।दनादान्तान् शक्तो दीनान् त्रिभावयेत् १८ ६॥ विषुवं शक्तिसक्तं तु तदुध्वं नादचिन्तनम् ॥
अधं चन्द्ररोधिनीनादनादा(र)न्तांश्व पूर्वाक्तलक्षगार्यां(२) शक्तो(३) टी नान् विभावयेत् । यतोऽयं नादा(ढ) शष्ट्स्त दतावक्षक्तर्यलक्षणः। अतः प्रक्चन्तान्द्रयगाचर सकखान्द्रय- दीतघिषये तत्यशान्ते विषुवमिस्यनुषङ्गः । तदुक्तं हेवतन्बे- अकाशरोकारवर्णो च पका(५)रां चिन्दुर्र च। नादनादान्त(&) सज्ञे तु स्यक्त्वा ब्रह्मादिभिः क्रमात् ॥ सप्तमे श्षक्तिमध्ये तु शिष्यात्ानं विचिन्तयत् । परशान्तं तद्विजानीयात् परशान्तेद्ियगाचरम् ॥ इति । ॥१८३-१८६॥ 1 दाक्तिकाटवरिषु(७)वभावनामाह-विषुर्बासिति । द्ध्म शक्तेरू(८रध्व समरनान्तं नादस्य विचिन्तन शक्ति- विषुवे तदूर्ध्वं सपनाया अप्यूष्वे। नाऽत्र काङकलाभावम्' इति खच्छन्दसङ्होत्तरत्या काराततिान्मनान्तं नादस्य
(१) (नादान्ताः' ख० |`
(२) “लक्षणाः ख० ।
(३) “दाक्तो खीनान् विभावयेत्' इति नास्ति ख०। (७) भ्रान्तो नाद् योगो खे०।
(५) मकारं बिन्दुमेव च' ख ।
(६) “शक्ती च' चऽ ।
(७) 'विषुवयोभा०' क ।
(<) (दाक्तेरूध्व' नास्ति ० ।
| | | |
[ ओ
२९२ स्टीकं योगिनीहद्ये-
. ध्य वेषवमन्मनान्त > ि
तदुध्व काावषुवमुन्मनान्त क ।॥ १८७ ॥ [ (ष् [क ८ €, छ
भानचन्द्राऽछद् शाभस्नुटामनाद्वद्नम् ॥
तिचिन्तनं कालविषुतरम् । तदु(१)क्तं वैवतन्तरे- श्षक्तेमध्यगतो नादः स्षपानान्त भ्रसपेति । तच्छक्तिवेषुव प्रोक्तयुन्पन्यां कारुसज्ञितप ॥ इति ॥९८७॥ नु कियता काडेन नादस्तत्वं वेदयतीत्याह-स्युनीति । _ स्वस्थे नरं सुखासीने यावत् स्पन्दति खोचनप् । तस्य निंश्त्तमां भागस्तत्परः परिकीर्तितः ॥ तत्परस्य प्र्ान्त(र)स्तु उटिरित्यभिधीयते। इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या निमेषस्य त्रिसहख्चतमो भाग- स्॒टि । मुनयः सप्त, चन्द्रः एकः, अष्ट, दश, संख्ये भसिद्धे । तेन हकाराद्युन्पन्यन्तानां विद्यावयवानां सप्रदकश्ाधिकाष्टो(३)त्तरद- रसहस्न्चटिमिरूचारे "अङ्कुरे विषुसज्े चः इत्युक्तरीत्या छते सति नादस्वान्ते त्वस्य वेदनपित्यथेः । तत्वाविषुवमावनमाह-चेतन्येति । अनन्तरो(ष)क्तरीस्या चैतन्यस्य शवारमतन्वस्य व्यक्तेः प- कक्ष्य हेतुस्तचवावेषुवपर् । कांऽथेः { उन्मनाध्व अनन्तराक्त- सख्यावतुरिभिनांदख्यात् खवात्मानु सन्धानं त्वविषुव मित्य - येः । तदुक्तं रैवतन्ते-
(१) "तदुक्तं" नास्ति क०।
(२) श्रातांरास्तु" ख० ।
(३) “सप्तद शाधिका्टशवोत्तर ० ख० । (४) 'अनन्तयक्तरीत्याः नास्ति खऽ ।
मिरी
पूजा सङ्कतनिषूपणम् । ` २९३
चेतन्यव्यक्तिहेतुश्च विषुवं तस्रसंन्ञि(१)तम् ॥१८८॥ परं स्थानं महादेवि! निसगानन्दसुन्दरम् ॥ ` एवं चिन्तयमानस्य जप(र)कारेषु पावति ! ॥१८९॥
