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` मास्टर' मणिमाखायाः पञ्चादीतिसंख्यको मणिः ( कोषविभागे ) श्रीमदमरसिहषणीतः

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प्राची नभारतीयेतिहास-मुद्रा-लिपिविशारद-मास्टर- प्रिण्ठिङ्गवक्सोभिधसुद्रणागाराधिप-

श्रीमन्नालाल `ञ्रमिमन्युः एम० ए०

इत्यनेन विरचित्तया “धराख्य'हिन्दीरीकया

संवखितः

तेनैव चोपयुक्तरिप्यण्यादिभिः समलङ्कतः किर 695 सच काशीस्थ ` संस्कृत-वुकडिपो' इत्यस्याधिपैः मार्टर खलाड़ीलाल रण्ड सन्स्‌

इव्येतैः

श्री सीताराम णालये पद्रणालच सुद्रापचिल्वा) ¡थ कैल

प्रकाशितः | हि) कमस + 2 {कधुष्डनः बृ \५५¶छत्‌। घो: , अभः ऋषि न," ' ट) २५ ` मस्य राजसस्करणस्य ^ चग, {६:+3 £ ; रणस्य २) सस्वत्‌ १९९४ मूद्यं साधारणसंस्करणस्य = ५)

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थे कि-

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ससार की भाषाओं का क्रमिक विका उनके कोष म्रन्थों पर निर्भर करता है जो भाषा जितनी प्रचलित होगी, जितनी प्राचीन होगी, जितनी तीत्रगति से सभ्यता कौ

गगनचुस्बो अद्रालिका पर पहची हद हदोगो ओौर अन्य रारो के खाथ जिस भाषाका ४४२.

सम्पकं मेत्रीपू रदेगा उसका कोष भरा- पूरा रहेगा, उसका सौभाग्य अचल रहेगा अर उसमें नित्यशः नवीन शब्दों की उत्पत्ति

के आविभाव पर अवलम्बित है रा पर हे साहित्य की अभिधृद्धि पर कोषको वृद्धि होती है जिस भाषा में जितने अधिक कोष प्राप्त होते हें बही सजीव मानी . हे मे जितने कम शब्दकोष मिलते हैः वहं उतनी+डो सृत आौर उसकी

अयना इषन्मुङकुलित मानी जाती है इसलिए निर्विवाद्‌ सिदध हुश्नाकिंसाहित्य अर कोष का पारस्परिक दद्‌ सम्बन्ध है | ह+ `

कोष निमौण

को आर भारतीय विद्ठानों की पूणे अभिरुचि थी वे जानते

'अवेयाकरण्त्वन्धः वधिरः कोषविवाजितः

विनाकरोषका राजा ओौर्‌ विना कोष का विदधान एवं निबन्ध छिखनेवालों के लिए कोष अत्यन्त आवश्यक

काल में प्रचछित भिन्न-भिन्न शब्दों का भिन्न-मिन्न अर्थं

शब्दों का लिङ्ग ज्ञान करना व्याकरण के साथ कोषकाभो कार्य है प्य ले | | पयायवाची शर का ज्ञान ओर एक शब्द्‌ के अनेक अथे कोष की क्रपा से 9

विदित होते हे अतः स्पष्ट कि संस्कृत साहित्य के गहन वन मे भ्रविषट होने कै छि कोषरूपी नम-पथ-प्रदर्शक < नितान्त आवश्यकता है भाचोन काठ में कोष शरोकबद्ध नहीं होते थे,

जेसे वेदिक निषरट्‌ लोकिकं संसृत के कोष प्रायः श्लोकबद्ध ही मिलते है। ~ घर

कापकारों ने अधिकतया अनु- टप्‌ काही आश्रय छिय। है प्रस्तुत पुस्तक. अमर-कोष के पूवं व्याडि, वररुचि भागुरि | ' रलकोष एवं माङा ये कोष-परन्थ उपलन्ध थे अमरकोष के अनन्तर सत-साहित्य-सरिता मे कोषां की ¢ गयो भारतीय रष्टिपथ पर शाश्वत छत अनका

| 1 अभिधानरलत = माला, यादब्‌ म्रकाश कां बेजयन्ती, महेश्वर कत्‌ विश्वप्रकाश, देमवन्द्र को

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_ संसार की भाषां का क्रमिक विकाश उनके कोष मन्थां पर निर्भर करता है जां भाषा जितनी प्रचलित होगी, जितनी प्राचीन होगी, जितनी तीब्रगति से सभ्यता की गगनचु्बी अद्ालिका पर पर्ची हृदे दोगो ओर अन्य राष्ट के खाथ जिस भाषा का सम्पकं मंत्रीपूे रदेगा उसका कोष भरा-पूरा रदेगा, उसका सौभाग्य अचल रहेगा ओौर उसमें नित्यशः नवीन- शब्दों की उत्पत्ति भी होती रहेगी सभ्यता का विकाश यन्त्रादि के आविभाव पर अवलम्बित है राष्र के मस्तिष्क की सबलता उसके साहित्य की भित्ति पर हे साहित्य की अभिवृद्धि पर कोष की बृद्धि होती है, यह अटल सिद्धान्त है जिस भाषा में जितने अधिक कोष प्राप्त होते है बही सजीव मानी जाती दै जिस भषां ` मे जितने कम शब्दकोष मिलते हँ वह उतनी धी सृत आर उ्तकी ` सभ्यता विकसित अथवा इषन्मुङकुलित मानी जाती है इसलिए निर्विवाद सिद्ध हुश्ना किं चाहित्य चौर कोषे ` ` का पारस्परिक दृढ सम्बन्ध हे हः | र,

कोष निर्माण की आर भारतीय विदानो की पूं अभिरुचि थी वे जानते थे कि- ----- अवयाकर णस्त्वन्धः बधिरः कोषविवरजितः \ विना कोष का राजा ओौर विना कोष का विद्वान निरथक हे कविता, वक्ता

[स लों कते 6 से एवं निबन्ध छिखनेवालों के लिए कोष अत्यन्त आवश्यक वस्तु है भारतवष मे वेदिककाल से लेकर आज तक अनेक कोषप्रन्थ रचे गये यदि इसका अभाव होता तो भिन्न

काल में प्रचित मिन्न-भिन्न शब्दों का भिन्न-मिन अर्थं माद्ूम करना दुष्कर कायं होता

शब्दों का लिङ्ग ज्ञान करना व्याकरण के साथ कोष का भी कायं है पयांयवाची शब्दो

का ज्ञान ओौर एक शब्द्‌ के अनेक अर्थं कोष की छपा से विदित होते हैँ अतः स्पष्ट है

कि संस्कृत साहित्य के गहन वन मे भरविष्ट होने के ङ्द कोषरूपी वम-पथ-प्रदशक की

नितान्त आवश्यकता है ¦ |

प्राचीन काल मेँ कोष श्लोकबद्ध नहीं होते 1 , जैसे वैदिक कोष निघण्टु

लोकिकं संसत कै कोष प्रायः श्लोकबद्ध ही मिलते दै कोषकारों ने अधिकतया अनु- | टुप्‌ काही आश्रय छिय। दै प्रस्तुत पुस्तक-अमर-कोष के पूवं व्याडि, वररुचि, भागुरि दौर धन्वन्तरि ये कोषकार तथा त्रिकारड, उत्पलिनी, रनकोष एवं माला ये कोष-मन्थ उपलब्ध थे अमरकोष के अनन्तर संकछृत-साहिव्य-सरिता मे कोषों की बादसीयओा गयो भारतीय दृष्टिपथं प॒ शाश्वत कृत अनेकाथसमुचचय, दतायुष कत अभिधानरतन. माला, यादव प्रकाश की वैजयन्ती, मदेश्वर कृत विश्वप्रकाश, देमबन्द्र को अभिधान.

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_ सब में सर्वर एवं लोकोपयोगी (अमरकोष' सिद्ध हृच्ा पूवेवतीं कोशकारो की कठिनाद्यों कां अमरसिंह को पूरा पता था इसोलिए उन्दने वैसी शली ` निकाली जो | अद्वितीय ठदहरी अमरकोष की सचना में पूवं के अनेक कोप से सहायता छी गयी दै 14

यद्यपि कोष परिणएन के अवसर पर-- | , मेदिन्यमरमाला च्रिकाण्डो रलमाज्िका . रन्तिदेवो भागुरि व्याडिः शब्दाणवस्तथा दिरूपश्च कलिङ्गश्च रभसः पुरुषोत्तमः दुर्गोऽभिधानमाला संसारावते-शाश्वतौ ` विश्वो वोपाज्ितश्चव वाचस्प ति-दलायुधौ हारावली ` साहसाद्को ` विक्रमादिव्य, एव डेमचन्द्रश्च | रुद्रश्वाप्यमरोऽयं सनातनः ` कहकर इसे प्राचीन सिद्ध किया गया है तथापि इनमें से कई कोष उनके समय से वियमान थे अमरकोष के प्राचीन टीकाकार्‌ कोरस्वामो चौर वानन्द्‌ ने इसके पूवीं कोष, उनके प्रणेताओं मे व्याडि की उत्पलिनी, कत्यायन का कास्य कोष, वाचस्पति का शब्दाणेव, भागुरि का त्रिकारड कोष, विक्रमादित्य का संसारावते, धन्वन्तरि का निघण्डु, अभर्र्त अमरमाला, बररुचि की ठि्गविशेवविथि आदि का उर्मेख किया दै। इन कोषो विशेषताएं अमरकोष मे पायी जाती है ओर स्वय॑ अमरसिंह ते इसे स्वीकार किय (समाहत्यान्यतन््रासि सं्तिप्तैः प्रतिसंस्कृते सम्पूरणसुच्यते वगैर्नामलिङ्गानुशासनम्‌ ॥" दा यही कारण है कि इसके वाद कोई कोष इतना प्रसिद्ध तथा लोकश्रिय हो सका सकरा उपाक्यता निरन्तर बहती ही गयी ओर ४० से अधिक टीक्ाकासें ने टीकाए कर डालो नो शोत नो साङ्गोपाङ्ग वर्णन = कर युद्धिन रह जाय इसक्रा विचार रख 9 1 मे वन करना ही उन्दं अभीष्ट था वे आत्म-परिचय को अपने माग का कण्टकं ५५ जानते थे यदि हमारी पुस्तक सवाग सन्दर है तो लक अजश्य इसीलिए कवल अपना नाम लिख देते थे 1 यद्‌ तो सवी सदा क्रा [र है कि लोग अपना दो हाथ लम्बा नाम मरोर अधा फामं परिचय लिखतं हें एवि 4 कोन ये किस प्रान्त के निवासी थे आदि प्रभं के उत्तर अभी गभ मे धिपे हए हैँ केवल अनुमान से लोगों ने का दै ओर यहं उसीको

२. |

१८५ मानकर कहा जाता है वे बौद्ध थे क्योंकि (अमरा निजेरा देवाखिदशा विवधाः खसः आदि केटकर ब्रह्मा विष्णु विश्वेश्वर की नाम-गणना के पूवं “सर्वज्ञः सुगतो बुद्धः" "चरन कर्‌ मङ्गलाचरण के अस्पष्ट अंशा ज्ञान-द्या-सिन्धु को. स्पष्ट कर दिया इसीसे अमरसिहो हि पापीयान्सवे भाष्यमचूचुरत्‌" कहा है बुद्ध भगवान पीपल के पेड़ कँ पा सत्यक खभ्बुद्ध धे ओर वौद्ध लोग इस पेड को बोधिद्रुम' कहते हे उसका उर्लेख अमरसिंह भी करते हँ बौद्ध के यों त्िपिटकाचारयं आदि बडे-वडे महात्मा की समाधि होती थी जिसे “एडकः कते थे गवनमेर्ट द्वारा खुदाई कराने पर वहत से एल तप मिले हें ~ इन माणो से स्पष्ट होतादै किवे बौद्ध थे। मिस्टर एलन गुभरवंशीय राजा सिक्तो को सूची' नामक मन्थ से पता चलता है कि गुधवंशीय नरपतिगणं की सुद्रा्रों पर "सिंह विक्रमः, “सिहचन्द्रः “सिहमहेन्द्रः" आदि उपाधियां भिलती हं सम्भवतः “अमरसिंहः” नाम भी इस प्रकार की उपाधियों में हो भ) इसी प्रकार इनके निवास स्थान के सम्बन्ध में मी कईं मतं है। इडलोगों का कहना हे क्ष द्वितीय कार्ड में गुजरात की साबरमती ( शरावती ) नदौ को सीमा मान- कर जो श्राच्यर' ओौर “उदीच्यः देश. उल्लेख किया है इससे वेः गुजरात काठियावाड़ के निवासी ठउहरते हें +) 4 4.1 विद्वानों ने अमरसिंह का समय निणेय करके बतलाया दै कि वे ३० सन्‌ की चौथी सदी में हृए कालनिणैय करने लिए हमे सवं भथम एकदम अन्तिम भवि अथात्‌ उपलन्ध स्वं प्राचीन टीका को मानना पड़गा- | ( ) त्तीरस्वामी ग्यारहवीं सदी के द्वितीयाद्धं मे हए ये अपनी टीका मं भोज का उरलेख करते है ओर गणरत्नमहोदधि सें वद्धमान इनका जिक्र करले दँ इससे इनका समय निण्य हआ ( ) क्षीरस्वामी के कथनानुसार भागुरि माङाकार के पहले हुए "एतच्च द्रप्सं शरमिति भागुरिपाडे सरमिति बुध्वा मालाकारो न्तः 1 ये ठीका्ं सीरस्वामी के समय में उपलब्ध थीं - | 6 = ~. ( ) शाश्वत का अनेकाथ समुच्चय अमरकोष के नानाथवग से अधिक विस्वेत॒ ` | यह इस बात का प्रमाण है किं अवशेष अर्थो को भी छिखकप उन्दने पूर किया इससे उनसे भी प्राचीन अमरसिंह हए नह्मवगे मे कहा गया है कि! आतिथ्यः का | मतलब (अतिथ्यर्थः है करमादातिथ्यातिथेये अतिथ्यथञत्र साधुनि! ( जह्यवगे, शोक )

कात्य चौर माखा के अनुसार आतिथ्यः = अतिथिः" तथा शाश्वत ने दोनों अथं बतलाया हे इसपर सीरस्वामी कहते दै- | (कात्यस्त्वाह--अआविशिकं विपधिद्धिरातिध्यमसिधीयते, द्ातिथ्योतिथिरागन्तुरिति माला,

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( ~ 1 न. 3. शाश्वतोत एवोभयमाह-भ्रातिध्यं स्यादतिध्यथं आतिथ्यमति्िं विदुः !* यह एक जवदैसत प्रमाण है कि अमर के वाद्‌ शाश्वत हए 1 ` ( ) कालवगे मे कहा गया है कि धौ ढौ मागोदिमासौ स्यादुः ।' इससे स्पष्ट (क अमरसिंह के समय में अगहन मास से वत्सरारम्भ होता था गणितिशाख्र के अनुसार यह समय आज से १५००-१६०० वषे पूवं का था तः अमरसिंह का समय चौथी सदी हा

४, (५ ) यद्यपि वे बौद्ध थे तथापि पाणिनि कँ व्याकरण के अनुसार चलनेवाले

उन्हेने प्रसिद्ध बौद्ध वैयाकरण चन्द्रगोमिन्‌ कँ सूत्र “दश्वराथादराज्ञः सभा' का अनु-

बाद्‌ कर, पाणिनि के सू (सभाराजामलष्यपूवो' क! अवाद्‌ 'रालाथोपि परा राजा-

म॒ष्याथोदराजकात्‌ किया है चकि चन्द्रगोमिन्-जिनसे वैयाकरण वसुरात ( ४८०

३० सन्‌ ) ते व्याकरण की शिक्ता पाई थी- पांचवीं सदी में हए तो अमर उनसे पूवं चौथी सदी मे हृए ही हेगि | |

(६) वे बौद्ध होते हए भो सांख्यदशेन के मताजुयायी थे देखिए, क्त्ज्ञ

आत्मा पुरुषः भानं अकृतः खियाम्‌” कपि के इस सिद्धान्त में इश्वरङ्कष्ण ( अथवा

विन्ध्यवासिन्‌ ) ते सुधार किया था। अमर कहते है-अन्तराभवसत्ेश्वे गन्धर्वो दिव्यगायने'

( नानार्थ वरम ) अन्तराभवसत् गन्धर्वं शब्द का वाचक है 1 छमारिल भद -छोकवातिंके

लिखते है-अन्तराभवदेहसतु नेष्यते विन्ध्यवासिना तदस्तितवे प्रमाणं हि किञ्वि-

द्वगम्यते अथात्‌ अन्तरामवसत् सिद्धान्त को विन्ध्यवासिन्‌ स्वीकार नदीं करते

इससे सष है कि दवरङृष्ण द्वारा प्रचार किया हा सांख्यदशेन का यद सुधरा रूप

अमरसिंह को नदी माटम था। अतः इस बात से सिद्ध हृश्रा कि अमरसिंह दैश्वरङष्ण

के पूवे अथोत्‌ थी सदी में हृए | |

(७) अमरकोष का चीनी जौर तिव्वती भाषा में छठी सदी मँ अटुनाद्‌ इञा था चीनी अनुवाद उज्जयिनी कै गुणरात ने किया था जब इस प्रन का अलुवाद्‌ टी सदो मे हृ तो सौ दो सौ बै पूर्वं उसकी रचना इड होगी क्योकि इतना समय इसके भचार ओर लोकप्रिय होने के लिए देना ही पड़ेगा ।'दससे भी चौथी सदी का समय माद्म हञा |

(८) पाशा विद्वानों का अनुमान है कि गया बौद्ध मन्दिर बनवानेवाले चे

ही अमरसिंह यदि उन विद्वानों का सिद्धान्त मान लिया जाय तो भा इनक शम

सदी भे होगा; क्योकि कनिगहम आदि पुरातखविशारदों का कथन्‌ दे कि

का बोद्ध मन्द्र को, शिल्पकला के आधार पर, कहा जा सकता कि यह खीष्टीय पाचवों खदी कै पूवे बना होगा

; | . [ | : ~ . भस्त धुलतक के अमरकोष ओर नाम लिङ्गाठुशासन ये दो नाम है इसमे तोन ` इसमे तोन ` ` कार्ड दे भ्त्ये काण्ड मे करई वमौ है, वेव 0. दै। भ्य काण भे--( १) स्वगं वणे ( २.) न्योम बग ( ) दिग्वगै ( ) कालवरौ (५ ) ५५७४४ , शब्दादिवगै ( ) नाद्यवगे ( ) , पातालमोगिवगै ( ) नरक्वग ( १० ) बारिवगं +. | ,\ द्वितीय कार्ड मे-( ) भूमिवे ( ) पुरग ( ) शैलवगै ) वनोबधिवै (५ ) ` हाद्व" ( ) मदुष्यवगे ( ) बरहवगे ( ) क्त्रियवम ( ) ` वैश्यवगे (१० ) शद्रवगे | | टृतीयकाण्ड मे --( १) विशेष्यनिन्नवगे ( ) सद्खीणैवग ( २) नानार्थवर ( ) अव्यय ` वग ( ) लिङ्गादिसंप्रहवगै ˆ^ ` `“ + कनन जब तक किसी संस्कृत न्थ की संकेतमात्र भी दिन्द्‌ नदी रहती तो जनसाधारण' कै लिए उसका सममना कठिन हो जाता है इस अभाव को दूर करने के लिए मेने कदं ` ` प्रयत्न किया है जहां “9: सम्भव हे ओर्‌ अन्थ विस्टृत दो इसका भी विचार ` रखते हुए सुचित सादिक, एेतिदासिकः आयुर्वेदिक आदि टिप्पणियाँ दी गयी है ` उन्द्‌ आप दूसरे रर तीसरे काएड सं अवलोकन कर सकते दहै जनता के हृत्तट प्र जो विचारधारा ठक्कर खाती रहत खर जिनसे प्रान्त मन-सागर कुञ्च होता रहता है उसकी शान्ति की निद्ृत्ति के लिद इस प्रकार को हिन्दी टीका प्रथम बार दीने के [# | स्‌ | पाठकों सम्धल रदी है (अनुबाद केसा हृच्या' इसका निणेय अपने सहृदय पाठका पर ही छोडता द्रं इसमे जो कु त्रुटि रह गयी हो उसके लिये क्षमा मोगरता द्व तथा अशा ` करता किं अग्रिम संस्करण में सूचित करने पर वे दूर कर दी जायगी "व अन्त मेँ श्रद्धेय परिडत श्रीरामतेजजी पारडेय सादित्य शाखी को धन्यवाद्‌ देना पना परमं क्न्य समभा हँ जिन्दोने सुभे समय कम रने पर, भरू संशोधन काये मे ` तेरी बड़ी सदायता कौ दै तीसरे कार्ड को टीका लिखते समय मुभे जरा भी अव- नहं था उत समय कापी तैयार कलने मेँ भी आपने वड़ो उदारता दिखायो

कश

| # रथयात्रा, ] विदुषामचरः-- संवत्‌ १९९४ लन्नाल्लाल्ल 'अभिष्न्धुः

अमरकोपस्यवगानुकमणि का

पयमकारडे-

वशः

शेक्वग॑ः ` | वनोषधिवैः तिक्षदिवर्गः

मलुष्यवमै,

२५ | यको `

^ || वैषयः

शूद्वगः

. . ततीयक्षाएरे- विरेप्यनिघ्ववसं $

सङ्कोणेवभ;

नानाथैचरौ;

भव्ययवग; ल्करादिषमक्टवमं;

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अअ्रमरकोषः

भाषाटीकासहित

( मङ्गलाचरणम्‌ ) यस्य ज्ञानदयासिन्धोरगाधस्यानघी गुणः सेव्यताम्तयो धीराः धिये चाश्रताय च| ९॥

अन्वयः--हे, धीराः ! सः, अक्षयः, ध्रिये, `

च, जद्ताय, च, ( भवद्धिः ) सेव्यताम्‌ , ज्ञान सिन्धोः, अगाधस्य, यस्य, अनघाः, गुणाः, ( सन्ति ) 1॥

टीका--हे पंडितो ! जिस अगाध ज्ञान ओर ` दयाके रलाकर परमात्मा के ( सत्य, शौच, द्या,

न्ति, त्याग आदि ) नमल निष्पाप गुण हैँ उस अविनाशी ज्ञानप्रद कौ सेवा संपत्ति तथा अमरतव

प्राप्ति के लिये करो ॥१॥

( ्रस्तावना ) समाहत्यान्यतन्नाणि सं्लिप्ैः प्रतिसंस्कृते;

अन्वयः--अन्यतन्त्राणि, समाहत्य, सक्षितः, प्रतिसंस्कृते, वगः, ( युक्तं ), सम्पूर्णम्‌ नाम- लिङ्गानुशासनम्‌ , ( मया ), उच्यते ६॥

टीका--अन्य श्छ को एकत्र कर ( अथवा संग्रह कर ) सक्िप्त ( अरात्‌ अल्प विस्तार रोर

सत्यं शोचं दया त्तान्तिर्यागः सन्तोष जवम्‌ रमो दमस्तपः साम्यं तितित्तोपरतिः श्रत्‌ शानं विरक्तिरश्व्यं शर्य तेजो वलं स्मृतिः स्वातन्त्यं कौशलं कान्तिर्य मादवमेव इत्यादयो गुणाः

प्रथमं कारहम्‌

2 +!

यथा 1 लच्मीः पद्मालया पद्या सम्पु णेभुचयते वगे नांमलिज्गाडशासनम्‌ ॥२॥ |

मा पिम को,

बहुत अर्थं गर्भित ), प्रति संस्कृत ( अथीत्‌ ग्रति पद्‌ के म्रकृतिप्रत्यय के विचार से सं स्कार किए हुए)

|. वग ( सजातीय ) समू्ौ से परिपूर्ण नाम ( खर्म आदि ) ओर लिङ्ग. ( खी पुं नपुंसक) को

पति- पादित करनेवाल। शाख कहत हू ॥२॥

| ( परिभाषा ) भायशो रूपभेदेन साहचर्याच्च जयत्‌ खी-पु-नएसकं ज्ञेयं तद्धिशेषविधेः चित्‌ ॥३॥ अन्वयः-- अत्र, प्रायाः रूपभेदेन, च, ( इनः ), उत्रचित्‌, साहचर्यात्‌, कचित्‌ , तद्वि- रोषविधेः, स््री-पु-नपुंसकः स्यम्‌ ॥३॥ 43 टीका--इस काश में बहुधा रूपभेद द्वारा ची

त, पुललित्न ओर नपुंसक लिङ्ग मालूम करना श्लोक संख्या स]

इत्यादि मं खीलिङ्ग के रूप टै; ओर पिनाकेा- ऽजगव धुः ` शोक सख्या ३५ देत्यादि मँ "पिनाकः पुल्लिङ्ग का रूप है ओ्ओौर अजगवं, धनुः' ये नपुंसक लिङ्गकेसूपहः।

द्रौर क्रिसी स्थान में निकटवर्ती शब्द्‌ की समीपता से लिङ्ग जानना (यथा अश्वयुगश्विनी दिग्वम का २१ शोक इसमं अश्विनी 'खीलिन्ग का रूप हे इसकी समीपता से अश्वयुक्‌ को भी खीलिङ्ग जानना ]

बर्‌ कहं लिङग की विशेष विधि तते स्त्री° पुं नपुंसक लिङ्ग जानना | यथा--श्लेरी स्त्री डुभिः

साहचयं [ अधीत

~ असरककरोषः ्‌ -------------------------~----~----~-~-~-- ~~~ इसका पितरो एेसा विभिन्न लिगवाचियो का एकं | शेष दन्द समास हुमा हे क्यौकि “जनयित्री प्रसु- ^... मोता' मनुष्य वर्म के २६९ वे श्लाकं से मातृशब्द ¶- `

पुम्नः नाय्यवगे का ६ठ शोक यदौ भेरी के आगे स्त्म ओर दुटुभि के अगे पुमान्‌ लिखा हे \ अतः भेरी स्तरीलिङ है ओर दुंदुभि पुलिङ्ग है १३॥ भेदए्यानाप्य इन्दो नेकशेषो सङ्करः छतोऽज भिच्रलिङ्गानामयुक्तानां कमाटतेः ।\॥ अल्वय.--अच्र, अनुक्तानो, भिच्रणिङ्गानां, भेदाख्यानाय, द्रन्रः, न, कृतः, एकशेषः, न, (ङतः), कमात्‌, ऋध, सङ्करः, न, (कृतः) ॥४॥ | टीका-इस कोष अद्युत्पादित भिन्नभित्र लिङ्गवाले नामों का रिंग भेद वतलाने के लिये न्द समास नहीं किया गया है [ यथा- (कुलिशं मिदुरं ^ ५८ | पविः" खगवरगं का ५० वा शोक ] इसका कलि भिदुर-पवयः' नरी किया, क्यीविः (कुलिशः

दर नपसक हं ओर पनि दे]

विति पानि फसा करने से साच

नुतिः" एसा तकर्‌ नहीं करिया सतोत्रं नपं

1 गयुस॒क, साह युति ये स््ोलिग हें | | लिहो का 4 उक्त |

श्लोक

वग क्र पौ

पन

| यतिरिक्घ शाषल्लिद्ध

धमान शब्द्‌ शेष॒ लिङ्ग

[ परथमं काण्ड

का लिङ्ग निश्चय हा चुका है] ॥४॥

भिखिडथां निषविति पदं मिथुने त॒ दयोरिति। ` निषिद्धिङग शेषार्थं त्वन्ताथादि पूवेभाव्‌।।५ `

= त्रिषुः इति, पदम्‌, ९, (मधुने, रयोः" इति, (पदम्‌), निपिद्धणिङ्ग रेषाथम्‌, ( केयम्‌ ); त्वन्ताथादि, पूवंभाक , न, ( इति केयम्‌ ) ॥५॥ _ अका--जा शब्द्‌ तीन लिङ्गो देते है उनके लए लिषुः पद्‌ लिला है, यथा. ऽम्निकणाः स्वरी वर्ग का स्फुलिग तीनों लिङ्ग मं हाता है ] जा शब्द्‌ मिथुन (छीलिग-पुहिलङ्ग) वाचकं हें उनके श्रागे द्रूयोः (~ 0 लकीलो दयो ज्वालकीलौः स्वगवर्ग का ६० वां शोक

<+ ^~

५१

| यहा “ति स्वगवेगे का ५.१ श्छोक का | यही विमानः शब्द्‌

| लीलिङध कानिषेध हे। रतः (धलिङन नपुंसक) में है | शब्द्‌ रहे शौर

= ~ अर्‌ जिसके यन्तम तु

शून के साथ सम्ब

स्वेगवेगे क्र १. त्वां श्टोक का सम्बन्ध ओर निखानवरताजखमप्य

स्वगवभे का वों श्टोकं पूवे थुः

थातिशयो भरः

९०्वा शलेक अधीत

सा पद्‌ लिखा है [यथा--

वगल' ये स्री युल्लिङ्ग मे होते

लिङ्ग कानिषेध हो वह उसके = समना [ यथा--“व्योमः

स्तान्नर | यानं विमानोऽ्ीः ^ (

धत ) नहीं होते 4लामजा शचीन्द्राणी नगरी त्वमरावती'

|

यही तुः शब्दान्त वै। मरावती हे | ( 0 | यही शतिशयः शब्द क| नद भर जिससे इका पम्बन्ध अगे वे,

नहीं ।] ॥५॥

|

2 8 ° ~. स्वगवगः 9 | .. `

< ~~~ ~~ ~ ~~~ ८४

भाषारीकासाहतः

~ ~ ~ 7 ~ 8/६ ~ ~.

अथ स्वगचरगः

६, ( नव नामानि स्वगस्य ) स्वरव्ययं स्वगे-नाक-जिदिव-जिदश्शएलयाः 1

सुरोको दयो-दिवौ ढे खियां छ्रीवे चिविष्टप्‌

सरग कं नाम--(१) सखः (२) सगे (३) नाक (४) त्रिदिव (५) त्रिदशालय (६) सुरल्ताकं (५) दयो (८) दिव (£) चरिविष्टप इनमें (१) अव्यय, (२-६ तक) पुलिङ्ग, ( ५-= ) खीलिङ्ग, स्वो ) नपुंसक लिङ्ग ॥६॥

( षडविंदातिदवानाम्‌ )

अरय निजया दैवाखिदशा विबुधाः खगः खुपवांणः खुमनससिदिवेशा दिवोकसः ।७]। आदितेया दिविषदौ लेखा अदितिनन्दनाः आदित्या ऋभवोऽस्वप्ना अमत्य अग्धतान्धसः वरहिसुंखाः कतुजो गीवांरण दानवारयः चृस्दरका दैवतानि पुंसि वा दैवताः खियाम्‌॥।&

देवतामां के २६ नाम-(१) मर (२) निर्जर (३) देव (४) त्रिदश (५) विबुध (६) सुर (७) खपर्व॑न्‌ ( = ) खमनस्‌ (६) त्रिदिवेश (१०, दिवांकस्‌ (११) आदितेय (१२ ) दिविषद्‌ (१३) लेख (१४५) अदिति-नन्दन (१५) शरादिः (१६) ऋभु (१५) अखप्र (१7) अमय (१६) ्रखतान्धस्‌ (२०) बर्हिमुख (२१) करतुभुज्‌ (२२) गीवोण (२३) दानवारि (२४) ब्रन्दारक (२५) | दवत (२६) देवता इनम द्वतः शब्द नधसक | लिङ्गम किन्तु वक्रल्म से पुंलिङ्ग में मी होता | हे देवता शब्द्‌ घ्रीलिङ्गमे होता दहे। रोष | शब्द्‌ पु्घङ्गं ॥५-<॥

( नव गणदेवानाम्‌ )

ओआदित्य-विश्व-वसवस्तुषिताभास्वसानिलखा महायाजिक-साध्याश्च शद्राश्च गणदेवताः १०॥ श्रादित्या दादश प्रोक्ता, विश्वेदेवा दश स्मृताः।

वसवश्वाष्टसं ख्याताः, परट्रिशत्तुपित। मताः आमास्वरश्चतः पशिवीताः ` पचाशदूनकांः मदहाराजिकनामानो दे शते

~

न्क ` = ~ -- = _ ~

गरणदेवताच्ों नाम -- (१) आदित्य (२) विश्व (३) वसु (४) तुषित (५) आराभाखर (६) निल (५) महाराजिक (=) साध्य (€) रुद्र | ( दा देवयोनयः ) वियाध्रराग्सरो-यत्त-रच्लो-गन्धवे-किन्नराः। पिशाचो खद्यकःसिद्धोःशूतोऽमीं देवयोनयः१९ देवत्रा की जातियों के १० मेद्-(9) विद्याधर (२) अप्सरस्‌ (३ यत्त (४) रत्तस्‌ (५) गन्धर्व (६) किंचर (<) पिशाच (=) गुह्यक (€) सिद्ध (१०) भूत

( दंश असुराणाम्‌ ) अख दैत्य-दैतेय-दचुजेन्द्रारि-दानवाः शकशिष्या दितिखुताः परूवेदेवाः खुरद्धिषः)। १२ खरो के १९. नाम- (१) असुर (२) दद्य ) देतेय (४) दलुज ८५) इन्द्रारि (६) दानव (७) श्ुकशिष्य (=) दितिखत (€) पूर्वदेव (१०) सुरदिष ( अष्टादश उुद्धस्य ) सवज्ञः खुगतो बुद्धो धमेराजस्तथागतः समन्तभद्र मगवान्मारजिद्खोकनजिन्जिनः। १३। षडभिज्ञो द॑शबरोऽद्धयवादी विनायकः मुनीन्द्रः श्रीघनः शास्ता मुनिः

वोद्धमत प्रवर्तक भगवान्‌ बुद्ध के १८ नाम--

विंशतिरतथा साध्या द्वादश विख्याता, रुद्रा एकादश समृताः श्र्थात्‌--्रादित्य १२, विश्वेदेवा १०, वसु = तुषित २६, आभास्वर ६४, अनिल ४९. महाराजिक २२० ध्य १२, रुद्र ११, हं

विद्याधरा जीमूतवाहनादयः अप्सरसो देवाङ्गनाः।

यक्ताः वुवेरादयः। र्तांसि मायाविनो लङ्कादिवासिनः

गन्धवास्तम्बरुपर्तयो देवगायनाः किन्नरा श्रश्वादिभुखा नराछृतयः पिराचाः पिशिताशा भूतविशेषाः गुद्यकाः मरिभद्रादयः निधि रक्षन्ति ये रन्तास्ते स्यु्यद्यसंज्ञकाः सिद्धाः विश्वावसुप्रभृतयः भूताः बवालग्रहादयो रुद्रा- नुचरा वा। दान शीलं चमा वीय ध्यान-परज्ञा-बलानि च। उपायः प्रशिधिन्नानं दश वुद्धवलानि.तै |

¢ अमरकोषः : [ अरथमं काण्डं

~ 0 6 0 0 0 0 ~ 9 9 9 0 0

(१) सचेज्ञ॒ (२) खगत (३) बुद्ध (४) धर्मराज (५) | उपेन्द्र इन्द्रावरजश्चक्रपाण््चितुसजः & तथागत (६) समन्तभद्र (७) भगवत्‌ (=) मार- | पद्मनामो मधघुरिपुवोखुदेवखिविक्रमः ॥२०॥ जित्‌ (६) लाकजित्‌ (१०) जिन (११) षडभिज्ञ | दैवकीनन्दनः शौरिः श्रीपतिः पुरुषोत्तमः (१२) द्शवल (१६) अद्रयवादिन (१४) विनायक | वनमाली विध्वंसी कंसारातिरधोच्तजः।।२९॥ (१५) मुनीन्द्र (१६) श्रीघन (१५) शस्त (१८) सुनि ! विश्वम्भरः कैरभजिद्धिधुः श्रीवत्सलाञ्छनः ( सक्च बुद्धावान्तरभेदस्य शाक्यसुनेः ) पुराणपुरुषो यज्ञपुरुषो नरकान्तकः ।।२२॥। 4 शाक्यमुनिस्तु यः ॥१४॥ | जरशा्यी विश्वरूपो मुन्दो मुरमर्दनः 1 स्वाथ : सवांथसिद्धः शौद्धोदनिश्च सः। विष्णुभगवान के ४६ नाम--(१) विष्णु गौतमाश्चाकौबनधु्च मायादेवीख॒तश्च सः) 4|| | (२) नारायण ( > ) क्रुष्ण (४) वेकुरट ( ५) विष्ठर- बुद्ध कं अवान्तर मेद शाक्यमुनि के नाम -- श्रवस्‌ (६) दामोदर («) हृषीकेश (८) केशव (६) (१) शाक्यमुनि (२) शाक्यसिंह (३) सवीर्थसिद्ध माधव (१०) स्वभू (११) दैखारि (३१२) पुरडरी- (४) शादधोदनि (५) गोतम (६) शरकंवन्धु (७) | काक्त (१३) गोविन्द्‌ (१४) गरुडध्वज (१५) माग्रादेवीसुत ॥१४-१ श: | पीताम्बर (१६) अच्युत (१७) शङ्खिन्‌ (१८) ( ) --- विष्वकसेन्‌ (१६), जनादन (२०) उपेन्द्र (२१) ब्रह्याऽऽत्मभूः सुरग्येषठः परमष्टा ° इ्द्रावरज (२२) चक्रपाणि (२३) चतुर्युज (२५) दिररयगर्भो ोकेशः स्वयम्भृश्चतुराननः॥ १६॥ ~ + षि पद्मनाभ (२५) मधुरिपु (२६) वासुदेव (२५७) धाताऽज्जयोनिद्रु हिणो विरिञ्चिः कमखासनः। त्रिविक्रम (२०) देवकीनन्दन (२,) वो नयथा ति विधि विक्रम (२८) देवकोनन्द््‌न (२६) शारि (३०) 1 वा विधाता ` | श्रीपति (३१) पुरुषोत्तम (३२) वनमालिन्‌ (३३) त्मम्‌ ६१४ * नाम (1) व्रह्मन्‌ (२) | वलिष्वसिन (२४) कंसाराति (३५) अधोक्तन (३९) \ परमेष्ठिन्‌ (५) पिता- विश्वम्भर (३७) कैटभजित (३८) विधु (३६) ४; हरिरा यगभ (५) ताक्रश (त ) स्वयम्भू श्रीवत्सलाञ्छ्न (४ © ) पुराणपुरुष (४ ) यज्ञपुरुष तति ( 2 धात्र (११) ग्रन्जयोनि (१२) | (४२) नरकान्तक (५४३) जलशायिन्‌ (५४) विश्व हण १३) विरिचचि (१ ४) कमलासन (१५) स्ट रूप (४ ५) मुकुन्द (४६ ) मुरमदंन १८-२२॥ वश्वखन्‌ (२०) विधि ॥१६-१५॥ | ढे कष्णपितुः चलवारिरिषणौ वसुदेवोऽस्य जनकः दुर्दुभिः।२३। रः ( पट्‌ चत्वारशह्रष्णोः ) | इन (कृष्णा) कै पताके नाम- (१) वसु 3 देषीकेशाः केशवो माधवः स्वभूः।१८॥ | १५२ ४.1 ^ + शणडगाकान्तो गोविन्दो गणुडध्वजः 0 . पाताम्बरोऽच्युतः शाङ्ग विष्वक्सेनो जनार्दनः बलमद्रः प्रटम्बघ्नो बलदेवोऽच्युताग्रज : ~ नाभिजनारडजः पृ सिप „~ रेवतीरमणो मः कामपालो हलायुधः ॥२७। नन्दो रजोभरि ~ {<> नवनः कमलोद्भवः सदा- नीटास्बरो सहि णेयस्तालाङ्को > गे ददी नन्दो रजोमूतिः सत्यः कौ ` ~ स्ताठ्धा मुखस दह्ला रो रजोमूरतिः सत्यः को हंसं वाहनः श्रन्य पुरतकों में नीत्ाम्बरो रोषि धो टन