स्वाधिकारे परे धानि विषुवं तर्वसंज्ञकम् । इति ॥१८८॥ परं स्थानािति। | परं शन्यषटूकावस्थापञख कसप्रविषुवकोखाहकार्तातं स्थानं विश्वविभ्नान्तिभूमित्वात् सवविषयानन्दसमष्टिभूतः परमान न्दो निसगानन्दः । अत पएवाऽ्नित्याऽद्युचिङ्क(३)रदु भगभदमभ- दे (४) पापश्चकपरिपन्थी पराकारणपरलाव परमानन्दल- प्षणपरमतरेमास्पदपरसु(५)न्दरपरमशिवरूपं निसगानन्द- सुन्दरम् । | पूर्वोक्त भावनायाः फरमाह-रवमिति । एव पूर्वाक्तपरकारेण जपका(द)ले तु 'आज्ञान्तं सकट प्राक्तम्ण इत्यादिपृर्बाक्तरीत्या। सकलसक कनिष्करकेवल- निष्कलरूपान्नेतिधास्तेषां कालाः दीपाकारोधपाजश्च इर्यादेना पृवाक्तविद्यावयवानां उचारणकाङास्तेषु । शुन्य- षदकादेकं चिन्तयमानस्य सकलाः सिद्धयः अणिपाचाः पूरवो
ष स 0 : । -
(१) (लनज्ञकम्' ख० । (२) “जपकाले घु" क०। (३) 'ङश' नास्ति ख०। (४) “मेद् प्रपञ्चपेरि० खऽ। (५) खन्दरपरमः इति नास्ति ख०। (६) जपक्रारेषु जपः" ख७ 1
। # १ ॥ 0
२९ खटीके योगिनीहदये-
` सिद्धयः तकलस्तुणं सिदथन्ति त्वसपसादतः ॥ एवै कृत्वा जपं देव्या वामहस्ते निवेदयेत् ॥१९२९०॥ अनामाङ्गुष्ठयोगेन तपेयेच्चक्रदेवताः ॥
क्ताः त्वत्मसादा(१)दाब् सिद्वन्ति। भ्रकाक्नार्मना मप विपचे
वाक्तां त्वयि भस्नायाम् । | तत्र तचराक्षमार्भेण चेतन्य व्यज्यते प्रभोः | इति विज्ञान भैरव मद्रारकोक्तरस्या स्वभरययमय(र२)ता-
-अुपगतायां तव प्रसादाद् स्वायत्ता भवन्तीत्यथेः ।
एवमिति । , एवसुक्तभावनापुरःसरं जपयुक्तलक्षणं कृतवा भकाशवि- कशेसामरस्यरूपायाः वापदप्ते विन्वकवखीकारपरे विमदमये नवद् यत्॥ ९८९-१९०॥ पूनाविधिमुक्का तपणव्रैधिमाह--अनामाङ्गछोति।
अनामा दक्तिः अङ्गुष्ठः शिवस्तयोयोगिन मेरनेन शिव्रश्ष-
कमलनवुद्रयत्यथः । चक्रदवताश्चतुरस्रादवबन्दवान्तनवचक्रान-
वा्िनाः भरकज्चिवपद्चकषपर सायूताः तपय(३)देत्यथेः प्रदा(४.नस्तपणेः सम्यग्िशुद्धुरप्रतात्पाभेः 1 महाहन्ता करामीडई विष्वं ईइ(“)व्यचुर्ःसरम् ॥
(१) (त्वत्प्रलादतः' ख० ।
(२) (मध्यमताञ्ुपगतायाः क । (३) (तपेयदित्यथैः' नास्ति ख०। (2) नेद्ानै' ख ० ।
(५) “हव्यवपुद्धरम्' ख० ।
जक |
मकान १ रा णर
वूजासङ्कुतनिषूपणच् ! २९९
भयं मांसं तथा मलस्य देव्या()स्तु व्रिनिवेदयेव ॥१९१॥ कोरचा(२)रसमायुक्तेवीरिस्तु सह वृजयेत् ॥
इत्यभियुक्तवचनाक्तर्यत्या परस्मिन् ङये(३) भावये- दित्यथेः । ५ 4. | ¢ घ॒ नि कि क तपंणप्ाधनानि वस्तून्याह् --बद्यमिति । शिवश्चक्तिेपेखनयुद्रयाः समस्तपदस्य मांसस्य मत्स्य(र)श्य च निवेदनमेव तपेणमितिभावः ॥ १९१ ॥
समय(५)स्येरेव सह पृजयेदित्याह-कौ लाच।रेति । ुखयुक्तलक्षणं हेय(दे)तया ज्ञेयं ये) पंते कालाः
दृ क्षिणादिस्लोतःस दीक्षितास्तेषां अ।चारः । | गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च पूजा श्रद्धा क्षमा ध्रतिः। त्यादिस्वच्छन्दसङ्कहादिक्ा(८)ष्रषु विहितास्तदयु- ¦ । - अहमि प्ररयं इवेनिदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्के स्वमावमरिवापहम् ॥
र कतर्वारं
(९) देव्ये तुः ख०।
(२) "कोलिकाचार संयुक्ते" ख० । (३) छय' ख ० । |