1

`

यह क्षकं पाया जाता हे इक सङषेणः सीरपाणिः कालिन्दीभेदनो बलः| २७ २) अण्ड (२) पतं नि पिन राम के १७ नाम--(१) बलभद्र (२ सदानन्द (७) 5 (४) अनिधन (५) कमलोद्धव (£) द्र २)। कौ = "1 नकु ९० नाम व्ह्याके जर्‌ (१ ९) हं सवाह पुर पु

तकं श्चोकं नहं दै रतः ब्रं केवल ३६ दी नास गिनाये हें

स्वगवगंः ] | भाषाटीकासहितः

(१५) सीरपाणि (१६) कालिन्दीमेदन (१५). बल

४-२५५।। ( एकविंशतिः कामस्य )

मदनो मन्मथो मारः प्रयय॒ख्रो मीनकेतनः कन्दर्पो द्पेकोऽनज्गः कामः पञ्चशरः स्मरः २१ शम्बरारिमेनसिजः ङुःखुमेषुरनन्यजः पुष्पधन्वा रतिपतिमेकरध्वज आत्मभूः ।२७॥ ब्रह्मसूकऋ ष्यकेतुः स्यात्‌

कामदेव (प्रदुन्न) के २१९ नाम- (१) मदन (२) मन्मथ (३) मार (४) प्रदुस्न (५) मीनकेतन (६) कन्दपे (७) द्पक (=) अनंग (६) काम (१०) पञ्च शप्‌

(९१) स्मर (१२) शम्बरारि (१३) मनसिज (१४) `

कुखुमेषु (१५) अनन्यज (१६ ) युष्पधन्वन्‌ (१७) रतिपति (१८) मकरध्वज (१६) ात्मभू (२०) ब्रह्मस्‌. (२१) ऋष्यकेतु ॥२६-२५॥ ( दे ्रद्न्नसूनेाः ) अनिरुद्ध उषापतिः

प्रयु कं पुच्र अनिरुद्ध के नाम-(९) अनि-

रुद्ध (२) उषापति ( एकादश लक्ष्म्याः )

कदमीः पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिपिया २८ इन्दिरा खोकमाता मा स्तीरोदतनया रमा

लदंमीजी के ११ नाम-(१) ल्मी (२) पद्या- लया (३) पश्या (४) कमला (५) श्री (६) हरि- प्रिया (४) इंदिरा (८) लेकमाता (६) मा (१०) ्षीरोदतनया (११) रमा ॥२८॥

( एक विष्णुराट्स्य ) शद्खो दमी पतेः पाञ्चजत्यः

शय्ररविन्दमशोकं चूतं नवमल्लिका

नीलोत्पलं पञ्चैते पच्चवाणस्य सायकाः ॥"'

उन्मादनस्तापनश्च शोषणः स्तम्भनस्तथा

सञ्मोहनश्च कामस्य पञ्च बाणाः प्रकीतिता: 1

लदचमीपति (विष्णु) के शख का नाम-(२)

पाञ्चजन्य ( एक विष्णुचक्रस्य )

चक्रं सखदशंनः ॥२६॥

विष्णु के चक्र का नाम-(?) सदशन (यद

पलिग के अतिरिक्त नपुंसक लिंग में मी हाता है-

खद शनेोऽचियां चक्रे इति नामनिधानात्‌ क्ीवेऽपि)

( एक विष्णुगदायाः )

कौमोदकी गदा विष्णु की गदा का नाम ८१) कौमोदकी खीलिग) एक विष्णोः खङ्गस्य ) खड्गो नन्दकः

विष्णु के खड्ग का नाम (१) नन्दक (एकं विष्णोमणेः ) * कौस्तुभो मणिः विष्णु की मणि का नाम-(९) कौस्तुभ ( एक विष्णोर चापस्य )

चापः शाङ्ग मुररेस्त॒ | मुरारि (विष्ण) के धनुष का नाम (१) शाङ्ग एक विष्णोः लान्छनस्य ) श्रीवत्सो खाञ्चनं स्म्तम्‌ ॥२०॥ विष्णु के वत्तःस्थल पर के चिह् कानाम- (१) श्रीवत्स ॥३०॥ ( नव गरुडस्य ) गरुत्मान्‌ गरूडस्तार्यो वैनतेयः खगेश्वरः नागान्तको विष्णुरथः सुपणेः पन्नगाशनः।।३ गरुड के नाम-(१) गर्त्मत्‌ (२) गस्ड

(अश्वाश्च शेव्य-सुम्रीव-मेघ पुष्प-वलाहकाः

सारथिदारुको मन्त्री ह्यद्धवश्चानुजा गदः )

(इनके (१) शेव्य (२) सुमीव (३) मेघपुष्प (४) बलाहक ये चार घेाडदहँ। सारथी कानाम- दारुक मन्त्री का नाम-उद्धव दोर भाई का नास गद्‌ हे )

अमरकोषः = - [ प्रथमं काण्ड

= 0 0 0 भाक =>

था 0 4

0

(३) ताच््ये (४ ) वैनतेय (५) खगेश्वर ( ) | भगे (३७) त्यम्बकं (३८) चचिपुरान्तक (३ | नागान्तकं ( ) विष्णुरथ (८) सुपणे (€) | गङ्गाधर (४०) अन्धकरिपु (४१) कतुध्वंसिन्‌

पन्नगाशन ।१२१॥ (४२) व्रषध्वज (४२) व्योमकेश (४४) भव ( अष्टचत्वारिराच्छम्भोः )

| (४५) मीम (४६) स्थाणु (४७) सद्र (५=) उमा- शस्भुरीशः पशुपतिः शिवः शटी महेश्वरः | परति ॥३२-३६। ईश्वरः शवं ईशानः शङ्रचन्द्रशेखयरः ।३२॥ | (१ ्रहिवैध्न्य अष्टमूर्ति गजारि महानट) भूतेशः खण्डपरगिरीशो गिरिशो मृडः ( एकं जावन्धस्य ) | मत्युञ्जयःछत्तिवासाः पिनाको पमथाधिपः३३, = कपदोऽस्य जराजूर: | उग्रः कपदीं श्रीकर्टः शितिकरटः कपाक्श्चत्‌ शिवजीके जटाजूट का नाम-(£) कपदं 1 | वामदेवो मंदादेबो विरूपात्तस्िरोचनः \\2:811 | ( दे शिवधनुषः ) | छृशाजुरोताः सवेज्ञो धूजेटि नीरुलोदितः। | पिनाकोऽजगवं धच: हरः स्मरहरो भगेस्त्यस्बकचिपुरान्तकः २८ शिवजी के धनुष के नाम-(१) पिनाकं गङ्गाधरोऽन्धकर्पुः कतुष्वंसी चुषध्वजः 1 | (२) अजगव (नपु°) व्योमकेशो भवो भीमः स्थारए्‌ ख्द्र उमएपतिः२६ ( एक शिवपरिचराणाम्‌ `) अदिवश्न्योऽटसूतिश्च गजारिश्च महानटः ।) प्रमथाः स्युः पारिषदाः शिवजी के ४८ नाम-(१) शम्भु (२) ईश (२) शिवजी के पारिषद का नाम- (१) प्रमथ प्ुपति (४) शिव (५) शूलिन्‌ (६) महेश्वर (७) ( ब्रह्मादिशक्तिदेवतानाम्‌ एकेकम्‌ शशधर ( = ) शवं ( ) ईशान (१०) शङ्कर (१९) | ब्राद्यीत्याद्ररूतु मातरः 1 1२.७\ चन्द्रशेखर (१२) भूतेश (१३) खणडपरश (१४) ब्राह्मी इत्यादि मातर हे ॥२५॥ गिरीश (१५) गिरिश (१६९) मड (१७) मरत्युज्ञय ( त्रीणि रेश्वयंस्य ) (१८) कृत्तिवासस्‌ (१६) पिनाकिन (२०) प्रमथा- | विभूतिभूतिरेष्वर्यम्‌ धिष (२१) उग्र (२२) कपदिन्‌ (२३) श्रीकरठ | देश्य के नाम-- (१) विभूति (२) भूति (२४) शितिकराठ (२५) कपालगरत्‌ (२६) वामदेव | (२) रेश्वये (२) मादेव (२८) विलूपाक्त (२६) त्रिलोचन |

( पेदवयस्य प्रसेदाः >

(२०) कृशानुरेतस्‌ (३१) सर्वज्ञ (३२) भूर्जरि अणिमादिकमच््ः | (२२) नीललोहित (२४) हर (३५) स्मरहर (२६) फेशवयं के मेद्‌--(१) अणिमादि > ` (क ( एकविदातिः पावत्याः ) शो करोमि सदा भ्वनासरमं य्नरामयन्‌ उमा कात्यायनी गोरी कप्टी हैमवतीश्वरी) २८) ¦ "(नन कः सः ॥' | शिवा भवानी स्दराणी शवांणी सवमङ्गला भरं ततः श्रकर्ठतामगात | अपण पार्वती दुर्गा सरडानी चणिडिकाऽम्बिका€ शिवपुराणे. _ इति नीलकरुठस्तवः रायां दात्तायणी चैव गिरिजा" मेनकात्मजा सर्वमेदाश्चैव प्रमाणतः ~ गर ` %। = ९६ > ^ स्कान्द पूजाया महादेवस्ततः स्मृतः ब्राह्मी, माहेश्वरो, चन्द्री, वारादी, वैष्णवी तथा

को मारीत्यपि, चामुण्डा, चचिकेत्यष्टमातरः = द. [च प्र्थात्‌-ब्राहमी, माहेश्वरी, एेनद्री, वाराहो, वेष्णवी, कौयारी, चामुर्डा, चचिका- ये त्र मात दें\। .

नन "म्ग तु रसाक्तं लोदितं तिपा इत्येव ततो परिकीतितः ॥'

;** ` +) | र्‌

स्वगवगः |

माषारीकासहितः

= (~ (~ ~~ (- ~ ~~~ 0 0 0 0 0 0 0 0 0 0

* काल्यायनी (२) गौरी (४) काली (५) हैमवती (६) + _: हरी (७) शिवा (=) भवानी (€) रुद्राणी (१०) ` “^ शवीणी (११) सवेमगला (१२) अपणौ (१३)

पार्वती (१४) दुगा (१५) खडानी (१६) चंडिक (१७) अंबिका (१८) च्या (१९) दाक्ञषायणी (२०) गिरिजा (२१) मेनकात्मजा ॥२८-२६॥ ( अष्टौ गणेशस्य ) विनायको विघ्नराज-देमाठवर-गरणाधिपाः।(०॥ अप्येकदन्त-हेरम्ब-खस्बोदर-गजाननाः गरोशजी के = नाम--(१) विनायक (२) विघ्न- राज (३) द्वेमातुर (४) गणाधिप (५) णकदन्त (६) टेरस्व ) लम्बोदर (<) गजानन ॥४०॥ ( सक्षदश्च स्कन्दस्य ) का{तकेयो महासेनः शरजन्मा षडाननः ॥९॥ पावंतीनन्दनः स्कन्दः सेनानीर भिम्‌ गुहः

कः

बृद्धश्रवाः शुनासीरः पुख्हतः पुरन्दरः 1७४॥। जिष्ुरंखषेभः शक्रः शतमन्युदिवस्पतिः खुजामा गोजभिदढज्री वासवो चचा चुषा।।७५॥ वास्तोष्पतिः खुरपतिवेलारातिः शचीपतिः जम्भसेदी हरिहयः स्वारारानसुचिसखूदनः।७६॥ संक्रन्दनो दुश्च्यवनस्तुराषारामेघवाहनः आमखरडलः सहस््रात्त भुक्ताः

इन्द्र कें ३५ नाम- (१) इन्द्र (२) मरुत्वत्‌ (३) मघवन्‌ (४) बिडाजस्‌ (५ ) पाकशासन (£) वृद्धश्रवस्‌ (४) शुनासीर (=) पुरुद्रूत (€) पुरन्दर (१०) जिष्णु (१९) लेखषम (१२) शक्र (१३) शतमन्यु (१४) दिवस्पति (१५) सुत्रामन्‌ (१€) गोच्रसिद्‌ (१७) वज्रिन्‌ (१८) वासव (१६) वृ्रहन्‌ (२०) व्रषन्‌ ( २१ ) वास्तोष्पति (२२) सुरपति (२३) वलाराति (२४) शचीपति (२५) जम्भभेदिन्‌

बाहुलेयस्तारकलजिद्धिशाखः शिखिवाहनः।॥४२॥ | (२&) दरिदय (२५) स्वाराट्‌ (२८) नमुचिसूदन

घारमातुरः शक्तिधरः कुमारः ऋौञदारणः स्कन्द्‌ के १५ नाम-(१) कार्तिकेय (२) महासेन (३) शरजन्मन्‌ (४) षडानन (५) पावेती- नन्दन (६) स्कन्द्‌ (८) सेनानी (=) अभू (६) गुह (१०) वाहुलेय (११) तारकजित्‌ (१२) वि-

| १-४२।। ( षण्नामानि नन्दिनः >) शङ्गीश्वज् रिरिस्तुरुडीनन्दिको नन्दिकेष्वर.४२ नाद्या नमि-- (१) शगिन्‌ (२) भगिन्‌ (२) रिटि (४) त॒शिडन्‌ (५) नेदिक (६ ) नंदि- कश्चर ॥४३॥ ( पञ्चत्रिशदिन्द्रस्य )

# न्य पुस्तकों यड क्षोक धिक मिलता है-- क्ममोटो तु चामुण्डा, चम॑मुण्डा तु चशचिका चामुण्डा के नाम-(१) कमंमोी (२) चाण्डा चचिका के नाम-(२) चमेसुखडा (२) चचक!

|

शाख (१३) शिखिवाहन (१४) षारामातुर (१५) शक्तिधर (१९) कुमार (१७) कचदारण

इन्द्रो मरत्वान्मघवा बिडौजाः पाकशासनः |

(२€) सक्रन्दन (२०) दुश्च्यवन (२१) तुराषार (३२) मेघवाहन (२२) आखरडल (२४) सह ख्राक्त (२५) ऋसभुक्लन्‌ ॥४४-४६॥ ( त्रीणि इन्द्रपल्न्याः ) तस्य तु पिया ॥७७।। पुलोमजा शचीन्द्राणी उस (इन्द्र) की परिया के नाम- (१)

पुलामजा (२) शची (३) इन्द्राणी ॥४५॥

( एकम्‌ इन्दरपुरस्य ) नगरां त्वमरावती

इन्द्र को नगरी का नाम-- (१) अमरावती

( एकम्‌ इन्द्रारवस्य ) हय उच्चैः श्रवा

इन्दर के घोडे का नाम- (१) उत्चःश्रवस्‌ ( एकम्‌ इन्द्रसारथेः ) सूतो मातलिः

इन्द्र के सारथी का नाम--(१) मातलि | ( एकम्‌ इन्द्रोपवनस्य ) नल्द्नं वनम्‌ ॥४८॥

¢ जसमरकोषः व. [ भ्रथमं काण्डं

इन्द्र के उपवन. करा नाम (१) नन्दन ॥८ | ( त्रीण्यश्छतस्य )

( एकम्‌ इन्द्रमासादस्य ) | पीयूषमग्तं सधा ।८२॥ स्याटमासादो वेजयत्तः | रसत के नाम -(१) पीयूष (२) अमृत | इन्द्र के महल का नाम - (१) वैजयन्त (२) सधा ॥५९१॥ | ( दे इन्द्रपुत्रस्य ) चत्वारि मन्दाकिन्याः ) जयन्तः पाकरशासनिः। | मन्दाकिनी वियद्भङ्का स्वणेदी सखुरदीधिका | इन्द्र के पुत्र के नाम - (१) जयन्त (२) स्वर्गगंग। के नाम - (१) मन्दाक्रिनी (२) | पाकशासनि वियद्ूङ्ा (३) स्वणंदी (४) सुरदीर्धिकरा ( चत्वारि इन्द्रगजस्य ) ( पञ्च मेरोः ) ऽभ्रमातङ्गरावणाभ्रमुवरलभाः २६॥ | मेखः खुमेख्ैमाद्री रलसायुः खुराख्यः ।५२।। | इन्द्र के हाथी के नाम- (१) ेरावत (२) मेरु पर्वत के नाम-(१) मेरु (२) सुमेर अरभ्रमातंग (३) एेरावण (४) अभ्रसुवल्ञभ ॥४६॥ | (३) देमाद्री (४) रलसालु (५) खरालय ॥५२॥ ( दश्च वच्रस्य ) ( पञ्च देवतरूणाम्‌ )

हादिनी वज्रम स्यात्कलिशं भिदुरं पवि; | पञ्चैते देवतरवो मन्दारः पारिजातकः शतकतेरिःस्वखः शम्बो दम्भोटिरशनिद्धेयोः५० | सन्तानः कटपचृन्तश्च पुंसि वा हरिचन्दनम्‌ ५३ वज्ज कै १० नाम - (१) हादिनी (२) वज्र | देवतामां के उक्त के नाम-(१) मन्दार (२) पारिजात (३) सन्तान (८४) कल्पन्त (५) हरिचन्दन इनमे “हरिचन्दन नपुंसक दै

(३) कुलिश (४) भिदुर (५) पवि (६) शतकोटि | (५) खरु (८) शम्ब (६) दम्भोलि (१०) अशनि इनम हादिनी च्रीलिङ्ग; वज्र ( स्तीलिङ्ग वर्जित ) | प्र विकल्प से पुलिङ्ग भी होता हं ॥५२॥

पुलिन्ग- नपुंसकलिङ्ग; कुलिश, भिदुर नपुंसक लिङ्ग ( ढे बह्यपुत्रस्य )

पवि आदि पु्विङ्गः अशनि दोनों लिगँ पंललिज्न- | सनत्छुमारो वैधाचः

नर्ुसक) मेँ होते हैँ ॥५०॥ | ब्रह्माके पुत्र के नाम--(?) सनत्कुमार (2 विमानस्य ) | (२) वैधातच्र

व्योमयानं विमानोऽख्ी | षडरिवनीकुमारयोः )

विमान के नाम-(?) व्योमयान (२) | स्वरव यावश्विनीखतौ ~ ^ „~ | मो विमान इनमे "विमान स्तीलिङ्ग को छोडकर, | नासत्यावरििनौ द्खावाररिनेयौ ताभ

लिङ्ग ओर नपुंसक भँ होता दै अचिनीकुमारों के नाम--(र) स्ववैय | ( एक सुरषेः; ) (२) अविनीत (२) नासत्य ( ४१कषिनि (४9 | नारदाद्याः सुरर्षयः | दल (६) आधविनेय (वेदो दें अतः द्विवचन का देवाथा के नाम- (१) नारद श्रादि। प्रयोग किया गया है ) ।५४॥ ( दे देवसभायाः ) | ( उवंदयादेः ) वा स्यात्ुधमां देवसभा सिया बहुष्वप्सरस : स्वव श्या ६५ शा देवतानं की सभा के नाम (१) सधर्मा उरयेशी आदि स्वगे की वेश्यान्ना # नाम- (२) देवसभा हि ` =

न= =------ -- 9 धृताच मेनका रम्भा उवंशी वि + आन तुम्बरभरत-पर्वत-देवलादयः खकेशो मन्जुधोषाचयाः कथ्यन्तेऽप्सरसो बुधैः

1

[) 30 ६, ~ नि ~~~ ६.६.०६.

` « (१ अप्सरस्‌ (२) स्वर्वेश्या इनमें अप्सरस

स्वर्गवगेः ]

भाषाटीकासंहितः &

( पञ्च ज्वाखायाः )

शब्द्‌ स्लीलिङ्ग में होता हे यह जातिवाचक टोने | वदर्योर्ज्वाखकीटावचिरहं ति. शिला सियास्‌।

कारण बहुवचनान्त हे | रसिकी ज्वाला के नाम (१) ज्वाल ( एक देवगायकानाम्‌ >) | (२) कील (३) ्र्चिस_ (४ हेति (५) शिखा !

, ( ठम्बरु, विश्वावसु, चि्ररथ प्रश्रति ) टे

{(१/

दाहा हृहश्चेवमादा गन्धवांखिदिवोकस्ाम्‌५५ दाहा दद्र" (पु °) इत्यादि देवताच्मां के गन्धर्व || ५॥। ( चतुस्त्रिदादग्नेः ) अवे श्वानरो वहिवींतिहोजो धनञ्जयः | कृपीर योनिज्वंरखनो जातवेदास्तनूनपात्‌।५६॥

, चदि: ष्मा कृष्णवत्मां शोचिष्केश उषवुंधः।

्रा्रयाशो ब्रह्धाचुः शायः पावको ऽनठः५७ रोहिताश्वो वायुसखः शिखावानाशुश्यत्तशिः दिरण्यरेता इतभुग्दहनो हव्यवाहनः ।५८॥ सप्ताचिदेसुनाः श॒क्रश्ित्रभायुर्विभावस्ुः शचिरप्पित्तम्‌

ग्रधि के २४ नाम-- (१) अनि (२) वैश्वानर (२) वहि (४). वीतिहोत्र (५) धनञ्जय (६) करपीटयोनि (५) ज्वलन . (=) जातवेदस (६) तनूनपात्‌ (१०) वर्हि (११) शुष्मन्‌ (१२) कृष्ण- वर्त्मन्‌ (१३) शोचिष्केश (१४) उपवुध (१५) स्राश्रयाश (१९) बहद्धाचु (१७४) शानु (१८) पावक (१९) अनल (२०) रोहिताश्व (२१) वायु- सख (२२) शिखावत्‌ (२३) आष्ुष्य्ञ णि २४ ) हिरण्यरेतस. (२५ हतसुज्‌ (२६) दहन (२७) टन्यवाहन (२८) सप्ताचिष्‌ (२९) दसुनस. ( २० ) शुक्र (२१) चित्रभानु ( ३२ ) विभावसु (२३) शुचि (२४) अप्पित्त ॥५६- ५८॥

( त्रीणि वाडवाप्नः ) ओओवस्तु वाडवो वडवानलः ॥५९॥

वडवानल के नाम~-( १) घ्रर्वं (२)

वाडव (३) वडवानल ॥५६॥

~ च्छक = ~

काली कराली मनोजवा खलोहिता सुधूप्नवणं स्फुलिन्निनी विश्वदाक्ाख्याः सप्त वह जहा ।*

इनमं ज्वालः अर कीलः दानां (स्ती-पु) लिङ्गम अर्चिस ` खी-नपुंसकलिङ्ग मेः हेतिः अर शिखा स्तीलिङ्ग मं होतेद। ( दवे अभ्चिकणस्य )

जिषु स्फुःलिङ्खोऽधिकणः ` |

राग की चिनगारी करे नाम~ (१) स्फुलि ङ्ग (२) रिक ये तीनां लिङ्गो (पुं-स्ती-नपुंसक) होते दं

( द्वे सन्तापस्य )

सखत्तापः सज्वरः समां <]

सन्तापके नाम-(१) सन्ताप (२) सज्वर ये दोनां समन अथ एव समान लङ्गवाले ( पु ) ॥६०॥

( चतुद यमस्य )

धमराजः पित्रपतिः समवतीं परेतरार्‌ कृतान्तो यमुनाभ्राता शमनो यमराडयमः। ६१ काटो दरडधरः श्राद्धदेवो बैवस्वतोऽन्तकः

यमराज के १४ नम--(१) धमराज (२) पितृपति (३) समवरतिन्‌. (४) परेतराज्ञ (५) कृतान्त (६) यसुनाश्नातर («) शमन ( = ) यमराज्ञ (€) यम (१०) काल (११) दर्डधर (१२) श्राद्धदेव (१२) वंवस्वत (१४) शमन्तक ।॥६१॥

( पञ्चदश राक्षसस्य ) रात्तसः कोणपः कव्यात्कव्यादोऽस्रप रात्रिञ्चरो रािचरः कर्वुरो निकषा

कि, वो नेच तो यातुरक्तसी ६३ राक्तस नाम--

कौराप (२) वो ४५.८१ कि (६) आश्र (७ ) रालिञ्चर ) राचिचर वी पर्‌ (६)

कुर (१०) निकषात्मज (१२) यातुधान पुरयजन (१३) नेशत (१४) यातु ५२) = छु (१५) रक्तस्‌

~प: + 4

्शारः६२

वि छ.

~~ =

$ = शण भुम - अमरकोषः ९8 [ रथं करण्ड ~ ^~ ~ ~+ „9 4 ~ 9 + ~ ~ ~ 4 ~ + ~ 4 9 0 0 ¢ ^ १-१4-५ +र ^ ~^ ~, ^~ ^" -----------

इनमे “यातुः रार शरक्तस्‌ः ये नपुंसक लिङ्ग है ( समस शरीर मं फिरनेवाली वायुका नाम )। शेष पुल्लिङ्ग ।६२-६२॥। | ( पञ्च वेगस्य ) ( पन्च वरुणस्य ) | रह्स्तरसी तु रयः स्यद्‌: ।\६७1 प्रचेता वरुणः पाशी यादसाम्पतिरप्पतिः | जवः ¦ वरुण के नाम- (१) प्रचेतस्‌ (२ ) वरूण (२) पाशिन्‌ (४) यादसाम्पति (५) अप्पति

वेग के नाम - (९) रंदस्‌ (२) तरस्‌ (३) रय (४) स्यद्‌ (५) जव इनमें 'रदस्‌ "तरस्‌

( विकतिवायोः ) | ये नषुंसक लिङ्ग, ओर शेष पुलिद्ध हैः ॥६) श्वसनः स्पशेनो वायुर्मातरिश्वा सद्गतिः ६8 दीघ्रस्य ) पृषदश्वो गन्धवहो गन्धवाहाऽनिखाऽऽथगाः ! = चथ शाघ्र त्वारत्‌ खु, ततनन छतम्‌

सत्वरं चपर तु णेमविरुम्बितमाश् ६] शीघ्रता के ११ नाम-(१) शीघ्र (२) त्वरित

समीर-मारुत-मरूञ्जगत्परणए-सखमीर रण. 11 ६५।। नभस्वद्वात-पवन-पवमान-प्रमञ्जनाः )

मिय

(२) वायु (४) मातरिधन्‌ (५) सदागति ( & ) (८) चपल (६) तूण (१०) श्विलस्वित (११) पृषदश्व (७) गन्धवद्‌ (८) गन्धवा ( & ) अनिल स्रु ।।६८॥ (१०) अश्ुग (११) समीर (१२) मारत ( १३) ( नव निरन्तरस्य _ मरत (१४) जगत्ाण (१५) समीरण ( १६) | सततानारताश्रान्तसन्तताविरतानिःशम्‌ नभस्वद्‌ (१७) बात (१५) पवन ( १६ ) पवमान | नित्यानवरताजचमपि (२०) प्रमज्ञन ॥६४-६५॥ निरन्तर (लगातार) के नाम सततत ( वातस्य प्रभेदाः ) (२) अनारत (३) श्श्रान्त (४) सन्तत (५) धकम्यनो मदातातो, मरमावातः खदृथिकःः | श्रविरत (६) निश (<) नित्य ( ° अनवरत श्रोधीके नाम- (र) प्रकम्पन (र) महावात | ६) अज्च। , वर्धसि शरौधी का नम--८२) भाज्फा- ( चतुदेरातिदप्यस्य ,) वात ।\६६।\ अथातिशयो अर्‌, ।६&।। ( पञ्च शरीरस्था वायुभेदाः ) | 7 ग्राणोऽपानः समानश्चोदान-व्यानो वायवः। ती्ैकात-नितान्तानि गाद-बाढ-टडानि चञ< शरीरस्था द्मे | ्मरतिशय ( बहुत ) के १४ नाम-- (१) अत्ति. शरीर मं स्थितं वायुश के नाम--(१) | शय (२ ) भर (३) श्रतिवेल (४) शश (५) पराण ( हृदयस्धित वायु का नाम )। (२) श्चपान | अत्यर्थं (६) शअरतिमाच्र (७) उद्भाट (=) निर ( गुदास्ित वायु का नाम) (२) समान | (६) तीव्र (१०) एकान्त (१९ ) नितान्त ( १२ ( नाभिस्थित वायुका नाम )। (४ ) उदान | गाढ (१२) वाढ (१४) दढ ।! < | (करटख्ित वायु का नाम ) (५) व्यान | क्गीवे शीव्रा्यसत्व,

| वायु के २० नाम--(१) श्वसन (२) स्पदन | (३) लघु (४) क्तिप्र (५) अर (६) हत («) सत्वर

^ 9 स्यालनिष्वेषा सत्वगामि यत्‌ हृदि प्राणो, गुदेऽपानः, समानो नाभिसंस्थितः शी रादि (से लेकर दढ पयेत्‌ ` चान्‌ कशठदेरो स्य द्थामः सवेशरीरगः रीका | ) हाने ने | अन्नं प्रवेशनं \ मूत्रावुत्सगोऽन्विपाचनम्‌ शब्द्‌ यअसत्व ( विशेष्य च्रत्ति ) हाने पर कड

भव्रयादिनिभेषाश्च तदयापातः क्रमादमी ( नयं सक ) लिङ्ग हाते [ यथा--शीघ्र कत

0, (इ ~ व्योम चगः | / भाषाटीकासदहितः ८३३

| + वन, मूखः, शश याति] ओर जा इन ( दे सामान्यनधेः )

( शीघ्रः रादि ) शन्दोँ मे सत्वगामी विशेष्य | निधिनां शेवधिः

वाचक ) ही वरे तीनों लिन मेहते दै [ यथा- खजाने के नाम- (१) निधि (२) शेवधि। शीघ्रा धेनुः, शीघ्रो वृषः, शीघ्रं गमनम्‌ | ये दोनों शब्द नर ( यंलिङ्ग ) दे

( श्रतिशयः तथा (भर' सर्वदा पं्िक्गवाचक दँ ) ( निभिविरोषस्य भरव्येकम्‌ )

( सप्तदशा ङबेरस्य ) मेदाः पश्चशह्लदयो निधेः \ कुबेरस्ञ्यम्बकसखो यत्तराड्गुदयकेश्वरः 1७९ निधि के मेद - (१) पद्य (२) शख आदि ` मनुष्यधमां धनदो राजसओ धनाधिपः ( इति स्वर्गवर्गः )

किन्नरेशो वैश्रवणः पौलस्त्यो नरवाहनः ।।७२॥ यत्तेकपि ज्ञे खविट-ध्रीद्‌-युरयजनेश्वराः अथ ठथोभवगेः 9९८ नाम -५५ छर ९) व्यम्बु ( एकोनविरतिराकारस्य ) ^ दिवौ दे खियामभ्र व्योम पुष्करमम्बरम्‌ ! धर्मन. (६) ह. ( ) - राजराज (८) धनाधिप नभोऽन्तसितं गगनमनन्तं सुरवत्मं खम्‌ ॥१॥ (६) कित्रशं (१०) श्रवण (११ पालस्त्य वियद्विषप्णपदं वा लु शस्याकाशविदायसी ९२) नरवाहन (१३) यन्त (१४) एकपिद्ग (१५) एिलविल(६ ६) श्रीद (१५) परुजनेश्र ॥७६-७२॥ ८) 1 "जी 1 रकश के १९ नाम-(१) यो(२)दिव्‌ दून ( कुबेर ›) बाग का नाम- (१) चेत्ररथ (३) अभ्र (४) व्योमन्‌ (५) पुष्कर ) नम्बर ( एकं कुबेरपुच्रस्य ) (७) नभस्‌ (८) अन्तरित (६) गगन (१०) अनन्त ` पुत्रस्तु नलकूवरः ।॥७२॥ (१) सुरवत्मन्‌ (१२) (१३) वियत्‌ (१४) (दनक) पुत्र का नाम-- (१) नलकूवर्‌ ।७३।। विष्यणुपद्‌ (१५) आमकराशा (१६) विदटायस्‌ (१७) ( एकं कुबेरस्थानस्य ) विहायस (१८) नाक (१६) दुस्‌ ॥२॥ ( तारापथ, अन्तरिक्ष, मेघाध्वन्‌ मटाबिलम्‌--ये नाम

कैरासः स्थानम्‌ किन्ही 0 ( इनके ) स्थान का नाम-- (१) केलास केन्दीं पुस्तकों मै पाये जाते हं ) इनमें यो ~~ 4 दोनों शब्द (न ( एकं ऊबेरपुर्याः ) रोर "दिव्‌" ये दोनों शब्द स्रीलिङ्ग मं होते; अर्का पूः श्माकाश' शरोर 'विदायस्‌' नपुसक लिङ्ग हँ किन्तु

विकल्प से पिङ्ग मँ भी होते है. 'विटायस' शरोर

(इनकी) नगरी क्रा नाम-(१) अलका पिक नाक" युंिज्ग मे होते ह; युस्‌" अव्यय दे; शेष

( एक कुबेरावेमानस्य ) निमानं पुष्पकम्‌ करीव हें ॥१-२॥

( इनके ) विमान का नाम- (६) पुष्पक ( इति व्योमवगः ) ( चत्वारि किञ्नरस्य ) | ^ पदोऽखियां महापडाः श्रौ मकर कच्छपो स्यात्किन्नरः किम्पुरुष्तुरङ्जवदनो मयुः ॥७४ सुुन्द-ढुन्द-नीलाश्च ख्वेश्च निधयो नव किन्नरों के ४.नाम-(१) कित्र (२) किम्पुरुष भधोत्‌-पद्, महापद्य, श, मकर, वच्छप, मुकुन्द

(२) तुरगवदन (४) मयु ॥७४॥ , | इन्द, नील, खवै-ये £ निषि है

१२ असरकोचः [ म्रथमं काण्ड 0 0 0 0 0 9 9 9 0 (४ 9 09 9 ५, ^ 9 ^ 9, ^

0 09 0, 0 0 क, 0 0 0 ~ क, 9 + 0

छ्य द्दिम्चमेः पदिक दियत च्छल दे पञ्च दिशः )

| नाम-पूर्वैदिशा का पति--(१) इन्द्र \ आग्नेय का दिशस्तु ककुभः काष्टा आशाश्च हरितश्च ताः। | (१) अत्रि दक्षिण करा (१) पितृपति नऋ दिशां के नाम--(१) दिश्‌ (२) ककुभ्‌

का-(१) नैक्रीत पचिम का-( ) वरुण वाय-

(३) कारा (४) आशा (५) हरित्‌ | व्यका--(१) मरुत (पवन) उत्तर का-कुबेर्‌

प्रत्येकं द्व ढे चतख्णाम्‌ ) | ईशान का--(१) ईश ( महादेवजी ) ॥२॥ षाच्यवाची परतीच्यस्ताः पूव -दक्तिणए-पथिमाः। ( दिग्गजा्ना मेकैकम्‌ ) | उत्तरा दिगदीची स्यात्‌ परावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ॥२॥।

पूर्वै दिशा का नाम-(१) प्राची दज्ञिणदिशा | पुष्पदन्तः सार्वभौमः खु्रतीक्च दिर्गजाः 1 का नाम-(3) अवाची \ पश्चिम दिशा का नाम--- |

(१) प्रतीची उत्तर दिशा कानाम (१) उदीची 13) ( एकं दिग्भवस्य ) दिश्य जिषुः दिम्भवे | दिशा मं देनेवाली वस्तुओ के नाम ~ (5) दिश्य (यथा- दिश्यो दस्ती, दिश्या हस्तिनी ) यह तीनों लिद्गों मं दोता हे (दिशां पतीनामेकैकम्‌ ) दो वदः पिदृपविन ऋतो वर्णो मत्‌ ॥२॥ = ( ेरावतादीनां हस्तिनीनामेकेकम्‌ ) वेर देशः पतयः पूवदीना दिशा क्रमात्‌ 1 करिर्योऽभ्रषु-कपिला-पिङ्गकाऽचुपमाः कमात्‌ विन्दीं २. पुस्तकों मे यह श्नोक मिलत दै-- तारक श्रदन्ती चाङ्गना चाञ्जनावती अवाग्नमवाचीनसुदौ चीनसुद्गभवम्‌ | उपरोक्त एेरावत आदि दाथियो की टथिनियोके रत्यर्मवं प्रतीचीनं, प्राचीनं प्राग्व त्रिषु ॥१॥ | ते नाम--(२) श्रभ्रसु (९) कपिला अवागमव (दक्षिण दिशा में दोनेवाली वस्तु) का नाम--, (२ (१) अवाचीन उद्ग्भवर ( उत्तर दिशा मेँ होनेवाली | पिद्गला। (१) श्जुपमा ( १, ताघ्रकर्णौ ( ) वस्तु ) का नाम-( १) उदीचीन म्रत्यरमव पश्चिम | शुश्रदन्ती। (४ ) अङ्गना (१) अन्ननावती |). ।\

दिशा भँ होनेवाली वस्तु ) का नाम-( ) प्रतीचीन | दरे अगन्यादिकोणस्य ) भाग्भव ( पूवं दिशा होनेबले पदार्थं ) का नाम-- | ^ न्वपदिशं दि शोध्य विदिकूखिया कूसिया (१) चीन ये (अ्रवाचीन-उदीचीन-प्रतीचीन-प्राचीन) 1 ` शब्द तीनां लिङ्ग दति दो दिशा के मध्यभाग [काण] के नाम-_ (२) श्रन्य पुस्तकों मेँ इतना श्रधिक ह~ (१) सपदिश (२ ) विदिश ।। ५।। इनसे रविः शक्रो हीसूनुः स्वभानुमीनुजो विधुः (यरपदिशः नपुंसक स्मर अव्यय मी दहै “वि {९ ९: , उषो इढन्पतिश्चेि दिशां नैव तथा गदाः | लीलिक्ग सं होता है ॥५॥ + (च दिशा के अह का नाम- (१) रवि आग्नेय का (दवै मध्यमात्रस्य ) रफ दक्तिण का-( १) महीसूनु ( मंगल )। त्वन्तयालम्‌ का--(१) सालु (राहु) प्रशम का-(१) | अभ्यन्तर ( शनेश्वर ) वायव्य का--(१) विधु (चन्द्र ) बीच के स्थान के नाम (१) - अभ्यन्तर तर का (१) इुष दशान का (१) बृहस्पति (२) अन्तराल

पूर्वं दिशा के हाथी का नाम -(१) णेरावत द्राग्नेय कारण के हाथी का नाम--(१) पुरडरीक्र दत्तिण दिशाकेदाधीका नाम (१) वामन, नैक्रत्य कोण के हाथी का नाम--( 5 ) कुमुद्‌ पथिम दिशाके दाधी का नाम--( १) यच्रन वायव्य कोण के हाथी करा नाम--(१) पुष्पदन्त , उत्तर दिशा के हाथी का नाम--(3) सावभौम ईशान काण के दाथी का नाम-(3) खरती ३।।

निक

( ढे मण्डलाकारेण परिणतसमूहश्य »

( दे वच्रध्वनेः )

चक्वा तु मर्डलम्‌ | स्पर्जयुवंच्निघ्रोषः मर्डलाकार समूह्‌ ( घेरा) कै > नाम (१) त्रिजली कडकने के नाम- (१) स्फ़जथ चक्रवाल (२) मरडल (२) वज्रनिर्घोषि पञ्चदङा मेघस्य ) | ( ढे वज्राग्नेः ) अश्रं मेधो वारिवाहः स्तनयिल्नुर्बटादहकः॥६॥ | मेघञ्योतिरिरंमदः धाराधरो जकुधरस्तडित्वान्वारिदोऽम्बुभरत्‌ | ~न चमृक नाम्‌ (१) मृतः घन-जीमूत-मुदिर-जलमुग्धूमयोनयः | | ज्योति (२) दरंमद मेघ के १५ नाम-(१) अभ्र (२) मेध (३) ( 2 इन्दधयषः ) वारिवाह (४, स्तनयित्नु (५) बलाहक (£) धारा- | श्द्रायुत्र शक्रधजुः धर (५) जलधर (८) तडित्वत्‌ ( ६) वारिद इन्द्रधनुष के नाम- (१) इन्द्रायुध (२) १०) अम्बुखत्‌ १२) जीमूत शक्रधयु ति गय 4 मुदि जव. § तदेव ऋज्रोटितम्‌ ॥१०॥ ( मेषपडमदः ) सीधा इन्द्र धनुष का नाम-(१) ऋजरोहित ॥१०॥

कादम्बिनी मेघमाला

(द्धे वृष्टः) मेवसमृह के नाम - (१) कादम्बिनी (२) | बष्टि्व॑षम्‌

मेघमाला वपी के नाम--(९) बरष्टि (२) वं ( एकं मेघभवस्य ) | ( ब्रष्टिविघातस्य ) जिषु मेघभवेऽभ्रियम्‌ | तद्विघातेऽवनग्राहावन्रहौ समो मेष मं टोनेवाली वस्तु का नाम-- (१) भिय 1 सृखा मघ के नाम-(१) अवग्राह (२)

यह तीनों लिङ्गां मं होता दे (यथा-अभिया | अवग्रह ये दवनों शब्द्‌ समान (०) लिङ्गवाचकरै = आपः, अभरिवः आसारः, अभियं जलम्‌ ) | ( दे महाद्ष्टेः ) ( चत्वारि मेघध्वनेः ) धारासम्पात श्रासारः

स्तनितं गजितं मेघनिर्घोषो रसिता दि च।॥८॥ मूसलधार पानी बरसने के नाम (१) |

बादल के गरजने की श्ावाज के नाम | भारासम्परात (र) आसार (१) स्तनित (२) गजित (३ ) मेघनि्ीषर (४) ( एकमम्बुकणानाम्‌ ) शीकशरोऽम्बकरणाः स्मरताः ॥१९॥

रसित ॥<॥ ( दज्ञ वियतः } वायु से प्रक्िप्त जलकणों ( पानीके रवद) का शस्पा शतहुदा-हादिन्यैरावत्यः त्षणपरभा नाम-- (१) शीकर १॥ तडित्सौदामनी वि्यश्वश्चरा चपला अपि।॥&॥ ( दे वर्षोपरस्य ) वर्षोपटस्तु क्रक

बिजली के १० नाम- (१) शम्पा (२) शत- वीजा ठेरवती ला भगिरने के 2 नाम (2 ) वषापल् (२ हदा (३) हादिनी (४) एेरावती ( ५) ्षणप्रभा करका ` (१) ४४

(६) तडित्‌ (७) सौदामनी (८) विद्युत्‌ (६) चश्चला ( एक मेघान्धकारितस्य )

(१०) चपला ॥६॥ | मेघच्छुन्नेऽहि दुदिनम्‌

१४ { दिन मै बदली हने का नाम-(१) दुर्दिन अष्टावाच्छादनस्य ) ्नन्तधां व्यवधा पुंसि त्वन्तधिरपवारणम्‌॥ ९२ अपिध्रान-तिरोध्रान-पिधानाच्छादनानि टाकने के = नाम-(१) अन्तधां (२) व्य- वधा (२) अन्तधि (४) शपवारण (५) अपिधान (६) तिरोधान (७) पिधान (८) ्रच्छादन इनमें (१-२) खीलिङ्ग मं (३) पलिङ्ग (४-८) नर्पैसक में हेते हँ ॥१२॥ | ( वि्तिश्चन्दस्य )

हिमां शश्चन्रमण्चन्दर इन्दु: ूमुद्वान्यवः)) ९२ विधुः खधाशथः शभ्रशरोषधौशो निशापतिः अन्ञो जैवातृकःसोमो ग्लोग्ेगाङ्कःकरानिधिः दिजराजः शशध्यसे नच्तनरेशः च्तपाकरः 1

| चन्द्रमा के २० नाम- (१) हिमांश (२) चन्द्रमस्‌ (३) चन्द्र॒ (४) इन्दु (५) कुमुदवान्धव (६) विधु (७) खधांशु (८) शुभ्रांशु ( यष- भश्च (१०) निशापति (१९) श्रन्ज (१२) जैवा- तृक (१३) सोम (१४) ग्लो (१५) मृगाङ्क (१६) कलानिधि (१७) द्विजराज (१८) शशधर (१२६) नन्ततेश (२०) ्षपाकर्‌ १२-१४।

( एक चन्द्रपोडां दास्य )

कख तु षोडशो भागः

चन्द्र के सोलदर्वे भाग का नाम-- (१) कल।।

( दवे रविचन्द्रमण्डलस्य ) बिम्बोऽखी मरडटं जिष ॥२५॥ चयमर्डल --चन्द्रमरडल के नाम - (१) निम्ब (२) मराडल ॥१५॥ इनम “बिम्बः शव्द खी- लिङ्ग को दछोडकर शेष दो लिङ्ग (ध नपुंसको हाता है मराल शब्द तीनों लिङ्गो मेँ हाता हे ( चत्वारे खण्डमात्रस्य )

` भित्तं शकल्खरडे वा पुंस्यधैः 1 उकडे ( खरड ) के नाम-(१) भित्त

(२) शकल (३) खरड (४) शरध इनमे “भित्त

नपसक लिङ्ग है “शकल तथा खण्डः नपुंसक

अमरकोषः

0 0 0 0 0 0 0 9 0 0 0 9 9 ~ ~ 3 9 0 ~ ~ 9 0 = 0, -, ~, ५, 0

|,

[ प्रथमं काण्डं

लिङ्ग हाते हुए भी विकल्प से पुल्लिङ्ग में दाते हें) द्धः पुल्लिङ्ग मे दाता दै ( यथा-कम्बलस्याद्धः (खरडः) ओर वाच्यलिङ्ग भमी दे ( यथा-अद्धौ- शाटी, द्धः पटः, अद्ध वच्रम्‌ ) ( तुल्यखण्डद्रयमध्ये एक खण्डस्य ) अधं सम ऽशके | दो वरावर टुक्डेमेसे एक का नाम (१) अद्ध ग्रह नपुसक लिक्कमंदही हाता दहं ) ( च्रीणि चन्द्धश्रभायाः ) चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्ना न्वोदनी ( चन्द्रमा की मभा) के नाम -- (१) चन्द्रिका (२) कौमुदी (३) ज्यात्ख्रा \ ( द्वे नेसंट्यस्य ) प्रसादस्तु प्रसन्नता ॥९६॥ प्रसन्नता के नाम--( १) प्रसाद्‌ (२) मरसन्नता ॥१६॥ ( पट चिद्धस्य ) कल्काद्धौ लाञ्छनं चिदं खच्म लल्तणस्‌ चिह के नाम-( १) कलङ्क (२) अङ्क (२) लाञ्छन (४) चिह्न (५) चमन्‌ (£) लक्षण ( एकमुत्कृष्टयोभायाः ) खषमा परमा शोभा परम शोभा का नाम-- (६) खपमा चत्वारि शोभायाः ) शोभा कान्तिं तिश्चुविः ॥१७। शामा के नाम--(१) शाभा (२) कान्ति (२) दयति (४) छवि ॥१५॥

( सप्त हिमस्य ? दिन | अवश्यायस्तु नीहार स्तुव दिमम्‌ प्रालेयं मिहिका .

पाला के नाम--( १० यवरश्याय (२) नीहार (३) तषार (४) वदिन (५) दहिम (६) प्रालेय (७) मिहिका

( द्रे हिमसमृदस्य ) दथ हिमानी हिमसंहतिः ॥१८॥

दिग्बगेः |

^) का ~ (0 ~

महापाला समूह के नाम-( १) हिमानी |

(२) हिमसहति १८] ( एकं शीतगुणस्य, सक्च शीतखद्र व्यस्य ) शोतं गुणे, तद्धदथाः खषीमः शिशिरो जडः

तुषारः शीतलः शीतो हिमः सप्तान्यलिङ्ककाः।॥ `

ठंड का नाम-(१) शीत

शीतल द्रव्यके नाम-(१) सखषीम (२).

शिशिर (२) जड (४) ठषार ( ५) शीतल ( ) शीत (७) हिम ये सात तद्रदर्थं (= शीतगण वाले अथं युक्त) ओर अन्यलिङ्ग (= विशेष्य लिङ्ग ) के वाचक्र हं ।।१९॥ ( द्रं धवस्य)

ध्रव ओत्तानपादिः स्यात्‌

प्रव के नाम-(९) ध्रुव (२ ) चैत्तानपादि।

( चीण्यगस्त्यस्य )

मे्रावरूणिः

अगस्त्य के नाम -(१) श्रगस्त्य (२) कुस्भसम्भव (३) मैत्रावरुणि

( एकमगस्त्यपत्न्याः ) ¢ ^ अस्येव लोपाञुद्ा सधर्मिणी ॥२०॥

्रगस्य की धमपत्नी का नाम-- (१) ज्तोषा-

मुद्रा ।॥२०॥ ( षट्‌ नक्षत्रसामान्यश्य )

नच्त्खत्तं भं तारा तारकाप्युड्‌ वा खियाम्‌

तारा के & नाम-८( ) नत्ततर ( २) ऋल्त (२) (४) तारा (५) तारका (£) उड़-यह नपुंसक लिङ्गम हे किन्तु विकल्प से घ्रीलिङ्ग म॑भीदहातादहे।

( एकमरिवन्यादिभानाम्‌ )

दात्तायरयोऽप्रिविनीत्यादिताराः

श्िनी यादि (सत्तादस) नच्षत्राका नाम-- ( ) दात्ञायण्य यह च्रीलि ङ्ग मं निय बहु- वचनान्त होता हे

दे अरिवन्याः )

अश्वयुगश्विनी ॥२१॥

भाकटीकासादहतः

अगस्त्यः कुम्भसम्भवः |

ध्विनी न्त्र के नाम-(१) अश्वयुक्‌ (२) अश्विना ।॥२१॥

( विखाखायाः ) राधा वद्ारखा | विशाखा नच्च कं नाम--(१) राधा (२) विशाखा |

|

त्रीणि पुष्यस्य ) पुष्ये तु सिध्य-तिष्यो पुष्य नन्नत्र के नाम--(१ ) पुष्य ८२) सिध्य (३) तिष्य { दे धनिष्टायाः )

= - ~~~ = =

श्रविष्टया समा धनिष्ठा धनिष्ठा ननलच्र के नाम ) श्रविष्ठा (२)

| धनिष्ठा

( ढे पूवंभद्रपदोत्तरभद्रपदानाम्‌ ) स्युः पोष्ठ्रदा भाद्रपदाः सिय: ॥२२॥ पूवाभाद्रपदा ओर उत्तराभाद्रपदा के नाम- (१) प्रो्रप्रदा (२) भाद्रपदा ये शब्द्‌ खरीलिङ्घ नित्य बहुवचनान्त म॑ होते हं ।।२२॥। ( च्रीणि शगरिरसः ) | स्गशीष स्यगशिरस्तस्मिन्नेवाय हायणी | म्रगशिरा नक्लत्र के नाम--(१ ) खग्ीर्ष | (२) गशिरस्‌ (३) श्मग्रहायरी ‹ख्टगर्षीषाडारो देदाध्थानां पञ्चानां स्वल्पतारकाणामेकस्‌ ) इल्वरास्तच्छिरोदेशे तारका निवसन्ति याः।२३। | ख्रगाशेरा नच्तेत्रं कं मस्तक पर स्थित पाच कटे-द्टे ताराश्मांका नाम -- (१) इल्वल ॥२२॥ ( नव बृहस्पतेः ) बहस्पतिः सुराचार्यो गीपंतिर्धिषणो गुखः जीव आङ्गिरसो वाचस्पतिश्ि्रशिगर्डिजः। वृहस्पति के & नाम - (१) ब्रदस्पति (२) खराचाये (३) गीति (४) धिषण (५) गुरु (६) “इन्वकाः” इति पाठन्तरम्‌

१६

+ 9 0 ------------------------------------------------------------<----------~----~----~~--~~-~<----~---~--------~----~------------ `. जर्ङडरस

अमरकोषः

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| प्रथमे काण्डं

जीव (७) आङ्गिरस ( ) वाचस्पति & ) चिच्र- शिखरिडिज्‌ 1\>२४\]

( षट्‌ शक्रस्य ) शुक्रो दैत्यगुखः काव्य उशना भार्गवः कविः

राशियां के उदय का नाम -(१) लप्र उन लमों के नाम-मेष, व्रष रादि 11२७} ( सश्चन्निरात्‌ सूयस्य ) सूर-सूर्यायमाऽऽदित्य-ददशात्म-दिवाकराः

शुक्र के नाम-( १) शुक्र (२ ) देखयगुर | भास्कराहस्कर-त्रध्न-पभाकर-विभाकराः॥ २८ (३) काव्य (४) उशनस्‌ (५) भागव | भास्वद्विवस्वर्स्ताश्व-हरिदश्वोष्णरश्मयः (६ ) कवि \

( पञ्च मङ्गटस्य )

अङ्गारकः कुजो भौमो लोहिताङ्गो महीखुतः। २५

मङ्गल के नाम-(१) अङ्गारकं (२) कुज (२) भोम (४) लारिताङ्ग (५) मटीखुत \२५। सेरिका ( श्रीणि बुधस्य ) रोदिणयो चुः बुध के नाम-- (६) रोदिण्य (२) बुध (३) सोम्य , ( दे रनेः ) रः समो सौरिशनैश्चरौ 4 नकर नाम- (९) सौरि (२) शनैश्चर दानँ शब्द्‌ अर्थ एवं लिङ्ग मं समान हे ( चञ् राहोः ))१* तमस्तु राहुः स्वभोनुः सेहिकेयो राहु के नाम- (१) तम॒ (२) राट (२) तानु ( सेहिकेय (५) विधुन्तुद ।।२६॥

विकतंनाकः-मावर्ड-मिदि रारुण-पुषणः ॥।२६॥। दुमणिस्तरणिमित्रश्चित्रभानुर्विरोचनः विभावसुग्रह पतिस्त्विषाम्पतिरहर्पतिः ।२८॥। भावु्दसः सहस्ाश॒स्तपनः सविता रविः सूये के २७ नाम--(१) सूर (२) सूर्यं (२) स्रयेमन ( ) आदित्य (५ ) द्वादशात्मन्‌ ( £ ) दिवाकर (७) भास्कर ( ) अहस्कर ( €) व्र्न ( १०) प्रभाकर (११) विभाकर (१२) भास्वत्‌ (१२) विवस्वत (१४, सप्ताश्व (१५) हरिदश्व (१ & ) उष्णरशमि ( १७ ) विकर्तन ( १८ ) अर्क (१६) मार्तरड (२०) मिहिर (२१) अरुण (२२) पूषन्‌ (२२) दुमणि (२४) तरणि (२५) भित्र (२६)

| चिच्रभाु (२७) ` विरोचन (२८) विभावसु (२8)

ग्रहपति (३०) त्विषांपति. (३१) ग्रहपति (३२) भानु (३३) टस (२४) सदां शु (३५) तपन (३६) सवित (२५) रवि ॥२८ - २०।।

तुलाथ बृधचिको धन्वी मकरः ऊुम्भ-मीनको

श्रथात्‌- (१) मेष (२) वरप (२) भिधुन (४) सिह

(६) कन्या (७) तुला (=) वृश्चिक (६) धनु (१०) मकर्‌

करही-कहीं ये क्नोक श्रधिक मिलते दं-- पद्य्तस्तैजसां राशिश्डायानाथस्तमिसदा ` कर्मसाक्षी जगचच्तलोकवन्धुस्रयीतनुः प्रचोतनो दिनमणिः खचोतो लोकबान्धवः ! इनो मगो धामनििन्चांशमाल्यल्जिनीपतिः

भर्थाच्‌- सूर्य के १७ श्रौर नाभ--(१) पदान्त (=)

तेजसां राशि (३) घायानाथ ( ) तभि्लहन्‌ ( ) कर्मं - मरीचि ( २) भङ्गि ( ) श्रतरि | पष्‌ (६) जगच्चचुष्‌ (७) लोकबन्धु (<) जथीतमु (& ) ) पुलंद (६) क्रतु (७ ) वसिष्ठ | प्रचोतन (१०) दिनमणि (११) खयात (६२) लोकबान्धव

सयो ( एक ससर्पीणाम्‌ ) मराच्यत्रिमुखाशिनव॑वशिखणिडनः ` ति ग्रमुल सपतर्षियों का नाम- [१] | (१९) कम्म (१२) मीन चित्रशिखरिडन ६.१ यह्‌ पल्लिद्ग चो नित्य बहु- वचनान्ते, पुल्लिङ्ग ओर नित्य बहु ( एकं रादयुद्यस्य - पीनायुदया लम तेत नामुद्या लमनं, ते मेषं-ृषाद्यः॥२७॥ ध. | अतिः पुलसत्यः पुलहः क्रतुः पष्ठस्चेति सप्तत शेयाध्ितरशिलणिडनः -( ) ४५ पुलस्त्य ( सरपं चित्रशिखरुडी षो कहलाते है

मिथुनं ककटः सिंह -कन्यके

(१३) इन (९४) भग (१५) .धामनिषि (१६) अंशुमालिन्‌ (१७) श्नन्जिनीपति

का्वगेः | ( सूयपादवस्थानां माटरादित्रयाणामेकैकम्‌ ) माठरः पिङ्गलो दर्डश्चरडाशोः पारिपारि्वका

चरो ओरके गरहौ) के मार्‌ (१) पिङ्गल (१) दरड ।।२१॥ ( पञ्च सूयंसारथेः ) सूरसूतोऽरुणोऽनूरूः काश्यपिगंख्डाग्रजः। सूयं के सारथी के नाम-( १) सूरसृत (२, अरुण (३) अनूरु (४) काश्यपि (५) गरुडाग्रज ( चत्वारे परिवेशस्य ) परिवेशस्तु परिधिरुपसूर्यक-मरडले ॥२२॥ परिवेश (= सूयं के चरो ओर, कमी-कमी दर्यमान कुरडलाकार तेज विशेष ) के नाम-- (१) परिवेश (२) परिधि (२) उपसूर्यक (४) मरडल यटा 'परिवेशः" के साहचयं से "परिधिः को लिङ्ग समना ॥३२॥ ( एकादशा किरणानाम्‌ ) किरणोख-मयुखाश्-गभस्ति-घणि-रश्मयः

|

किरण कं ११ नाम-(१) किरण (२) उख

परडश्चु ( सूय ) के पारिपाश्चक ( समीपवर्ती एक-एक नाम -८ ) `

भाषाटीकास हितः

न््यण्वाण्यष्व ~ ~ ~~ ~~ ~ ~ ~ --~ ~ ~ 4 र. 000 0 6 0

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पः 0 तः ++ पी"

| (४) त्विष्‌ (५) भा (६) मास्‌ («) द्वि (र) द्युति

|

9

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|

|

भाजुःकरो मरीचिःखी-पुंसयेदींधिति खियाम्‌३३ टं किन्त भमवान्‌ तानां लिङ्गम दीतटं।

(२) मयूख (४) अशु (५) गभस्ति (€) घृणि (७) |

ररिमि (८) भानु (६) कर ( १० ) मरीचि (११)

दीधिति इनम (१-६) शब्द्‌ पुंलिङ्ग, ओर ( १० ) मरीचिः खीलिज्ञ-युंललिङ्ग ( १९१) खीलिङ्गमें हाता

हे ३२ ( एकादश प्रभायाः ) स्युः भरभा-टम्चिस्त्विङ्भा-भाशलुवि द्यतिदीप्तयः। रोचिः शोचिरुभे ्गीवे

उक्तं सोरतन्त्रे -

शक्रोऽस्य वामपाश्वं तु द॑ख्डाख्यो दण्डनायकः वह्विस्तु दत्रे पाश्वे पिङ्गलो वामभागतः। यमोऽपि दक्षिणे पाश्वं म॑वेन्माठरसंज्ञया

शधृष्णयः" इति केचित्‌ ; शश्नयेः” इत्यन्ये पठन्ति

|

(€ ) दीप्ति १०) रोचिष्‌ (१९१) शोचिष्‌ इनम

श्रभ? से लेकर दीपि' शब्द्‌ तक खीलिङ्ग है; तथा

"रोचिष्‌* ओर शोचिषः ये दोनों नपुंसकलिङ्ग दै

(त्रीणि जातपस्य)

प्रकाशो दयोत आतपः ॥२४॥

धूप के नाम-(१) प्रकाश (२) द्योत (३) स्रातप ॥२४॥ |

( चत्वारि इषटुष्णस्य ) कोष्णं कवोष्णं मन्दोष्णं कड्ष्णं चिषु तद्वति जरा-जरा गरम कुनकुना के नाम--( १.)

| कोष्ण (२) कवोष्ण (२) मन्दोष्ण (४) कुष्ण

ये नपुंसक लिङ्ग में टँ किन्तु तद्वान्‌ ( = धर्मवान्‌ ) मं तीनां लिङ्गामदहोत दह ( चीणि अस्युष्णस्य ) तिग्मं तीदणं खर तद्वत्‌ बहुत तेज्ञ गरम के नाम--(१) तिग्म (२) ती च्ण (३) खर ये तद्वत्‌ ( कोष्ण शब्दकी भति ) हे तात्पयं यह है करि नपुंसक लिङ्ग

दे खगत्ष्णायाः ) स्रगतृष्णा मरीचिका ॥३५८॥ स्रगतृष्णा के नाम-(१) म्रगतृष्णा (२) मरीचिका ॥३५॥ इति दिग्बगंः

अथ कालवग;

( चत्वारि सामान्यकालस्य )

रु प्रभा के ११ नाम - (१) प्रभा (२) रुच. (३) रुचि | काटो देटोऽप्यनेहापि समथोऽपि

सम्य कं नाम-- (१) काल (२) दिष्ट (२) ( प्रतिपत्तिधेः ) अथ पक्तिः प्रतिपदुद्धे इमे ख्रीत्वे

१८ | अमरकोषः [ ्रथसं काण्डं

,, > + का रि

प्रतिपदा के नाम-(१) पक्ति (२) प्रति- | राह 1 इन तीनों का संयुक्त नाम ्॒रिसन्ध्यः हे पद ये खीलिन्न मे होते हें 1 | ( द्वादश रात्रेः ) #. | ( एक सामान्यतिधेः ) | पथ शवेरी ।३॥} तदायास्तिथयो दयोः ॥९। | निश निशीथिनी राजिखियामा त्तएद्‌ा च्तपा। प्रतिषदादि का नाम-() तिथि यह शब्द | विभावरी-तमस्विन्यौ रजनी यामिनी तमी।13}\ दोनां लिङ्गा (पु च्री°) में दोता हे रात्रि के १२ नाम-() शवरी (२) निशा ( पञ्च दिनस्य ) (३) निशीथिनी (४) रान्न (५) चियामा (६) सहणद्य घस्रो दिनाहनी वा त॒ ्ीवे दिवस-वाखरो 1 | (७) क्तपा (८) विभावरी (€) तमस्विनी (१०) रजनी दिनि के नाम-(१) (२) दिन (३) | (5) यामिनी (१२) तमी ,

~~

अदन्‌ (४) दिवस (५) वासर \ इनम ^्दवस' ओर ( एकमत्यन्धकाररात्रेः ) "वासर पंलिद्ग के अतिरिक्त नपुंसकलिङ्ग मं भी | तमिस्रा तमसी राजिः होते दें अधियारी रात का नाम-(3) तमिखा | ( षट्‌ भ्रभातस्य ) पि | ( एक उयोत्स्नावद्रारेः 9 प्त्युबोऽदेसुसं कस्यमुषः प्रव्युषसी अपि 1२ उयोरस्नी चन्द्रिकयान्विता

प्रभातं ब्रत-काल कं नाम--(१) प्रत्यूष (२) अह- एक दिनद्रयमध्यगतरात्रेः )

(३ 1 (४) उषस्‌ ( ५) मरत्युषस्‌ (६) प्रभात आगाभिवतेमानादयंक्तायां निशि पक्तिणी | ५॥ 0 पुलिङ्ग के अतिरिक्त अनिवाली च्रौर वर्तमान दिनवाली रात का नपुसक लिङ्ग मं मीटोता दै, |

नाम--(9) पक्तिणी ५॥

( एकं दिनान्त एी ॥| (त ( एक रात्रिसमयुदायस्य ) | गणराज निशा बहघः

दिनान्त का ---- = | न्तका नास (१) सायः वहुतसी रात्रिर्या का नम--(१) गणराच्र ( हे सन्ध्यायाः ) | ~ _ > | ( दे रान्निप्रारम्भस्य )

्चोदनी रात का नाम-( ) ज्यौत्स्नी

"१

सन्ध्या पितृध्रखूः | जनीसुख

सन्ध्याके नाम-( १) सन्ध्या (२) | + प्रदीषो मू ।॥

पितृप्रसू | रात्रि के पूर्य भाग के नाम--( १) प्रदोष ( एक दिनायन्तमध्यानाम्‌ ) (२) रजनीमुख गहमापराह्मध्याहासिसन्ध्यम्‌ ( दे रान्निमध्यस्य ) नाम -(१) मध्याह शाम का नाम-(१) अप- प्राधीरात के नाम--(९) अधरात्र (२) शकषकननदि "प्र ------ | निशीथ "६।- कन्ट्‌] तृ में | * न= ४०

नाम मिलते < तका म॒प्रातःकाल श्रौर ( प्रहूरस्य )

व्युष्टं विमत्त दे छीवे पुंसि गोस्तगं इष्यते अरथौत्‌ _ ^: धि याम-प्रहरौ समौ , ^ (२) व्युष्ट (२) विमत (३) गोसगं दौ ।६।॥

इनमें न्यु 4 श्रोर : भ्‌ ¬ ^ $ ~ याम नगं रः धमात्‌" ये दोनों नपुंलिङ्ग मं शौर पदर के नाम--( 9 याम ( ) पर ग्‌ पुत्लङ्ग यं होते ह्‌ | दो नां समानलिन्न (पु) ह्‌ ।।£॥

कालवगंः ] ( एकः पवंसन्धेः ) पवंसन्धिः प्रतिपत्पञचद्श्योर्यदन्तरम्‌ प्रतिपद्‌ ओरौर पञ्चदशी (पूर्णमा) के वीच वाली सन्धि का नाम-(१) पर्य एकं पश्चान्तस्य ) पत्तान्तो पञ्चदश्यौ दे ्ममावस्या ओर पूणिमा पक्तान्त

क्रा नाम--(१) ( हे पूणिमायाः ) पौणेमासी तु पूणिमा ॥७॥ पूर्णिमा के नाम--(१) पौणमासी (२) पूरमा ॥५॥ ( एकमनुमत्याः ) कटादीने साऽनुमतिः तीण चन्द्रकलावाली पूरिमा का नाम-() स्रनुमति ( एकं राकायाः ) पूं राका निशाकरे पूणा चन्द्रकला सदित परिमा का नाम- (9) राका ( चत्वारि कृष्णपक्षान्ततिधेः ) अमावास्या स्वमावस्या दशं: सू्यन्ढुसङ्गमः॥ ्रमावस्या के नाम -- (१) अमावास्या (२) ्रमावस्या (३) दश (४) सूर्यन्दुसंगम इनमें

"दश ओर “सर्यन्दुसङ्गमः ये दोना पुंलिङ्ग देँ ॥८॥ |

( एक सिनीवाल्याः ) खा दण्द # सिनीवाटी अमावस्या मं चन्द्रमा दिखलद पडे तो उसका नाम- (१) सिनीवाली ( एक इद्धाः ) सा नष्ठन्दुकला कटः नष्ट चन्द्रकलावाली अमावस्या क्रा नाम- (१) कटू ( ढे रहस्य ) उपरागो ग्रहः

=

~ `

=; १९ | ग्रहण के नाम--(१) उपराग (२) अह 1 | ( दवे राहुयस्तस्येन्दोः सूर्यस्य ) | राहुभ्रस्ते त्विन्दौ पूष्णि ॥&।! सोपक्षवोपरक्तो द्धौ राहु से यस्त इए चन्द्र या सूर्य के नाम-- (१) सोपश्चव (२) उपरक्त ।॥8॥ ( दे आकादादिष्वञ्िविकारस्य ) अग्न्युत्पात उपादितः धूमकेतु के नास--(१) अग्न्युत्पात (२) उपाहित ( एकं सञुच्चितचन्द्र-सूययोः ) एकयोक्त्या पुष्पवन्तौ दिवाकर-निश्ाकरोौ।८। सूयं ओर चन्द्रमा का संयुक्त नाम--( १२) पुष्पवन्तौ ॥१०॥ , (एकं काष्टायाः ) अश्टादश्च निमेषास्तु काष्ठा १८ निमेष = काष्टा

( “अक्तिपच्म- परित्तेपो निमेषः परिकीर्तितः के अजुसार एकवार पलक मारने के समय को निमेष कहते हें ) | ( एक कायाः ) | निशत ताः कला | | २० काष्टा = कला | ( एकं क्षणश्य ) तास्तु चिशत्त्तणः | २० कला = त्तर ( एकं मुहूतंस्य ) ते तु सुहवां द्वादशाल्ियाम्‌ ॥१९१॥ १२ क्षण = यूर सुदूरतः शब्द्‌ खीलिकग को छोड़कर शेष दोनों लिङ्गां मे टोता है ॥११॥ ॥. ( एकमहोरात्रस्य ) ते तु चिशददहोराचः २० सुद्रूतं = अहोरात्र ( एकं पक्षस्य ) पकतस्ते दश पञ्च } १०५५ (= १५) अहोरात्र = पञ

कल"

२० असमरक्छोषः

# ^ [ प्रथमं काण्ड. +) >) 0 7 9) 7) 9 ^ ९. 0 9 0 च~र + 1

पोष के -नाम-८१) पौष (२) तेष

„~ 0 0 0 + ~ 9

( एकैकं जुङ्-कूष्णपक्षयोः )

#

पत्त पूवोपसे शङ्-रूष्णो ` ( ) सदस्य मास के पूव पक्त का नाम-(१) शुक्त द्वे माघमासस्य ) मास के अपर पक्त का नान- (१) कृष्ण तपा माघे ( एकं मासस्य ) | माघके २नाम--(१) तपस्‌ (२) माघ 1, मासस्तु ताघुभो ॥१२॥ | ( त्रीणि फाल्गुनस्य ) कप्त कृष्णपन्त = मास ॥१२॥ | | अथ फार्गुने | ( एकम्‌ ऋतोः ) | स्यात्तस्य: फाटगुनिकः दोढौ मागोदिमासो स्यादतुः फाल्गुन के नाम--( १) फाल्गुन (२) मागशीषं रादि दो मास = ऋत्‌, | तपस्य ( ) फाल्गुनिकः ( एकमयनस्य ) ( णि चैत्रस्य ) तेरयनं तरिभिः | स्याच्चैजे चैचिको मधुः ऋतुत्ां का अयन 1 के २नाम-( १.) चेत्र (२) चैचि ( एकैकमयनद्वयस्य >). | (२)मधु॥ १५॥

अयने दवे गतिख्दष्दक्तिणाऽकोस्य वत्सरः ॥१३॥ ` दयन दो प्रकार का होता है- एक सर्यकी | उत्तरागति ( जिसे उत्तरायण कहते है ); ओौर | वैशाखे माधवो राधः | दूसरी दक्तिशा गति (जिसे दक्षिणायन कहते हे) वेशाख के नम-(१) वेशख (२) अयन = वर्ष ॥१३॥ माधव (३) राच) ( दे समरात्िदिवकारस्य » ( ढे ्येष्टमासस्य ) समराजिन्दिवे काले विषुवद्धिषुवं तत्‌ 2 यताः जिस ( तला संक्रानित शौर मेवसकन्ति क) | 2१, ५. मथ दिन ओर रात बरावर दोता है उस समय + को (१ ) विषुवत्‌ ( ) विषुव कहते > शचिस्त्वयम्‌ ( चत्वारि मागंदीर्षस्य य्राघाद मागशीषे सहा ^ ८१५५4 सः ॥९७॥] = आषाढ के .२. नाम--(१) शचि (२ 9 अरगहन के नाम -( १) मार्गशीष @ स्रषाठ सहस्‌ ( ३) माग (४ ) आग्रहायिकं १५

( ज्रीणि वैशाखस्य )

च्रीणि श्रावणस्य ) ध्रावशे तु स्यान्नभाः श्रावणिकश्च सः द्‌ ॥\

न्रीणि ( त्रीणि पौषस्य ) षर तंष-सहस्यो द्वो श्रावण के नाम-(१) श्रावण (२ नभस्‌ ( ३) श्रावणिक॥ १९ ;

किसी पुसतक मे यह ओक मिलता है | ˆ -------------

धयुक्त पो॑मासी पौषी मते त॒ यत्र सा। है इसी प्रकार श्नौर भी माध ्रादि( मषा नदर स॒पोपो माधाचाश्चैवमेकादशापरे फल्युनी नचत्र चित्रा विशाखा [१

पपौ रीरोभायन थच पोर्णमासी को पौषी" कते दै | श्रवण भद्रपदा श्मश्विनी १० कत्तिका ११ खग शासौ जिस माप मे हो उत मांस को पौष कहते | शिरा ) एगारह (== एकादश ) महिना जानना

कारुवगंः ]

0 0 0 0 4 0-0-44 4 ५-५4-५

( चत्वारि भाद्रपदमासस्य ) स्युनेभस्य-परोष्ठपद्‌-माद्र-माद्पदाः समाः

(३) भाद्र (४) भाद्रपद ये समान लिङ्गवाचकः देँ ( चरीणि आदिवनस्य ) स्यादाररिन इषोऽप्याश्वयुजोऽपि १. क्रार के नाम--(९) आशिन (२) इष (३) च्म द्ाश्चयुज |

( चत्वारि कार्तिकस्य )

4 दस कोक स्यात्तु कात्तिक ॥१७॥ कार्तिक के नाम--(१) कार्तिक (२) वाहू (२) ऊज (४) कार्तिक्रिक ॥१७॥ ( एकं मागं-पौषाभ्यां निष्पन्नस्य्तोः ) हेमन्तः ्रगहन-पौषमहिनेवाली ऋतु का नाम-- (१)

( एकं माघ-फाल्गुनाभ्या्टतोः )

शिशिरोऽखियाम्‌ माघ-फाल्गयुन महिनेवाली ऋतु का नाम-- 145 ( १) शिशिर यह चखीलिन्न को छोडकर ) ` ~ लिङग तथा नपुसकः लिङ्गम दोताद। (८ चीणि चेत्र-वैशाखाभ्याश्टतोः )

वसन्ते पुष्पसमयः खुरभिः

( ) वसन्त ( ) पुष्पसमय (३) खरभि ( स्च ज्येष्टाषाटाम्याश्तोः ) ग्रीष्म ऊष्मकः ॥१८॥ निदाघ उष्णोपगम उष्णं उष्मरागमस्तपः | ज्येष्र-त्राषाद्‌ महिनेवाली ऋतु के नाम- (१) ग्रीष्म (२ ) उष्मक (३) निदाघ (४) उष्णोपगम (५) उष्ण (६) ऊष्मागम (७) तप ॥१८॥ ( ढे भावणभाद्राभ्या़तोः ) लिया भाष्‌ खियां भूलि वषाः सावन-भदे महिनेवाली ऋतु के नाम- ( १) प्रावृष्‌ (२) वष इनमें भ्रावरट्‌ः शब्द

माषाटीकासहितः

"(2 9 यो = 7 (~ 9 (+ अ.