(£) मीनस्य क० ।
(५) समयस्थेनैव' ख० ।
(६) (तथाः खऽ ।
(७) येस्ते कौलिकाः" ख०। (८) “शासे ख०।
३९६ सर्दी हदथ-
पुष्पमेन तु(१)बारे च सोरे च परमेरवरि ! ॥१९.२॥ गरोर्दिने स्वनक्षत्रे चतुर्दैदय्ट्मीषु च ॥
| [क
ति परापश्चाश्कोक्तरीत्या मेदप्रतीतिसाध८रोनस्य
लि =
इदन्तारिपोरहमि सम(३)राङ्गणे प(४)ङयप्रतिपादनपराः बराः
तैः सह पूजयेत् ।
तन्त्राचारपरिभरषटः पपश्चव्रतशालिमिः । पशुभिः क्षद्रकमेस्थेन र्याद् उपमे (५)नम् ॥ ` इयादिष्रचनसिद्धेः सह न पूजयेदित्यथः । ननु कस्मिन्न्षतरे कस्मिन् वारे कस्मिन् वा दिने पूजा(६) कार्येत्यत आह-पुष्पभेनेति । नित्यं सम्पूजयेदेर्वी साप्षनां साद्रातिं क्रपात् । इति स्वच्छन्द्(ऽ)सखङ्हादेशाञ्चषु यद्य(८)पि भति- दिने पूजा विदिता तथाऽपि पुष्प(९)भन पुष्यनक्षत्रेण सह सोरे वारे गुरो(१०)ष्द् यन्याप्त्यो दिने स्वनक्षत्रे च चतुद्य-
^
(१) भनित्यं पुष्पदिने वारे" ख० । (२) सारस्य ख०।
(३) रणाङ्गणे ख० ।
(8) प्रखयप्रातिपादनपरेः' ख० । (५) “भोजनम् ख०।
(६) "पूज्यं" क० ।
(७) "स्वच्छन्द" नारित क । (८) यद्यपि नास्ति ख०।
(२) "वुष्यरदिने' ख० ।
(१०) 'गुरूदय ° ख० ।
वूजासङ्कतनिषरूपणध् । ३९७ चक्रप्जां विशेषेण योगिनीनां समाचरत् ॥ १९३ ॥ चतुःषषि(१)युताः कोव्यो योगिनीनां महौजसाम् ॥
(|
चक्रमेतत् समाश्रित्य संस्थिता वीरवन्दिते! ॥ १२४॥
एमीषु तिथिषु च(२) चक्रपूजां चतुरख्लादिवन्दवान्तचक्रगता- नां देवतानां पां विशेषेण समाचरेत् । नित्यपूजा(रे)वन्न भ- वति, किन्तु नेमित्तिकतया । अष्टा्टकादि(ड)योगिनीगणपरी- गनपुरःसरं पूनये दित्यः ॥ १९२-९९३ ॥
नसु(५) चक्रे अष्टाषटकपूजनं क्थ सङ्खच्छते इति शशङ्ष्ु- पलुदनः विशेषपूनामेव विदणाति-चलुषष्टीलि ।
त्रलाक्यमाहनचक्रनिवासिनीनां बराहृम्यादीनां अक्नमुताः अ- ्षोभ्याध्ाः चतुःषष्टियोगिन्यः तासां प्रस्येकमंशमूतानां (दको- टिसङ्ख्याकानां पहौनसां प्रहाभरभावक्षालिनीनां योगिनीना- युक्त लक्षणानां मिकि(७)त्वा चतुःषष्ठिकोव्यो यतधक्रमतत् समा- प्नित्य संस्थिताः । पध्ये (८) भूगरहस्ततः पध्यभूगरृहोदितचतुःषष्ट योगिनीनां सपष्टिभूतानां अक्नोभ्यादीनां। अष्टा(९)एक अष्टका
(१) 'चतुःषषठियेतः' ख ० । (२) "च' नास्ति ख०। (३) ननिव्यपूजा तु भवतिः ख । (७) 'भछाष्टकादियोगिनीनाम्' ख०। (५) "नज श्यारभ्य 'चतुःषष्टीति' इत्यन्तं नाहि क्ञ०। (६) 'कोटिकोरिसं° ख०। (७) इत्युक्तत्वात्" ख० । (<) 'मध्यमभूगरहान्तश्चतुःषष्टिकोरियोगिनीसमष्टिभूतानां ल० । (९) 'अष्टाएटक' नास्ति ख०। ३८
२९८ खटीके योगिनीहदये-~
अष्टाष्टकं तु कतेन्यं वित्ताठ्यत्रिवाजितम् ॥ त्वमेव तासां शख्पेण क्रीडसे व्िरवमोहिनी ॥ १२९ ॥ अन्ञाला तु कुलाचारमयष्टा गुर्पादुकाम् ॥
नामष्टकं । वित्तक्षाल्यविवभितं स्वस्ववित्त(१)वञ्चनाहीन यथा भवति तथा कतेग्यम्रू । अन्(२)छृतिर्नाम पूजनक्रियायोगो-
` ऽभितरेतः ।