भादा के नाम--(१) नभस्य (२) ग्रौष्टपद

चेत्र-वैशख महिनेवाली ऋतु के नाम-- |

ग्ट ( षान्त ) खीलिद्ग में; योर "वषः शब्द खीलिद्ध नित्य बहुवचनान्तमें हाता हे ( एकम्‌ आदिवन-कार्तिकाभ्याश्टतोः ) अथ शरत्खियाम्‌ ॥१६॥ क्रार-कार्तिक महिनेवाली तुका नाम-(१) शरद्‌ यह शब्द्‌ ( दकारान्त ) स्रीलिद्गमें हाता दे १९ ( देमन्तादीनां षण्णामेकम्‌ ) षडमी ऋतवः पुंसि मागांदीनां युगैः कमात्‌ मागे-शीषं आदि दो-दो महिने के ये हेमन्त रादि ऋतु" टोते यह (ऋतुः शब्द्‌ पुंलिङ्ग | मंद्ोता दे | ( पट्‌ संवत्सरस्य ) | संवत्सरो वत्सरोऽब्दो दायनोऽखी शरत्समाः | वपे के नाम-( १) संवत्सर (२ ) वत्सर ( ) अन्द्‌ (४) टायन (५) शरद्‌ ( & ) समा इनमं संवत्सर" से लेकर श्टायनः शब्द पर्यन्त पुल्लिङ्ग तथा नपुंसक लिङ्ग भे; शरद्‌ खरीलिज्ञ मं, श्रौर समाः" खीलिन्ग नित्य बहुवचनान्त हे ॥२०॥ ( एकमहोराच्रस्य ) मासेन स्यादहोराजः चेच: मलष्यों का महीना => पितरों काश ्रहाराच्र ( दिन-रात ) ५4 | मनुष्यों का साल= देवता रं देवताश का दिनरात | दैवे गस दधे नाद्यः वताम का २०० = ह्य ्रहोरात्र | ` २००० शुग = पजह्माका | |

( एक ब्रह्मणो दिनस्य ) कल्पो ठु तौ णम्‌ ॥२९॥

* कृष्ण पक्त की अष्टमी से शक्छपत्त की ण्य पितरो का दिन होता दै शुप्त की अष्टमी से

कौ अष्टमी तक पितरों की रात्रि दोती है स्वताओं का उत्तरायण" दिन है ओर दक्षिणायन, रा

बरह्मा का दिन मनुष्यों का सिथितिकं

वो ओर्‌ ब्रह्य रात्रि मनुष्यों का प्रलयकाल हे को

न्टेर

उन देवताश के २००० युग =ब्रह्माका प्रदोरात्र = मचुष्यों का कल्प। ( एक मन्वन्तरस्य ) मन्वन्तरं तु दिव्यानां युगानामेकसक्तति;। देवताग्रों के ७१ युग=१ मन्वन्तर ( नपुंसक लिङ्ग ) ( पञ्च प्रख्यस्य ) संवतः प्रख्यः कट्पः त्तयः कल्पान्त इत्यपि विष्णुपुराण-- क्रतं त्रेता द्वापरं कलिश्चेति चतुयुंगम्‌ प्रोच्यते तत्सदखं तु ब्रह्मणो दिनसुच्यते शर्थात्‌-( कृत + त्रेता + द्वापर +- कलि ) >< १००० = बरह्मा का दिन मलु का कथन दै-- चत्वायोहुः सदस्राणि वषौरणां तु कृतं युगम्‌ तस्य॒ तावच्छतो संख्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः इतरेषु ससन्ध्येषु ससन्ध्यांशेषु त्रिपु एकापायेन वतेन्ते सदखाणि शतानि एतट्द्वादशसादसं देवानां युगसुच्यते दैविकानां युगानां सदं परिसंख्यया ब्राह्ममेकमदञ्चेयं तावतीं रात्रिमेव च॥ देववपं के शरनुक्तार कृतयुग का मान == ४८००; मनुष्य वपेमा्नं 5 ( ४८०० देववषं + २६० दिन =) १७२८८०० देववपं के ्रनुसार त्रेतालुग मान = २६००; मनुष्यवपंमान ५9 == ( २९००८ २६० = ) +: १२९९००० देवषपं के अनुसार द्वापर युग का मान = १४०८; मनुष्य वेषं मान॒, =( २४००६३६० = )

>" „` ४८ ^ <ववपं कं अरनुसार्‌ कलियुग का मान == १२०० मनुष्य वषेमान = ( १२००८२६० = )

इरः 8६ ४2२२००० चारो युगो का देवव ४८०८ + २६०० 1२४००

+ ९२०० == १२००० ्य॒ 29 9) भुष्यवषं = १७२८००० -- १२६९६ © © ©

+ ८६४००० ४३२२००० == ४२२०००० देव वषं के अनुसार ब्रह्मा का दिन = १२००० >८ १००० == ९२०००५०० मचुत्व वं 1 ` {1 ची . रः ` == ४२२०००० > १००० ~ ४२२०००००००

अमरकोषः

0 0 0 (४ 9 0 9 09.09 ^ #।

[ ब्रथसं काण्ड

प्रलय के नाम--( १) सवतं (२) | (२) कल्प (४) ततय ( ५) क्रल्पान्त्‌ ॥२२॥.

द्वादश पापस्य )

अखरी पटं पुमान्पाप्मा पापं किंर्विष-कस्मषम्‌ कलुषं चृजिनैनोऽघमंहीदुरित-दुष्कतम्‌ ॥२३॥

पाप के १२ नाम -( १) पङ्क (२) पाप्मन्‌ (३) पाप (४) किल्विष (५) कल्मष (£) कलनुप ( ) वृजिन ( ) एनस्‌ ( ) अघ (१०)

अस (११) दुरित (१२) दुष्कृत इनमें (१)

पङ्क ( खीलिज्गवार्जत ) यँल्लिङ्ग ओर नपुंसक मेः ( ) पाप्मन्‌ रँल्लिद्गमें ओर शेष २-१२) नपु सक लिङ्क मे दोते ॥२३॥ ( पञ्च धमंस्य )

स्याद्धमेमखियां पुए्य-श्रेयसी सुरतं वृषः

धमे के ५नाम-(१) धर्म (२) पुर्य (२) श्रेयस. (४) स॒ङ्ृृत ( ५) वृष इनमें (१) वम" पुँल्लिङ्ग ओरौर नपुंसक मे; ( २-४ ) नपुंसक मेँ ८५) वृष पँखिङ्ग में)

1 ( द्वादश आनन्दस्य )

मुत्प्रीति प्रमदो हषः प्रमोदामोद्‌-सम्मदाः॥२७ `

स्यादानन्दथरानन्दः शमे-शात-सखुखानि

्रानन्द के १२ नाम-(१) मुद्‌ (२) म्रीति (२ ) प्रमद्‌ (४) दष (५) प्रमोद ( £ ) आमोद्‌ (७) सम्मद्‌ (८ ) आनन्दथु (६) नन्द्‌ (१०) शर्मन्‌. ( ११) शात ( १२) सुख इनमें ( १-२ ) साहचयं से खीलिद् (२-€ ) पुंलिङ्ग ओर (१० १२ ) नपुंसक टै ॥२४॥

( द्वाद कल्याणस्य )

ति

-

श्वःश्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मङ्गलं शुभम्‌॥२५ भाष्ुकं भविकं भ्यं कुशं च्तेममस्ियाम्‌ ~

शस्तं

कल्याण के १२ नाम-(१) श्वःश्रेयसं (२) शिव (३) भद्र (४) कल्याण (५) मङ्गल (६) शुभ (५) भावुक (८) भविकं (६) भव्य (१०) कुशल (११) चेम (१२) शस्त

काल्वगेः | भाषाटीकासहितः क, =

3 0/2 (07000 0 00 0 00/00 0 0 0 0 0 0 0. 0 0 1

= ~ न= ---~-~---~-~-न--------~--------- -----3-333-- += = --- गिरिर सरर ता या-क

इनम (१-१०) नपुंसक मं (११-१२) नपुंसक योर पुलिङ्ग में होते देँ ॥२५॥ अथ तरिषु द्रव्ये पापं पुरयं खखादि ॥२६॥ पापः पुराय" तओरौर खख से लेकर “शस्तः शब्द्‌ पयन्त द्रव्यवाचक होने पर तीनां लिङ्गो में होते हैँ [ यथा-पापः पुमान्‌, पापाघ्री, पापं कुलम्‌ | २६ ( पञ्च प्रद्ास्तस्य ) मतल्लिका मचचिका प्रकारडमुद्धतल्छजं प्रशस्तवाचकान्यमरूनि प्रशस्त के नाम-( ) मतल्लिका (२) मचर्चिका ( ३) प्रकारड ४) उद्ध (५) तक्लज ये पाचां विशेष्य मं अन्य लिङ्गके समानाधिकरण मं होने पर भी अपने लिङ्ग को नहीं छोडते। ( यथा -- प्रशस्तो व्राह्मणः = ब्राह्मणमतल्लिका = ब्राह्मणोद्धः प्रशस्ता गोः = गोमचार्चका = गोप्रकाराडम्‌ प्रशस्ता कमारी = कुमारीतल्लजः | ( एकं छभावहविधेः ) अयः शुभावहो विधिः ॥२७॥ शुभकारक भाग्य का नाम~-(१) अरय गह पँलिलिङ्ग दे २७ ( षड भाग्यस्य ) दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं खी नियतिर्विधिः भाग्य के नाम~--( १) दैव (२) दिष्ट ( ) भागधेय ( ) भाग्य ( ५) नियति (६) विधि इनमें नियति" खीलिङ्ग; विधिः पुंल्लिङ्गः शरोर शेष नपुंसक हें ( श्नीणि कारणस्य ) हेतुना कारणं बीजम्‌ कारण के नाम-(१) देतु (२) कारण (२ ) बीज इसमें ( ) त॒" पुल्लिङ्ग, (२-३) नपुंसक हें ( दे मुख्यकारणश्य ) निदानं त्वादिकारणम्‌ ॥२८॥

मुख्य कारण के नाम-(१) निदान (२) अआदिकारण ॥२८॥ जीणि आत्मनः ) त्तेचन्ञ आत्मा पुरुषः शरीराधिदेवता के नाम-(८ ९) त्तेत्रज्ञ (२) अ्रात्मा (२) पुरुष ( दे प्रकृतेः ) प्रधानं भ्रकृतिः खियाम्‌। प्रकृति के नाम-(१) प्रधान (२) परकरति इनमें ) नपुंसक (२) चखीलि ङ्ग हे ( एक कालावस्थायाः ) विशेषः काटिकोऽवस्था समय द्वारा निर्मित देहादि के विशेष रूप बाल, यौवन, ब्रद्ध ) का नाम--( ) अवस्था ( त्रयाणां गुणानामप्येकेकम्‌ ) + गुणाः सत्वं रजस्तमः ॥२२&॥ गुणां के नाम--( १) सत्व (२) रजस (२) तमस. ॥२६॥ + ( षट्‌ जननस्य ) जनुजनन.जन्मानि जनिरत्पत्तिरुद्धवः जन्म लेने के & नाम--( १) जनुष (२) जनन ( ) जन्मन्‌ (४) जनि (५) उत्पत्ति ) उद्धव इनमं ( १-२ ) नपुंसक ( ४-५ ) चरीलिंङ्ग (£) पुल्लिङ्ग दै ( षट्‌ प्राणिनः ) प्राणी तु चेतनो जन्मी जन्तुजन्यु-शरीरिणः३० प्रणी के नाम-(१) प्राणिन्‌ (२) चेतन (३). जन्मिन्‌ (४) जन्तु (५) जन्यु ( ) शरीरिन्‌ ( १-६ ) यँल्लिङ्ग देँ ॥२०॥ तजा ( न्रीणि घटत्वादिजातेः ) जातिजातं सामान्यम्‌ जाति के नाम--{ १) जाति (२) जात ( ) सामान्य ( दे धटादिन्यक्ते: )

व्यक्तिस्तु पुथगात्मता

अमरकोषः [ प्रथमं रर .: ^~ ^~ ~+ „~\ ~~~ --~-~-------~-----------------~--~-~-~-~-~-~-~ -^-\ ^ ^ ^ ^ ^~ ~ ^ ^~ ^~ ^~ -^~\ ^~ ^ ~\ ------------------- ------- ---- ---- व्यक्ति के नाम--{ १) व्यक्ति (२) प्रथ विचार ( प्रमाणो द्वारा अर्थं परीक्ता) केर गात्मता 1 नाम- (१) चच (२) संख्या (३) विचारणा ॥२॥ ५९

( सक्च मनसः ) |

चिन्तं तु चेतो हदयं स्वान्तं हन्मानसं मनः॥३९ | अध्याहारस्तकः ऊहः

मन के नाम-(१) चित्त (२) चेत

(७ ) मनस्‌ ये ( १-७ ) नपुंसक है ॥२१॥ इति कालवगः

--=- =

य. अथ घीवगेः

ुद्धिमेनीषा धिषण धीः परज्ञा शेमुषी मतिः रक्ञोपरन्धिश्िःसंवि्परतिपञ्छप्िचेतनाः ।1९॥ बुदधिके १४ नाम (१) बुद्धि (२) मनीषा

| ( चतुद बुद्धेः ) | | |

मति (८ ) प्रत्ता (६) उपलि

( १) संविद्‌ ( १२ ) प्रतिपद

चेतना

( एक धारणायुक्तबुदध:

धीधाोरणावती मेधा

धारणा शङ्तिवाली वुद्धि का नम--(९) मेधा। ( एक मनोग्यापारस्य )

सङ्करपः कम मानसम्‌

मानसिक कम का नाम--( ) सङ्कल्प

( चेतसः सुखादौ तत्परतायाः | चितताभोग। षः तत्परतायाः )

(१०) चिद्‌ |

| |

| आदिमे ्रासक्त मन नाम- | (१) चित्ताभोग (२ ) मनस्कार

( ब्रीणि विचारणस्य ) 9 --.--- चास्या | चचां संख्या धिचौरणा || भ्य पुतो मे यह श्न अधिक मिलता ` भवषेनं समाधानं भरिषानं तथेव ५५ केरे नाम -( १) भवेपान (२) समा १) प्रणिधान अन्य पुस्तकों

(२) धिषणा (४) ध्री (५) प्रज्ञा (६) शेमुपी (७) | ये दोनों समान लिङ्ग ( पुल्लिङ्ग )

(२) वासना |

( त्रीणि तकंस्य )

9 तकं के नाम-( १) अध्याहार (२) तकं

(३) हदय (४) स्वान्त (५) हृद्‌ (६) मानस | ( ३) उह

( च्वारि संरायक्तानस्य ) विचिकित्सा त॒ संशयः सन्देह-दापरो संशय के नाम--( ) विचिकित्सा (२) संशय ( ) सन्देह (४ ) द्वापर ( दे निश्चयक्ञानस्य ) अथ समो निर्णय-निश्चयो ॥२॥ निश्चय के नाम-(१) निर्णय (२) निश्चय हं ३॥ ( हं पररोकाभाववादिज्ञानस्य )

(१३) ज्ञपि (१४) | मिथ्यारष्ठिनांस्तिकता

परलोकाभाव ज्ञान के नाम--{( १) मि्या दृष्टि ( ) नास्तिकता | ( दे परद्रोहचिन्तनस्य ) व्यापादो द्रोदचित्तनम्‌ दूसरेसे द्रोह करने का विचार करने नाम-( १) व्यापाद्‌ (२) द्रोहचिन्तन। ( इनं पहला पुट्लङ्ग चनौर दूसरा नपुंसक हे ) ( हं सिद्धान्तस्य ) समो सिद्धान्त-गाद्धान्तौ सिद्धान्त के नाम-( ) सिद्धान्त (२ | प्दवन्त ये दोना प्लिङ्ग है ( त्रीणि भ्रमस्य ) भन्तिमिथ्यामतिभ्रेमः ।॥४॥ नरम के नाम--(१) भ्रान्ति ( ) मिष्य

मति (३) रम ॥४॥ |

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विमशों सावना चैव वासना निगय नाके नाम-(१) विम (२)

| |

पो

| से

` धीवगंः ५] भाषाटीकासदहितः =

~ ~ ~~ ~, / ~ / ५, १2.09. ८. > 0 „~ ^ 7 १, ^^ ^~

नि वि, [मि +> + कन वक

( दद्य अङ्गीकारस्य ) इन्ियां के नाम-(१ ) हषीक (२) संविदागूः पतिज्ञानं नियमाघ्रव-संधरवाः विषयिन्‌ ( ) इन्द्रिय ङ्ख ौकाराभ्युपगम-पतिध्रव-सखमाधयः ॥९॥ ( एकं गुद्यादीन्दियस्य »

अङ्गीकार के १० नाम- (१) संविद्‌ (२ कमेन्दियं २। पाय॒वादि गरू ( २) मतिज्ञान (४) नियम (५) द्माश्रव कर्मन्दिय के नाम- (१) गुदा यदि) (६) संश्रव (७) अङ्गीकार (८ ) अभ्युपगम (8 ) ( एक ज्ञानेन्द्रियस्य ) अतिभ्रव ( १० ) समाधि इनमे ( १-२ ) च्ीलिङ मनो नेजादि धीन्द्रियम्‌ ॥०॥ है ॥५॥

ज्ञानेन्द्रिय के नाम- (१) मन (२) नेत्र आदि ( एकं मोक्षोपयोगिबुदधेः)

मोत्ते धीक्लानम्‌ ठवरस्तु कषायोऽच्नी मोक्त मे निरत बुद्धि का नाम ( ) ज्ञान। कसेले रस के नाम (१) ठवर (२) ( एकं सिसपादिविषयक ठः) नतक पला क्षिक ओर दूरा सं" अन्यन विज्ञानं शिटपशाखयोः | नपसक मे होता है अन्यत्र ( मोक्ञोपयोगि वुद्धि को छोडकर ) ( एक मधुरस्य ) शिल्प ( कारीगरी ) ओर शाख मे लगनेवाली बुद्धि + मधुरो का नाम -( १) विज्ञान रस का नाम-( १) मधुर ( अष्टौ मोक्षस्य ) ( एकं रूवणस्य ) | | मुक्तिः केवस्य-निर्वाण-्रेयोनिः भरेयसामरतम्‌॥६ खवः | ` मोत्तोऽपवगेः | पमभन रस का नाम (१ ) लवण मोत के नाम-( १) मुक्ति (२ ) करेवल्य ( एकं कदोः )

~ कड़वे रस करानाम श्रखत ( ,) मोक्ते ( ) अपवर्ग ॥६॥ ( (१) कटु ( त्रीणि अज्ञानस्य ) सिक्तः प्तक्तस्य }) भथाज्ञानमविदयाहम्मतिः खियाम्‌ अज्ञान के नाम--(१) ज्ञान (२)

(द) निवांणा ( ४) प्रेयस्‌ (५) निःभ्ेयस (६) |

तीते रस का नति)

रविद्या (२ ) अहंमति ची लिङ्ग) ( एकं अम्लस्य )

(~ 3 अम्ब्छश्च

( रूपादिपञ्चकस्य प्रयेकं त्रीणि ) खरस का रूपं शब्दो गन्ध-रस-रपशांश्च विषया अमी! ।७॥ | (१) अम्ब्ल। गोचरा इन्द्रियाश्च | पायूपस्थे प] रि-पाौ चेतोन्दिमम विषयों के नाम-(८१) रूप (२) शब्द्‌ | १० (१ पायु ( गुद ५.(९) उप स्थ (लि |

(३) गन्ध (४) रस ८५) स्पशी। इन्हींको | (२) ५१ (५) वाणा - ये | भग ) ~ गोचर, इन्द्रियार्थ मी कहते हैँ ॥७॥ | ५५.८५ नेतं रसना त्वचा सह |

( त्रीणि इन्द्रियाणाम्‌ ) | रतानि षीन्द्ियाणि

भभात्‌-() मन (२) = हृषीक विषयीन्द्रियम्‌ | | (५) त्वचा (६) नाक गनि भख (८४) जोभ

(तुवर' सेकर म्लः पयेन्त शब्दो को रस कहते है ओर रसवाचक होने पर ये पुंलिङ्ग मं होते

तद्वत्सु षडमी चिषु 11६1 यदि वे द्रव्यवाचकदहों तो तीनों लिङ्गो मं ोते ॥€॥ ( एक परिमखस्य ) विमदोत्थि परिमलो गन्धे जनमनोहरे मनुष्यों के मन हरण करनेवाली ( खरतादि मे-वकुल-मालाश्रों के मदेन से ओर चन्दनादि के धिसने से उत्पन्न ) खगन्धि का नाम-- (१) परिमल ` - (एकं सुगन्धस्य ) रामोद: सोऽतिनिहरी वह्‌ परिमल यदि अत्यन्त मनोहर दोतो उसका नाम -( ) आमोद वाच्यटिङ्गत्वमागुणात्‌ ॥१०॥ य्दा से लेकर शुणे शुङ्कादयः पुंसि १७॥° तक जो शब्द दै वे वाच्यलिङ्ग दै ( अथात्‌ विशेष्य के अलुसार तीनो लिद्धौ मं होते ! ) ॥१०॥ ( दवे दूरगामिगन्धस्य > समाकषीं तु निहारी बड़ी दूर की खश के नाम- (१) समा- कषिन्‌ ( ) निर्टारिन्‌ ( चत्वारि शोभनगन्धयुक्तस्य ) खुर भिघ्रांणतपंणः इटगन्धः सुगन्धिः स्यात्‌ खगन्धि ( खुशबू ) के नाम - (१) सुरभि (२) प्राणतपण (३) इष्टगन्ध (४) सुगन्धि ( दे सुखवासनगुटिकादेः ) आमोदी मुखवासनः ॥?१॥ . मह को सुगन्धित करनेवाले “पानः श्रादि के नाम--(१) त्रामोदिन्‌ (२) सुखवासन ।।११॥ ( ढे इुग॑न्धस्य » पूतिगन्धिस्त॒ गन्धः

#

[ ग्रथ्सं काण्ड

८५ ^+ ^+ ^+ ^+ ^ ~ ~“ ~ ------ ~~~ ------------ `` > > 9) 0 > ५7 > (2 \ बट-- ~ द-प - ि

दुगेन्ध (८ बदवरू ) के नाम--(१) पूतिगन्धि

(२) दुगेन्ध

( दे अपक्रमांसादिगन्धस्य )

विखं स्यादामगन्धि यत्‌

कच्चे मांस आदि की गन्ध के नाम-(१). विख (२) अमगरिधन्‌

( जयोद शछुक्छवणंस्य ) शक्क-भ्र-शचि-श्वेत-विशाद्‌-प्येत-पारडराः॥१ - अवदातः सितो गौरो वलच्तो धवलोऽञनः।

सफेद्‌ रग के १३ नाम-(१) शुक्त (र) शश्र (२) शुचि (४) श्वेत (५) विशद्‌ (£) श्येत (७) पारडर (=) अवदात (६) सित (१०) गोर (११) वलक्त (१२) धवल (१३) अज्जंन ॥१२॥ ( त्रीणि पीतसंवलितद्युक्टवणस्य ) हरिणः पारड़रः पारडुः कुछ पीलापन लिए हुए सफेद रंगके३ नाम--(१) हरिण (२) पार्धर (३) पाणड़ ( दे धृसरवणेस्य ) ईषत्पाणडस्तु धूसरः ॥१२।१ . क्छ-कच् सफेद (मटमैला) रंग के नम-- (4 ईषत्पारड्‌ (२) धूसर ॥१३२॥ ( सक्ष कृष्णचवणंस्य ) कृष्णे नीलासित-्याम-काल-ष्यामल-मेचकाः कालारगके नाम - (१) छष्ण (२ > नील (३) रसित (४) श्याम ( ५) काल (६) श्यामल ) मेचक च्रीणि पीतवणस्य ) पीतो गोरो हरिद्राभः पीला ( हरदी की च्माभा) रंगकेर नाम ~ ( १६) पीत ( त) गोर (२ ) हरिद्राभ | त्रीणि हरितवणंस्य > पाटाशो हरितो हरित्‌ ॥९१. ४: हरारंग के नाम--( १) पालाश (२ ` हरित (२) हरित्‌ ॥१४॥

इाब्दादिवगेः ]

| च्रीणि रक्तवणंस्य ) रोहितो खोदहितो रत्त° लल के नाम-(१ ) रोदित (२) लोहित (३) रक्त ( ज्रीणि शोणवणेषय ) | शोणः कोकनदच्छविः | लाल कमल के समान गाद्‌ लाल रगकेर२ | नाम--( १) शोण (२) कोकनद्च्छवि। | ( दे अरुणवणस्य ) | व्यक्तरागस्त्वर्णः गुलाबी रंग के नाम- (१) अनव्यक्कराग (२) अरुण ( श्वेतरक्तवणेस्य >) . श्वेतरक्तस्तु पारख; ॥१५॥ सफेदी लिए हुए लाल रंग के नाम-(१) श्वेतरक्तं (२) पाटल ॥१५॥ ( दवे ईष्णपीतस्य ) षएयावः स्यात्कपिशः काल।पन लिए हुए पीले रेग ( फीकारंग ) के नाम-( १) श्याव (२) कपिश ( न्रीणि कृष्णलो हितस्य ) धूष्र-धूमलो कृष्णलोहिते कालापन लिए हुए लाल रंग ( धूमिल रंग के नम-(१) धृप्र (२) धूमल (२? करृष्णलोदहित ( षट्‌ कपिखवणष्य ) कडारः कपिः पिज्ग-पिशङ्गो कदु-पिङ्ल 1| १६ भूरा रंग के नाम--(१) कडार (२) कपिल (२) पिङ्ग (४) पिशङ्ग (५) कटु (६) पिङ्गल ॥१६॥ ( षड विचित्रवणभ्य चित्रं किरमीर-कटमाष-शबरेताच्च कुरे चित्र-कर्वुर ( चित-कवरा ) रंग के नाम-- (१) चित्र (२) किर्मीर (३) कल्माष (४) शबल (५) एत (€) कलर > गुणे शङ्कादयः एसि, गुशिथिज्ञास्तु तत्रति १७

भाषाटीकासदहितः

0/2 0, 2 2 2, (4

२७

गुणवाचक दोन पर शुक्तं आदि शब्द पुल्लिङ्ग में दोते ँ। ओर गुणिवाचक होने पर उनके रनुसार तीना लिङ्गां मेदहोते हं [ यथा-- शुक्तं वस्र, शुक्तः पटः, शक्ता शारी ] ॥१५७॥ बर १०५ + . "९ ( इति धवगः )

शब्दादि वशे; ( सक्षाधिष्टादेवतायाः ) ब्राह्मी तु भारती भाषा गीवाग्वाणी सरस्वती सरस्वती (वाणी की अधिष्टात्री देवी) के नाम--( ) ब्राह्मी (२) भारती (३) भाषा (४) गिर. (५) वाच. (६) वाणी (७) सरस्वती ( घट्‌ भाषणस्य ) व्याहार उक्तिरपितं भाषितं वचनं वचः ॥९॥ बोलने के & नाम -(१) व्याहार ८२ ) उक्ति (३) लपित (४) भाषित (५) वचन (€) वचस. इनमें ( ) पंलिन्ग (२) खीलिङ्ग (२-६) नपुंसक दहं १॥ ( द्वे अपथ्य } अप्र शोऽपशब्द्‌ः स्यात्‌ ्पभृश शब्द के नाम-( १) अपर्भृश ( ) अपशब्द एक शाब्दस्य ) शास्त्रे शब्दस्तु वाचकः शास्र ( व्याकरण शमादि) मे वाचक का नाम - (१) शब्द्‌ ( एक वाक्यस्य )}

४4

तिङ्‌ ुबन्तचयो वाक्यं क्रिया वा कारकान्विता तिडन्त-खुबन्त-पद समूह ओर कारक युक्त करिया का नाम - (१) वाक्य ॥२॥

( चत्वारि वेदस्य ) ्ुतिः खी वेद्‌ शान्नायल्यो

कक क, + कन = 9 + = ¢ ^ 9 = 9 2 (0 (2 ^-^ + ~~~ --------------------*~---- ~ ------------------------- --------------------- -- ---- - ~ --- ---------- -- -- ` ---- ~ ---------- | 7 - -- ----- ==

२४ अमरकोषः [ म्रथमं |

` चेदके नाम (१.) श्रति (२) वेद

स्वरो के नाम-(१) उदात्त आदि से अनु- (३) आम्नाय (४) जयी 1 इनमें (१,४) स्रीलिध |

दात्त ओर स्वरित समफना 1४॥

( २२ ) पुल्लिङ्ग हें | ( एकैकं तकविद्यायाः, अथंशास्त्रस्य )

( एकं वेदविहितकमंणः ) आन्वी्तिकी दर्डनीतिस्तकविार्थंशाल्योः। धमेस्तु तद्विधिः गोतम अदि की रचित तके विदा कानाम- ( ध्म जिज्ञासमानानां म्रा परमं॑श्रतिः | (-१ ) आन्वीक्तिकी

के अनुसार ) उस वेदम कटी हह विधि का बहस्पति-कोटिस्य रादि के वनाए हुए अध-

नाम -( १) धर्मे शाख का नाम--( ) द्रडनीति | ( वेदानां भ्येकमेकम्‌ ) ( द्वे ्ातसत्यार्थभूतायाः कथायाः }) ~ | खिया्क्सामयज् षी आआख्यायिकोपलन्धाथां 4

वेद्च्रयी का नाम ~ ( ) ऋच. (२) सामन्‌ कटानी ( यथा वासवदत्ता रादि के) नाम- | 4 ) यजत्‌ इनमे (१) चछ्रीलिङ्ग २-२) ( ) आख्यायिका ( ) उपलब्धार्था 1 | सकं = | | ( दवे व्यासादिप्रणीतभागवतपुराणादेः ) ( एकं स्य ) हि पुराणं ^ पञ्चरत्तणम्‌ ॥५॥

इति वेदाख्यस्यी 1 इन तीनों वेद का संयुक्त नाम-(१) न्यासादि प्रणीत भागवत पुराण आ्दिकेर

च्रयी॥ ३२॥ ` नाम- ( ) पुराण (२ ) पञ्चलक्षण ॥५॥ वौ ( एके वेदृङ्गस्य ) ` ( दवे कथायाः ) शित्त धरतेरङ्गम्‌ | श्रबन्धकटपना कथा वेद के चङ्ग का नाम ( ) रिक्ता कथा के नाम-(१) प्रबन्धकल्पना. ( इत्यादि से कल्प व्याकरण, निरुक्त, ज्यौतिष . (२) कथा केन्द्स. का अभिप्राय समना ) ( दे दुविद्तानाथमर नस्य ) ( द्र ञकारस्य ) प्रवद्धिका प्रहेलिका 1 ॐकार-अरवो नानक अकार के समो | सगेश्च प्रतिक्तगश्च वंशो मन्वन्तराणि च। रके नाम-(१) ॐश्कार्‌ (२) | शानु चरितं चेव पुराणं पच्वलक्तणम्‌ ॥। प्रणवे ये दोनों वशानुचारत चव पु भूर ^" समनिश्रथ एवं लिङ्ग (°) वले हें --व।रादपुराणम्‌ इतिहास पूवचरितस्य महाभारतादेः ) श्रष्टादश पुराणानि पुराणज्ञाः प्रचक्तते ~.“ पुरावृत्तम्‌ | पादं बाह्यं वेष्णवं शैवं भागवतं तथा शूवत्तान्त बतलनेवाले महाभारत अदि ) तथाऽन्यन्नारदीयश्च माकंण्डेयन्च सप्तमम्‌ + - ^ नाम - ( ) इतिहास ( २.) पुरा्ृत् भाग्नेयमटमं चव दशमं ब्रह्मवेवतं लेज्ञ सवान स्वराः 119 || चतुर्दशं मनकं कौर्म पन्चदशं स्मृतम्‌ ५५ कल्पो व्याकरणं निरुक्तं ज्योतिषां गतिः प्रदेलिकालक्तणम्‌ - "स पेचितिरितयष षडंगो वेद उच्यते व्यक्तीक्रत्य कमप्यर्थं स्वरूपाथस्य गोपनात्‌ ` स्वानु्त्तश्च स्वरितश्च स्वर।खयः यत्र बाद्या्थसम्बन्धः कथ्यते सा प्रहेलिका

: प्रचितो नोक्तो यतोऽसौ छान्दसः स्मरतः . ` ..अस्योदराहरणम्‌, सुभाषितरत्नमाण्डागारे~ ,..

[र 2. 3

रब्दादिवगः |] भाषाटीकासदितः २९ पेली के नाम-प्रवहलिका ( ) प्रहेलिका ( षट्‌ नाम्नः )

( ढे मन्वादिस्प्रतेः ) | ` अयाह्यः ॥।

स्प्रतिस्तु धमैसंदिता | आख्याह्वे अभिधानं नामधेयं नाम

मनु आदि की १स्रतिके नाम-(१) नाम के नाम--(१) आहय ( ) आख्या

स्मरति ( ) धमरसहिता ( ३) आह्वा (४) अभिधान (५) नामघेय

( दवे संहस्य ) ( & ) नामन्‌ इनमें (१) पुल्लिङ्ग ( २-३ )

समा्टतिस्तु रसंग्रहः ॥६॥ | त्रीलिङ्ग ( ४-६ ) नपुंसक हें ॥७॥

संग्रह के नाम-(१) समाहृति ८२) ( जीणि आह्वानस्य ) ` संग्रह | हतिराकारणाऽऽदह्यानम्‌ ( दवे समस्यायाः ) |, पुकारने के नाम (9) द्रति (र) आका- | समस्या तु समासार्था रणा (३ ) अ्राहान इनम (१-२) खीलिङ्ग (२) समस्या के नाम-( १) समस्या (२) | नपुंसक है

समासाथौ ( एक बहुकतृकाह्वानस्य ) ( दे खोकप्रवादस्य ) संहतिबेहुभिः कता ॥८॥ किवदन्ती जनश्चतिः बहुत लोगों के पुकारने का नाम-( १) श्रफवाद के नाम--८ ) किंवदन्ती (२) | स्द्रति जनश्रति ( दे ऋणदानादिनिमित्तविविधवादस्य ) - विवादो व्यवहारः स्यात्‌ कजे के देन-लेन के सम्बन्ध मेँ फगड़ा करने के नाम-(१) विवाद्‌ (२) व्यवहार द्वं वचनोपक्रमस्य ) 3 उपन्यासस्तु वाङ्मुखम्‌

( चत्वारि वातांयाः ) वार्ता भरवृत्तिवरत्तान्त उदन्तः स्यात्‌ वृत्तान्त के नाम--( १) वातां (२) | प्रत्रत्ति (२ ) व्ृत्तान्त (४ ) उदन्त

` एकचन्ुनं काकोऽयं बिलमिच्छन्न पन्नगः | बात आरम्भ करने के नाम-(१) उप- त्तीयते वद्ध॑ते चेव समुद्रो चन्द्रमाः न्यास (२) वाड्मुख पाराशरस्म्रति को भूमिका देखिए। ` 1 सुत्र-माप्ययोः उपो तिभ निबन्धो यः समासेन संयहं तं विदुवुधाः न: = व्र = = ८1 कह जानेवाली बात की पुष्टि के निमित्त यथा--सूयोदये रोदिति चक्रवाको" समस्या की पूति | दृष्टान्त, उदाहरण, भूमिका आदि देने के नाम-- “विलोक्य बालामुख चन्द्रविम्बं कण्ठे सुक्तावलिद।रतार।: , | (१) उपोद्धात (२) उदाहार एुननिंशाया मयभौतर्म॑ता सृथोंदये रोदिति चक्रव ॥” | ( दे शपथस्य ) श्नोर कुर्वाते कुरुते करोति कुरुतः कुवन्त्यलंवुर्वतेः | ` शपनं शपथः पुमान्‌ ॥&॥ समस्या की पूर्तिं इस प्रकार दोगी- कसम खाने के नाम--(१) शपन (२) शपथ

“यस्य द्वारि सदा समीर-वरुणो संमाजेनं हव्यवाट पलि्ग पाकं शीतयुरातपत्रकरणं दसो प्रतोहारत.म्‌ इनमें (१ ला) नपुंसक, (२ रा) पुंलिङ्ग हे &

देवा लास्यविधिं दस्यममरा वर्यं दशास्यः कथं ( न्नीणि प्ररनस्य ) ऊर्वाते कुरुते करोति कुरुतः उवन्त्यलंङुवेते ॥"" प्रर्नोऽचयोगः पृच्छा

नाम-(१)

के प्रश्न (२) अनुयोग (३) पच्छा 1 दवे उत्तरस्य `) प्रतिवाक्योत्तरे समे

जवाब देने के नाम--(१) प्रतिवाक्य

(2) उत्तर ये दोनों नपुंसक दँ ( दे मिथ्याविवादस्य )

मिथ्याभियोगोऽभ्याख्यानम्‌

असत्य ्रात्तेप ( अथोत्‌ तुम्दारे यरो मेरा

सो रूपया बाकी दै रादि) कै २, नाम - (१)

मिध्यामियोग (२) अभ्याख्यान 1 ( दे सुरापानादि मिथ्यापापोद्धावनस्य )

2 <: अथ मिथ्यामिशंसनम्‌ ॥१०॥।

| आटे दोष ( तोहमत ) लगने के नाम-

(१) मिथ्याभिशसन ८२) अभिशाप ॥१०॥

( एक्‌ भ्रीतिविदोषजनितस्य मुखकण्डादिश्चब्दस्य ) | प्रणादस्तु शब्दः स्यादचुरागजः अनुरागज ( प्रेम से उत्पन्न हुए ) शब्द का

नाम - (१) प्रणाद \ .

( णि कीतंः )

यशः कीतिः समज्ञा

कीर्तिं के नाम-(१) यशस्‌ (२) कीर्ति (३) समज्ञा

( चत्वारिस्तुतेः ) स्तवः स्तं स्तुतिनुंतिः ॥६२॥ स्ति के नाम- (१) स्तव (२) स्तोत्र (२ ) स्तुति (४ ) नुति ॥११॥ ( एकं द्विभ्वारोक्तस्य ) आब्र डितं द्विखिरक्तम्‌ दो-तीन वार कहे हुए शब्द्‌ का नाम - (१) श्रामेडित ( द्वे उच्चेर्धोषस्य ) उच्चैधु ष्टं तु घोषणा शः जोर से चिल्लाए हुए शब्द्‌ के नाम-(१) उचधुष्ट (२) घोष्रणा

यि

= उल्हना दो प्रकार का होता दै--

[ = काण्ड

~ ~ --~----~~~~~~~~~~---~-~--~~-~---~----- चक + + ^> 0 (सि _ =-= = अक 2 जक ~

( एक दोकादिना विकृत्ब्दस्य ) काड्क स्जियां विकासो यः शोकमीत्यादिभिष्वेनेः शोक भय आदि से विकृत शब्द्‌ का नाम-- (१) काकु यह स्त्रीलिङ्ग दै 1 १२॥ ( ददा निन्दायाः ) अवरणत्तिप-निर्वाद्‌-परीवाद्‌पवाद्‌वत्‌ उपक्रोशो ज॒गप्खा कुरसा निन्दा गहणे १३ निन्दा के १० नाम--(९) ग्रवरी (२) आते + (२) नि्वाद्‌ (४) परीवाद (५) अपवाद ( £ ) उप- कोश (७) जुगुप्ता (=) कुत्सा (€) निन्दा (१०) गरैरण इनमें (१-६) पुंचिन्न, (७-&) स्त्रीलिङ्ग (१०) नपुंसक हँ ॥\२३॥ ( अभ्रियवचसः ) पारुष्यमतिवादः स्यात्‌

द्मत्रियवचन के नाम-(१) पारुष्य (२) अतिवाद

( दवे अपक्राराथवाक्यस्य ) भत्सखेनं व्वपकारगीः अपकारयुक्त वाणी (कटकार) के नाम (१) भत्सैन (२) पकारगिर्‌ इनम ( शला ) नषु. -

सक, (ररा) स्त्रीलिङ्ग हे

( एक सन्निन्दभाषणस्य ) यः सनिन्द उपालम्भस्तत्र स्यात्परिभाषणम्‌ ९१

बुराई के साथ १उलदटना देने का नाम - (१ ) परिभाषण ।१४।

( परस्त्रीनिमित पुंसः, परपुर्पनिमित्त श्त्रियाश्च- कऋोश्नस्येकम्‌ ) तत्र त्वात्तारणा यः स्यादाक्रोशो मेथनं पति परार घ्री या परपुरुष से मेथुन के निमित्त बातचीत करने का नाम-( ) ग्मात्तारणा

(ज) गुणो को प्रकट करते हुए यथा-- “महाकुलीनस्य तव किमुचितमिदम्‌ ? तुम्हारे जैसे महाकुलीन को क्या यदह उचित है ( ) निन्दा करते त-क “वन्धकीसुतस्य तवो चितः 1 तुम्हार जैसे छुलटा के पुत्र को यह उचित हौ है

खाब्दादिवगंः ] भाषाटीकासहितः ३१

3४ ~ (~. 07 0 0 0 0 0 0 00 0 0 0 00 0 0 0 0 00 ८/0 07 ~ 40 0/7 007 00, ८/0, 000, 0 00, 00, 09 - 0 0 0 6. 6 ` 0 0,

( दवे सम्भाषणस्य ) ( दवं सन्देदावचनस्य ) स्यादाभाषणमालापः संदेशवाग्वाचिकं स्याट्‌ रपस मं मीठी बात करने के नाम- सन्देश कटने के नाम-- (९) सन्देशवाच ( ) आभाषं ( ) अलाप (२) वाचिक इनमें (शला) चखरीलिङ्ग, (ररा) ( एक प्रयोजनश्ून्यस्योन्मत्तादिवचनस्य ) नपुंसक है प्ररापोऽनथकं वचः ॥१५॥ वाग्भेदास्तु तिषूत्तरे ॥९७॥ करने का नाम--( १) मागे के वाग्मेद ( श्शतीः से लेकर + १५६५ सम्यक्र” २१ शलोकपयन्त ) तीनो लिङ्गां में 7 - 4 र, | अजुटापो ुहभाषा ( एकमकल्याणवाचः ) एक वात को फेट-फेट कर वार-वार्‌ कटने के | खशती वागकल्याणी नाम--( १) अनुलप (२) मुहु भोषा अशुभ वाणी का नाम-( १) रुशती

( दे रोदनपूवकभाषणस्य ) विखापः परिदेवनम्‌

रोते-रोते वात कहने के नाम-८१)

( ) विलाप (२) परिदेवन ( दे अन्योन्यविरुदवचनस्य >)

विप्रखपो विरोधोक्तिः परस्पर विरुद्ध वात कहने के नाम--(१) | { दे सम्बद्ध वचनस्य ) ॥. विप्रलाप ( ) विरोधोक्ति | सङ्गतं हृदयङ्गमम्‌ ।।९८॥ | ( एकं मिथोभाषणस्य ) |

- कव | जीमें उट जानेवाली बात के नाम- संखापो भाषणं मिथः ॥१६॥ (१) सङ्गत (२) हृदयङ्गम ।१८।

प्राइवेट वात-चीत करनेका नाम (१) ( दवे ककंडावचनस्य >)

( एक छुभवचनस्य ) ~ ` स्यात्कटया तु शुभात्मिका | सुभ वचन का नाम-( १) कल्या ( एकं सान्त्ववचनस्य ) अत्यथमधुरं सान्त्वम्‌ बहुत मीठे वचन का नाम--( १) सान्त्व।

संलाप १६॥ | निष्टुरः परुषम्‌ ( शोभनवचनस्य ) = न्त खुध्रखापः सुवचनम्‌ असत्य अभियोग के नाम--( १) चो्य(२) प्यारी बातके नमम--( ) सुप्रलाप (२) | श्राक्तेप (३) श्रमियोग सुवचन | ( चरौणि शापस्य ) ( हे गोपनकारिवचनस्य ) शापाक्रोशौ दुरेषणा

अपलापस्तु निह्वः१ | राप्‌ के नाम.-(१) शाप (२) आक्रोश / कही हुई बात को छिपाने के नाम-(१) (२१ इसा

( च्रीणि चायोः , पलापं (२) निहव (न

--------------| अस्त्री चाड च्‌ श्लाघा मेम्णा मिथ्याविकत्थनम्‌

अन्य पुस्तकों मे निघ्राङ्कित श्लोक मिलते है- चापलुसौ ( प्रेम के कारण मूढ बोलने ) के नाम (त्रीणि अभियोगस्य ) (१) चाट(२) चडु(३) आवा। इनम (१.२ )

चोयमाक्षेपाभियोगो खीलिङ्ग ^) चोङकरर शेष पुं० नपुंसक मे होते हे

३२ अमरकोषः [ परथमं काण्ड

4 4 0 0 0 4 0 0 4 4 4 4 , 4 4 0 0 "ष 4 0

करोर वचन कै नाम-( १) निष्डुर त्तर (२) अवाच्य

(२ ) परुष \ ( एक श्टषावचनस्य ) ( दे भण्डादिवचनस्य ) आहतं तु स्रषाथेकम्नर > ग्रास्यमन्छीखम्‌ भृटा अर्थं रखनेवाला वचन ( यथा-- भाङ्‌ आदि के वचन के नाम--( १) एष वन्ध्यासुतो याति खपुष्पक्रतदोखरः 8 माम्य ( ) अश्लील खगवृष्णाम्भसि खातः दाराश्टङ्गधनुद्धरः ` ( एक प्रियसत्यवचनस्य ) का नाम-- (२) राहत सूतं भिय ( दवे अप्रकरवचनस्य ) |. सत्ये अथ म्लिष्टमविस्पष्टम्‌ | प्यारी ओर सच बात का नाम-(१) स्पष्ट वचन के नाम- (१) म्लिष्ट ल. सरत | | अविस्पष्ट ( त्रीणि विरुढाथंस्य वचनस्य ) ( ढे सत्यवचसः ) अथ सङ्कलः धि परस्परपराहते ॥१६॥ वितथं त्वनृतं वचः ।.र्र परस्पर विरोधी बात ( यथा-प्रश्यत्यन्तुः शृ बात के नाम--(१) वितथ ( = श्णोखयकणः ) के नाम--८ ) सच्छुल (२) | अचरत ॥२१॥ क्ि्ट ( ) परस्परपराहत १६ ( चत्वारि सत्यवचसः ) ( दवे अशक्त्यादिनासम्पूर्णोचारितस्य ) | सत्यं तथ्यस्रतं सम्यग्‌ लुप्तवणेपदं श्रस्तम्‌ सच वात के नाम - (१) सत्य (२) तड अशक्ति अदि से कटी गयी अधूरी वात के | (२) ऋत (४) सम्यक. > नाम--( ) लुप्तवणेपद्‌ (२ ) ग्रस्त अमूनि चिषु तद्धि ( दे रीघ्रोचारितवचसः ) ये ( सत्य रादि ) शब्द विशेष्य वाचक दै

निरस्तं त्वरितोदितम्‌ | पर तीनां लिङ्गां मेंदोते हँ ( यथा- सत्या खक जल्दी से कटी गयी वात के नाम -( ) | सत्यः पुमान्‌ , सत्यं कुलम्‌ )

निरस्त ( २) त्रितोदित | श्नन्य पुस्तकों मेयेश्नोकमिलतेदै- ( 2 श्टेष्मनिगमसदहितवचनस्य ) | ( दे सोपहासस्य ) अम्बूकृतं सनिष्ठीवम्‌ सोल्टण्ठनं तु सोस्प्रासम्‌ धृक का छटा के सदित निकलती हुईं बात | मजककी बवातके२ नाम--(१) सौल्लुण्टन (= के नाम-(१,) अम्बूकरेत (२) सनिषरीव | सोप्रास कवत ( द्वे अथंयुन्यवचनस्य ) द्वे रतिकरूजितस्य )

भणित रतिकूजित रति समय मँ किए गये शब्द्‌ के नाम--( < भणित (२) रतिकरूजित

वद्धं स्यादन्थंकम्‌ ॥२०॥ निना मतलब की वात के नाम-(१)

त्रवद्ध (२) अनर्थक ॥२०॥ | पश्च स्पष्टवचनस्य ) ( दवे वक्तमनहंस्य वचसः ) श्राज्यं हयं मनोहारि विस्पष्ट भकटोदितम्‌ अनत्तरसवाच्यं स्याद्‌ स्पष्ट वात नाम--(१) श्राज्य (२) ह्यय (ङ `

कहने लायक बात के नाम- (१) श्रन- | मनोदारिन्‌ (४) विस्पष्ट (५) प्रकटोदित

नाव्यवगंः ] भाषाटीकासदहितः

( स्चदच्च शब्दस्य ) शब्द निनाद-निनद्‌-ध्वनि-ध्वान-रव-स्वन: स्वान-निर्धोष-निहाद-नाद्‌-निस्वान-निस्वनाः। आरवाराव-संराव-विरावाः शब्द्‌ के १४ नाम- (१) शब्द्‌ (२) निनाद

(३) निनद (४) ध्वनि (५) ध्वान (€) रव (७) स्वन (८) स्वान (६) निर्घोष (१०) निहौद (११)

नाद्‌ (१२) निस्वान (१२) निस्वन (१४) अरव (१५) आराव (१६) सराव (१७) विराव ॥२२॥ ( एकं वस्त्रपणध्वनेः ) अथ ममेरः ॥२२॥ स्वनिते वद्पणणंनाम्‌

कपड़ा श्रौर पत्तों की आवाज का नाम- (१) ममर ॥२३॥ ( एकं भूषणध्वनेः ) भूषणानां ठु श्थिजितम्‌ गहनां ( नूपुरादि ) की छमाचम आवाज का नाम (१) शिज्ञित ( पञ्च बीणादिस्वनितस्य ) निकणः काणः कणः कणनमित्यपि वीणायाः कणिते प्रादेः प्रक्राण-प्रक णाद्‌यः

( 2 प्रतिध्वनेः )

खी प्रतिश्चलपतिध्वाने प्रतिध्वनि के नाम--(१) प्रतिश्र त्‌ (२)

प्रतिध्वान इनमें (१ ला) खीलिङ्ग; ओर (ररा) पुंलिङ्ग है

( दवे गानस्य ) | गीतं गानमिमे समे गाना के नाम-(१) गीत (२) गान ये | दोनां समान लिङ्ग ( नपुंसक ) हँ

इति शब्दादिवगंः &

|

|

| अथ नाव्ववर्गः

| ( स्वराणां प्रथक्पथक एकैकम्‌ ) निषादषंभ-गान्धार-षडज-मध्यम-घेवताः पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्ीकरटोत्थिताः स्वया

तन्त्री ( वीणा आादि के तार ) ओर मुर्ष्यो

के करठ से उत्पन्न हुए स्वरों के नाम-(१) निषाद (२) ऋषभ (२) गान्धार (४) षड (५) मध्यम ~ (६) धवत (७) पञ्चम १॥

( एक सृक्ष्म्वनेः ) काकी तु कले स्तरु्मे

वीणा की श्रावाज्ञ के नाम--(१) निक्राण |

(२) निक्रण (२) कराण (४) करण (५) कणन इन शब्दों के श्र" रादि उपसग जोडनेसे वने हुए शरक्राण' श्रकरण' श्रादि शब्द भी वीणा शब्द्‌ के दर्थ मेँ होते हं ॥२४॥ (द्रे बहुभिः कृतस्य महाध्वनेः ) ` कटक ठ. वहुत द्माद्मिय से किए गए शोरगुल का

नाम - (१) कोलादल (२) कलकल

एक पक्षिशब्दस्य ) तिर्थां वाशितं र्तम्‌

चिडियोँ के. चहचहाने की आवाज का नामं

(१) वाशित ॥२५॥ 4

| नास्वशाले-- | पडजश्च ऋपभश्चेव गान्धारो मध्यमस्तथा पचमो भेक्तश्चेव निषादः सप्त रवराः नानां कण्ठमुरस्तालु जिहां दन्तांश्च संस्परशन्‌ ` षड्भ्यः सज्ञायते यस्मात्तस्मात्डज इति स्मृतः तद्वदेवोतथितो वायुररःकण्ठसमाहतः नामि प्राप्तो महानादो मध्यस्थस्तेन मध्यमः वायुः ससुट्गतो नामेररोहत्कण्ठमूदखु वि चरन्पचमस्थानप्राप्त्या पश्चम उच्यते नारदः- षड्जं रोति मयूरस्तु गावो नर्दन्ति चरषमम्‌ ्रजाविको गान्धारं करो्चौ नदति मध्यमम्‌ पुष्पसाधारणे काले कोकिलो रौति पञ्चमम्‌ श्वस्तु धैवतं रोति निषादं रोति कु्जरः | - `

2

मधुर ध्वनि का नाम-(१) काकली यह च्रीलिङ्धमेंदोतादे। ( एकमन्यक्तमधुरध्वनेः ) ध्वनो मघुरास्फुटे

मधुर ओर अस्पष्ट ध्वनि का नाम-- (१) कल। (एकं गम्भीरशब्दस्य ) मन्द्रस्तु गम्भीरे शर्मीर ध्वनि का नाम- (१) मन्द्र ( एकमुच्चशब्द्स्य ) ^ तारोऽत्यु्चेः ऊची आवाज का नाम-(१) त।र। जयस्जिषु 1२) ये तीनो. ( कल, मन्द्र, तार ) शब्द्‌ तीनों लिङ्गो मे होते ॥२¶ ( एकं गीतवाययरख्यसाम्यस्य ) खमन्वितलयस्त्वेकतालः समन्वितलय ( गाना श्रोर वाजा कीलय के साम्थ) का नाम-(१) एकताल

(श्रीणि वीणायाः ) वीणा तु वर्छकी

विपश्ची

वीणा के नाम-(१) वीणा (२) वल्लकी (२) विपञ्ची ८. ( एक सितार” इति स्यातस्य ति परिवादिनी ॥३॥। ता वीणा ( सितार ) का नाम- (१) परिवादिनी ॥३॥ "~ + ` ्रन्य पुस्तकों म-- - मध्यस्थो दाविंशतिविधो ध्वनिः ५. कएठमध्यस्थस्तारः शिरसि गीयते नि मनुष्यों के हृदय के बीच वास प्रकार की (त्थ हे उनम कण्ठ के मध्य स्थित ध्वनि का

( ) न्द्र [1 शि कै रि 7 |

अमरकोषः

4 ~ 0 0 9 (4 09 0 0 7 प. 0. 0 , 0 1 ^ 0

[ रथम कोष्ड

0 (0/4, ~ 0 0 ~

( एकं वीणादिवाद्यस्य ) रततं वीणादिकं वायम्‌ | वीणा ( सितार, सारेगी, बेला, इसराज ) सदि का नाम--(१) तत | ( एकं सुरजादिवा्यस्य ) आनद्धं सुरजादिकम्‌ ग्रदज्ञ ( ढोल, तबला, पखावज ) आदिं बाजा का नाम-(१) आमानद्ध्‌ एकं वरावाद्यस्य `) वंशादिकः तु सुषिरम्‌ ्वोसुरी आदि बाजाश्मों का नाम-(१) खषिर ( एकं कांस्यताकादेः ) कास्यताखादिकं घनम्‌ ।॥४॥ कोसि के ताल (घरटा, मँ, मीरा) दि वाजा्मों का नाम-(१) घन ॥४॥ ( दे ततादि चतुष्टयस्य ) चतुविधमिदं वाद्यं वादिजातोयनामकम्‌ इन चार प्रकार ( तत, आनद्ध, खषिर, घन `) के बाजारों के नाम-(१) वादित्र (२) आतोदय ( दवे खदङ्गस्य ) ग्टदङ्खा मुरजाः मृदङ्ग के नाम-(१) मृदङ्ग (२) मुरज ( त्रीणि श्दङ्गमेदानाम्‌ ) भेदास्त्वं्थालिङ्गधोध्वकास्जय, ॥५॥ ख्दनज्न के भेद्--(१) शङ्क्य (२) ्ालिङ्गय (२) ऊर्वक ॥५॥

नास्वशाख्े- ततं चैवावनद्धं धनं सुषिरमेव च। चतुर्विधं तु विज्ञेयमातोचं लक्षणान्वितम्‌ ततं तन्त्रीगतं ज्ञेयमनवद्धः तु पोष्करम्‌ घनं तालस्तु विज्ञेयः सुषिरो वंश उच्यते रे हरीतक्याक्ृतिस्त्वङ्ग यो यवमध्यस्तथोध्वैकः श्रालिङ्गयश्चैव गोपुच्छो मध्यदक्तिणएवामगाः ॥! श्रथात्‌-हरीतकीं की श्राकृति के समान ्द्भूय; यव कै मध्य भाग के समान ऊध्वेक; गोपुच्छं कौ आजति समान-~ श्रलिङ्गव ोत। हे 1

| 9

क, र्ब

नाव्यवगेः ]

( दे यक्ञाःपरहस्य ) स्यायशःपरदो दकता नगाराके नाम-(१) यशःपटह (२) टकरा (दवे मेयः) भरी स्त्री दुन्दुभिः पुमान्‌ ठरही शदनाई ) के नाम-(१) मेरी (२) दुन्दुभि इनमें (१ ला) खरीलिङ्ग ओर (२ रा) पँ्लिङ्ग हे ढे पटस्य ) मानकः परहोऽस्त्री स्यात्‌ डग्गी के नाम--(१) आनक (२) पटह इनमें ( ला ) पुंलिङ्ग ओर (२ रा) पिङ्ग के

अतिरिक्र नपुंसकमें भी होता हे।

( एक वीणादिवादनस्य ) कोणो वीणादिवादनम्‌ ॥६॥ वीणा अदि बजाने के लिए काष्निर्मित धनुही का नाम--(१) कोण ॥६॥ ( द्वं वीणादण्डस्य ) वीणाद्र्डः प्रवारः स्यात्‌ वीणा के दरड के नाम-(१) वीणा-दर्ड

(२) प्रवाल

द्वे वीणादण्डाधःस्थितशाब्द्गाम्भीरयार्थ- चमावनद्ध दारुमयभाण्डस्य ) ककुमस्तु भरसेवकः | वीणाकी तूबी के नाम--(१) ककुभ (२) प्रसैवक (८ एकं तन्त्रीरहितवीणाकायस्य ) कोडस्बकस्तु कायोऽस्या: वीणा के तार रहित दरड श्रादि समुदाय टचा ) का नाम-(१)कोलम्बक ( द्वे यत्र तन्त्यो निबध्यन्ते तस्योध्वभागस्य ) उपनाहो निबन्धनम्‌ ।७॥

भेयामानकट्न्दुभी' इत्यपि पाठः|

भाषारीकासंहितः

वीणा के ऊपरवाले टिस्से-जिसर्मे तार बोधते हँ--के नाम--( १) उपनाह (२) निवन्धन ॥७॥

( वा्यविरोषाणां प्रथक्‌ थक एकैकम्‌ ) वायग्रभेदा उमख्-मङ्‌ड-डिरिडिम-भमराः मदेलः पणवोऽन्ये

बाजाच्यां के मेद्--

डमरु का नाम--(१) उमस

जलतरङ्ग का नाम-- (१) मड्ड़

तम्बूरा का नाम- (१) डिरिडम

मेक का नाम-(१) म्र

मशक बाजा का नाम-(१) मदंल

टोल का नाम-(१) पणव

( द्वे नतक्याः) ~. नतंकी-खासिके समे ॥२८॥

नाचनेवाली के नाम- (१) नतकी (२) लासिका ये दोनों शब्द घ्रीलिङ्ग है ॥८॥

( विरुम्बित-दुत-मध्यानां नृत्यगीतवाानां तचादिक्रमेणेकैकम्‌ ) विरम्बितं हतं मध्यं तच्छंमोधो घनं कमात्‌

धीरे धीरे नाचने-गाने-वजाने का नाम -- (१) तख

जल्दी जल्दी नाचने-गाने-बजाने का नाम- (१) ओघ

मध्यम गति से नाचने-गाने-बजने का नाम्‌ __ (१) घन

( एक तारस्य ) तालः कालक्रियामानम्‌

ताल देने रौर ताल मिलान का नाम-(१) ताल

नास्वशाखे- लयतालवणंपदयति गीत्यत्तर भावकं भवेत्तत्वम्‌ आनिद्धकर णवहुलं उपयुंपरिपाणिकं द्रुतलयं अरनपेक्तितगीतार्थं बाचं चोधं ुधेक्ेयम्‌

३8

पक गानतन्त्रीख्यस्य ) - ` ख्यः सास्यस्‌ 1 लय ( गाना गने, बजने, पैर एक साथ उस्ने आदि को दिखाने के लिए काल ओर करिया साम्य ) का नाम-(१) लय

अमरक्छोषः ~ =

0 0 0 (४ 0 0 0 0 ~ ^ 0 ^

[ अथसं काण्डं

( एक विदुषः )

भावो विद्धान्‌ विद्वान्‌ का नाम-(१) भाव एकं जनकस्य )

अथावुकः 1

` ` अथास्तियाम्‌ ॥&॥ जनक

रागे ओआनेवाला ( तारडव ) शब्द पुल्लिङ्ग ओर नपुंसक लिङ्ग होता है ॥६॥ ` | ( षट्‌ न्त्यस्य ) ताण्डवं नटनं नाध्यं खास्यं चृत्यं नर्तने !

पिता का नाम--(१) राव +

( द्वे युवराजस्य ) ` युवराजस्तु कुमारो भकृदारकः ॥९२॥ युवराज ( राजकुमार ) के नाम- (१)

नाच के £ नाम्‌ - (१) तारडव (२) नयन | कुमार (२) भरदारक ॥१२॥

(३) नाय्य (४) लास्य (५) नर्य (€) नतन ( दः नाय्यस्य ) तोयेजिक सृत्य-गीत-वपयं नाट्यमिदं जयम्‌॥\९० नाचने-गाने-वजाने के संयुक्त नाम - (१) तीयतच्निक (२) नाय्य ॥१०॥

( त्रीण स्तरीवेशयधारिणो नतकस्य ) भरङ्सश्च भ्रकसश्च भरकुःसष्चेति नतंकः | स्रोवेशधारी पुरुष

ली का वेश धारणकर नाचनेवाल्े पुरुष ( जनखा ) के नाम (१ ) भ्रकंस (२) कंस (३) भरक्रुस

नारयोक्त नावोक्तो" इस पदका शङ्गहारः" (१६ शयोक) के पहले तक अधिकार होने से ्रागामी नामों का प्रयोग नाटक मेँ ही होगा ( एकमज्जुकायाः ) गरिकाज्चका ॥१९॥ स्टेज पर नाचनेवाली गशिका का नाम--(१) श्रज्जुका ॥११॥ ( एक भगिनीपतेः ) भगिनिपतिरघत्तः ` बहिनोर का नाम -(9) आवुत्त | ; _ ` ` त्रयो लयाश्च विज्ञेया दुत-मध्य-विलम्विताः

[त ~ इसका पद वर्तमान शासनपद्धति

मोंतिदोताथा ओर श्री श्रमरस्िद के समय में पड

राजा के शाले कौ मिलत( था जो बादमे ज्षतरियों का एकः

| दे राद्ठः ) राजा भट्रारको देव राजा के नासम--(१) भद्रारक (२) देवं ( एकं रान्तः सुतायाः ) तत्छुता भठेदारिका राजकुमारी का नाम- (१) भवृदारिका ( एक बद्धपटाया रा्यएः ) देवी कताभिषेकायाम्‌ पटरानी का नाम-(१) देवी , ( एकमितरराक््याः )

इतराखु तु मानी ॥६३॥ अनन्य साधरण रानियां का नाम--(१ )

भद्िनी ॥१२॥ |

( एकं वध्यस्य ब्राह्मणादेरदोषोक्तेः » अव्रह्मरयमवध्योक्तो

मारे जानेवाले ब्राह्मण आदि को मारने कै लिए कटने का नाम -- (१) अब्रह्मण्य

( एकं राः श्याखस्य राजश्यालस्तु राष्िय राजा के शले का नम-- (१) राष्टि

गवनर्‌ क्ते

स्वतन्त्र राष्ैय ( राटौर ) वंश दी दो गया

नाव्यवगेः |

( दे मातुः ) अस्वा माता माताकेदो नाम - (१) अम्बा (२) माता। ( हे ऊमायाः ) सथ वाला स्याद्वासूः कुमारी के नाम-- (१) वाला (२) वासू ( दे आयस्य ) अआरसस्तु मारषः | १४] सूतच्रधार-पाश्ववतत्ता। के नाम--( १) श्राय (२) मारिष ॥१४॥ ( एकं ज्येष्ठभगिन्याः ) द्मत्तिका भगिनी येष्ठा जेठी वहिन का नास - (१) -अत्तिका (द्रे निवेहणस ) निष्ठा निवंदणे समे। मुख-प्रतिसुख-गभ-विमर्थ-निर्वहण नामक नाटकीय सन्धिकी वीं सन्धि के नाम--(१) निष्ठा (२) निर्वहण ये समानाथेक हैँ, समान लिङ्ग वाले नहीं ( एकैकं नीचां चेटी सखीं प्रति प्रत्याह्वानस्य दण्डे दञ्ञे हलाहानं नीचां चेरीं सखीं प्रति १५ नीच ल्ी के पुकारने करा संबोधन- (१) हरडे चेरी के पुकारने का सम्बोधन--\१) टञ्जे। सहेली के पुकारने का सम्बोधन- (१) दला॥१५॥ ( खत्यविद्चेषस्य ) श्रङ्दारोऽङ्गवित्तेपः लचक-लचककर नाचने के नाम- (१) ग्ङ्गहार (२) श्रङ्गविक्तेप द्वे हस्तादिभिमेनोगतभावासिग्यञ्जकस्य ) व्यञ्जकाभिनयो समो हाथ श्नौर श्ङ्गलि के इशारा आदि से दिल के न्द्र के भाव को प्रकट करने के नाम-- (१) व्यज्ञक (२) रभिनय ये दोनों पलिङ्ग हे ( आद्गिक-सातिविकगुणयोः कमेणेकैकम्‌ ) निचे त्वङ्गसत्वा्यां दे चिष्वाङ्गिक-साच्िके

0 (0, 00 2600000 0.3 000 0, 0/0 0/0, 0/0, के, „00/00 00009, 000 00/00/0000 ,/0 0/0 ,/9

क्रपा दयाऽजुकम्पा स्यादचुकरोशोऽपि

आषारीकासहितः 1 ३७

न्ग के विकार भह आदि मरकाने) का नाम--(१) आङ्गिक 1 `

अन्तःकरण के भाव ( स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाचः. स्वरमङ्गोऽथ वेपथुः वैवरथमश्चप्रलय इत्यष्टौ सात्विका गुणाः) का नाम-(८१) सात्विक ये दोनों शब्द तीनों लिङ्ग में होते हे ॥१६॥

एकैक शङ्गारादिरसानाम्‌ )

श्ङ्ञार-वीर-करूणाट्भुत-हास्य-भयानकाः बीभत्स-योद्रो रसा

प्रकार के रसो का एक-एक नाम- (१) श्ङ्घार (२) वीर (३) करूण (४) अद्‌भुत (५) हास्य (६) भयानक (७) वीभत्स (=) रोद्र

( त्रीणण शङ्गाररसस्य ) ~ श्छ ज्रः शाचर्ज्जञ्वखः ॥९७।। आङ्गार रस के नाम--(१) शङ्कार (२) श्णुचि (२) उज्ज्वल ॥१७॥ | ( हे वीररसस्य ) उत्साहवधंनो वीर वीर रस के नाम-(१) उत्साहवधन (२) ` वीर्‌ ( सक्च करुणरसस्य ) काख्रयं कर्णा धुणा

१-- नायसवशाखे-

शृङ्गार-हास्य- करुण-रोद्र-वरीर-भयानकाः

वं मत्पषट्मुतसंन्ञो चेत्यष्टौ नाय्ये रमाः स्पत; श्रगाररस का उदाहरण-

किमिद बहुभिरुक्तोयुक्तिशूत्येः प्रलापेद्र॑यमिह पुरुषाणां सवेदा सेवनं.यम्‌ अभिनवमद्लीलालालसं खन्दरो णां स्तन- भरपरिखिन्नं यौवनं वा वनं वा ।- ( भ्ोद्धटस्य ) वीररस का उदाहरण-

छद्राः सन्त्रासमेते विजहितहरयो भिन्नमत्तेभकुम्भा युष्मददेषु लज्जां दधति परममी सायका निष्पतन्तः सौमित्रे तिष्ठ पात्रं त्वमसि नहि रपां नन्वहं मेघनादः किचित्स॑रम्भलीलानियमितजल्थं राममन्वेषयामि ( महा- नाटकस्य )

2

अमरकोषः

[ भरथर्मं काण्डं

~ ~ ~ „~ ~ ~ ~ ~ 4 ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ 0 ~ ~ ~ 0 0 0 ननम जर द्‌ जय वयद ययया 3 ----- - -----ग्ा-क--य ारययाया-याा- = ` - ~ -------- - =

-करुण रस के नाम--(१) कारुरय (२) करूरा (२) रणा (४) कृपा (५) दया (£) अनु- कम्पा (७) अनुक्रोश

( ऋणि हास्यरसस्य ) अथो दसः ।१८ हासो हास्यं दास्य रस के नाम- (१) हस (२) दास (३) दास्य ।॥१८]] ( ढे बीभत्सरसस्य ) बीभत्सं विक तिष्विदं दयम्‌ वीभत्स रस के नाम--(१) वीभत्स (२) विकृत ये दोनों शब्द तीनों लिद्धं पु-खरी-नपुं ) मेदहोतेदहें। ( चत्वारि अद्‌ गुतरसस्य विस्मयोऽद्शुतमाश्चयं चिजमपि

अद्भुत रस के नाम - (१) विस्मय (२) दरद्भुत (३) आश्वर्यं (४) चित्र | ( नव भयानकरसस्य अथ मेरवम्‌ ॥१६।।

करुणरस का उदाहरण - यास्यत्यय शकुन्तलेति हृदयं संस्पृषटमुत्करट्या कण्ठस्तम्भितवाष्पव्रृत्तिकलषश्िन्ताजडं दशनम्‌ वेक्व्यं मम॒ तावदीदृशमपि रनेदादरण्योकसः पञ्चन्ते गृहिणः कथं तनयाविश्लेषदुःखेनेवेः -( अभिज्ञानशाकुन्तलस्य ) हास्यरस का उदादरण- आदो वेश्या पुनर्दासी पश्चाद्भवति ठद्टिनी स्वोपायपरित्तीणा वृद्धा नारी पतित्रता॥ वीम रप्र का उदाहरण- उक्करत्योक्रत्य क्ति प्रथममथ पथूच्छो मभूयांसि मासान्यंसरिफिगपष्ठपिरडायवयवसुलमान्युग्रपृतीनि जग्ध्वा ्त्तलाखन्त्नेत्रः प्रकरितदशनः प्रेतरङ्कः करङ्काद ङ्स्था- दस्थिसंस्थं स्थपुटगतमपि क्रव्यमव्यग्रमत्ति ।-( मवभूतेः ) अटभुत रस का उदाहरण-- स्थाः स्वयं मूलविदिन एव पुत्रो विशाखो रमणी त्वपरां परोपनीते; कुमेरजल्ं फलत्यमीषटं किमिदं विचित्रम्‌

दारणं भीषणं मीष्मं घोरं भीमं भयानकम्‌ भयङ्कर ्रतिभयम्‌ *भयानक रस के & नाम-(१) भैरव (२) दारुण (३) भीषण (४) भीष्म (५) घोर (€) भीम (७) भयानक (=) भयङ्कर (&) प्रतिभय ( द्वे रौद्ररसस्य ) रोद्रं त्नम्‌ "रौद्र रस के नाम- (१) रद्र (२) उम्र अमी चिषु ॥२०।॥ चलुदंश | ये ( श्रद्थुत' से लेकर “उग्र तक) १४ शब्द्‌ रस के र्थ रयुलिङ्ग दँ ओर “रसवातले" रथं में तीनों लिङ्गां में होते दे ॥२०॥ ( पट्‌ भयस्य ) द्रस्रासो भीतिर्भीः साध्वसं भयम्‌

डर के & नाम-(१) दर (२) त्रास (२३) मीति ८४) भी ८५) साध्वस (€) भय) ( एकं विकारस्य ) विकासे मानसो भावः मन के विकार का नाम-(१) भाव ( एक रव्यादिसूचकरोमा्चादेः ) अञुभावो भावबोधकः ॥२९१।।

भयानक रस का उदादरण-- इदं मधोनः कलिशं धारासन्निहितानलम्‌ 1 स्मरणं यस्य दैत्यसरीगर्मपाताय केवलम्‌

--( दरिडिनः )

£ रौद्ररस का उदाहरण -

रे धृष्टा धार्तराष्टाः प्रबलमुजन्रहत्ताण्डवाः पाण्डवा रे वार्याः स-कृष्णाः शरुत मम वचो यद्रवीम्यध्वै वाहुः \

एतस्योत्बातवादोद्रःपदनृपखतातापिनः पापिनो- ४.५ पाता ह्च्छो शितानां प्रभवति य॒दि (५ पाध ] नास्या -- वागज्ञखुखरागश्च सत्तनाभिनयेन कवेरन्तगंतं भावं भावयन्‌ भाव उच्यते ~ नाट यशा वागङ्ग।मिनयेनेद यतस्त्वरथो ऽनुभाव्यते ब्रागज्ञोपाङ्गसंयुक्तस्त्वनमावस्ततः स्मृतः

लाव्यवगेः ] भाव का बोध करानेवाले ( रामाच्च आदि ) का नाम-(3) अचुभाव ॥>२१।। ( जीण अहकारस्य )

गर्वोऽभिमानोऽदङ्कार

मान( ) अहङ्कार ( एक मानस्य ) +मनथित्तसमुन्नतिः चित्त की समुन्नति ( बड्प्पन ) का नाम- ( १) मान ( नव परिभवस्य )

रीढावमाननावज्ञावहेनमसूत्तेणएम्‌ अपमान के नाम--( १) अनादर (२) परिभव (३) परीभाव (४) तिरस्क्रिया (५) रीटा ( £ ) बु ( ) अवज्ञा (5 ) अव- हेलन ( ) असृच्तण ।२२। ( पञ्च ख्ञ्जायाः ) मन्दाक्तं हीस्त्रपा चीडा खञ्जा लजा के नम--( १) मन्दाक्ञ (८२) दही (३) चषा (४) व्रीडा ( ५) लजना ( एकं पित्रादेः पुरतो जातर्ज्जायाः ) साऽपच्रपाऽन्यतः ॥२२॥ पिता आदि के सामने लजा करने का नाम--

(१) दरपच्पा || २।। ( दे क्षमायाः )

तान्तिस्तितित्ा

दूसरे की उत्नति दख सकने के नाम--

(१) तान्त (२) तितिन्ञा ( एकं परदव्येच्छायाः )

|

श्रन्थ पुस्तकों मे यह क्षोक अधिक न्क >.