नज्ु तासां पूजने किमायातं ममेत्यत आह-स्वमेयेति । प्रकारारमनो विश्वबोधकस्य (३)पर्मांशभूता विपक्षरूपिणी। त्वेमव बेन्द्षचक्रगता वित््वमोहिनी स्सारि्योपपादनकारिणीं तासां ब्रादूस्थादोनां जक्षोभ्यादीनां च रूपेण क्रीडसे । पका सती भगवती परमा्थतोऽपि ` सन्दश्यसे बहुविधा नतु नर्तकीव । इत्याथेयुक्तोक्तरीर्या तत्तद्रपेण परिणपसे । अतस्तत्स- टशभूतयांगिनीयजनेनं समेव प्रीणासीत्यथेः ॥ १९४-१९५ ॥ नतु व्युत्पत्तिब(*)कछेन वा आगपायंपवगम्य तत्तत्तन््रा(५)
न्तर षुजनादबदषु प्राततः स्यात् क ग॒ुखूपदश्चनत्याशङ्क्याह्- अज्ञात्वात।
(१) "विभकव' ख७ ।
(२) भन्न कृतिनोम' नास्ति ख9।
(२) "म्न नास्ति ख०।
(७) "वादेव" ख० । - (५) "तत्तत्तन्बान्तरेघु' ख० ।
पूजाखङ्त निषूवणन् । २९९
योऽस्मिन् शाखे प्रवतत तं खं पीड(१)यसि धवम ॥१९२६॥ एव ज्ञात्वा वरारोह ! कोलाचारपरः सदा ॥
स्वभ्रकाशरिवमूरतिरेकिका ॥ तद्विपक्षततुरेकिका तयोः । सापरस्यवपुरिष्यते परा | पादुका परशिबार्मनो य॒रोः ॥ इत्यस्मद्गुरूक्तरीया (र)गुरोः । | अविदित्वा कुखाचारं कुङं कांलिकदशेनम् ।
तत्राधारः (३)स्वच्छन्द् सङ्ग्रडादृरासख्े विहितः । तं गुरुमुखाद विज्ञाय याञस्पन् शाकल प्रवतत । अ।स्पन् शाकले षूबा- क्तपरमहितपरदेवतायजनपरमायसाधकः (४) तदुक्ताथाचरण- परो भवेत् । तं (५चुम्बकसाधकं साधकपांसपज्ादिशोषणा- दिरूपेण षीडयसि गृह्णासि, धुव नात्र शङ्का । अतो गुरुमुखा- देव अखिछ(&)पप्यवगम्य अस्मन् क्षा भ्रवातव्य, अन्यथा निष्फलं स्यादियथेः ॥१९६॥
एव ज्ञात्बात।
` (१) "पीडयसे' क०। (२) “ज्िधामगुरोः' ख । (३) (तन्त्राचार' क । (४) साधके प्रवतैत तदुक्ताचाकरणविचरणवरो भवेत्! ख
(५) खुवक साधकाधमं त्व डाकनीक्रूरयोगिनीरूपेण'इति क ° तुऽ पाठः।
(६) 'आलिखागमाथानव०' ख ।
३०० सदीके योगिनीहदये-
आवयोः शवलाकारं मधं (१)तत्र निवेय च ॥ १ ९५७। तलप्रधा(२)प्रसलराकारास्त्वामेव पारेभावयेत् ॥
ण
वरारोहे { "वरारोहा मत्तकाविन्युत्तमा वरवर्णिनी! इति निचण्डुः । अत (३)एवभुक्तपरकारेण ज्ञत्वा गुरुमुखादेव । को - काचारपरः कोरिकाः पूर्वोक्तरक्षणाः तेषां विहिताः स्वच्छ. न्द्सङ्ग्रहादिश्षाक्चेष्वाचाराः सदा तदनुष्ठानपरः । आवयोः पकाश्चविमशास्मनोः शबलाकारम् ।
सुर क्षक्ति; शिवो पांसपानन्दा मोक्ष उच्यते ।
इत्यभियुक्तवचनोक्तरीया सापरस्यापादानरूपं तत्पूरव- क्तरीया शोधितममृतीङृतं मधं (पासं निवेचयाऽऽवयो(ष)नि- योज्यम् । सत्परधा(दै)प्रसराकारः । तव विमशेशक्तेः परधा(७) स्पन्द्; ततप्रसराः तदुद्भू(<८.ताः आकाराः यास्रामात्ररणद्- वतानां तास्त(रधाक्तास्त्वामेव त्वदन्यता न पएृथ(१०.गभूताः परिभावयेत् ।
(१) "हज्ञं तच्च ख ० । (२) ^त्वत्प्रथाप्र ° ख०। (३) "अतः" नारित ख०। (४) भम मांसं" नादिति ख० । (५) 'आवयोरित्येव यो० ख ० । (8) त्वत्प्रथाप्र ० ख०। (७) प्रथा लऽ । (८) तद्भूताःः ख ।
` (९) 'तास्तथाविधास््वमेव' ख० । (१०) (्थग्यात्ताः' ख० ।
पुजासङ्कतनिषखूपणम् । ३०९
त्वामिच्छाविग्रहां देवीं गुरुरूपां विभावयेत् ॥१९.८॥ त्व्रन्मय( १ स्य गुरोः रोषं निवेद्याऽऽत्मनि याजयेत् ॥ योगिनीनां महादेवि! बटुकाथाऽऽत्मरूपिण ॥१९९॥
मूराद्धवं श्क्तेचक्रं यतस्तन्पयतां गत् । तस्पिननेवाऽ(२)व्यये घान्चि विखीनं परिभावयेत् ॥ इत्यभियुक्त ()वचनोक्तरीत्या विमशेशाक्तेः विकासः भुताधकाराः यास्ताः आवरणदेवतास्तत्रैव विरीना भावये दित्यथः। त्वामिति। 5 देवी विहव(ै)रूपिणीं विखानुनिघृक्ष(देया णदीत- डीलाविग्रहां शच्छा(च)विग्रहामिस्यथेः । त्वामेव गुरूक्पां बि- भावयेत् । खन्मय(७)स्य त्वद्रपस्य गुरोः तद्धेतु निवे रेष देवतागुरनिवेदितशेष(८)मात्मनि योजयेत् यावत्साधकस्तास्यां समरसी मवति, तावच्छेषं स्वयघ्ुपञुजीतेत्येः । ` बङिनिषेदनमाह-योशिनीनाभिति ।
र (९) शेष गुरोनिवेदाऽपि पश्चादालमनि योज्येत" ख । (२) (तस्मिन्. परेऽव्यये" ख । (२) शहव्याभे युक्ताकत्या' खल ०। (४) "विमशेरूपिणीं' ख० । (५) 'विदवानुजिषुश्चाग्रही ऽ" ख ७ । (६) च्छाविग्रहां' नास्ति क° । (७) स्त्वन्मयस्य' नास्ति ख०। (&) शेष' नारित ० ।
३०२ सटीक योागिनीहदये- ~
त्राणां पतये मद्यं बक कुर्वीत हेतुना ॥ नियं पि(१)बन् वमन् खादन् स्वेच्छचारपरः स्वयम् २००॥ अहन्तेदन्तयेरेक्यं भावयन् व्रिहुरेत् सुखम् ॥ ^
योगिनीनां पूर्वोक्तरीत्या मातृमानमेयमरीचीनामापरूपिणे परमा(२)नन्दस्पन्दरूपिणे बटुकाय । स्ेजाणां पतये स्षेत्राणि दारीराणि तेषां पतिर्जीबात्मा (र)तस्पे । पद्यं मदहन्ताविष्टाय । हेतुना मयेन सद्वितीयेन । वरि कुवत । |
कन्व ` क जे
श्वासद्रयनिरोषेन-ङण्डकीजयपे(४)खनात् । ` | यज्नीवरिवयोरेक्यं तेनासावान्तरो बलिः ॥ | इत्यस्मद्गुरूक्तराया सद्रितांयपद्य(५)स्वाकारण उद्छ- सिते मनसि। अत (द)एव प्राणापानयोः सञ्चारे श्रान्ते निरस्ते ति(७)त्रलक्षणे भेदे हिबोऽहमस्मीति स्वान्तरो बर्िरियथेः । ` ततः खेराचारपरो भूयादिस्याह-नित्यभिति । नत्य वप्रत्यह पिबन् देवतागुरुनवादतशेष दतुं खादन्
तच्छष(८) खाद्यं वमन् दयपपीति पषापथ्यास्छम्यम् । स्वेच्छाचा- रपरः |
(१) ¶पिबद्दरव्यन्वमन्खादन्' ख० ।
(२) "परमात्मसखङूपिणे' ख०।
(३) "अस्मै" ख० ।
(9) कुण्डलिनीज् ० ख० । `
(५) “रुज्ञस्वीकरणोहासिते' ल ० । | | (६) “द्वतः' ख० । | (9) श्रितस्वलक्षणे' ० ।
(८) (तच्छेषं नास्ति क०।
पूजासङ्केत निरूपणम् । ३०३ एतत्ते कथितं सर्वै सङ्केतत्रयमुत्तमस ॥ २०१ ॥
यत्रं यत्र मनस्तुष्टिमनस्तत्रेव धारयेव् । तत्र त्र परानन्दस्वरूपं सम्प्रकाशते ॥