1 ( षट्‌ दपंस्य ) दुर्पोऽवरेपोऽवष्टम्भाश्चन्तोदकः स्मयो मद्‌ः

दपै के & नाम-(१) दपै (२) अवलेप (३) श्रवष्टम्भ

(४) चिन्तोद्रेक (५) स्मय (£) मद

भांषाटीकासदितः

न्म्य 2, 2 (2९ ४, ६, „६ ^~ ष्णा -

अभिमान के नाम--( १) गर्वं (२) अभि-

अनादरः परिभवः परोभावस्तिरस्कियः ॥२२॥

अभिध्या तु परस्य विषये स्पा पराये विषय ( दूसरे के धन आदि) सें इच्छा करने का नाम- (१) अभिध्या

( ढे परभ्युदयासहनस्य ) अत्तान्तिरीर्ष्या

जह र्खन के नाम-(१) न्ञान्ति (२ भा-( (२) ( एकभथदानादिषु गुणेषु दम्भकस्वादिरूपदोषा रोपणस्य >) असूया तु दोषारोपो गुरोष्वपि ॥२४। पे लगाने ( अर्थात्‌ किसी के गुण मे दोष निकालने का नाम-- (१) असूया ॥२४।। ( त्रीणि वैरस्य ) वैरः विरोधो विद्धेष वैर करने के नाम- (१) > विरा रे नाम-(१) वेर (२) ( ज्ीणि सोकस्य 3) मन्यु-शोको तु शकः चखियाम्‌ अफसोस के नाम-- (१) मन्यु (२) शोकं ५७ रच. इनगं (१-२) प्लिङ्ग ओर ( ) सखरी- ( चीणि पश्चात्तापस्य , पश्च।त्तापोऽनुतापश्च विप्रतीसार इत्यापि।।२५॥ पचितानेके नाम-{( ) पश्चात्ताप (२) अनुताप (२) विप्रतीसार ॥२५॥ ( सक्च कोपस्य ) को प-करोधामषे-रोष-प्रतिघा खय्‌ करधो चखियो। रन नाम--(१) कोप ( २) कों (३) अमष (४) रोष ( ) प्रतिघ (&) रुष्‌ (७ ) छप्‌ इनम (१-५) पुल्लिङ्ग; (६-७) ख्रीलिज्ग हं

( एक शीरुष्य >) शचो त॒ चरिते शीलम्‌

< आचरण का नाम-(१) शील ( हे चित्तविश्नमस्य )

उन्मादश्चित्तविधमः ।२द।।

पागलपन के २, नाम-(१) उन्माद (२) च्ित्तवि्रम \\२६॥\ ( पञ्च स्नेहस्य ) ग्रेमा ना प्रियता दाद घरेम स्नेटः म्रेम के नाम-८ १) ब्रेमन्‌ (२) प्रियता (२) दादं (४) प्रेमन्‌ (५) स्नेह इनमें ( १ला ) पुल्लिङ्ग ( ४था ) नपुंसक हे ( हादश्च इच्छायाः ) अथ दोहदम्‌

इच्छा कत्ता स्परहेदा त॒डवाज्डा छिप्सा मनोरथः 11२७1 कामोऽभिखाषस्तषश्च ` इच्छा के १२ नाम-() दोदद्‌ (२) इच्छा (३) काञ्चछा (४) स्पृटा (५) ईदा (६) त्ष्‌ ( ) वाञ्छा ( = ) लिप्सा (€) मनोरथ (१०) काम (११) अभिलाष (१२) तर्ष ( इसमें दोहदः शब्द गाभेणी की अभिलाषा वाले अर्थं मँ मी प्रयुक्त होता है ) ॥२७॥ ( एकमतिप्रीतेः ) सोऽत्यथं खारुसा दयोः वड़ा चाटना का नाम-(१). लालसा | पु०-च्री लिङ्गो मेदहोताहै। ( द्वे धमचिन्तनस्य ) उपाधिना धमंचिन्ता धार्मिक चिन्ता के नाम-(१) उपाधि (र) धर्मचिन्ता इनमें (१) पँल्लङ्ग (२) खीलिङ्ग दे ( ढे मनःपीडायाः ) पुस्याधिमांनसी व्यथा ॥२८॥ मानसिक व्यथा (मन की बिथा) के नाम-

असरक्ोषः `

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[ थमं काण्ड 7/0 0-0-00 0 0 00 प” 000

( दे उक्कण्ठायाः )} उत्करठोत्कलिके सस्ते उत्करा के नाम-( १) उत्करठा ( उत्कलिका ये दोना खीलिङ्ग हं , ( दे उत्साहस्य ) उत्साहोऽध्यवसायः स्यात्‌ उत्साह के नाम-(८ १) उत्साह

अध्यवसाय ( एकमतिरायिताध्यवसायस्य )

वीयंमतिशांक्तेभाक्‌ ।। ङ्स वहत्‌ ताकत साध उत्साह्‌ रसने का नास्ङड

(१) वीये \\२&\\ ( नव कपटस्य )

कपटोऽदी ल्याज-द्म्भो पधयश्छदय-कतवे

कखतिनिकूतिः शाव्चम्‌ कपट कं £ नम-( १) कपट ८२ ) च्या.

(२) दम्भ(४) उपधि (५) चछञन्‌ ( <`

केतव ( ) कुखति ( = ) निकृति ( & )

इनमे (5) खीलिङ्ग के छोडकर पुं लिलिद्ध

(न

नपुंसक में हाता दै; (२-४) पुं; (५-&) नुस

( ७-= ) स्री; ( ) नपुंसक हाते हं ( दे कतव्यानवधानस्य > पमादोऽनवधानता ॥३ लपरवादी के नाम--(१) प्रमाद `> द्मनवधानता ॥२३०॥ ९२ ( चत्वारि कोठुकस्य ) कोतूदलं कोतुकं ऊतुकं कुतूह ग्राश्चयेजनकर खेल-तमश्चे के (१) कौतूहल (२) कोठुक (२) कुतुक (४) कचहस्त षट स्त्रीणां वलखसस्य ) |

(१) आधि (२) मानसी व्यथा इनमे (१) पुँल्लिङ्ग | खशां विास-विन्वोक-विभ्रमा लितं तथ्येष =-=

(२) चरीलिङ्ग है ॥२८॥ ( श्रीणि स्मरणस्य ) स्याच्चिन्ता स्मरतिराध्यानम्‌ स्मरण के नाम--(१) चिन्ता (२) स्ति (२) श्राध्यान

नाटरयशासख.- स्थानासनगमनानां हस्तश्रूननकमणां चेव

उत्यते विशेषो यः किटः लासः स्यात्‌ इष्टानां भावानां प्रा्तवभिमानगर्भ॑सम्भूतः सीणामनादरक्रतो विभ्वोको नाम॒ विज्ञेय

1

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लाव्यवगंः ] भाषाटीकासदहितः

4 9 7 9 9 + + + 4 4 ~ = ~ ~ कच

देखा लीलेत्यमी हावाः क्रियाः शङ्गारभावजाः। शोक से उतरे हए चेहरे के चिपाने के लिया के श्ङ्गार से उत्पन्न हदाव-भाव क्रियाओं नाम--(१) अवहित्था (२) अआकारगुि ( अथीत्‌ चोँचले, नखरे ) श्रादि के नाम-- ( वे हषांदिना कमसु त्वरणस्य ) (१) विलासं (२) विन्वोक (३) विभ्रम (४) ललित | समो संवेग-सम्भरमो (५) हेला (६) लीला ॥२१॥ खुशी के कारण जल्दी करने के नाम- ( षट्‌ कीडामात्रस्य ) (१) संवेग (२) सम्भ्रम ये दोनं। समान लिङ्ग दव-केलि-परीदासाः कीडा खीखा नमे च३२। वाले (पुं०) कीडा मार के नाम--(१) द्व (२) केलि ( एकं परस्यामषंजनकहासस्य >)

(२) परीहास (४) कीडा (५) लीला (£) नर्मन्‌ ३२ | स्यादाच्छुरितकं हासः सोत्प्रासः ( त्रीणि स्वरूपाच्छादनस्य ) साभिप्राय (खिलखिला कर ) दास्य का नाम-- व्याजोऽपदेशो लदयं (१) आच्छुरितक वहाना करने के नाम-( ) व्याज (२) ( एकमिषद्धासस्य ) अपदेश (२) लच्य मनाक्‌ स्मितम्‌ ॥३७॥ ( त्रीणि बाक्रीरायाः ) थाडी हंसी ( सुस्कराहट ) का नाम--(:१ )

कीडा खेखा करूदनम्‌ | स्मित ३४ लड़कों के खेल-कूद के नाम-(१) कीडा | ( एकं मध्यमहासस्य ) (२) खेला (३) कूर्दन मध्यमः स्याद्धिंह सितम्‌ मध्यम दास ( साधारण र्दैसी) का नाम---

त्रीणि प्रस्वेदस्य )

धर्मो निदाघः स्वेद्‌ः स्यात्‌ (१) विहसित »

पसीना (या घाम) के नाम--(१) घमं ( दे शा 2. (२) निदाघ (३) स्वेद _ सोमा्वो रोमदषणम्‌

( दवे परिस्पन्दननाङस्य ) खड़े देने के नाम--(१) रामाच्च भलयो नण्चेष्टता ॥३३॥ | (२) रमहप !

बेहाशी के नाम-(१) प्रलय (२) नष्ट- नन्दिं < त्रीणि रोदनस्य )

चेष्टता ॥३२॥ करन्दितं रुदितं कष्टम्‌

राने के नाम-(१) कन्दति (२) सुदित

( हे आकारगोपनस्य ) (२) कुष्ट

अवहित्याऽऽकारगुतिः __ = = ( दं खादिविकासस्य ) विविधानामर्थानां वागङ्गाहार्यसत्वयुक्तानाम्‌ जम्भस्तु चिषु जम्मणम्‌ ॥३५॥ मदरागहषेजनिती व्यघ्यासो विभ्रमो नाम जम्हाई कै नाम-( ) जम्भ (२) कर चर णाङ्खन्यासः समभूनतरोठसमयुकतस्तु | स्मितलक्षणम्‌-- सुकुमारविधानेन खिभिरिदं स्त॒ खर्तमर्‌ ` ईषद्धिकसितैर्दन्तेः कटात्तेः सोष्ठवान्वितम्‌ एव भावाः सर्वेषां श॑गाररतसंश्रयाः श्रलक्ितद्विजद।रमुत्तमानां स्मितं भवेत्‌ समाख्याता वुधैहखां ललिताभिनयात्मिका विहसितलक्तषणम्‌ -- वागङ्गालक्गारेः क्लिष्टैः प्रीतिप्रयोजितेमधुरः श्राकुचितकपोलात्तं सस्वनं निःस्वनं तथा इष्टजननस्यानुक्ृतिर्खछ शेया प्रयोगज्ञे: प्रस्तावोत्थं सनुरागमाहुविहसितं बुधाः

दे

अमरकोषः

जम्भण \! इनमे (१) तीना लिङ्गं (२) द्वे कम्पस्य ) नपुंसक लिङ्ग मे हाता है ॥३५॥ | ( दे वंचनायुक्तभाषणस्य ) कम्पः | विश्रम्भो विसंवादः कोपने के नाम--(१) वेपथु (२) कम्प 1 ठगपने से बातचीत करने के नाम-(१) ( पञ्च उत्सवस्य ) विप्रलम्भ (२) विसंवाद श्रथ त्तण॒ उद्धर्षो मह उद्धव उत्सवः ॥२३८॥। घमादेश्चरनस्य, बाानां हस्तपादगमनस्य उत्सव के नाम-(१) क्षण (२ ) उद्धक वा, पिच्छिलादौ पतनस्य वा ) (न रिङ्गणं स्खलनं समे इति नायस्यवगेः

अपने धमे से च्युत हाने, अथवा वालको के वः ९. घुटनौ के बल से रंगने, अथवा पैर फिसल जाने अथ पातालमोगिवगेः टः

कै नाम- (१) रिङ्गण (२) स्खलन यें ( ^. 9 दोना नपुंसक लिङ्ग भे ते दँ \ अधोभुवनपातालं वङिसद्च रसातठम्‌

( पञ्च निद्रायाः ) नागखोकः |

स्यान्निद्रा शयनं स्वापः स्वप्नः संवेश इत्यपि | पाताल नाम (१) अधोयुवन (रम नीद के नाम--(१) निद्रा (२) शयन (२) | परताल (२) वलिसद्मन्‌ (*) रसातल (५) नागलोक स्वप (४) स्वप्र (५) सवेश ॥३६॥ ( एकादश विरस्य )

( ढे निद्राया आरस्थस्य ) | अथ कुहरं खषिरं विवरं बिलम्‌ ९९९. तन्द्री पमीडा िद्रं निव्येथनं रोकं रन्ध्रं श्वभ्रं वपा खषिः नीद के कारणं लस अने ( खमारी ) के बिल के ११ नाम-(१) कुर (२) नम--(?) तन्द्री (२) प्रमीला (२) विवर (४) बिल (५) छिद्र (€) निर्न्यथन (७ ( त्रीणि कोधादिना रलारसङ्कोचनस्य ) रोक (=) रन्ध्र (€) श्वभ्र (१०) वपा (९२ ्रकुरिभरक्कटिभ्रंकरटिः लियाम्‌ १९ (२, कोध आओआदिसे भह टेदी करने के नाम-- तावर भुवि + | (१) भ्रकटि (२) भ्रकुटि (२ ) ्रकुरि ये तीन ४९४ 1 त्ीलिङ्ग मे देते हं न" "^" ^ | ( एक कराया दृष्टेः ) "न एक सरन्धरस्य ) "(भु 8.5 --{ १) अटि) चछेदवाली चीज का नाम-(१) शुषिर यद्‌ ( प्च स्वभावस्य ) तीनों लिङ्गो मँ होता हे ॥२॥। | संसिद्धि-भ्रूती समे ।॥२७॥ पञ्च अन्धकारस्य ) स्वरूपं स्वभावश्च निसश्च शन्धकारोऽखिया ध्वान्तं तमिल तिमिरं तमः स्वभाव के नाम--(१) संसिद्धि (२) ग्रति अन्धकार के नाम (१) अन्धकार (२)

(२, स्वरूप (४) स्वभाव (५) निसर्ग ॥२७॥ ध्वान्त (२) तमिख (४) तिमिर (५) तमस्‌ इनस

(१ ला) पुंलिङ्ग ओर नपुंसक में; शेष (२-५)

नपुंसकम होते दें ( एक घनान्धकारस्य ¬) ध्वान्ते गादेऽन्धतमसम्‌ गाढे अन्धकार का नाम--(१) अन्घतमस्‌ एक क्षीणतमसः ) त्तीणेऽवतमसम्‌ थोडी अधियारी का नाम-(१) अवतमस ( एक व्यापकतमसः ) तमः ।३॥ विष्वक्‌ संतमसम्‌ चारो ओर फले हुए अन्धकार का नाम-- (१) संतमस ॥३॥ ( दं नागानाम्‌ ) नागाः काद्रवेयाः नागो के नाम-(१) नाग (२) काद्रवेय 1 द्वे नागानां स्वामिनः ) तदोश्चवरः शोषोऽनन्तः | नागों के राजाके नाम-(१) शेष (२) अत ( द्वे सपराजस्य ) वासुकिस्त सपेराजः सर्पराज के नाम-(१) वासुकि(२) सपरा ( दे गोनसस्य ) अथ गोनसे ॥४।॥ तिटित्स स्यात्‌ गोहुवन साप के नाम-( ) गोनस (२)

¢ ®. तिलिः ( त्रीणि अजगरस्य )

अजगरे शयुवांहस इत्युभौ द्रजगर के नाम-(१) अजगर (२) शयु

(२) वादस ( दवे जर्व्यारस्य )

दरगर्दो जखव्यालः

डोड्टा ( पानी के सोप) के नाम-(१) अलगद्‌ (२) जलव्याल्ल ( दं नविषस्य द्विखुखसपंस्य >) समो राजिक-डरड़भो ॥५॥ दुखा धारीदार सोपि के नाम-(१) राजिल (२) इरड़भ ॥५॥ ( दे चिच्रसपस्य >) मालुधानो मातुखाहि | चितकवरे सोपि के नाम- (१) माल्नुधान (२) मातुलाहि द्वे मक्तत्वचः सपंस्य ) निखुक्तो मुक्तकञ्चुकः केचुली चछोड हुए सोपके नाम-(१) निसुक्त (२) सुक्तकञ्चुक ( पञ्चचिरतः सपस्य ) सपः प्रदाङ्भुजगो जङ्ग ऽदि अुजज्म ॥द॥ ्शीविषो विषधरब्यक्री व्यालः सरीसृपः कुर्डरी गूह पाच्चक्चुःश्रवाः काकोदरः: फणी दवींकरो दीघेपृष्ठो दन्दश्को बिलेशयः उरगः पन्नगो भोगी जिद्यगः पवनाशनः ॥८॥ सपे के २५ नाम-(१) सप (२) प्रदाकु (२) भुजग (४) भुजङ्ग (५) अहि (€) भुजङ्गम (७)

राशीविष (=) विषधर (€) चक्रिन्‌. (१०) व्याल

अन्य पुस्तकों मे ये श्लोक अधिक मिलते है लेडिहानो हिरसनो गोकणः कञ्चुकी तथा कुस्भानसः फणधर हरभागधरस्तथा सपं के ओर = नाम-(१) लेलिहान (२) द्विरसन (२) गोकणं (४) वन्तुकिन्‌ (५) कुम्भीनस (€) फणधर (७) हरि (८) मोगधर ( एकं भोगस्य )

अहेः शरीर भोगः स्यात्‌

सपके शरीर का नाम- (१) भीग।

( दे अरदिद॑ष्टिकायाः ) रीरण्यहिदं ¢ सोधक दति के २नाम-(१) राशी (२) भदिदंष्टिका

= 2 ~~ - ~ - ` "चा ~ षि

(११). सरीखप (१२) कुरडलिन्‌ (१३) गृदपाद्‌ (१४) चच्तुःश्रवस्‌ (१५) काकोदर (१६) फणिन्‌

(१७) दर्वीकर (१८) दीषष्ट (१६) दन्द्‌ शक (२०) विल्लेशय (२१) उरग (२२) पन्नग (२३) भोगिन्‌ (२४) जिह्यग (२५) पवनाशन ॥&€-८॥ ( एक सपंविषास्थ्यादेः ) जिष्वाहेयं विषास्थ्यादि | सोपके विष, दड़ी दि का नाम-(१) द्ाहेय यह शब्द तीनों लिङ्गो मँ होता हे ( द्वे फणायाः ) ` सूफटार्यां तु फणा दयोः 1 सँपिके फन के नाम-(१) स्फटा (२) फणा ये शब्द दोनों लिङ्ग (पुंर री) मं होते हँ दं सपंत्वचः ) समो कञ्चुक-निर्मोको सप की केचुली के नाम--(८ १) कञ्चुक (२) निमकि ये दोनों पुलिङ्ग हं (णि विषमात्रस्य ) | च्वेडस्तु गर रुं विषम्‌ ॥६।। जहर के नाम-८१) च्वेड (२) गरल (३) विष इसमें (१) पं०, (२-२) नपुं° मं होते हैँ ॥६॥ ( स्थावरविषभेदानां प्रत्येकम्‌ ) पुंसि क्रीवे काकोल-कालक्रूर-दलाहलाः सीरा्टिकः शोक्रिकेयो बह्मपुत्रः दीपनः १० दारदो वत्सनाभश्च विषभेदा अमी नव सुश्रत मँ लिखा ३-- "= मन्न स्थावरं जङ्गमं चैव द्विविधं विषमुच्यते वृत्त, लता-पत्ता ओर पत्थर श्रादि जड़ पदार्थों रहने बाले विष को ^त्थावर' कहते हैँ सप, विच्छ, वर, चूदा, मकड़ा ्रदि मेँ रहनेवाले विष को “जङ्गमः कते दै माव प्रकाश मे प्रकार के विष लिते दै-- ` (१) कालक्रुट (२) दालाहलं (२) सोराष्टिकि (४) ब्रहम पुत्रे (५) भरदौषन (६) बत्सन।म (७) हारिद्र (=) सक्तुक (£) श्रङ्गिकर

अमरकोषः [ अथस काण्ड

> चा ¬ का क, [कि 9 सा

ये विष के मेद हैँ--(१) काकोल (२) काल्‌- कूट (२) हलाहल (४) सौराष्ट्रिक (५). शै क्किकेय (६) ब्रह्मपुत्र (७) ग्रदीपन (८) दारद्‌ (९) वत्स नाभ इनमे (१-३) पँल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग भं होते हँ ॥१०॥ द्वे गारुडिकस्य ) विषवेयो जाङ्गुलिकः सर्पं के विष को दूर करनेवाले वैय कै नाम--(१) विषवैय (२) जाङ्गुलिक ( दे सप्राहिणः ) व्याखाग्राद्यितुरिडिकः ।११।। सोप पकड्नेवाले के नाम-(८१) व्याल- ग्राहिन्‌ (२) अहितुरिडक ।॥११।। ( इति पातारुभोगिवगंः `)

अथ नरकवगं; ( चत्वारि नरकस्य >) स्यान्नारकस्तु नरको निरयो दुगंतिः खियाम्‌ नरक के नाम-(१) नारक (२) नरक ` (३) निरय (४) दुगेति इनमें (१-३) पु (४ ) छ्रीलिङ्ग में हाता है

( नरकभेदानां यक प्रथक्‌ भत्येकम्‌ ) तद्धेदास्तपनावीचि-महारौरव-रोरवाः ॥९॥ संघातः काटसूत्रं चेत्याद्याः

नरक के मेद- १) तपन (२) वीचि ( ३) महारौरव (४ ) रौरव (५) संघात & कालसूत्र इत्यादि ॥१॥

( एकं नरकस्थप्राणिनाम्‌ ) सत्त्वास्तु नारकाः \ <

नरक सेद का वसन भिपतय नव वि भेद का वणेन अ्रथिपुराण, बह्मार्डपुरार्‌ वामनपुराण, वाराहपुराण, ्रह्मवेवतेपुराण, माकैण्डेयपुरश्खु देवीभागवत, रोवपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण अदि खँ

सविस्तर मिलता हे | 1

सा

3,

४,०-१

प्रता;

भाषाटीक्ासदहितः ७९

नरक में रहनेवाले प्राणियों का नाम--(१) ग्रेत 1

( एकं वैतरण्याः ) वेतरणी सिन्धुः नरक की नदी का नाम-(१) वैतरणी ( एक नारकीयाया अरक्म्याः )

स्यादलदपीस्त निकः तिः ॥२॥

नरक की अशोभा का नाम-(१) निऋति ॥२॥ ( द्वे नरके हरास्प्रक्षेपस्य ) विषिराजुः

नरक मे जवदंस्ती ठकेलने के नाम- (१) विष्टि (२) राजू ये खीलिङ्ग है ( त्रीणि नरकपीडायाः ) कारण तु यातना तीववेद्ना नरक की पीडा के २नाम-(१) कारणा (२) यातना (२) तीव्रवेदना ( नव दुभ्खस्य ) "पीडा बाधा व्यथा दुःखमामनस्यं प्रसूतिजम्‌॥३ स्यात्कष्टं रच्छुमाभीलम्‌ दुःख के नाम-(१) पीड़ा (२) वाधा (३) व्यथा (४) दुःख (५) शरामनस्य (६) प्रसूतिज (७) कष्ट (८) कृच्छर (६) रामील ॥२॥ -जिष्वेवां भेदयगामि यत्‌ इनके मेयगामि (विशेषण) हने पर ये तीना लिङ्गो मं दाते हँ ( यथा- दुःखः सुता निगणः; दुःखा सेवा; सर्व दुःख विवेकिनः ) ( इति नरकवगेः )

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श्रत्र पीडादिचतुष्कं मनःपीडायाः। श्रामनस्यादि दयं वेमनस्य कष्टादि त्रयं शरीरपीडाया इति भेदः

्रथात्‌(१-४) मानसिक दुःख; (५.९) उदासी; (७-६) शारीरिके दुःख केनामदहें।

( पञ्चदश समुद्रस्य )

समुद्रो ऽच्धिरक्रपारः पारावारः सरित्पतिः उदन्वायुदधिः सिन्धुः सरस्वान्सागरोऽणंघः॥ रत्नाकरो जरनिधियाद्‌ःपतिर्पापतिः

समुद्र के १५ नाम-(१) समुद्र (२) अब्धि (२) अकूपार (४) पारावार (५) सरित्पति (£) उदन्वत्‌ (७) उदधि (८) सिन्धु (€) सरस्वत्‌ (१०) सागर (११) अणव (१२) रत्नाकर (१३) जलनिधि (१४) याद्‌:ःपति (१५) अपां पति ॥१॥ | ( ससद्रविशेषाणां एथकपृथगेकैकम्‌ ) तस्य प्रसेदाः त्तीरोदो खवरोदस्तथापरे ॥२॥

समुद्र के मेद-(१) क्षीराद्‌ (२ ) लवणोद इत्यादि (३ दध्यूद घृताद्‌ खरोद £ इन्द स्वादृद्‌ ) ॥२॥

| ( स्षविद्ातिजंरस्य ) अपः सनी भरून्नि वावारि सलिलं कमलं जलम्‌। पयः कीलालमस्तं जीवनं भवनं बनम्‌ ॥२॥ कवबन्धमुद्कं पाथः पुष्करं सवंतोमुखम्‌ अम्भोऽणस्तोय-पानीय-नीर-त्तीराम्बु-शम्बरम्‌ मेघपुष्पं घनरसः

जल के २७ नाम--(१) अप्‌ (२) वार्‌ (३) वारि (४) सलिल (५) कमल (६) जल (७) पयस्‌ (८) कीलाल (६) अग्रत (१०) जीवन (११) भुवन (१२) वन (१३) कबन्ध (१४) उदक (१५) पाथस्‌ (१६) पुष्कर ( १७) सवतोमुख ( १८ ) चअम्भस (१६) रणस्‌ (२०) ताय (२१) पानीय (२२) नीर (२२) चीर (२४) अम्बु ( २५) शम्बर ( २६) मेषपुप्प (२७) घनरस इनम प्‌ शब्द्‌ नित्य

खीलिङ्ग बहुवचनान्त में हाता हे ( यथा- श्पि-

भिमीजनं कृत्वाः ) ओर "वार पूर्वोत्तर साहचर्य

से खीलिङ्ग ओर नपुंसक लि ङ्ग मे हाता है ( दवे जरुविकारस्य )

निषु दे आप्यमस्मयम्‌

जलविकरार्‌ ( वफ, शबत श्यादि ) के नाम

ठ]

अमरक्छोषः

~ ~~~--~-~-------------------~--~--~----~------- (र (८ ~ (५ ~ ^~ ~ /-+ ^~ ^~ ~~ ^~ ~+ ~ ~+ ^~ ~ ^~ ^~ ^~ क~ ्रङः ररर

ष्ठि

~---~------ (3 >) आप्य (२) अम्मय तना लिङ्गां मं

दाते हँ \ | ( चत्वारि तरङ्गस्य ) . भङ्गस्तरङ्ग ऊमिवां खियां वीचिः लहर के नाम-(१) भङ्ग (२) तरङ्ग (३) ऊर्म (४) वीचि इनमें (१-२) पु, (३) पुंण्ची (४) खरीलिङ्ग मे देते दँ ( दे महातरङ्गस्य )

अथोमिषु ॥५॥ महः्षूल्टोट-कट्टोखो बड़ी लहर ज्वार ) के नाम-(१) उल्लाल

(२) कल्लोल ५॥ ( एक जानां ्मणस्य )

स्यादावर्तोऽस्मसा भ्रमः ैवर (जल के मर्डलाकार घूमने) का नाम-(१) आवतं # ( चत्वारि जलकणस्य ) षन्ति विन्दुपृषता; पुमांसो विप्रषः खियाम्‌६ पानी की वृद्‌ के नम--( १) प्रषत्‌ (२) बिन्दु (३) पृषत (४) विग्ुष्‌ इनमें (१) नपुंसक (२-३) पँल्लिङ्ग (४) स्रीलि ङ्ग देते दँ ॥\£\1 ( द्र चक्राकारेण जलानामधोयानस्य ) चक्राणि पुटभेदाः स्युः चक्र काटकर नीचे जानेवाले पानीकेर नाम-(१) चक्र (२) परुटमेद्‌ ( द्रे जलनि.सरणजाल्कस्य ) भरमाश्च जलनिगेमाः फ़व्वारा छूटने के नाम-(१) भ्रम (२)

जलनिगम ( पञ्च तीरस्य )

कूटं रोधश्च तीरं घतीरं तरं चिषु॥७॥ नदी के किनारे के नाम-(१) कूल (२) रोध (२) तीर (४) म्रतीर (५) तट इनमें (तट शब्द्‌ तीन लिङ्ग मँ हाता हे ॥५॥ ( एकैकः परतीरावरतीरयाः ) पारावारे परावाची तीर

गडढेके नाम-(१) कूपक (२) विदारकः

| नाव्यं जिलिङ्क' नौतायं

[ रथम काण्ड

नदी के उस पार वाले किनारे का नाम-(१) पार नदी के इस पार वाले किनारे का नाम- (१) अवार्‌ एकं कूलयो मेध्यस्य ) पां तदनन्तरम्‌ पाट दोनों किनारो के मध्यमाग ) का नाम- (१) पार ( दे जखमध्यस्थस्थानस्य ) द्वीपोऽसियामन्तरीपं यदन्तवारिणस्तरम्‌ (= टापू के नाम-(१) द्वीप (२) अन्तरीप ये दोनों शब्द पुंलिङ्ग ओर नपुसक लिद्ध मे दोव ` ्ं ॥=॥ ( एक जखाद्चिरनिर्गततरस्य ¬) तोयोत्थितं त्पुलिनम्‌ जल मं रती पड़ जाने का नाम-(१) पुलिन ( द्रं वाटुकामयतटस्य ) | संकतं सिकतामयम्‌ वालूदार किनारे के नाम-(१) सेकत (२) सिकरतामय ( पञ्च कदंमस्य ) निषद्वरस्तु जम्बालः पङ्कोऽख्ी शाद-कदंमे कीचड़ के नाम--(१) निषद्रर (२) जम्बाक्त (२) पङ्क (४) शाद्‌ (५) कदम इनमें ( इरा ) पु्िन्ग अर नपुंसक लिङ्ग में होता हे; शेष पुल्लिङ्क हं ।। २॥ ( द्वं ्रब्रद्धजटस्य निगममागस्य )

` जरोच्छसाः परीवाहाः

नल के नाम--( १) जलोच्छूवास (२

परीवाद |

( दे छष्डनद्यादौ कृतगतंस्य >)

चरू पकास्तु 1वद्‌ारका

सृखी नदियां मं जल के निमित्त बनाए ( एकं नौतरणयोग्यजलस्य )

नाव से पार होने लायक नदी आदिका नाम

वारिवगंः १० ]

(१) नान्य यह तीनों लिङ्गो मे होता है ( ज्रीणि नौकायाः >) लिया नौस्तरणिस्तरिः ॥९०॥ नवे के नाम-(१) नौ (२) तरणि (३) तरि ये तीनों शब्द च्रीलिङ्ग में होते हैँ ॥१०॥ ( चीणि अल्पनौकायाः ) | उडपं त॒ सवः कोलः = घरडइल क्रे नाम-(१) उडप (२) स्व

| (३) कोल

( एकमज्रत्रिमजख्वहनस्य ) स्रोतोऽम्बुसरणं स्वतः सोता का नाम--(१) स्रोत ( दे नदयादितरणे देयमूटयस्य ) ्रातरस्तरपरयं स्यात्‌ उतराई खेवाई ) देने के नाम-(१) मातर (२) तरपरय ( एकं “डांगी 'तिख्यातस्य ) द्रोणी काष्ठाम्बुवाहिनी ॥११॥ डांगी के नाम--(१) द्रोणी (२) काष्ठाम्बु- वाहिनी ॥११॥ दे नौकया चाणिज्यकारिणः ) सायानिकः पोतवणिक्‌ नाव से व्यापार करनेवालों के नाम---(9) सांयाच्निक (२) पोातवणिज्‌ दे नाविकस्य, नौप्ष्ठदण्डधारकस्य वा ) रणंध्यारस्तु नाविकः मलह्लाह ( या पतवार पकड़नेवाले ) के नाम-() कणोधार ( ) नाविक दे वहिग्रवाहकस्य ) नियामकाः पोतवाहाः दुष्ट जलजन्तु््रो से जहाज की रक्ता करने- वालों के नाम-(१) नियामक ( ) पोतवाह | दे नौमध्यस्थरज्जुबन्धनकाष्ठस्य ) \ कूपको गुणव्तकः ॥१२॥ मस्तूल के नाम-( १) कूपकं (२) गुणङ्ृत्तक १२

भाषारीकासहिततः ७७

^ >) > ~~~ (~ ~ [हि ऊक > सक > 1 स) स) # वि 4 ~

दे नौकावाहकदण्डस्य ) नोकादर्डः ्तेपणी स्यात्‌ डि के नाम--(१ ) नौकादरड (२) त्तेपरणी ( ढे नौण््ठस्थचालनकाष्टस्य ) अरिजं केनिपातकः पतवार के नम-(१) अरित्र (८२) केनिपातक (ढे पोतादेमंखापनयनार्थ काष्ठादिरचितऊदारस्य) अभ्रिः खी का्ठङ्कदालः नौका साफ करने के कुदाल के नास. (१) अभि (२) कष्टकुदाल इनमें भिः शब्द्‌ खीलिङ्गमें होता दै ( दवे नौस्थजलो्संजनपाच्रस्य ) | सेकपारं तु सेचनम्‌ ॥९३॥ डोलची या बाल्टी ( जिनसे नावम एकचरित ह्या जल उलीचा जाता है) के नाम--(१) सेकपात्र ( ) सेचन ॥१३॥ एकमद्धंनौकायाः ) क्रीबेऽधनावं नावोऽधं धी नाव का नाम--( १) अधनाव। यह शब्द नपुंसकलिङ्ग में होता हे ( एक नौकामतिक्रान्तजखादेः ) अतीतनोकेऽतिनु चिषु | नावकी अपेक्ता अधिक वेग से तैरनेवाला प्राणी ( मचुष्य, जलचर, पानी का बहाव ) आदि का नाम--( १) अतिनु यह तीनों लिङ्गो मं होता है जिष्वागाधात्‌ या से लेकर अगाधमतलस्परः ( श्लोक १५) तक के शब्द तीनों लिङ्गां मे होते हे ( दवे निमेरस्य ) प्रसन्नोऽच्छः अच्छा साफ निर्मल (जलादि) के नाम. ( ) प्रसन्न ( २) अच्छं

७८

( श्रीणि मलिनस्य ) कलुषोऽनच्छं आविः ॥१४॥ मेला, दला ( पानी आदि ) करे नाम- ( ) कलुष (२) अनच्छं ) आविल ॥१४॥ ( ्रीणि गम्भीरस्य ) निम्नं गसीरं गम्भीरम्‌ गिरा के नाम--(१) निग्न (२) गमीर (२) गम्भीर 1 ( एकसुत्तानस्य ) उत्तानं तद्धिपयये 1 उथला ( चला ) का नाम-( ) उत्तान (दे अ्न्तगम्भीरस्य )

अगाएवम्रतरस्पश अथाह के नाम- (१ ) अगाध (२) अरतलस्पश जरीणि धीवरस्य )

4 दास-धीवरो १५ नाम--( १.) कैवर्त (२ दास ( ) धीवर १५॥। , .„ (दे जारस्य `)

आनयः पसि जाट स्यात्‌ जाल केर नाम-- नाल इनमं (१ ला नपुसक होता है

( ढं शणसूत्रनारस्य )

शणसूत्रं पवित्रकम्‌

(१) आनाय (२)

सुतरी के वने हुए चणसत्र ( ) पवित्रकं

स्याट्‌

पाम { १) मत्स्याधानी (२) वलिशं

व॑शी ( मचली वेम 44

टोकरी के कुवेणी

केरिया

नाम---( , बलिश (२) मतस्यवेधन

अमरकोषः

4 0 (८

|

॥१६॥ रोहितो मदुगुरः शारो राजीवः `

पृथुरोमा भषो मत्स्यो मीनो - विसारः शङ्कखी

मषः( ) मत्स्य (४) मीन ८५) वेसारिणं ( ) अरडज ( ) विसार ( ) शकुलिन्‌

+

अष्टौ मर्स्यस्य ) 1

मदली के = नाम--( ) प्रथुरोमन्‌ (२)

( दे गडकस्य . अथ गडकः शङ्लाभेकः १७॥ ( गड़ई ) गलफरी महली के नाम--(१). गडक (२) शकुलाभेक ।१७। दे बडुदष्टस्य मत्स्यस्य ) सहस्यदष्र पाटीनः पाठी मछली के नाम-८ १) सहखरदष्ट ( ) पाठीन नि ( दे सुदस' इतिख्यातमतस्यविरोषस्य » उलूपी शिश्कः समौ सुस म्ली के नाम-( १) उलूपिन ( ) शिश्युक ( द्वे नल्वनचारिणो मस्स्यविदोषस्य >) नखमीनश्िखिचिमः गवा ( नरकट में रहनेवाली ) मछली

2

) पुदिक्न शौर (शलः नाम -(८ १) नलमीन (२) चिलिचिम।

( दे छभ्रमत्स्य विशेषस्य ) प्रोष्ठी शरी दयोः ॥१८। सहरी मछली के नाम--(१)

जाल के नाम--८ ) | ( ) शफरी ये दोनों शब्द्‌ पुं-खीलिङ्ग में होते

ह्‌ ।१८॥

( हे अण्डादचिरनिगेतमस्स्य सहस्य ) छु द्रारडमत्स्यसंघातः पोताधानम्‌

्रर्डे से तुरत के निकले हुए मछलियों छोटे वचं के नाम--( ) क्ुद्रारडमत्स्य्‌- संघात ( ) पोताधान

( मत्स्यविद्रोषाणां शूथगेकैकम्‌ ) अथो भषाः 1

|

वारिवर्गः १० ] भाषाटीकासदहितः ७९ विमिगिखादयश्च नाक (८ "कोकोडाद्‌लः ग्रजी भाषा ) के मचछलियों का वणन नाम-(१) नक (२) कुम्भीर रोद्र मछली का नाम--(१) रोहित ( त्रीणि कच्ुवाः इति ख्यातस्य ) मगरा मदछली का नाम-(१) मद्गुर पथ मरटीटखता २६ सौरी मछली का नाम--(१) शाल गराड़्‌ पद्‌: किञ्खुखुकः राया मद्ली का नाम-(१) राजीव कंचुवा के नाम-(१) महीलता (२). गर्ड्‌- 3 सौरा म्ली का नाम- (१) शकरुल पद्‌ (३) किञ्चुलक ॥२१॥ १) तई मछली ( इति आंग्लमाषायाम्‌ ) ( दवे जलगोधिकायाः ) ~ का नाम-(१) तिमि निहाका गोधिका समे दोलः मदछली को खा जनेवाली मद्ली का गोह्‌ के नाम-(१) निहाका (२) गोधिका नाम-(१) तिमिङ्िल आदि चरीणि जदूक्ायाः ) ( दे जखचरमात्रस्य ) रक्तपा तु जलखीकोयां अथ यादांसि जलजन्तवः खि्यां भूम्नि ऊल्यीकखः ।२२॥ जलजन्तु के नाम--( १) यादस्‌ (२) जोक के नाम-(१) रक्तपा (२) जल्लौका जलजन्तु इनमे (१ ला) नपुंसक ओर ( रा) | (३) जलौकस्‌ १-३) स्त्रीलिङ्गमेंदोते दै, पुल्लिङ्ग हे किन्तु जलौकस्‌ शब्द बहुवचनान्त दोता है ॥२२॥ ( जलजन्तुविद्रोषाणां पुथगेकेकम्‌ ¬) ( ढे अत्तिक्ायाः ) तद्धेदा िश्यमायोद्र-शङ्भवो मकरादयः ॥२०॥ | मुक्तास्फोटः खि क्ति जलजन्त्मों के भेद-- सिपी ( सितुही ) के नाम--(१) सुक्तास्फोट शिरस का नाम-(१) शिशुमार (२) शुक्ति) इनम (१ला) पु०, (ररा) खीलिद्ध ऊदबिलाव का नाम--(१) उद्र ोता दे सप का नाम--(१) शङ्क 1 ( ढे शह्भुस्य > मगर का नाम-(१) मकर ॥२०॥ शद्ध : स्यात्कस्बुर सियो ( द्वं ककटस्य ) शङ्खं के नाम--(१) शङ्ख (२) कम्बु ये स्यात्कुटखीरः ककरक दोनों शब्द्‌ सखीलिङ्ग के छोडकर दोनों लिङ्गां (सु° केकंडाके नाम-(१) कुलीर (२) | नपुं) दोते ककंटक (ब्रीणि कच्छपस्य ) ( दे सृक्ष्मशदधानाम्‌ )

कमे कमठ-कच्चुपौ | द्रहः शङ्गनखाः कटु्ा के नाम-( ) कूम ( ) कमठ छोटे शङ्ख के नाम--(१) चदरशङ्क (२)

| शङ्खनख ( | ( ३) कच्छप ( दवे म्राहस्य ) ` (ढे शम्बरूकानाम्‌ ) | शम्बूका जलशुक्तयः 11२३ ऽवहारः ५५०५७ के नाम-(१) ग्राह (२) अवहारं वावा नाम--( 1) +दक ,(२ ( हे कसय ) ` शुक्ति इनमे (शला) पु°-ल्ी श्रौर (ररा) खीलिङ्ग नक्रस्त कम्भीर हे ॥२२॥

[ प्रथमं काण्डं

मेदक ( दादुर ) के नाम-(१) मेक (२) मणक (२) वाम (४) शालूर (५) क्व (६) | ददुर्‌ |

( दे स्वल्पगण्डूपदजातेः किन्तुलकमार्यायाश्चापि | शिखी गरड्पदी | | छोटे कचुए श्रौर कचु के | शिली (२) गराद्रपदी ( दे मण्टूक्याः ) भेकी वर्षाभ्वी मेदकी के नाम- (१) मेकी (२) वर्षभ्बी ( दवे कच्छप्याः ) | कमरी इटिः ॥२७॥ | कदे के नाम- (१) कमठी (२) इलि॥२४॥ | ( एकं मदुगुरस्त्रियाः )

मदुगुरस्य प्रिया शङ्णी

॥4

भगरा म्ली की त्री संगी" का नाम- (१) “श्री 1

( दे जलकाकारजखचरविदोपस्य ») दुनांमा दीघेकोशिका के नाम-( ) दुर्नामन्‌ (२) दीषेकोशिका इनमे (१ला) चु, (ररा) छीलिङ्ग हे। ( दे तडागादीनाम्‌ ) जलाशया जलधारा; भील, बावड़ी श्रादि के नाम- जलाशय (२) जलाधार ` ( एकमगाधजनलादायस्य ) तत्रागाधजलो हदः ॥२५॥ | ऊणड (दह) का नम--(१) हद्‌ ॥२५॥ ( ढे निषानस्य ) आहावस्तु निपानं स्यादुपकूपजलाशये | ~ तालाव वगर; नजदीक गौ, घोडे नी पीने के जिए बनाए गए दौज के

नाम्‌ (६) आहाव (२) निपान |

चत्वारि कूपस्य ) |

पुस्येवाऽन्धुः परिः छरूप उदपानं त॒ पुंसि वा। कए के नाम-(१) अन्धु (२) प्रहि (३) | कूप (४) उदपान इनमें १-२ ) पुंलिङ्ग, (४) `

पु०-नपुंसक में होता हे ॥२६॥

द्वे कूपस्यान्तरे रञ्वादिधारणाथंदारूयन्त्रस्य )

नेमिस्िकाऽस्य गड़ारी का नाम-(१) नेमि (२) चरिका। एक कूपसुखे इष्टकादिभिबंदस्य ) घीनादो मुखबन्धनमस्य यत्‌ कए के जगत का नाम--(१) वीनाह (दे पुष्करिण्याः ) पुष्कारिर्यां तु खातं स्यात्‌ पोखरी के नाम-( १) पुष्करिणी (२) खात (दे अक्रत्रिमखातस्य, देवद्रारस्थजलखाशयस्यः वा) अखातं देवखातकम्‌ ।॥२७॥ निना बनाया पोखरा या देव-मन्दिर के श्मगि

के तालाब के नाम-(१) अखात (२) देव्‌- खातक ॥२७॥

दे स-पद्मागाधजरादायस्य )

पद्याकरस्तडागोऽस्नी

कमल पेद्‌ा दोनेवाल्े शौर थाह तालाब के

नाम-(१) पद्याकर (२) तडाग इसमें (तडागः शब्द पुं °-नपुंसक मं दोता हे

च्रीणि कत्रिमपद्याकरस्य ) कासारः सरसीं सरः

खोदवाए हुए कमलवाले तालाब के

नाम--(१) कासार (२) सरसी (३) सरस. इनमे (१) पुं, (२) छी, (३) नपुंसक मं होता हे।

जचीणि स्वल्पसरोवरस्य )

वेशन्तः पल्वलं चाट्पसरः

थोडे पानी वाले तालाव (गडदी, तलेया ) के

नाम-(१) वेशन्त (२) पल्वल (२) अल्पसरस्‌

दवे वाप्याः ) वापी तु दीधिका ॥२८॥

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वारिवगंः १०]

बावली के नाम-(१) वापी (२) दीर्धका ॥२८॥ | ( द्वे दगोदिपरितः खातश्य ) खेयं तु परिखा |

खां के नाम-(१) खेय (२) परिखा

एकं “बोधः इति ख्यातस्य ) | अआधारस्त्वम्भसां यत्र धारणम्‌

पानी के वध का नाम-(१) आधार

( जीणि वरक्षादिमूरे कृतजलाधारस्य स्यादाडखवाङमवटमावापः

थाला ( पौधे के जड़ के चारा तरफ पानी के लिए वनाए गए खद्‌क ) के नाम-(१) श्राल- वाल (२) ओआवाल (३) आवाप

( इादश्च नयाः )

17 अथ नदी सरित्‌ ॥२६॥ तर॑गिणी शैवलिनी तटिनी ह्ादिनी शुनी

स्रोतस्विनी दीपवती स्रवन्ती निञ्लगाऽऽपगा

नदी के १२ नाम-(१) नदी (२) सरित्‌ (३) तरंगिणी (४) शवलिनी (५) तटिनी (€) हादिनी (७) धुनी . (८) खोतस्विनी (€) दीपवती (१०) खवन्ती (११) निस्नगा (१२) पगा ॥२६-२०॥

( अष्टौ गङ्गायाः ) गङ्गा. विष्णुपदी जह्‌.तनया स्ुरनिन्नगा भागीरथी जिपथगा चिसख्नोता भीष्मसूरपि गङ्गाजी के नाम-(१) गङ्गा (२) विष्णु- पदी (२) जह तनया (४) खरनिञ्नगा (५) भागीरथी (९) त्रिपथगा (७) त्रिखोतस. (८) भीष्मस ॥२१॥ ( चध्वारि यञुनायाः )

कालिन्दी सूुयंतनया यमुना शमनस्वसा

अन्य पुस्तकों यह श्लोक अधिक मिलता है-- कूलङ्कषा निद्वरिणी रोधोवक्रा सरस्वती शर्थात्‌- नदी के शरोर नाम-(१) कूलङ्कषा (२) निभरिणी (३) रोधोवक्रा (४) सरस्वती २--्तितो तारयते मत्यान्नागास्तारयतेऽप्यधः दिवि तारयते देवांस्तैन त्रिपथगा स्मृता

भाषाटीकासहितः

2 2 4 0

2.

यसुनाजी के नाम-({१) कालिन्दी (२) सूर्यतनया (३) यमुना (४) शमनस्वसख ( चत्वारि नमंदायाः >) रवा तु नमेदा सोमोद्धवा मेकरूकन्यका ॥२२॥ नर्मदा नदी के नाम-(१) रेवा (२) नर्मदा (३) सोमोद्भवा (४) मेकलकन्यका ॥२३२॥ ( गौरीविवाहे कन्यादानोदकाज्जातनयाः ) करतोया सदानीरा पार्व॑तीजी के विवाद मेँ कन्यादान के जल से पैदा हुई नदीजो प्राचीन समय मेँ वङ्गाल ओर कामरूप देश की सीमा समी जाती थी ओर श्राज कल बङ्गाल के रंगपुर, दीनाजपुर शमादि नगरों होकर बहती है, उसका नाम-(१) करतोया (२) सदानीरा दवे कातेवीयांवतारितनद्याः ) बाहुदा सेतवादहिनी धवला नदी ( जिसे श्रव ब्रूढा राप्ती नदी कहते हैँ ओर जो अवध की राप्ी नदी की एक सहायक नदी है) के नाम-(१) बाहुदा (२) सैत- वाहिनी . ( दे शतद्रेवाः ) शतदुस्तु शवदिः स्याट्‌ | पज्ञाव की सतलज नदी के नाम--(१) शतद्र्‌ (२) शुतुद्रि ( दं विषाञ्चायाः >) . विपाशा तु विपार्‌ खियाम्‌॥।२३॥ पला की व्यास नदी (जिसने वसिष्ठजी के पाश को नष्ट कर दिया जब क्रि उन्दने विश्वामिन्र ्रारा मारे गये पने पुत्र के शोक से संतप्त दो फसी लगायी थी ) के नाम- (१) विपाशा (२) विपाश्‌ ये दोनों शब्द ख्रीलिङ्ग दैः ॥२३॥ ( दं श्ोणभद्रस्य ) शोणो हिरण्यवाहः स्यात्‌ सोन नदी (जो श्रमरकरण्टक से निकलकर पोच सो मील वहने के वाद्‌ पटना के ऊपर गङ्गा

ध्र

जी मिलती दै) के नाम-(१) शोण (२) दिरख्यवाह ` . एकं कत्रिसस्वल्पनयाः >) ङुस्याऽटपा छनिमा सरित्‌ ( बनायी गयी छोटी नदी ) का नाम- (१) कुल्या ( नदी विशेषाणां पथगेकैकम्‌ ) शरावती वे्वती चन्द्रभागा सरस्वती ॥२४॥। कावेरी गुजरात की साबरमती नदी का नाम-(१) शरावती बुन्देलखरड- की बेतवा नदी का नाम--(१) वेत्रवती

पज्ञाव की चेनाव नदी का नाम-(१) चन्द्र- भागा

दिल्ली की सरस्वती नदी का नाम-(१) सरस्वती दक्तिण की कावेरी नदी कानाम- (१) कावेरी ॥२४॥ सरितोऽन्य्ध | इनके अतिरिक्त ओर भी नदिर्थौ यथा-- कोसा नदी (८ यह्‌ गङ्गाजी की सायक नदियों सें अंत बड़ नदी है रौर इसका सङ्गम गङ्गाजी के ताथ वगालमें ह्र हे ओ्रौर वह स्थान अव तक तीरथ से विख्यात है ) का नाम- कौशिकी उत्तर की गराडकी नदी का नाम-गसडकी बन्देलखड की चम्बल नदी का नाम- परसरावेती दक्तिण की गोदावरी नदी का नाम-गोदावरी ( दरं नदीसङ्गमस्य ) सम्भेदः सिन्धुसङ्गमः नदियों के मिलने के (सगम) के नाम--(१) सम्मेद्‌ (२) विन्धुसङ्गम ( एकं छृत्रिमजलनिःसरणमा्॑स्य ) -‰ ली पसः पदन्ाम्‌

^ अन्याः कोशिकी-गरण्डकी -चर्मवती-गदाव्यादयः।

अमरकोषः

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[ प्रथम काण्ड जल के निकलने के लिए वनाए गए रास्ते ( यानी पनाला ) का नाम-(१) प्रणाली यह . पुं° श्रौर च्रीलिङ्गमेंदहोतादे। ( देविकासरयूद्धवयोः क्रमेणेकेकम्‌ ) विषु तूचरो २९ देविकायां सर्वां भवे द्‌ाविक-सारवो देविका ओर सरयू नदी में दोनेवाले पदार्थं के क्रमशः एक-एक नाम-(१) दाविक (२) सारव ये दोनों शब्द तीनों लिङ्गम दोते हे ॥३५।॥ दे सन्ध्याविकासिनः शुक्छकल्वारस्य ) सोगन्धिकं तु कलह्वारम्‌ सन्ध्या समय विकसित दोनेवाले सफेद कमल के नाम-(१) सौगन्धिक (२) कहार दे रक्तकह्वारस्य ) ठट्खकः रक्तसन्ध्यकम्‌ ३६ लाल कमल केर नाम-(१) दल्लक (२) रक्रसन्ध्यक ॥३६॥ ( द्वे ऊवख्यस्य ) स्यादुत्प कुवलयम्‌ सफेद कमल (फफूला ) के नम-(१) >> उत्पल (२) कुचलय ( दे नीखोत्पलस्य >) अथ नीलाम्बुजन्म इन्दीवरं नीलेऽस्मिन्‌ नीते कमल के नाम-(१) नीलाम्बुजन्मन्‌ (२) इन्दीवर द्र शुक्टोत्परस्य ) सिते कसुद-केरवे ॥२३७॥

सफेद कमल ( कोई) के नम-(१) कुमुद (२) कैरव ॥३७॥ . ( एकञत्परकन्दस्य )

शालूकमेषां कन्दः स्यात्‌ इन कमलो के जड का नम--(१,) शालूक

वारिपणीं त॒ ङम्थिका

.. इखुदिन्याम्‌

| + वारेवगः १० |

आषाटीकासहितः।

(6

ष्क

जलकुम्भी (काई) के नाम-(१) वारिपर्णी | रक्तोपरं कोकनदं

(२) कुम्भिका ( चीणि शहौवाखस्य ) जलनीखी तु शेवाटं शेवाखः सेवार के नाम-(१) जलनीली (२) शेवाल (२) शेवाल ( दे ङखदिन्याः ) अथ ऊुमुद्धती ॥३२८॥

कुमुदिनी ( कोई ) के नाम-(१) कुसुद्रती (२) कुमुदिनी ॥२८॥ ( च्रीणि कमलिन्याः >) नटिन्यां तु बिसिनी पद्चिनीमुखाः। कमलिनी के नाम-(१) नलिनी ८२) विसिनी (३) पद्मिनी आदि ( षोडश कमलस्य >) वा पुंसि पद्मं नकिनमर विन्द्‌ महोत्पलम्‌ ।३६। सहखरपच्नं कमं शतपत्रं कुशेशयम्‌ पङ्केख्हं तामरसं सारसं सरसीरुहम्‌ ॥४०॥ चिसप्रसून-राजीव-पुष्कराम्भोर्हाणि च। कमल के १६ नाम-(१) पद्म (२) नलिन (३) अरविन्द (४) महेत्पल (५) सहखपत्र (६) कमल (७) शतपत्र (८ ) कुशेशय ( & ) पड्केरुट (१०) तामरस (११) सारस (१२) सरसीरुह (१३) विसःग्रस्‌ून (१४) राजीव ( १५) पुष्कर ( १६) स्रम्भोरुह ये (१-१६) पुं °-नपुंसक मे हाते हँ ॥२६-४०॥ ( दवे सितसरोरुहस्य ) पुरडरीकं सिताम्भोजम्‌ सफेद कमल के नाम-(१) पुरडरीकं (२) सिताम्भोज च्रीणि रक्तसरोरुहस्य )

दथ रक्तसरोरुहे ।॥४१।।

१.-मूलनालदलोत्फुल्ला फलेः समुदिता पुनः “¦ :.. पञ्चिनौ परोच्यते प्राजेविसिन्यादिश्च सा स्यूता

॥. 7.3

लल कमल के नाम-(१) रक्तसरारुद (२) रक्तोपल (३) कोकनद ॥४१॥ ( दे पद्यादिदण्डस्य `) नारो नालम्‌ कमल के डंठल के नाम-(१) नालः (२) नालम्‌ ( दे खणारस्य >) अथास्जियाम्‌ ग्रणाटं बिसम्‌ कमल तन्तु के नाम-( १) णाल (२) बिस ये दोनों शब्द्‌ खरीलिङ्ग में नहीं होते केवल पुल्लिङ्ग ओर नपुंसक में हेते हँ ( एकमन्जादीनां समूहस्य ) अव्जादिकदम्बे षरडमस्ियाम्‌ ॥\४२॥ कमल आदि के समुदाय का नाम-(१) षरड यह पुं °-नपुंसक में हाता हे ॥४२॥ ( ढे पद्मकन्दस्य ) करहाटः शिफाकन्दः कमले की जड़ के नाम-(१) करहाट (२) शिफाकन्द्‌ ( दे पञ्मकेसरस्य ) किञ्नस्कः केसरोऽखियाम्‌। कमल के पराग (केशर ) के नाम-(१) करिल्ल्क ( ) केसर ये दोना शब्द पुं° श्नौर नपुन्मं हाते दहै ( हे पद्यादीनां नवपन्नस्य ) 1 नवदटप्‌ कमल आदि के नये पत्तों के नाम-(१) संवर्तिका (२) नवद ( दे कमर्बीजस्य `) बीजकोशो वरारकः ।४३॥ कमलगद्ा के नाम--( ) बीजकोश (२) वराटक ।॥४३॥ (इति वारिवगे: १०)

संवतिक

९५४ अमरकोषः [ अ्रथमं काण्डं

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( उपसंहारः >) . . ` | पातालमेागिवर्म, नरकवगे, वारिवगे आर इनके उक्तं स्व्व्योमदिकाखुधीशब्दादि स-नाख्यकम्‌ | मरज्ञवश देव, अखरः भेव आदिकामी पाताकभोगि नरकं वारि चैवा सङ्गतम्‌।१। 1 जत | नाम (

इत्यमरसिदङतौ आ: नामलि्गाडशासने मदमरासह के वनाए इए नाम (स्वर्‌ , स्वग

इत्यमरसिदङ्तो नामलिङ्ग शासने 1 = लिङ्गो ( पिङ्ग नचि नपुंसकलिङ्ग

( स्वरादिकारडः भ्रयम, साङ्ग पव समथित || २। 2.0 श:

४4 ` | (4 || को वतानेवाले नामलिङ्गाचशासन (्रमरकोष) नामक मे ( अमरसिंह ) ने स्वगेवग॑, व्योमवगं,

दिण्व्म : धीमी ग्रन्थ में स्वरादि वर्गे का पहला कार्ड साङ्गोपाङ्ग < | ~ त, अलग, धीवग, शब्दादिव्ग, नाख्यवग, | समाप्त हु्ा ॥२॥ .

इति श्रीमन्नालाल “अभिमन्यु एम० ए० विरचितायां 'धराःख्यामरकोषटीकायां प्रथमः कार्डः समाप्तः

तै (१

५1

द्ममखरकोषः दवितीयं काण्डम्‌

--अ ( प्रस्तावना ( द्रं शदः = फ), वगाः पृथ्वी-पुर-दमाभरदधनोपधि-्गादिभिः | खन्खत्तिका 1 {199४ ~ ““ , स-बरह्म-त्तज-विय्‌-शद्रेः साज्ञो पगेरिहोदिताः मिद्री के नाम-(१) यत्‌ (२) श्त्तिका ये 4 टीका--इस ( द्वितीय कारड ) मे साङ्गोपाङ्ग | (१-२) च्रीलिङ्ग हें | (१) भूमिवग (२) पुरवगं (३) शेलवगे (४) वनो- ( दे भ्रशस्तश्छदः ) पधिवगं (५) सिंहादिवगे (६) मनुष्यवर्ग (७) ब्र्म- प्रशस्ता तु ख॒त्सा गख॒त्स्ना खत्तिका। वग (८) त्तत्रियवगे (€) वैश्यव्म (१०) शुद्रवग यच्छी मिद्रीके नाम-(१) खत्सा(२) कटा जायगा ॥१॥ सत्स्ना अथ भूतनिवगेः एकं सर्वसस्याव्यशदः )

उवंरा सवेसस्याद्या

उपजाऊ ( सव अन को पैदा करनेवाली ) मद्री का नाम- (१) उर्वरा

( ढे क्षारश्त्तिकायाः )

स्यादूषः त्तारणग्डत्तिका ॥४।। ना, खारी मिद्री के नाम-(१) ऊष (२

परथ्वी के २७ नाम--(१) भू (२) भूमि (३) क्तार त्तिका इनमें (१) पिन | चला (४) अनन्ता (५) रसा (६) विश्वम्भरा (७) ( दे क्षारण्द्िदि्देदाय) _ ~ स्थिरा (=) धरा (€) धरित्री (१०) धरणि (११) ऊषवानूषरो द्वावप्य यलिज्ञो | त्ोणि (१२) ज्या (१३) काश्यपी (१४) त्तिति ऊपर जमीन के नाम--(१) ऊषवत्‌ (२) (१५) सर्वसहा (१६) वखमती (१७) वसुधा (१८) ऊपर ये दोनों शब्द किसी के विशेषण होनेपर उर्वी (१९) वन्धरा (२०) गोचरा (२१) कु (२२) | तीनों लिङ्गो मे होते हं ( यथा-ऊषवती ऊषरा परथिवी (२३) प्रभ्वी (२४) तंमा (२५) अवनि (२६) वा स्थली उषरे स्थलम्‌ ) मेदिनी (२७) मही ॥२-२॥

( सक्षचिदातिभरमेः ) भूभूभिरचलाऽनस्ता रसा विश्वम्भरा स्थिरा] ॥. धरा धारिजरी धरणिः क्तोणीञ्यां काश्यपी त्तितिः। ,। ”~ सवंसहा वसुमती वद्ुधोवीं वसुन्धरा

/ गोजा कुः पृथिवी पृथ्वी दमाऽवनिमेंदिनी मही

र» ~

मा ( दे स्थरुस्य ) अन्य पुस्तकों भूमि के ११ नाम अभिक स्थरं स्थली जो मिलते दै स्थल के नाम-(१) स्थल (२) स्थली

विषा गवरी धात्री गौरिखा म्भिनी क्षमा (वः भूतधात्री रतरगभां जगती सागराम्बरा नर अत ी०-(१) विपुला (२) गहरौ (३) धात्री (४) गो (५) | सम ने इला (६) कुम्मिनी (७) क्षमा (८) मूतधात्री (8) रलगभा जल ( मर्‌) दश के नाम-(१) मस (१०) जगती (११) सागराम्बरा (२) धन्वन्‌ ये दोनों यिन हं

५६ < 1

2 6

दे दरायक्ृष्शचे्रादेः ) द्वे खिलाग्रहते समे ॥५॥

तरिषु बिना जोते इए खेत आदि के नाम-(१)

खिल (२) श्रप्रहत ये दोनों समान अर्थं एवं तीनों लिङ्गा भे प्रयुक्त दोते दँ ५॥

( पञ्च भूतस्य ) जगती रोको विष्टपं भुवनं जगत्‌

नगत्‌ के नाम-{१) जगती (२) लोक (३) विष्टप (४) भुवन (५) जगत्‌

५९१ ( एकं भारतवर्षस्य ¬)

भारतवपे ( हिन्दुस्थान ) का नाम-( १) भारतचष

एकं प्राच्यदेरस्य ) शरावत्यास्तु योऽवधघे; ॥६॥ देशः पाग्दक्तिणः पाय्य.

`'एवती नदौ पूर्व -द्िएवाले # णवाले देश का

( एकसुदीच्यदेदास्य ) उदीच्यः पथ्िमोत्तरः शरावती नदी के पश्चिम-उत्त नाम-{१) दीय रवातले देशका

उवाक, कामरूप के १के२ नाम-(१) प्रयन्त

( द्वे मध्यदेशस्य )

` {म~ प्वदेशस्तु मध्यमः ॥9॥ मध्यदेशस्तु मध्यमः ।७]।

# यत्समुद्रस्य दिमादरेश्चेव दक्षिणम्‌ तद्भारतं नाम भारतो यत्र सन्तति;

चाठुवरयव्यवस्थानं यसिमन्देशे विद्यत

स्ेच्छविषयं प्राहरायावतेमत परम्‌ हिमवद्विन्ध्यये्मध्य यघ्रागिनशनादपि

वेतस्वत्‌

आरा समुद्रात्तु वं पूवादा समुद्राच पच्िमात्‌

[ द्वितीयं काण्ड | (29 (2 2 (2 ५.

4 मध्यदेश ( हिमालय ओर विन्ध्याचल के बीच कुरुते से पूर्व शोर प्रयाग से पश्चिमवाले देश ) के नाम-(१) मध्यदेश (२) मध्यम 11७11

( द्व विन्ध्यहिमाचर्योरन्तरस्य )

अर्यावतैः पुरयभूमिमेध्यं विन्ध्य-हिमाख्योः॥ विन्ध्याचल ओर हिमालय के बीच केदेश के नाम--(१) आर्यावतं (२) पुरयमभूमि

( द्र जनपदस्य )

नीचरञ्जनपद्‌ः

देश सुल्क ) के नाम-(१) नीद्रत्‌ (२)

| जनपद्‌ 1

( जीणि देरमाच्रस्य ) देश-विषयो तूपवतंनम्‌ देश के नाम-(१) देश (२) विषय (३)

उपवतेन ।)८॥ निष्वागोषएठात्‌

यहा से लेकर गोष्ठ" ( श्छोक १३ ) के शब्द्‌

तीनों लिङ्गो में दोते हे

( दवे नडाधिकदेशस्य )

नडप्राये नडान्रडर इत्यपि)

नरकट ज्यादा देनेवाले देश के नाम-

(१) नडवान्‌ (२) नडवल

( एक बहुवेतसदेदास्य )

कुमुद्न्ुमुद्‌ धाय

फपल (सफेद कमल) वाले देश का नाम--

(१) कुसुद्रत्‌

( एक बहुवेतसदेशस्य ) वेतस्वान्बहुवेतसे ॥६॥ बहुत वेत वाते देश का नम-(१)

` ---~ प्रत्यगेव प्रयागाच मध्यप्रदेशः प्रकीतितः ॥- मनु

तयोरेवान्तरं गिर्योरायांवत विदुवधाः ॥- मनुः पवेतयोहिमवद्धिन्ध्ययोयेदन्तरं मध्यं

आयान्तं देशो वुधैः रिष्टेरच्यते ।-मेधातिषिः `,

हे) * ति

भूमिवगंः 1] ----~-----~------<~--~ ~~~ ~ ~ 2 ( एक हदरितवृणभ्रचुरदेशस्य ¬) शाद्रः शाददरिते नयी 2 हरी घास वाले देशं का नाम-(१) शादल यह तीनों लिंङ्ग में प्रयुक्त हातां दै एक कदमयुक्तदेशस्य ) संजम्बाले तु पड्किखः @ कीचडवोते देश का नाम-( ) पंकिल ङ) ( प-खी-नपंसक ) ( दवे जख्बहुरुदेशस्य ) . जलप्रायमनूपं स्यात्‌ | तरार के नम-(१) जलप्राय (२) नूप। (१-२) पु -ली-नपुंसक एक नयादेरूपान्तदेशस्यं ) पुंसि कच्छुस्तथाविधः ॥९०॥ उसी प्रकार ( अनूपसदश ) नदी शमादि के संमीपवतीं देशं ( केच्छारे ) का नाम-(९) कच्छ यह केवलं पिङ्ग में ही दोता है, किं उपरोक्त ॥/ कथनानुसार तीनां लिङ्ग मं॥१०॥ कै. ( चत्वायक््मव्रायग्रेदाधेकस्य )

ईट-रोड-कंकड़वातले देश के नाम-(१) शंकरो (२) शकेरिल (२) शाकेर (४) शकंरावत्‌ इनमें (१) शकरा" शब्द केवल खीलिङ्ग मेँ होता है शेष ( २-४ ) पु-खी-नपुंसक लिङ्ग में देशं चवादिमो

द्यादि के “शक्रराः अर (शकरिलः शब्द व्द्‌ देश

ही नाम हे।

( चत्वारे बालुकाबहुरुदेशस्य )

एवपुन्नेयाः सिकतावति ॥११॥

वव श्रनुपदेशलक्तणम्‌-

केत ¦ , नदी-पलवल-रोलान्यः फुल्लोत्पलङुल्युतः हंस-सारस कारण्ड-चक्रवाकादिसेवितः शश-वराद-मदिष-रुर-रोहिकलाऽऽऊुंलः परभूतदरम-पष्पाढ्धो नीलसस्यफलान्वितः श्रनेकशालि केदार-कदलीदधविभूषित

` श्नपर्देशो ज्ञातव्यो वातश्लेष्ममयातमान्‌

भाषाटीकासहितः 1

खरी शकय शकरिखः शाकेरः शरकशावति

वालूवाले देश के नाम-(१) सिकतां (२) सिकतिल (३) सकत (४) सिकतावस्‌ ` इनमें सिकताः नित्य च्रीलिङ्ग बहुवचनान्त होता हे किसी शाचाय के मत से सिकताः ओरं शर्करा" यें दोनों शब्द बहुवचनान्त होते है; शेष पुं-खी-नधु- सक में ॥३१। |

एकेकं नयम्बुभिच्ष्व्यम्बुभिः सम्प्नदेशास्य ) ` देशो नयम्बुचष््यम्बुसम्पन्नवीहि पालितः ` स्यान्नदीमाठको देवमाचरक्ञ्चे यथाक्रमम्‌ ॥१२॥

नदी के जल से उपजे धानां द्वारा पाले गये देश का नाम-(१) नदीमातक (पु-ल्ली-नपु° )

वषा के जल से उपजे धानां द्वारा पाले गये देशं का नाम-(१) देवमातृक (पु-खी-नपु ०)॥१२॥

( एकं स्वधर्मपरायणसुराजयुक्तदेशास्य ) खराज्ञि देशे राजन्वान्स्यात्‌ 4;

` श्पने धम मे परायण अच्छे राजावाले देश का नाम-(१) राजन्वत्‌ ( पुः-खी-नयु सक) `

( एक सामान्यराजयुक्तदे्चस्य ) ततोऽन्यन्न राजवान्‌ साधारण राजावले देश का नाम्‌-( १) राजवत्‌ पु-खरी-नपु सक ) द्वे गवो स्थानस्य ) गोष्ठं गो स्थानकम्‌ गों के स्थान गौं का बाडा, गोशाला ) के नाम-(९) गोष्ठ (२) गोस्थानक ( एक भूतपवंगोस्थानस्य ) तत्त॒ गौष्ठीनं भू तपूवेकम्‌ ॥९३॥ पुराना गोबाड़ा का नाम-(१) गोष्टीन ॥१३॥ ( हे नदीपवतादीनासुपान्तथुवः ) पयंन्तभूः परिसरः

नदी पहाड़ आ्रादि के निकट की भूमि के नाम-(१) पयेन्तभू (२) परिसर इनम (शला) त्रीलिङ्ग ओर (ररा) पूंलिङ्ग हे

( हे सेतोः ) सेतुर खिया पुमान्‌

= =

५८ अमरकोषः [ (द्वितीयं काण्ड

~ 9 कि

पुल के नाम--( १) सेतु (२) श्रालि एक दूरशून्यच्छायाजरादि वर्जितमागंस्य >) इनभे (१ला) पुंचिद्ग ओर (ररा) खीलिङ्ग है प्रान्तरं दुरशयूल्योऽध्वा २३ ( त्रीणि वल्मीकस्य ) दूर, सूनसान, छाया श्रौर जलरहित राह का वामलूरश्च नाङ्श्च वल्मीकः पुंनपुंसकम्‌ || १४॥ | नाम--(९) प्रान्तर (नपुं) ` ` ~ व्यमोर चींटी, दीमक आदि से वनाया गया ( एकं चोरकण्टकादुपद्रवयुक्तमागस्य ) मिद्रकाढेर) के नाम-(१) वमलूर (२) कान्तारं वत्मे दगमम्‌ २.७) नाज (३) वल्मीक इनम (१-२) पुग, (ररा) | , चोर, कौट वैरः उपद्रवो से युक्त दुम राह | नपुंसक के अतिरिक्त पुलिङ्ग मं मी होता हे ॥१४॥ | का नाम--(१) कान्तार ( नपुं०, प° ) ॥१७॥ ` | द्वादञ्च मागंस्य ) ` द्र कोदाद्रयपरिमितस्य >) अयनं वतम मागांऽध्व-पन्थानः पदवी खतिः | गव्यूतिः खरी कोशयुगम्‌ ` | सरणिः पद्धतिः पद्या वतन्येकपदीति च॥९५॥ दो केस के नाम--(१) गव्यूति (२)

रास्ता ( राह, मागं, सडक ) के १२ नाम-- | कोशयुग उनमें ( ) खरीलिङ्ग शब्दार्णव के (१) अयन (२) वत्मेन. (३) मागे (४) च्रध्वन्‌ (५) | अनुसार पुँल्लिङ्ग ओर वाचस्पति के श्रनुसार नपु ` पथिन्‌ (६) पदवी (७) खति (=) सरणि (६) पद्धति | सक भी होता है ), (२) नपुंसक है 1

| (१०) पद्या (११) वतनी (१२) एकपदी इनमें ( एक चतुःरतहस्तपरिमितस्य ) | ( १-२ ) नुक (३-५) पुल्लिङ्ग ( ६-१२) घी नट्वः किष्कुचलुःशतम्‌ 1 लिङ्ग हँ ॥१५॥ | ( चतुः शत ) ४०० (किष्कु) दाथ का नाम- _ ( त्रीणि शोभनमागस्य ) (१) नल्व ( पुं ) अतिपन्थाः छुपन्थाश्च सत्पथश्चाचितेऽध्वनि ( दे राजमार्गस्य >) मागे राह) के 9 ) | ध्रण्टापथः संसरणम्‌ | `. | श्रतिपाथेन्‌ (२) न्‌ (३) सत्थ ) ये (१-३) मुल्क ग्रर्ड दू नाम-( ) षर्टापथ

( पञ्च दुमागंस्य ) व्य्वो दुरध्यो विपथः कदध्वा कापथः समाः१ बुरा रासा ( कुपथ, खराव माग ) के १0) अवा (2 दरष्वं (र विपथं (४)| = - कद्ध्वन्‌ (५) कापथ ये (१-५) पुल्लिङ्ग हें १६॥ किन्श्षीं पुस्तकों मे ये शलाक भिलते है- # ( दे अमा्ग॑स्य ) ( पच्च चावाभूम्याः ) अपन्थास्त्वपथं तुल्ये द्यावाघरथिव्यौ रोदस्यौ दयावाभूमी रोदसी मागाभाव ( जरह रसान दो उस) के | दिवस्ण्थिव्यौ नि नाम- दर्पा इनमें श्माक्राश-पृश्वी के नाम यावा्येवी २) . | | ^ ५. (य अपथ इनम (१) दसो (२) यावाभूमी (४) रोदसी (५) दिव््थिवी 9 => ( दे। चतुष्पथस्य ) 0.14 ( त्रीि लवणाकरस्य ) ; श्छंगारक-चतुष्पथे गञ्जा रमा स्यावणाकरः चोराहा कै नाम-( १) शङ्गाटक (२) नमक की खान के नम-(१) गन्ना (२) रुमा चतुष्पथ ये (१-२) नपुंसक हैँ (२) लवणाकर

(२ संसरण इनमें (१ ला) पुं०, (२) नपुं है ( एक पुरमागस्य ) त्पुरस्योपनिष्करम्‌ ९८!