ति विज्ञानभेरवयटहारकोक्तरीत्या स्वस्य यत्र यनेच्छा जायते (१)तन्तदेव नान्न ि(२)हित, यत्र यत्रेच्छा न जायते त- त्देष(३) शास्ननिषिद्ध(४)प पि(५) वतेते । अतः स्वेच्छानुकू- © ० [९ ध = छरूप()पदाथानवु(9)भवेव् । रतिकूरपदाथान् परित्यज दि त्यर्थः । अहन्तेदन्तयारेक्यं भावयन अदन्ता ज्नातरधपेः इदन्ता ्ेयधमे; तयोरेक्यम् । यत्र यत्र पिता परौचयः तत्र (८)तत्र विसुरेव जम्भते । इत्या दिपूपरतिषादितरी्या ज्ञतृङ्ञेयचेतन्ययोः समरसीक- रणछक्षण ज्ञान (रफतदेवाहमितेि भावयन् छख विहरत । परिपृणेज्ञानानन्दां भवादेत्यथेः । तदुक्तं विज्ञानमेरवज- हारकः र र जग्धिपानकृतार्छास्ररसनन्दावेनुम्भणात् । भावयेद्धरितावस्थां महानन्दस्तता भवेत् ॥ इति । (१) "तत्र तत्रः क०। (२) "निषिद्ध" क० । (३) “तृन्न तञ्च क० । (8) "विदितम्! क ० । (५) "अपि वतैते नास्ति ख०। (६) “रूप' नास्त ख० । (७) अनुभावयेत्" खऽ । (<) एष पादो नास्ति ख०। (९) "जानन् क०
३०४ ख्टीके योगिनीहदये--
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वगुद्य(१)मिव सुव्रते ! ॥ -चुम्ब(२)के ज्ञानटुन््रे च(३) न भरकादयं त्वया ऽनघ! २०२ अन्यायेन न दातव्यं नास्तिकानां महदवरि ! ॥
परमप्रदतय्रुपसंदरति-ठतदिति । स्पष्टम् ॥ १९५७-२० १॥ सवज्ञानोत्तमत्वादत्यन्तगोपनीयमित्याह-गोपनी यानि ति । ` यथा स्वगुद्य यानि परपुरूषभ्यो गोप(४)यसि परय- | त्नेन, तथा (५)एतदपि सङ्कतत्रयं अनर्हैभ्यो गोपनीयमित्यथः। | नलु (द)केऽनहां येभ्यो गोपनायमित्यत आह-चुम्ब- के इति| भक्तेटीनोऽनेक(७)चाऽऽसक्तः । तन्तत्त(८न्त्रान्तरेषु विद्यामाव्रपारा(र)च्चुम्बकः । ज्ञानटब्यो विद्यासाधारण्यात् कान्यनारक्ादि विच्यावदत्राऽपि ज्ञानं सम्पाचपिति मन्वानः तयो- दरयोरपि इदं (*०)रहस्यं खया न प्रकटीकरणीयमिस्येः॥२०२॥
(१) (्वयोनि० क० ।
(२) चम्बुक' क ० ।
(३) "वाः ख० ।
(४) गोपनीयम्! क० ।
(५) 'इदमपि' ख० ।
(६) 'केनानर्हभ्यो' क० ।
(७) 'भक्तेहीनोऽन्यत्राऽऽसक्तः' ख० । (८) "तत्तत्तन्जवरेषु' ख० ।
(९) विध्यामाव्रसाधी चम्बुकः' क० । (१०) "हदं" नास्त क ० ।
ˆ चूजासङ्कत निषूपणक् । ३०५
एवे त्वधाऽहमाज्ञप्तो मदिच्छरूपया प्रभो! ॥ २०३॥
ध्यति(१)क्रमादन्यायेन न करणीयपित्याह-अन्या-
येनेति ।
~~
› > 2
[ ®»
(२)मन्यन्ते ते (३)चम्बुका बौद्धादयः ते नास्तिकाः ।
> (~ (५
ननु अत्र को विधिरित्यत आह-एवभिति । प्रभो ! जगत्प(४)हत्तिनियमनप्रभावक्ाछिनि । अत एव ।
+ ०. ~र +~ ५
शक्या (५)हीने शिवे शल्ये (हनाम धाम न विधते ।
इति चतुःरतीशास्रोक्तरीत्या सवया विनाऽह किपपि कर्तु (ॐ)न शक्तः) वक्तु न समथः । तव् मदिच्छारूपया ममा- ऽचखिदेग्वरस्य।ऽखिलागमशाञ्लवक्तुः इच्छाद्पया विवक्षा(८)₹- पया अनाशध्रितकर्या आज्ञप्तः परितः(९)। ज्ञानमवशुक्तलक्षणं भोक्तवानारिमि । (१०)ततस््वद्ज्ञेव विषिरितयथैः ॥ २०३ ॥
(१) "विध्यातिक्मणादन्यायो न करणीय इत्यत आ!ह'-ख० ।
(२) "मन्वते" ख० ।
(३) "ते चम्बुकाः' नास्ति ख ।
(७) 'जगत्परूतिविच्रत्तिनियमभ्र ° ख० ।
(५) 'विना' ख० ।
(६) "सुक्ष्म" ख०।
(७) न शक्तः" नास्ति ख० ।
(<) 'विषक्चारूपया' नास्ति ख०।
(९.) ्प्रोषितः' ख०। |
(१०) ततस्त्वशाक्ञेव बिधिरित्यथेः' नारित ख० । ३९.