{

` शुरवगंः २]. भाषाीकासदितः = . . ` ५९

शहर की सडक काः नाम-( ) उपनिष्कर (नपु०) ॥१८॥ इति भूमिवगेः )

मथ पुरवगः ( सक्च नगरस्य )

पुः स्त्री पुरी-नगर्यो वा पत्तनं पुटभेदनम्‌

१४

स्थानीयं निगमः

: , शहर (नगर) के नाम--(१) पूर्‌ (२) पुरी (३) नगरी (४) पत्तन (५) पुटमेदन (£) स्थानीय ( ) निगम इनमें ( ) खरीलिङ्ग (२२) खी- लिङ्ग ओर नपुंसकलिङ्ग (४-£६ ) नपुंसकलिङ्ग

(७) पल्लिङ्ग हँ

एकं शाखानगरस्य ) अन्यत्त यन्म्रूटनगरात्‌ पुरम्‌ ॥९॥

तच्छासखानगरम्‌ राजधानी के पास के छोटे शहर (उपनगर)

का नाम-(१) शाखानगर ॥१॥ वेश्यानिवासस्य ) वेशो वेश्याजनसमाध्रयः ररडी के घर के नाम-( १) वेश (२) वेश्याजन-समाश्रय दवे हटस्य, क्रय्यवस्तुदारायाः )

छ्रापणस्तु निषद्यायाम्‌

बाजार ( मरडी, हाट ) के नम-(१)

द्रापण (२) निषदा इनम (१) पुल्लिङ्ग (२) खी- लिङ्ग दह

( | दे क्रय्यवस्तुश्चाखापंक्तः ) विपणिः पण्यवीथिका ॥२॥ करे नाम--(१) विपणि (२) परय-

वीथिका इनमं (१) प-लीलिज्न ॥२॥

( त्रीणि भ्राममध्यमागस्य )

रथ्या श्रतोी विशिखा

गली (शहर के वीच का माग) के नाम-

| (१) रथ्या (२) प्रतोली ) विशिखा

(दे परेखोद्‌ टतग्छत्तिकार्टस्य, प्राकाराधारस्य चा) स्यायो वप्रमखियाम्‌ खाई से निकाली गयी सिद्धी कीढेर या कचा किला के नाम-( १) चय (२) वप्र इनमें (१) पु ल्लिङ्ग (२) पंलिङ्ग- नपु सक लिङ्ग दै ( त्रीणि यष्िकाकण्टकादिरचितवेष्टनस्प ) प्राकारो वरणः सालः लकड़ी-कांटे से बनाए गए घेरे के नाम- (९) प्राकार (२) वरण (३) साल ( एकं मरामादेरन्ते कण्टकादिवेष्टनस्य ) प्राचीनं प्रान्ततो चरतिः ॥३॥ नगर शमादि के सषास कटिके घेरा का नाम-(१) प्राचीन ॥२॥ ( दे भित्तेः ) भित्तिः खरी कुञ्यम्‌ सीत दीवाल ) के नाम-(१) भित्ति (२) कुड्य इनम (१) खीलिङ्ग (२) नपुंसक हे ( एकं बौडस्तूपस्य >). एडकः यदन्तन्येस्तकीकसम्‌ बौद्धं के स्तूप का नाम-(१) एटक 1 ( षोड ग्रहस्य ) गहं गेदोदवसितं वेश्म सद्म निकेतनम्‌ ॥६।॥ निशान्त-परस्व्य-सदनं भवनाऽऽगार-मन्दिरम्‌

गरहाःपुंसि भूम्न्येव निकाय्य-निख्याऽभ्टयाः

वोद्ध-धममावलम्बौ आदरणीय सृत व्यक्ति की दद्की को पृथ्वी में रखकर उक्तके चसे. शरोर ऊंची दिवाल उटा देते थे जिमे स्तूप कहते हँ ओर वे उसी कौ पूजा करते ये। जैसा कि महाभारत वनपर्वमे लिखा दै कि बोद्धकाल (कलियुग) मे लोग स्तूपं कौ पूजा करगे, ओर देवताओं कौ पूजा छोड दगे भारतवपे मेँ देवता्रों के मन्दिर दिख- लाई पड़गे विन्तु स्तूपों दी से पृथ्वो व्याप्त दोगी--

एडूकान्‌ पूजयिष्यन्ति वजेयिष्यन्ति देवताः (१६०,६५)

एडूकचिह्णा पृथिवी देत्रगरृहमूषिता ( १९०,६७ ) ` एतप्ार४३ = 3प्तत्‌181 9 प्प]१ऽ. [ र. वश्व]; [रोडणाफ पता) 150 \. 1) _ 850 ^+... २.4. ]

4 असरकोषः [ द्वितीयं काण्डं

= (~~~ =-= ~ ~~~, + 3 के १६ नाम--(१) ण्ट (२) गृहः (३) पोसरा, प्याऊ के नाम-( १) मपा (२) उदवखित (४) वेखमन्‌ (५) स्न्‌ ( ) निकेतन | पानीयशालिका | ` (७) निशान्त (८) परत्य (६) सदन ( १० ) भवन ( एक मरस्य ) (११) आगार ( १२ ) मन्दिर ( १३) गह (१४) | मटश््ाजादिनिलखयः निकाय्य ( १५) निलय ( १६ ) आ्रालय इनम छात्रावास या संन्यासियों के वास स्थान का (१-१२) नपुंसक,(रर) पुंलिङ्ग मी, ९३) पुह्लिन्न | नाम-( ) मठ नित्य बहुवचनान्त, (१४-१६) पुल्लिङ्ग हे ॥४-५॥ | (दे मचगरहस्य ) - 4 | ( चत्वारि सभागरृहस्य ) गञ्जा तु सदिरायदम्‌ः | वासः कसी दयोः शाला सभा शरावघर ( कलवरिया ) के नास-( ) | सभा घर के नाम-(१) वास (२ ) कुरी | गञ्जा ( ) मदिरागह ्‌ (३) शाला (४) सभा इनमें (१) पुल्लिङ्ग ( ) ` (दे गहमध्यभागस्य ) -पल्लिङ्ग--ल्रीलिङ्ग (२-४) च्रीलिङ्ग हे गभागारं वासगरहम्‌ ` :भि ( दे अन्योन्पाभिञुखशालाचतुष्कस्य ) घर के मध्यभाग (भीतर की कोटरियों सञ्जवनं त्विदम्‌ | के नाम-(८ १) गभगार (८२ ) वासगृह चतुःशालम्‌ ` (द प्रसवस्थानस्य ) धिर अकः ( २) ततुः अरिं सूतिकागहंम्‌ = ( दे उनीनां गृहस्थ ) | सौरीधर के नाम-( १) अरिष्ट ( २) मुनीनांतु पराशालोरजोऽस्तरियाम्‌ पतिका 1४ रगा ^ सुनि लेगों की सोपडियों के नाम-(१) $ ५, वातायन गवात्तः > के

| पणशाला (२) उटज इनमें (१ ) स्रीलि द्ध (२)

+ फरोखा के ~ षु © -नपुंसक हे धवा नाम ( ) वातायन ( ) ( दवे यक्ञस्थानध्य ( दे मण्डपस्य ) > ` चेत्यमायतनं तुशे ्‌ अथ मर्डपोऽस्ीं जनाश्रयः

यज्ञशाला कै नम-(१) चैत्य (२) आय- तन दोना नपु सक लिङ्ग हैः (दवे अत्रवदाखायाः ) वाजिशाला तु अन्दुरा घुडताल या अस्तवल के नाम-( १)

मरडप (लोगों के आराम की जगह )

नाम -( १) मरञप( २) जनाश्रय इस (१) पु-नपु सक मे, (२) पुल्लिङ्ग मेँ होता है ( एक धनवतां वासगरहस्य ) - हम्यांदि धनिनां वासः

वाजिशाला (२ मन्दुरा ~ ~= ¦ {11 श्नन्य पुस्तकों मे ये श्नोक श्रपिक मिलते है ( स्वणक्ारादीनां शालायाः ) ऊहिमोऽवी निबद्धा भूः | = आवेशनं शिरिपशाला 4

फशंवन्दी ( तदखाना ) का नाम-( ) ऊदिम

सनार--चित्रकार अदि कारीगरां के स्थान पु-नपुंखक मँ होता दै

` के नाम-(१) श्रवेशन (२) शिल्पिशाला ( दे जलायाः ) प्रपा पानीयशालिका ॥७॥

चन्द्रशाला शिरोग्रहम्‌ टार ( धूर ऊपर का वंगला ) केर नाम-(१) चन्द्रशाला (२) शिरोगरह "+ "कि

- ^

खेमा, डरा ) के नम--(१) उपकायां (२) उप-

खुरवगंः ] भावारटीकाखहितः ` -&

अमीरों के घर का नाम-( ) दम्यं (नपु- | इनमें (१) पुँ ्िङ्ग, (२) पु-नपु सक मं हाता है

सक )। ( चीणि द्ारभ्रको्टाद् हिद्धराग्रव्तिचतुष्कस्य ) ( एकं देवानां रात्तां गदस्य ) प्रघाण-प्रघणाऽलिन्दा बदिद्धरपरको्ठके ॥१२॥ प्रासादो देवभू भजाम्‌ द्रवाजे के बाहर चबरूतरे ( या बरामदा ) के देवालय ओर महल का नाम--(८ १) | नाम-(१) प्रवाण (२) प्रण (३) म्ासाद्‌ & ^ | अलिन्द्‌ ॥१२॥ दवे राजगरहस्य ) दवे देहल्याः ) सौधोऽस्त्री राजखदनम्‌ | गृहावग्रहणी देही राजाच्मों के घर के.२ नाम-(१) सौध (र) | देहली, ज्योद़ी के नाम-( १) गरहाव राजसदन इनमे (१) पु-नपु'सक श्रोर (२) नपु- | म्रदणी (२) देदली सक मँ होता है ( न्रीणि प्राङ्गणस्य ) दवे राजगरहसामान्यस्य ) अङ्गणं चत्वराऽजिरे उपकार्योपकारिका रोगन के नाम-(१) अङ्गण (२) चत्वर

कपडेके वने हुए राजाके घर( तम्बू, | (३) अजिर ये (१-२) नपुंसक हँ ( एक द्वारस्तस्भाघःस्थितकाष्टठस्य )

कारिका! ` अधस्तादाखुणि शिला ( एकैकमिरवरगरहविरोषाणाम्‌ ) दरवाजे के नीचे के चौकठ का नाम-( १) स्वस्तिकः सवतो भद्रो नन्यावघतादयोऽपिच॥१०| शिला विच्छन्दकः श्रमेदा हिः भवन्तीश्वरसद्मनाम्‌ ( एक द्वारस्तम्भोपरिस्थितकाष्टस्य ) राजयो के मेद-- | नासा दारूपरि स्थितम्‌ ॥९१३॥ चार दरवाजा यर तोरणसहित राजघर का नास ( दरवाजे के ऊपर के चौकट जिसको नाम-- (१) स्वतिक (पु"°-नपु °) मस्तक प्री या गरोशपद्यी कते हँ) का नाम-- एक के ऊपर एक कईं मजिल वाते राजघर | (१) नासा ॥१३२॥ $ ` का नाम--(१) स्वैतोभद्र ( पं०-नपुं° ) ( दे गुषद्रारस्य ) गोलघर का नम-(१) नन्यावतं (पु० नपुं°) | प्रच्छुन्नमन्तद्ीरं स्यात्‌ खूब लम्बे-चोड़े श्र खुन्दर राजघर का गुप्त दरवाजे के नाम--(१) अच्छन्न (२) नाम-(१) विच्छन्दक ( पुं नपुं ) ॥१०॥ | अ्नन्तदवोर | ( चत्वारि राज्ञा ्त्रीगृहस्य ) ( दे पक्षदरारस्य ) रयगारं भू मुजामन्तःपुरं स्याद्वरोधनम्‌ ॥१९ पन्तद्वारं पक्तकम्‌ शद्धान्तश्चाबरोधश्च द्रवाजे के बगल की खिड्की के नाम-- रनिवास के नाम--(१) अन्तःपुर (२) | (१) पक्तद्रार (२) पत्तक द्मव्रोधन (३) शुद्धान्त (४) वरोध ॥११॥ ( द्व पररप्रान्ते गरहाच्छाद्नस्य ) ( दवे हम्या्यपरिगरहस्य ) वरीक -नीभ्रे परल-प्रान्ते .

स्याद चोममस्तियाम्‌ पाटन छाने के सामानके नाम--( अटारी के नाम--( ) अहं (२) चौम वलीक (२) नीभ्र इनमे (१) नपुंसक मे (लिङ्ग

श्र 4 अमरकोषः | | द्वितीयं काण्ड

~ ~ 6 4 ~ 0 0 4

खी ) (२) नपुंसक मे दोता है \ कोई-कोई "पटलः | . नगर द्वारमें खखसे अने जने के लिए ओर “त्रान्तः इनको मिलाकर चार नाम वतलाते हैँ | वनी हई मिद्ध की सीदी का नाम--(१) दस्तिनिख ` ` ` (डे जदनस्य ) ( दव कपाटस्य ) .. | अथय परलं छदिः ॥१४॥ | 9 अथ तषु ` , छानी-छप्पर के नाम--( ) पटल (२) | कपाटमररः तस्ये | (१ ) नपुसक, (२) सान्त स्रीलिङ्ग | केवाड़ के नाम-(१) कपाट (२) अरर

= ऋआ | ये दोनों शब्द समान अर्थं वाले ओ्रर तीनों

गोपानसी तु वर्मी छादने वक्रदारुणि 0.1 9

५४११-५ ( एक कपाटरोधनकाष्टस्य )

( दे सौधादौ काष्ठादिरचितपध्षिगृहस्य ) गरी, वैवड़, सोकल, सिटकिनी का नाम--

कपोतपाटिकाया तु विरङ्कं षु-नपुंसकम्‌॥१५॥| (१) अर्गल यद पह्ग मे नहीं होताः किन्व स्त्री- , _ कूर के गञ्ज-द्रवा केर नाम--( १) | लिङ्ग चौर नषुसक मं दोता दै ॥१५॥

शतपालिक (र) विड इनम (९) लीलिद्ग (२) | (द्वे पाषाणादिकृतसौधाच्ारोदणमार्मस्य >)

पु ल्लङ्ग ओर नपु सक मेँ ॥१५॥

| [लिलत > आसोद णं स्यात्सोपानम्‌ स्ञी द्ाह्वारं प्रतीहारः ` ` नै सीढ़ी के नाम-(१) आरोहण द्रवाजे नाम-(१) द्वार्‌ (२) द्वार (३) दवे काष्टादिक्तारोदणमागंस्य >) @ वेद्याः, भाङ्गणादिषु कृतस्योपवेदास्थानस्य वा) काठक सीद केर नाम (९) निश्रेणि 34 स्याद्वितदिस्तु वेदिका | (२) अधिरोदिणी =, वेदीयाश्रांगन मेँ वैठने के लिए वनाये गये ना ( ढे सम्माजन्याः ) चबूतरे के नाम- (१) वितर्दि (२) वेदिका .ये | सम्म शोधनी स्यात्‌ (१-२) व्रीलिङगहै ` वद्नी, माद्र के नाम--(१) सम्मासैनी ( दे द्वारबाद्यभागस्य ) ` (२) शोधनी तोरणोऽस्त्री बहिद्रारम्‌ . (द भवकरस्य ) | ह. घर के बादर के फाटक के नाम- (१) संकरोऽवकरस्तथा ॥१८॥ | न्क इनमे (१) पु-नपुसक (२) | कृडा, करकट के नाम--(१) संकर (२) (दे नगरा ) 1 परदार ल॒ गोरम्‌ ॥१६॥ = " "बु नगर के फाटक के नाम---(१) पुरद्वार जी | (२) गोपुर ॥१६॥ निकलने के द्वार के नाम--(१) सुख (२) ( एकं नगरद्वारे सुखेनावतरणाथं कृतस्य निःसरण .. | # ` क्रमनिम्नस्य श्रत्छ्टस्य ) ` . ( दे समीचीनवासस्थानस्य ) ५१ कूरं ूददारि यद्धस्तिनखस्तस्मिन्‌ | | सन्निवेशो निकषणः

शेर्वगः 1

च्छे वासस्थान के नाम-(१) सन्निवेश

(२) निकर्षण ( दे मामस्य ) समो संवसखथ-म्रा

गोव के नाम-(१) संवसथ (२) ग्राम ये दोनों पुल्लिङ्ग हँ दे गृहरचनावच्छिन्नभूमेः ) वेश्मभूवांस्तुरस्जियाम्‌ घर वनाने लायक जमीन के नाम-(१) वेरमभू (२) वास्तु इनम (१) चरी लिङ्ग ओर (२) पुंलिङ्ग ओर नपुंसक होते हैँ ॥१६॥ ( द्र मामादिसमीपदेशस्य ) ग्रामान्त उपशट्यं स्यात्‌ गवि के पास खली जगह या पड़ोस के नाम-(१) म्रामान्त (२) उपशल्य ( दे सीमायाः ) सीम-सीमे स्जियासुभो

गवि की सीमा, डंड के नम-(१) सीमन्‌

` (२) सीमा ये दोनों खीलिङ्ग हे

दवे आभीरम्रामस्य ) घोष आभीरपल्ली स्यात्‌ ्रहीराना या हीरो के गवि के नाम-- (१) घोष (२) आभीरपल्ली ( ढे भिद्म्रामस्य ) पक्रणः शवराख्यः ॥२०॥ मीलों - सुसदरो-जगलियों के गेवि के नाम-(१) पक्रण (२) शवरालय ॥२०॥ ( इति पुरवगेः २)

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अथ शेलवगः; ३. ( श्रयोदश्ञ पवतसामान्यस्य ) महीध शिखरि-दमाभ्रदहाय-धर-पवेताः। ञ्मदि-गोत्न-गिरिप्रावाऽचल-शेर-शिरोच्ययाः॥

भाषाटीकासदहितः

7 (न ~ (८

षड

(७) शद्वि (८) गोत्र (€) गिरि (१०) अरावन्‌ (११) चल (१२) शैल (१३) शिलोचय ।॥१॥ दे खोकारोकस्य ) लोकाटोकथ्चक्रवारख पृथ्वी को घेरे हए पवेत के नाम-( १) लोकालोक (२) चक्रवाल दे धरिकूटाचरस्य ) निक्रट स्जिकङ्त्समो जिस पर्यैत पर लङ्का बसी हुई हे उस च्रिकरूट पर्व॑त के नाम-(१) त्रिकूट (२) त्रिककुद्‌ 1. ये दोनों पुंलिङ्ग हँ दे अस्ताचङस्य ) श्स्तस्तु चरमच्मग्चत्‌ द्मस्ताचल के नाम-( १) यस्त (२) चरमद्माश्रत ये (१-२) पुं ल्लिङ्ग हे दवे उद्याचलस्य ) उदयः पूवंपवतः ॥२।॥ उदयाचल के नाम-( १) उदय (२) पूवैपवेत ॥२॥

( सप्त पवंतविजेषाणाम्‌ ) हिमवान्निषधो विर्भ्यो मास्यवान्पारियाचकः। गन्धमादनमन्ये देमकरूटादयो नगाः ॥३॥

हिमालय पाङ (जिसका विस्तार ७५० कोस है ओर श्रीमद्भागवत के कथनानुसार १०,०००. योजन ऊच है, शरोर जिसकी एक चोरी, गौरी- शङ्कर, १६३२४ दाथ ऊंची हे ) का नाम-(१) हिमवत्‌

इलादृत्त वषे के दक्षिण हरिव के सीमापवेत का नाम--(१) निषध

विन्ध्याचल ( गुजरात से लेकर पूर्वं की रोर ३०० कोस फले हुए पर्वत) का नाम-(१) विन्ध्य

केतुमाल वषै के सीमापर्व॑त ( जो इलादृतवष

च्रसतयुत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम्‌

पाड के १३ नाम-(१) मदीध्र (२) शिख- | नगाधिराजः प्वापरो तोयनि धीवगाह्य स्थितः पृथिव्य्‌ इव्‌

, रिन्‌ (३) त््माशरत्‌ (४) अहाये (५) धर (६) पवैत ` मानदण्डः

के पूवे मे स्थितं हैः ) का नाम-( ) माल्यवत्‌

विन्ध्याचल की पश्चिमी पववतमाल्लो ( जिसमें

रावली मी है ओरं जा नमेदा के सुहाने से खंवात | यह पुं-नपुंसक लिङ्ग मेँ होता दै

की खाड़ी तक फली हुई हे ) का नाम--( १) पारियात्रक 1 भद्राश्चवषं (जो इलाद्रेतं वेषं के पथम में है) के सीमापवैत ओरं सुमेरुपर्वतं जिसे ्राजकल रुद्रहिंमालय कहते हँ, यही गंगा की प्रादुभीवस्यली गंगोत्री नामकं स्थोन है ) के एकं भागं का नाम-- (९) गन्धमादनं ( इस पवंत की भ्रणी बदरिकाश्रम से उत्तर-पूवं की ओर ङ्च दी दटकरं आरम्भं होती है )। , किंपुरुषवष ( हिमालयं के उत्तरं सितं ) के सीमापवेत का नाम-- (१) हेमकूट शादि \ ( पाषाणस्य `) पाषाणु-प्रस्तरव्राब्ोषदाश्मानः शिला षत्‌ पत्थरकै नाम-(१) पाषाण (२) प्रस्तर (२) ग्रावन्‌ (४) उपल (४) ्रशभन्‌ (६) शिला | दृषद्‌ इनमे (१-५) पुंलिङ्ग (६-५) च्नीलिङ्ग हे ( च्रीणि ल्लिखरेस्य ) कूटोऽस्तरी शिखरं ङ्गम्‌ हाड की चोरी के नाम-(१) कूट (२) शिखर (२) ङ्ग इनमें (१) पल्लिङ्ग-नपुंसकलिन्ग (२-३) नधुसक है ! ` (्रीणि पव॑तोत्व्तनस्थानक्य ) प्रपातस्त्वतरो भगु: ॥४॥ बरीहड़ या पाड से पानी गिरने के स्थान के नोम--(१) प्रपात (२) श्रतट (२) श्रगु ॥४॥ ( एकं पवंतमध्यभागस्य मेखराख्यस्य )

्रादिना मलय~चित्रकूट-न्दरादयः। रजतोद्विस्त केलोस ह्द्रफीलस्तं मन्दरः रपि विष्किन्ध-विष्किन्ध्यो वानराणां गिरो देयम्‌ मलयप्रशंप्ता-- कितने हेमगिरिशा रजताद्रिणा वा त्रोधिता हि तैवस्त रवतत श्वे मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण लोखोट- निम्ब्चश्जा अपि चन्दनानि

तओरकौर के पत्थो को नाम--(१) दन्तकाः1 `

करकोऽस्मी नितम्बो

पहाड़ के मध्य भाग का नाम-(१) कटकं 1 `

( त्रीणि पवंतसमभू भागस्य ) `

स्युः धरस्थः साजुरस्जिखाम्‌ पहाड़ की समतल भूमिके नाम-(१) सतु (२) प्रस्थं (३) सानु ये (१-३) पु ल्लिङ्ग ओर नपुसक लिङ्ग मे होते दँ === (दे यन्न पानीयं निपत्य बहुखी भवति तस्य स्थानस्य). < उर्सः प्रस्रवणम्‌ 4 जहो टपके कर पानी एकटा हो जाता है उसं

जगह के नाम-(१) उत्सं (२) प्रवण

( हे उत्सान्निगतजरुग्रवाहस्य `

पञ्चापि पयाया दत्यस्ये ) वारिप्रवादो निभरो भरः ॥१५॥ फरना के नाम-(१) वारिप्रवाह ( २) निकर (२) फर [ कोई “उत्सः श्रवणः आदि को इन्टीं शब्दों का पयायवाची मानते दै ] ॥१५॥ ( दे कृत्रिमगरृहाकारणिरिविवरस्य ) द्री तु कन्दे बोस््ी ¦ बनाई हुई युफाके नाम-(१) दरी (२) कन्द्र इनम (१) च्ीलिङ्ग ओर (२) पल्लिङ्ग के ग्रतिरिक्त कन्दरा" खीलिङ्गंमेभीरशोतादहै। `) | ( अङ्त्रिमगिरिविरस्य )

देवखातविले गुहा गरम्‌ | देवता द्रारा खोदे गएं चिल (निनो बना: गुफा) के नाम--(१) गुहा (२) गह्वर ( एक गिरः पतितस्थूरुपाषाणस्य ) 8 गणडशेास्तु च्युता स्थूरोपला गिरेः ॥६॥ | पहाड़ से गिरे हुए पत्थर की बड़ी. चदान `

के नाम-(१) गरडशेल ॥६॥ नकृ

दन्तकास्तं बहिसितिथकत्रदेन्ञाननिरता गिरेः ` पहाड़ के तिर प्रदेश से बोदर निकले हे शूल के

^~५^~\ ^-^ >+ = > करः

वनौषधिवर्गः |

( दवे रलाद्य॒त्पत्तिस्थानस्य खनिः स्जियामाकरः स्यात्‌ खान के नाम--(१) खान (२) आकर इनमे पटला खीलिङ्ग; शौर दूसरा पलिलङ्ग हे दवेः पव॑तसमीपस्थादस्पपवंतानाम्‌ ) पादाः पत्यन्तपवंताः पटाड के समीप दछोरी-छोरी पदटाडियों के

नाम-(१) पाद्‌ (२) प्रयन्तपवेत

| ` ( एकं पवतासन्नभूमेः >) उपत्यकाद्रेरासन्ना भूमिः पहाड़ के नीचे की भूमि कानाम-- (१) उपत्यका ` ( एकं पव॑तोध्वभूमेः ) ऊध्वेमधित्यका ॥७॥

पाङ के ऊपर की जमीन का नाम-(१)

्रधित्यकां ॥७॥ ( एकं मनःकिखादिधातोः ) ` धातुम॑नःशिकादद्रेः ` पवेत की-मेनपिल, हरताल, उवण, तवा, चदी, गर्जन, कसी, सीसा, लोहा, दिंगल्‌, गन्धकः, अभ्रक अआदि-वस्तु्ां का नाम-(१)धातु। ( एक धातुविद्ोषस्य ) | गैरिकं तु विशेषतः विशेष कर (१) गैरिक शेर) घातु है ( दे खतादिभिः पिहितस्थानस्य )

निङ्कुञज-कञ्जो वा गवे रुतादि पिहितोदरे

आदिना हरिताल-स्वणेताभ्रादिग्रहः तदुक्तम्‌ .- सुवण-रोप्य-ताघ्रि हरितालं मनःशिला गेरिकाचन-कासी-सीस-लोदा-सहिङ्गलाः। गन्धको ऽअक इत्याद्या धातवो गिरिम्मवाः।

` इनकी उत्पत्ति के विषय मे वेचक मन्थो लिखा हे कि ` . हरितालं दरेवींयं लद्मीवीरय मनःशिला

धारदं शिववीर्यं स्याद्रन्धकं पावतीरजः

` हरताल श्रोर मैनसिल मे इतना अन्तर हे कि हरताल श्रत्यन्त पीत ओर भैनसिलं रक्त वणे की हेती है

&

भाषारीकासदितः 1

4 0 4 4-५-५4 ४-4-८५ ~+ = ~ ~ ^~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ 0

६२

लताच्यों से चिरे हुए स्थान (कुञ्ज)के नाम-(१) निकुञज्ञ (२) कुञ्ञ 1 ये दोनों शब्द पँंल्लिज्ग के अतिरिक्त नपुंसकमें मीदहोतेर्हँ॥ ८॥

(ति शसन: १.)

अथ वनौषधिवगं; ४. ्‌ ( षट्‌ वनस्य > अटव्यरर्यं विपिनं गहनं काननं वनम्‌ जङ्गल के & नाम--(१) टवी .(२) ररय (२) विपिन (४) गहन (५) कानन (€) वन इनमें (१) ल्रीलिङ्ग (२-६) नपुंसके _ ` ` ( दवे महतो वनस्य ) ` महारण्यमरण्यानीं | भारी जङ्गल के नाम-(१) महाररंय .(२) अररयानी इनमें (१) नपुंसक ओर (२) खीलिङ्ग हे। ( दे. गहस्मी पोपवनस्यं >) | गरहायामास्व निष्कुयाः ॥९।॥ घर के नजदीक के वगीचे के नाम-(१) गरहाराम (२) निष्कुट 1१ ( दे कृतरिमब्क्षसमूदस्य ) आ्रारामः स्यादुपवनं छचिमं वनमेव यत्‌ बागर के नाम--(१) आराम (२) उपवन्‌ ( षक मन्त्रिणो वेश्यायाश्च गरृहस्योपवनस्य ) अमात्यगणिकागेहो पवने चत्तवारिकः ॥२] राजमन्त्री गणिका के वगर का नाम--(१) बृत्तवारिका ॥२॥ | (दव राज्ञः सर्वोपभोग्यवनस्य ) पुमानाक्रोड उद्यानं राज्ञः साधारणं वनम्‌ चना का साधारण वाग ( जरौ मन्तरियों गणिकां यां विदूषको मादि के साथ विविधं प्रकार के खेल खेले या दरूतादि से मनोविनोद ` करे उस वगीचे) केर नाम-( १) आक्रीड (२) उद्यान (१) पुल्लिङ्ग ( अमरमाला के अनुसार नपुंसक मं मी ) चओओर (२) नपुंसक है `

, . अमरकोषः, ` [ द्वितीयं क्काण्ड

६६ ' चि. <= ~~~ ~~~ ~~~ --~- ^ ~ ~ ~ ~ ^ च) + ~ ~ ~ ^ +

पं यत्र सस्त्रीको राजा क्रीडति तस्य वनस्य ) (एक पनसोदुम्बरादेः, ुममात्रस्य वा)

सत्यादेतदेव भ्रमद्वनमन्तःपुरोचितम्‌ ॥३॥ तेर एप्पाद्धनस्पतिः)

रनिवास की रानियों के साथ विविध प्रकार विना एूते फलनेवाले (कटहल, गूलर आदि) के मनोरंजन जिस वाग्रम किए जार्यं उसका | पेड या व्र्तमाच्र का नाम--(१) वनस्पति 1 `

नाम- (१) प्रमदवन ॥३॥ : एकं नीहियवादेः > ( पञ्च सान्तरपंक्तेः ) ओषध्यः फरुपाकान्ताः स्युः वीथ्यालिरावालः पंक्तिः श्रेणी जा फल अने के वाद सूख जाते (जैसे पङ्ति या पीति के नाम-(१) वीथी (२) | धान, जौ ) उनका नाम--(१). शओओषधी। - - मालि (३) श्रवलि (४) पक्ति (५) प्रणी दवे यथाकारं फरुधरस्य- ) :.< ^ द्वे निरन्तरपक्त्यपंक्ति साधारणायाः ) अवस्भ्यः फलेग्रहिः ॥६॥। लेखास्तु राजयः समय के नुसा. फलनेवाले पेडां के लकीर या रेखा के नाम-(१) लेखा | नाम--(१) अवन्ध्य (२) फलेग्रहि ये (१-२), . (२) राजि \ ये (१-२) खीलिङ्ग दु 1 ०-स्री ०-नपुंसक् में टोते दं ॥६॥ एकं बनसमूहस्य ) | +| ( त्रीणि ऋतावपि फररहितस्य `) चन्या वनसमूहे स्याद्‌ षी चन्ध्योऽफटोऽवकेशी वन-समूह का नाम--(१) वन्या ऋतु मं मी फल रहित रथात्‌ फलने वाक्ते ( दे नूतनाङ्करस्य ) पेडों के नाम--(१) त्रवन्ध्य (२) अफल (३) अङ्कुरोऽभिनवो द्धिदि ॥४॥ | त्वकेशिन्‌ ।(१-३) पु-खी-नपु °लिङ्गमे दोते है नया अखुश्रा का नाम-(१) अंकुर ॥४॥ ` (जीणि फरसदहितवुक्चस्य ) ( त्रयोदशा बृ्षस्य ) फठवान्फलिनः फली = वृतो महीरुहः शाखी विटपी पादपस्तखः फलयुक्त पेड़ के नाम-(१) फलवत्‌ . (२) अनोकहः कटः शाल; पलाशी दु-ढमागमाः॥५ || फलिन्‌ (३) फलिन. ये (१-३) पु-्ी-नपुसक लिय पेड के १३ नाम-(१) वर्त (२) महीरुह दोते दं

( अष्ट ्रफुलितदृक्षस्य ) प्रफुलोर्फुट-संफुछ-व्याकोश विकच-स्फुःटा & फुःट्टश्चेते विकसिते फूले हए पेडां के नाम-(१) प्रफुल्ल (२) उत्फुल्ल (३) संफुल्ल (४) व्याकोश (५) विकच एल कर फलने वाले (श्रा, जायुन शादि) | (९) स्फुट (७) फुक्ञ (=) विकसित (१-) का नाम- (१) वानस्पत्य घु-खी-नघु सक लिङ्ग मँ दोते ॥७॥ ग--- | (२) वीरुष (३) वानस्पत्य (४) श्रोषपि "क `

(२) शाखिन्‌ (४) विटपिन्‌ (५) पादप (£) तर (७) अनोकह (८) कुट (€) शाल (१०) पलाशिन्‌ (११) द्र (१२) द्रम (१३) अगम ॥५॥

( एकं पुष्पानातफरोपरक्चितवक्षस्य )

वानस्पत्यः फलः पुष्पात्‌

{९ वनस्पतिर्वीरधश्च वानरपत्यस्तथोषधिः जिन वृक्षों पर विना पएरूल कं ही फल लगेः उने फलवनस्पतिः पुष्परवानस्पत्यः फलेरपि वनस्पति कते है जिन वृतां पर एूल लगकर फल ओषध्यः फलपाकान्ताः प्रातानेर्वीरधः स्मृताः लगते उन्दं वानस्पत्य कहते दँ जो फल लगने के

वयक मन्थां के श्रनुसार द्धिद ( पृध्वी को फोड़ | भ्नन्तर सृख जाते दँ उन ओषधि कदते दँ जिनकी बेलि निकलनेवाले ) रवय की चार जाति है- (१) वनस्पत दती दै उन्दं वीरुध कहते दं 1

वनौषधिवर्गः 8 ]

स्युरबन्ध्यादयचिषु ये श्रबन््यः शमादिः (श्छोक ६) से लेकर विकसितः श्लोक ) तक के शब्द तीनों लिङ्ध महोतेदहें। ( च्रीणि श्ाखापच्ररहिततरोः ) स्थारएुवां ना श्रुवः शङ्खः ` ( डाली ओर पत्ते से हीन ) पेड़ के नाम-(१) स्थाणु (२) धुव (३) शकु इनमें ८१ ला) पुंलिङ्ग, नपुसकं समोर शोष (२-३) + पुंह्लिगमेंदोतेर्दै। एकं सृक्ष्मशाखामूखस्य शाखोटकादेः ) हस्वशाखाशिफः श्च पः ॥८॥ चोटी डाली ओर छोटी जड वाले पौधा [ जसे मधुय्िका ( सुक्ञेठी ), कण्टकारी (कटेरी) ] का नाम--(१) च्तुप ॥८॥ दे स्कन्धरदितस्य ) प्रकारे स्तम्ब-गुल्मो तना रहित पौधा जो एक जड़ से करई होकर