विध्यतिक्रम एताऽन्यायः । "नास्ति पररोकः' इति य
| ।
३०दै सरीके योगिनीहटदये-
अ(9)ज्ञनेन तुयो दयात् स परेता भविष्यति ॥ सङ्कतं यो वरि(२)जानाति योगिनीनां मतरेस्ियः॥२०४॥ सर्वप्सितफलवापिः सवेकामफराश्रयः ॥
अत(३.प्तदतिक्रमे प्रहदनिष्टं स्यादियाह--अनज्ञाने- नोति । |
अतस्त्वद क्नाविधिसुर्लङ्घ्य चुम्बक्रादिभ्यो य एतज्ज्ञानं द्ध्त् स परेतो भविष्यति ।
एतत्परिन्नानफलमाह-सङ्कतभिति ।
एतत् सङ्केतं युरुुखादेव यो विजानाति स योगिनीनां यागः परमर्षिव्तमवायः तदरत्यः परप्िन्भरीचिभूताः शक्तयः तासां प्रियः परमाशेवः तस्याऽनन्तक्षक्ति(४)मर्वात् । तदु- क्तं तन्वान्तरे-
शक्त याऽस्य नगत्सवं शक्तिमास्तु पहैरधरः । इति ।
परमाशिव(५) एव मवेदित्यथेः ॥२०४॥
नयु परदिवतादार्म्यवपुषा पुरूषाय? किपिर्यत आह- स्वैप्वितेति ।
यतः सवेषां जनानां काम्यानां (ह)काम्यमानानां फएरा-
(१) इद् पद्याधे ख० षु० नास्ति ।
(२) योऽभिजा०' ख०।
(३) अत इत्यारभ्य अज्ञानेनेति "इत्यन्तो ग्रन्थः ख०पु०्नारित । (४) शाक्तेत्वात् ` ख ० ।
(५) परमरिवः इत्यारभ्य 'सवेप्सितेति' इत्यन्तं खण्पु०्नास्ति। (६) "काम्यानां नास्ति क०।
न न न म्न = नल न ना वाक ` नाता ` "न्क्ष = ` आक 1;
पूजाखङ्कतनिरूपणयर । २०७
यतोऽपि दभ्यते देवि! कथं व्रि(१)दान्न चिन्तयेत्॥२०५॥
नामाश्रयः परमदिवः । अतः (र)सवोप्सितफखावाप्निः सर्वेषां यानीप्तितानि स्प्रहणायीनि फलानि तेषां भाप्चिः परम्िवता- दारम्य(३)परिन्नानाद्धवति, स एव परमपुरुषाय इव्यथः । नतु स कुत्र दश्यत इयत आदह-यतो ऽपीति । यतोऽपि यच्र कापि बाहिरन्तवां मनः प्रसरति, तत(४) तदनुभवरूपेण स एव इश्यते तस्य सवेगतत्वात् । तद्क्तं वज्ञा- नभरवमहारकेः- यत्रं यत्र पनो याति बाह्ये (५कवाऽभ्यन्तरे प्रिये ! । तत्र तत्र रिवावस्था व्यापक(दै)त्वापरकाइयते ॥ इति । तत्र तचाक्षमार्गेण चेतन्यं व्यजञ्यते प्रभोः । इति(ऽ)च ॥ नन्ु कथं तथा दश्यत इत्यत आह-कथं वि(८)द्ानिति । सत्यं दश्यते तथा न प्रयति (न मां प्यति कथन! इत्यु- पनिषदुक्तरात्या- परस्यक्षगोचरं दवे लोकं चाधि(र)प्रपाथिनम् ।
(९) क थाञ्चेन्न विचिन्तयत्" ख० ।
(२) “सर्वप्सितफखावाप्तिः नारित ख०। (३) (ताद्ास्म्यः नास्ति क०।
(७) “पतदज्ु ° क ।
(५) ध्वाऽभ्यन्तरेऽपि च' ख०।
(६) “यापकः स्यात् क यास्यसिं' ख०। (७) 'च' नास्ति ख
(<) कथञ्चिन्न विचिन्तयेत् ` ख०। (९) ष्वातिष्र ° ख०
र का वाका "` चका
| |
३०८ सदीके योभिनीह्दये-
दष्टा स्म्रति(*>शिरस्सान्दरमचुक्रोशति दुःखितः ॥ इति तन्बान्तरो क्तरीत्या हद्यमानमप्युपदेश्हैनाः न प१- वयन्ति । (निष्कलत्वं शिवे (रे)बुदध्वा' इति निष्कल(३)पर- शिवतादारम्पापरोक्षाज्ुमवशाली गुरुकटाक्षवीक्षणात् उरितस- (४)परस्तपाश्जाछः परिस्फुरत्परमाशेवाहन्ताविज्ञानः (५५)इदं कथ चिन्तयेद् ईति तत्सवंत्र समभावं कथञ्चिन्न पद्ये दित्यं! ॥ २०५॥ शिषेनाऽति(द्)रहस्यत्वाद विस्पष्टतयोदितमर् । त्वद्रूपं नाथव चनात् विद्रतं(ॐ)नो क्षप्रस्व तत् ॥ इति ओमत्परमयोगीन्द्रपुण्यानन्दनाथ- ` रिष्ाऽख्तानन्दनाधयोगिप्रवर विरचितायां यागिनीह्टदयदीपिकायां पूजासङ्तः ` ` समासोऽयं तृतीयः । |
ध] | थी # /7>~- 9 (१ 42 < <-> स ४ 44८ ¢ (द ८.८ % ॐ
८ यो, दे,
[ ; < ऽय अरन्थः। ध भ ४7 ९ "= ~ न= >+ न $ वट ध सट > ८7 = भ ^^ # (@ॐ (1 ध ४9 = ॐ # वि 0 अदः = चक = = शै 9 (1
(१) श्ुति' ख० ।
(२) “बुद्धया कऽ ।
(३) “निष्कलत्वं परमरशि० क० |. (8) "समस्त नास्ति ख०।
(५) कथञ्चिद्धिचि०' ख० ।
(६) 'शिवेनाऽभ्ब | रह्०' क० । (७) 'धिघरृतं मोक्षमुच्यते' ख० ।
योगिनीहदयदीपिकायागष्टेखितम्रन्थ- ग्रन्थकत्तणां नामानि ¦ ->>3(1६-<
नामानि- पृष्ठाङ्ः- अभियुक्त ७, ६, १३, ५१, ५७५, ६२, ९.६, १०२, १०७ १९७ १०८, १५७, १६०, २११, २७२. ं | अस्मवुगुरु ६८, ७११ १२९५ १५२, ११३, १५९. १६१, २९१५, २२० २३९. २९.९२. २३०२. खागमान्तर २.७१, २७८, २९.११ २९५, २९.६) २९९.) ३७०.
आज्ञावतार ९, ७३, २२९, २.७३
दभ्वरप्रत्याभनज्ञा ४९, ५६, ७० उत्तरपद् २३०. उद्धारोध्वतन्त्र १४. उपचारोपनिषत् २३२.
उपनिषत् ९२, ११५ १२३ २१०, २८७, ३०७.
कामकखाविखास १९, १५, ८५ ९.३. १२७, २८०. क्रमोदय २२५५; २७०. प्रन्थान्तर १६४ चतुःशता १३३, १७२, २२२, २३६, २४२, २७४५, २७.७, २५२, २५९, २६१, २६५, २६६, २६८, २७१, २७२, २७७, २७६, २८६, ३०५ चिद्गन चन्द्रिका ६, १०, ७३, १०३, ११७, ६७३. ह्षानदीपविमक्चिनी १२७. तत्वविमक्िनी १९६ तन्जान्तर ७२, ७९, ७३, ९४४७ २२२, २९.२, ३७६, ३०८. तन्ञावस्ाक १५७. नवशतीशासख् ७९. निघण्डु २९७०७ परापञ्जणक्ैक्ना ५२, ६७, १०३४ २७४०, २७९, २५०, २५७, २६२, २६७
| | | | | |
एकाक कावा
। | । ।
#;
[1
(~र . र
[ षि ज ऊव 9 |
के क ५
२८६७, २९.७५. प्रामाणकवचन ४२, ७०, १८५४८; १५११. २२४, २३९, २५६, २.७८. भगवद्राता ५ ८३ भूतलिप्युद्धार क्रम रद. महाकवि ६३, २०५ २६३. मदास्वच्छन्द ३ महास्वच्छन्दसङ्कःद १०५४ मुख्याप्नायरहस्यावेध १६२,.-२३१ खघुस्तात्र २८९१. = ` न वज्ञनभरव भट्टारक ३९, १४७१ १८४८, १५२, १५६. १५८ १६०, १६९, ५ ` १९२, २०३ २५८२, २२७, २६९, २८३, २८७, २९.७४;
३०२, ३०७ वेदरहस्य ७
दावतन्तर २८८; २८९. २९०, २९१, २९२
श्रापर।क्रम २०४, २१३
श्रपराच्रादाक। ७? |
श्रात ३, ९; ८९१, ८३ <; ८५49 <९, ९ १४ १८१) १३४७ १८६५; १६०
२८३, २६४ सङ्तपद्धात <, १३, ३३, ६० ६९, ६5 <७१.€८ २१३, १३०, १३० १ १३ २९२६, २८८
खुभगोद्य ४६. > 3 .
सोभाग्य सुभगोद्य ३८, ७९) ९८, १३५.
स्तात्रावरा २५५
स्वच्छन्द भरस्व १२० | ^,
स्वच्छन्द सङ्ग्रह १९. २११ २२, २३, २५, २६, २७, २८, २९, ३०, ३९ २६, ४२, ४५, ११०) १११, ११३, ११५, ११६, ९२११ १२५ १२६१.९२०, १३२, १४२, १६९ १७९२, २०१, २१९४; २१५, १६, ९१७, २१८, २१९. २४५, २५१) २५५१ ६४, २७२, २७८, २९१, २९५ २९.६, २९.९., ३००.
¦ हेसपरमश्वर ६२७.
„रः कियन ~ व याणका हका > ~` ~ प क
व = क क ककः - 2
[न ` ~ फा श [
त ", क्षे # ~ ऋ द 2 च्